+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

डॉ कुमार विश्वास

अप्रैल 2002 में मैंने कवि-सम्मेलनों में कविता पढ़ना प्रारम्भ ही किया था कि रोहिणी (दिल्ली) के एक कवि-सम्मेलन में एक पतले-दुबले कवि के दर्शन हुए। देहयष्टि प्रभावी नहीं थी लेकिन उनके भीतर के कवित्व और आँखों के सम्मोहन से मैं अछूता न रह सका।
मुझे याद है कि उस दिन उस मंच का संचालन भी उन्होंने ही किया था। छोटे माइक पर अर्द्ध-पद्मासन लगाकर जब वे मसनद पर विराजित हुए तो ऐसा लगा कि विद्वत्ता साकार होकर मंच का मोर्चा संभाल रही है। मुखर हुए तो ऐसा लगा जैसे शब्दों का प्रक्षालन करके उन्हें साधकर प्रस्तुत करने का आदेश पालन हो रहा हो। कवि-सम्मेलन के बीच जहाँ कहीं हास्य का प्रसंग हुआ तो उनकी भाव-भंगिमा में शरारत घुल गयी।
उस दिन मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा और व्यंजना से आच्छादित उनके व्यक्तित्व और प्रेम की विरह धारा से निर्मित उनके कृतित्व में एक संपूर्ण कवि को अनुभूत किया। उस दिन के बाद लम्बे समय तक उनकी संगत हुई।
उनका सान्निध्य मेरे भीतर करवट ले रहे ‘कवि’ को रोचक लगने लगा। यह दौर उनके संघर्ष का भी दौर था। संघर्षशील व्यक्ति से अधिक समृद्ध गुरुकुल कोई नहीं हो सकता। सो मैं उनकी ख़ूब संगत करता और विपरीत परिस्थितियों में उनके निर्णयों की सफलता और विफलता से जीवन का पाठ पढ़ता रहता।
किसी का आकलन करना मेरी प्रवृत्ति का अंश नहीं है, सो उनकी गतिविधियों और क्रियाकलापों को कभी सही और ग़लत के तराजू में तोलने की मैंने आवश्यकता महसूस नहीं की। मेरा मत है कि हर व्यक्ति एक ‘प्रवृत्ति’ होता है, और प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। इसी कारण उनके साथ बिताए लंबे-लंबे दिन और रात में मैं कभी परीक्षक बनकर नहीं, केवल शिक्षार्थी बनकर उपस्थित रहा।
अपनी भरपूर मेधा और शब्द-मंजुषा से उन्होंने मुझे ख़ूब निहाल किया। मैंने देखा कि संघर्ष से उपजने वाली खीझ से आँखें नम करने की बजाय दंतपंक्ति को आपस में रगड़ लेना अधिक कारगर सिद्ध होता है। मैंने देखा है कि जब परिस्थितियाँ चारों ओर से आघात कर रही हों तो थककर बैठ जाने की बजाय टूटे रथ का पहिया उठाकर जूझ जाने में सफल होने की गुंजाइश बची रहती है। मैंने देखा है कि उन्होंने रथ का पहिया उठाकर दर्जनों चक्रव्यूह भेदे हैं।
जो किसी का बुरा नहीं होता वह निष्क्रिय होता है। जो सक्रिय होगा उसे आलोचना मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन अपनी आलोचना से बिलबिलाने की बजाय दोगुनी ऊर्जा से जुटे रहना किसी को कुमार विश्वास बना सकता है।
राजनैतिक जीवन हो अथवा साहित्य जगत्… डॉ कुमार विश्वास ने बुलेटिन भर-भर आलोचना झेली है। सोशल मीडिया के ट्रोलर्स की चोट सहना आसान नहीं होता। डॉ विश्वास ने वह चोट बार-बार भोगी है। जब किसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की निंदा की कोई उचित दर दुकान नहीं मिलती तो निंदक उसकी निजता के गोदाम में प्रवेश करके ‘नियरे’ आने का प्रयास करने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने न तो जनता की सिम्पैथी से उन्हें खदेड़ा न ही गोदाम पर ताला लगाया… बल्कि भरे गोदाम में उन्हें रीते हाथ बाहर लौट आने पर विवश कर दिया।
2002 से 2022 तक के इस लंबे सफ़र में मैंने उनका अपनत्व और परायापन… दोनों भोगे हैं, लेकिन इस परायेपन में भी मैंने उनसे यह सीखा है कि एक फोन कॉल से किसी भी पराएपन को अपनत्व में बदला जा सकता है।
मेरे एक शे’र को दुबई के मुशायरे में उद्धृत करके डॉ कुमार विश्वास ने मुझे यह सौभाग्य दिया है कि मुझे अज़ीम शायर जनाब अहमद फ़राज़ ने फोन करके आशीष दिया। इस बात के लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। मेरी एक क्षणिका की घुमावदार पगडण्डी को उन्होंने न जाने कितने ही लोगों तक पहुँचाया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। उनसे नाराज़ भी बहुत कारणों से रहता हूँ, लेकिन वह हमारी निजता का विषय है…!

