Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished Geet
ताल की आँखें सजल हैं
गन्ध की पाँखें विकल हैं
पेड़ पत्थर से हुए हैं
ख़्वाब नश्तर ने छुए हैं
पर अभी भी आस का दामन नहीं छूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा
मुस्कुराहट पर बनावट का असर दिखने लगा है
हर क़दम पर अब कोई अनजान डर दिखने लगा है
नित नए अनुभव हमारी आस को खलने लगे हैं
रेत पर कुछ भ्रम हमारी प्यास को छलने लगे हैं
कष्ट बढ़ते जा रहे हैं
प्रश्न चढ़ते आ रहे हैं
आँख से आराम का सपना नहीं रूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा
आँख के आगे कोई घेरा घनेरा छा गया है
है निपट एकांत, साये पर अंधेरा छा गया है
हर उजाला लुट चुका है, हर सहारा लुट चुका है
जो दिशा का ज्ञान देता वो सितारा लुट चुका है
आह का स्वर घुँट गया है
चाह का घर लुट गया है
हौसले का वक़्त ने झोला नहीं लूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा
इस प्रतीक्षा के परे फिर से अहल्या श्वास लेगी
और शबरी के चखे हर बेर की क़िस्मत जगेगी
जानकी के पास सागर लांघ आएगी अंगूठी
भोर से पहले उठा ले आएंगे हनुमान बूटी
कष्ट जब हद से बढ़ेगा
देव को आना पड़ेगा
ये अटल विश्वास हो सकता नहीं झूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सुख मिलने से भी कतराया
दुःख देहरी तक चलकर आया
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली
सुख को पाने की कोशिश में, हर दिन ख़ुद को सेज किया है
दुःख, जिसने किरदार निखारा, उससे ही परहेज किया है
अब मैंने अपने दुखड़े संग
हँसने की तैयारी कर ली
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली
सुख की सबको चाह रही है, दुःख का कोई चाव नहीं है
पर सुख जो मुझसे करता है, वो अच्छा बर्ताव नहीं है
सुख से भीख नहीं मांगूंगा
दुःख से ही अलमारी भर ली
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली
जितनी इसकी पूछ करूं मैं, उतने ताव दिखाता है सुख
जिस दिन से मुँह फेर चला हूँ, पीछे-पीछे आता है सुख
तब इसने दुत्कार दिया था
अब मैंने ख़ुद्दारी भर ली
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली
साथ न छोड़ेगा जीवन भर, सारे दोष क्षमा कर देगा
दुःख से हँसकर मिल लूंगा मैं, तो ये क्या से क्या कर देगा
दुःख से रायशुमारी कर के
सारी दुनियादारी कर ली
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
मुम्किन है कोई ख़ौफ़ मुझे थाम ले कहीं
ऐ हौसले तू दो घड़ी आराम ले कहीं
मैं मुश्किलों से टूट ही जाऊँगा शौक़ से
हिम्मत तो साथ छोड़ने का नाम ले कहीं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
वेदियाँ बाज़ार में आ तो गई हैं किंतु फिर भी
सिर्फ़ दौलत से इन्हें पाना अभी मुम्किन नहीं है
हर गुज़रता शख़्स इनके दाम पूछेगा यक़ीनन
हर किसी के हाथ बिक जाना अभी मुम्किन नहीं है
हाथ में अमृत लिए धन्वंतरि आ ही गए हैं
पर अमरता के लिए संग्राम होना है ज़रूरी
हाँ, कई राजा उपस्थित हैं स्वयंवर की घड़ी में
किन्तु सीता के लिए तो राम होना है ज़रूरी
द्वार पर अकबर खड़ा संगीत की अरदास लेकर
कह दिया हरिदास ने गाना अभी मुम्किन नहीं है
हर किसी के हाथ बिक जाना अभी मुम्किन नहीं है
बाँसुरी का मोल करना है बहुत आसान लेकिन
श्वास को सरगम बनाने की कला अनमोल ही है
आरती की तान में शामिल हुआ तो पूज्य है अब
शंख वरना लिजलिजे से कीट का बस खोल ही है
प्यास से चातक बहुत बेचैन है लेकिन समझ लो
प्यास पोखर से बुझा आना अभी मुम्किन नहीं है
हर किसी के हाथ बिक जाना अभी मुम्किन नहीं है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
तुम प्रपंचों में समय अपना खपाना
मैं समर के हर नियम को मान दूँगा
तुम बदलकर वेश मुझसे मांग लेना
मैं कवच-कुण्डल ख़ुशी से दान दूँगा
हाथ की सारी लकीरें हैं विरोधी
अब भला कुछ झोलियों का रीतना क्या
न्याय से या सत्य से सम्भव नहीं जो
झूठ कहकर उस समर को जीतना क्या
तुम निहत्थे वीर पर पौरुष दिखाना
मैं किसी अभिशाप को सम्मान दूँगा
धर्म के हाथों तिरस्कृत ही रहा हूँ
पाप का आभार ले-लेकर जिया मैं
दंश बिच्छू का सहा तो ये मिला फल
शाप का उपहार ले-लेकर जिया मैं
तुम धनुष के ज्ञान पर ऊर्जा लगाना
मैं बस अपने जाति-कुल पर ध्यान दूँगा
द्रोण, कुंती, कृष्ण, पांचाली, पितामह
मैं सभी के द्वार से लौटा अभागा
आज अर्जुन और मुझमें युद्ध तय है
आज पहली बार मेरा भाग्य जागा
जो मुझे कुछ भी न दे पाए जनम भर
मैं उन्हीं की इक ख़ुशी पर प्राण दूँगा
✍️ चिराग़ जैन