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दो साल बाद कवि सम्मेलन

दो साल के घनघोर निठल्लेपन के बाद मुझे कवि-सम्मेलन का आमंत्रण मिला तो मैं फूला नहीं समा रहा था। सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल न होता तो उस दिन मेरा आयतन दो गज की सीमा को पार कर गया होता। जिस मोबाइल की घण्टी से भी रेमडिसिवर की बदबू आने लगी थी, उससे फिर से होटल से उठाए हुए शैम्पू और साबुन की ख़ुशबू आने लगी।
कोविड के भयावह दौर से गुज़र कर जो धड़कन विरक्ति की झपताल में चलने लगे गयी थी उसने यकायक द्रुत गति की कहरवा का रुख़ कर लिया।
पुराने मकान की दीवार पर गड़ी हुई कील में युगों से लटक रहे रस्सी के टुकड़े जैसी बेकार मेरी उंगलियाँ अचानक हाईटेंशन वायर की तरह फड़फड़ाने लगीं। मैनें मोबाइल में पड़ी ट्रेवल एप को इन फड़फड़ाती उंगलियों से छुआ तो उस एप्प ने मुझे उसी दृष्टि से देखा जिस दृष्टि से कभी देवकी माई ने कंस को मारकर आए कन्हैया को देखा होगा।
‘डिपार्चर’; ‘अराइवल’; ‘ट्रेवल डेट’ और ‘पैसेंजर डिटेल’ जैसे शब्दों को पढ़कर मेरी आँखें भर आईं। भीगी पलकों से बुक हुई टिकट को देखा तो उसका एक-एक शब्द अजंता की किसी अप्रतिम पेंटिंग की तरह मन पर छप गया। जिस एयरलाइंस के लोगो को भी कभी नज़र उठाकर नहीं देखा था, उसके लोगो की एक-एक लकीर को आँखों में बसा लिया। पीएनआर ऐसे रट गया, ज्यों साधनारत किसी तपस्वी को मंत्र रट जाता है।
टिकट बुकिंग का अलौकिक आनन्द उठाने के पश्चात मेरी गर्दन ने घूमकर कमरे के उस कोने पर दृष्टिपात किया, जहाँ चार-चार पहियों की स्वामिनी एक अटैची दो वर्ष से जड़वत खड़ी थी। ज्यों ही मैंने उसे छुआ तो ऐसा महसूस हुआ कि बरसों से पाषाण की तरह जी रही किसी अहल्या में प्राण संचरित हो गये हों। मेरे हाथ लगाते ही वह अपने चारों पहियों पर एक साथ नृत्य कर उठी। हैंडल पकड़कर मैंने उस पर नियंत्रण न किया होता तो वह उसी क्षण दौड़कर हवाई अड्डे पहुँच गयी होती।
मैंने बड़े प्यार से अटैची को बिस्तर पर लिटाया। फिर सलीक़े से उसकी ज़िप को टटोल कर रनर को पकड़ा। अटैची की ज़िप खुलने की आवाज़ सुनने को व्याकुल कान उत्साह में आँख के करीब झुक चुके थे। रनर एक निश्चित दिशा में चलने लगा और अटैची की सीत्कार जैसी आवाज़ ने पूरे माहौल को रोमांचित कर दिया। दोनों रनर बौराए हुए तीतरों की भाँति अलग-अलग दिशा में दौड़ गये और मेरे बाएँ हाथ ने आगे बढ़कर लगभग इस अंदाज़ में अटैची के दोनों फलक खोल दिये ज्यों अलीबाबा सिमसिम के भीतर कोई ख़ज़ाने का बक्सा खोल रहा हो। अटैची खुलते ही मेरी आँखें अटैची से होड़ करने लगीं। हालाँकि यह मुझे पहले से पता था कि अटैची ख़ाली होगी लेकिन फिर भी मैं आँख फाड़-फाड़कर उस ख़ालीपन को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था।
अटैची में सजाने को जब मैंने कपड़ों की अलमारी खोली तो अलमारी के कब्ज़ों ने चूँ की आवाज़ करके मुझे सूचना दे दी कि कपड़े काफ़ी नाराज़ हैं, ज़्यादा चू-चपड़ मत करना। मैंने शर्मिंदगी से भरकर कलफ़ लगे कपड़ों की ओर देखा तो उन्होंने मुझे उसी हिकारत से देखा जैसे द्रौपदी ने चीरहरण के बाद युधिष्ठिर को देखा था। किंतु ढीठ होकर मैंने भी हैंगर पकड़कर एक जोड़ी पैंट-शर्ट को ठीक वैसे उतार लिया जैसे कीचक की अभद्रता के बाद भी कंक ने सैरन्ध्री को समझाने-बुझाने की हिम्मत जुटा ली थी।
लेकिन इस बार कपड़े मुझसे ज़्यादा ढीठ निकले। हैंगर से उतरने के बाद भी उनके माथे पर एक सिलवट पड़ी रह ही गयी थी। मैं समझ गया कि इस बार नरमी से काम न चलेगा। इतने दिन एक ही आसन में टँके-टँके कपड़ों ने अकड़ना सीख लिया है, सो मैंने भी इस्तरी लेकर उन्हें गर्मी दिखाई तब जाकर मुआमला शान्त हो सका।
एक-एक सामान को समझा-बुझाकर अटैची में जमाने के बाद अटैची के दोनों रनर्स को पुनः क़रीब लाया गया और महीनों से ख़ाली खड़ी बेचारी अटैची को तृप्त करके एक ओर खड़ा कर दिया गया। भीतर से भरे व्यक्तित्व की तरह अटैची का आत्मविश्वास भी देखने लायक था। पहले छूने भर से बौरा जाने वाली अटैची अब हिलाने पर भी ठहरकर पाँव बढ़ा रही थी।
मैं पूरी तैयारी करके मोबाइल में सुबह चार बजे का अलार्म लगाने लगा तो मोबाइल की घड़ी ने टोका – ‘इतने फॉर्मल क्यों हो रहा है बे, दो साल बाद कार्यक्रम का आमंत्रण मिला है। दस तो बज ही गए हैं… चार-छह घण्टे इस आमंत्रण का प्रचार कर… इस क्षण को एन्जॉय कर…!’
मुझे अपने टुच्चेपन पर शर्मिंदगी हुई। भरा हुआ कवि भी भला सोता है! यही तो समय है आत्मविश्वास के साथ बाक़ी कवियों को फोन कर-करके यह कहने का- ‘चलो, अब मैं सोता हूँ, सुबह जल्दी उठना है, छह बजे एयरपोर्ट पहुँचना है ना!’