✍️ चिराग़ जैन

होलीपुरा कवि-सम्मेलन

आगरा शहर पीछे छूट रहा था और राजमार्ग सकुचाते हुए एक समान्य सी सड़क में समा गया था। निमंत्रण देते समय ही होलीपुरा के वयोवृद्ध गीतकार शिवसागर शर्मा जी ने बता दिया था कि सड़क पर गाय-मवेशी बहुत मिलेंगे इसलिए गाड़ी आराम से ही दौड़ाना।
ज्यों-ज्यों हम आगरे की शहरी आबोहवा से बाहर निकल रहे थे, त्यों-त्यों सड़क किनारे हरियाली और सड़क पर गैया की मात्रा बढ़ती जा रही थी।
आसमान के बादल रह-रहकर हमारी गाड़ी पर रिमझिम से हस्ताक्षर कर रहे थे। सड़क के बीच मवेशियों की महा-पंचायतें लगी थीं। ऐसा लगता था जैसे गौवंश के महाकुंभ में अलग-अलग अखाड़े अपनी बिछावत सजाए बैठे हों। इनकी संख्या इतनी अधिक थी कि महानगरों में सरपट दौड़ती गाड़ियां यहाँ दबे पांव किनारे होकर निकल रही थीं।
इस वृंदावननुमा वातावरण से गुज़रते हुए जब काफ़ी समय बीत गया तो जीपीएस ने हमें मुख्य सड़क से लगभग एक पगडंडी पर उतार दिया। दोनों ओर खेत कतार बाँध कर खड़े थे और उनके बीच से हमारी गाड़ी लहराती हुई पगडंडी पर दौड़ रही थी। खेतों का साम्राज्य संपन्न हुआ तो हम होलीपुरा के रिहायशी इलाके में पहुँच गए।
रास्ता, मौसम और गांव… तीनों ने मन को रमणीक बना दिया था। हवा की नमी से मन भीगने लगा था कि अचानक गाड़ी एक बड़े से गेट में प्रविष्ट हुई और एक मैदान में जाकर रुक गई। सामने बड़ा सा फ्लैक्स लगा था जिसमें आमंत्रित कविगण की सूची में मेरा भी शानदार चित्र छपा था।
बैनर से लेकर आयोजक तक सादगी का समारोह था। गाँव के इंटर कॉलेज के टीनवाले सभागार में आयोजन था। दीवारें ख़ूबसूरत और महंगे पेण्ट से सजी नहीं थीं, लेकिन उन पर जीवन की वे इबारतें लिखी थीं, जिनको आत्मसात करके मनुष्य बना जा सकता है। स्टेज पर गद्दा बिछा था और उस पर मसनद लगाई गयीं थीं। आयोजकों की भागदौड़ (जो कार्यक्रम सम्पन्न होने तक यथावत बनी हुई थी) से गद्दे में सिलवटें पड़ गयी थीं लेकिन स्वागतकर्ताओं की मुस्कान में ज़रा भी सिलवट नहीं मिली।
एनसीसी कैडेट्स और अन्य कुछ बच्चे स्टेज के ठीक सामने बिछी दरी पर विराजित थे। शेष श्रोतादीर्घा कुर्सियों से सज्ज थी। हॉल में थोड़ी आवाज़ गूंज रही थी लेकिन साउंड सिस्टम इतना बढ़िया था कि हॉल की इको का दुष्प्रभाव कवियों की प्रस्तुति पर नहीं पड़ा।
कार्यक्रम का आयोजन सीधे-सादे गीतकार श्री शिवसागर शर्मा की दो पुस्तकों के लोकार्पण के उपलक्ष्य में किया गया था। पीले कुर्ते के नीचे सफेद रंग की धोती पहने शिवसागर जी बड़े ख़ुश थे। सारी व्यवस्था प्रयत्क्ष रूप से वे स्वयं ही कर रहे थे इसलिए कवियों के स्वागत, श्रोताओं की व्यवस्था, माइक, हॉल, पुस्तक लोकार्पण, माला, भोजन, मानदेय, दीप प्रज्ज्वलन की मोमबत्ती और सभी व्यवस्थाओं ने उनको अतिरिक्त व्यस्त कर रखा था।
प्रोफेसर हरि निर्माेही ने प्रारंभिक संचालन किया और पुस्तक लोकार्पण का कार्य सम्पन्न करवाया उसके बाद शिवसागर जी ने काव्यपाठ भी किया और अपने बेहतरीन गीत से कार्यक्रम का स्तर सुनिश्चित कर दिया।
इसके बाद मेरे संचालन में सभी कवियों ने सधा हुआ, संक्षिप्त किन्तु सार्थक काव्यपाठ किया। स्थानीय कवियों को सुनकर भी यह समझ आ गया था कि परिवेश गीत का है। फिर तो सभी कवियों ने अपने मन का काव्यपाठ किया। भोजन का समय होने पर कार्यक्रम में ब्रेक दिया गया। सबने मान-मनुहार से भोजन किया।
एक बार मुझे ऐसा लगा कि इस ब्रेक के कारण श्रोताओं की संख्या कम हो जाएगी लेकिन जब हम भोजन करके लौटे तो हॉल उतना ही भरा हुआ था।
कवि-सम्मेलन क्या था, कविताओं का महोत्सव था। गीत पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया देखकर मैं भी गीत सुनाने की हिम्मत कर सका; जिसे सफल कहा जा सकता है।
एक गर्म दुःशाला, एक डिब्बा गुंजिया, दो सद्य प्रकाशित पुस्तकें और ढेर सारा ‘मन’ लेकर गाँव से घर लौट आया हूँ लेकिन यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि तानसेन बनकर घूमते-घूमते आज हरिदास की कुटिया में पहुँचा तो अपनी अट्टालिकाओं का बौनापन समझ आ गया।
भव्य मंच, ग्लैमरस साज-सज्जा, चकाचौंध और बेतहाशा शानो-शौक़त से दूर आज गाँव का कवि-सम्मेलन करके लौटा हूँ। ऐसा लग रहा है ज्यों बहुत दिन तक पिज़्ज़ा और डबलरोटी खाने के बाद यकायक किसी ने चूल्हे के पास बैठाकर पानीवाले हाथ की रोटी, ताज़ी पिसी चटनी के साथ परोस दी हो।

✍️ चिराग़ जैन

सृजन और आलोचना

जिनका कोई अर्थ नहीं है, उन पर क़लम चलाना छोड़ें
जो चर्चा को दूषित कर दें, उन सबको समझाना छोड़ें
हमें ओस के कण चुन-चुनकर, अपने सपने सच करने हैं
अपनी ओस बचाना सीखें, उनके पेड़ हिलाना छोड़ें
✍️ चिराग़ जैन

कविता बुन लेता हूँ

शोर-शराबे में भी दिल की धड़कन सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ

इस दुनिया के छोटे-छोटे हिस्से घूम रहे हैं
लोग नहीं हैं, दो पैरों पर किस्से घूम रहे हैं
होंठों पर मुस्कान दिखी, मस्तक ग़मगीन दिखे हैं
हर चेहरे को पढ़कर देखो, कितने सीन लिखे हैं
इस सारी सामग्री में से मोती चुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ

देह भले ठहरी है लेकिन मन में चहल-पहल है
मौन धरा है अधरों पर और भीतर कोलाहल है
जिन आँखों में झाँका, उनमें ही संवाद भरा है
जो जितना चुप, उसमें उतना अनहद नाद भरा है
इस सरगम से मैं अपने गीतों की धुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ

मीठी यादों के तकिये पर सिर रखकर सोती है
मन पिघले तो दो आँखों की कोरों को धोती है
ठिठकी हुई खड़ी मिलती है किसी नदी के तीरे
कभी स्वयं ही चलकर आती, मुझ तक धीरे-धीरे
दो शब्दों के बीच जड़ी चुप्पी को सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
✍️ चिराग़ जैन

निकुंज शर्मा

हिन्दी कवि सम्मेलन जगत् ने यश तथा संतुष्टि के साथ मुझे कुछ अनमोल रिश्ते भी दिए हैं। आज से लगभग आठ-नौ साल पहले रीवा कवि सम्मेलन में जाते हुए अनामिका अम्बर के साथ एक बालक से भेंट हुई थी। उस समय तुकबंदियों को कविता माननेवाला वह युवा, आज मेरे सर्वाधिक प्रिय गीतकारों में से एक है। कई बार तो वह इतना श्रेष्ठ लिखता है कि मेरे लिए अनुकरणीय हो जाता है।
मुझे नहीं पता कि शोर-शराबे के इस दौर में इस युवक को कितनी पहचान मिल सकेगी। लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ कि यदि नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सुननेवाले कुछ एक कान भी शेष रहेंगे तो निकुंज शर्मा के गीतों की गूंज अनहद नाद से एकाकार होने का सामर्थ्य प्राप्त कर सकेगी।
यदि आप अपने व्हाट्सएप और फेसबुक पर चलताऊ शब्दाडंबरों के बीच शुद्ध गीत तलाशते हैं तो एक बार निकुंज के कुंजवन का विचरण अवश्य करना; मेरा वायदा है कि आपकी संवेदनाओं की साँस-साँस महक उठेगी।
वह अधरों से बाँसुरी में भी संगीत भरना जानता है और उंगलियों से गिटार को भी झंकृत कर देता है। अपने भीतर के कबीर को पोषित करने के लिए वह अपने जीवन की समस्याओं को खाद बना लेता है। मैं निकुंज से मिलता हूँ तो लगता है कि एक सम्पूर्ण कलाकार से मिल रहा हूँ।
आज अचानक यह सब इसलिए लिख रहा हूँ कि आज मेरे इस प्रिय गीतकार का जन्मदिन है।
ईश्वर तुम्हारी प्रतिभा को प्रतियोगिता के अभिशाप से बचाए रखे! ईश्वर तुम्हारी सृजनात्मकता को साधना के आभूषण पहनाए!
✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!