✍️ चिराग़ जैन

अनुवाद : परिकल्पना और वस्तुस्थिति

चूँकि उड़ने के लिए पंख फैलाने आवश्यक होते हैं, इसलिए उड़ते हुए पक्षी का आकार, बैठे हुए पक्षी के आकार से बड़ा हो जाता है। भाषा का आकार विस्तृत करके उसे सुदूर यात्रा के योग्य बनाने के लिए ‘अनुवाद’ पंखों की भूमिका निर्वाह करता है। अनुवाद, भाषा के ज्ञानकोष को समृद्ध करता है। अनुवाद के पंख लगाकर ही एक भाषा की रचना अन्यान्य भाषा-भाषियों तक यात्रा करती है।
अनुवाद के महत्त्व को हम यूँ समझ सकते हैं कि रूसी साहित्य के फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की की रचना ‘अपराध और दण्ड’ को हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाना अनुवाद के बिना सम्भव नहीं था। इसी प्रकार रबीन्द्रनाथ टैगोर, शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ, लियो टॉलस्टॉय, जेन ऑस्टेन, वर्जीनिया वूल्फ, मार्क ट्वेन, व्लादिमीर नामोकोव, जॉर्ज इलियट, होमर, जॉन मिल्टन, मुंशी प्रेमचंद और कुर्रतुल-ऐन-हैदर समेत सैंकड़ों रचनाकार अनुवाद के जादुई कालीन पर बैठकर ही समूचे विश्व में लोकप्रिय हो सके हैं।
एक अनुवादक का दायित्व कई अर्थों में मूल लेखक से अधिक हो जाता है। वह केवल शब्दों का ही अनुवाद नहीं करता बल्कि स्रोत भाषा के सांस्कृतिक परिवेश तथा लक्ष्य भाषा के सांस्कृतिक परिवेश के मध्य भी सामंजस्य स्थापित करने का दायित्व निर्वाह करता है। साहित्यिक अनुवाद में तो यह दायित्व-बोध सामान्य अनुवाद की तुलना में कई गुना अधिक हो जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि अंग्रेजी की किसी कहानी का अनुवाद हिन्दी भाषा में किया जाए तो अनुवादक को इंग्लैंड के परिवेश तथा भारत के परिवेश का व्यवहारिक ज्ञान होना आवश्यक है। चूँकि इंग्लैंड में ठण्ड अधिक पड़ती है इसलिए ग्रीष्म ऋतु उनके लिए सुहावनी होती है। लेकिन भारत में यदि यह लिखा जाए कि ‘गर्मी की सुहानी ऋतु थी’ तो पाठक को यह हास्यास्पद जान पड़ेगा। इसी प्रकार हिन्दी में ‘गुलाब’ पुल्लिंग है और अंग्रेजी में ‘रोज़’ स्त्रीलिंग है। कोरा शब्दानुवाद किसी कृति की भावभूमि का मर्म स्पर्श करने की बजाय उसे बेढंग का बनाकर छोड़ देता है।
इसमें भी हिन्दी कविता के अनुवाद के सम्मुख एक कठिनाई इसकी छन्दबद्धता भी है। अनेक हिन्दी कविताएँ ऐसी हैं जिनमें कथ्य से अधिक आनन्द उनके शिल्पपक्ष का है। बुनावट के इस आनन्द को लक्ष्य भाषा तक ले जाना लगभग असंभव है।

हरि गरज्यो, हरि बरस्यो, हरि आयो हरि पास।
पर जब हरि, हरि में गया, तब हरि भयो उदास।।

इस दोहे में रचनाकार ने ‘हरि’ शब्द के विभिन्न अर्थों का प्रयोग करके श्लेष अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है, किन्तु इसको यदि किसी अन्य भाषा में अनूदित किया जाएगा तो यह दोहा तीसरी-चौथी कक्षा के पाठ्यक्रम की एक बेहद सामान्य उक्ति से अधिक कोई अर्थ न संजो सकेगा।
रीतिकाल की रचनाओं में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जो यदि किसी अन्य भाषा में अनूदित कर दिए जाएँ तो गूगल उन्हें ‘इनएप्रोप्रिएट कन्टेन्ट’ समझकर अमान्य कर देगा। किन्तु हिन्दी में वे ही रचनाएँ श्रेष्ठ सौंदर्य तथा काव्य-शिल्प के लिए रेखांकित की जाती हैं।
ग़ज़ल के रदीफ़-काफ़िये उसके सौंदर्य का आधार बन जाते हैं। उन्हें अनुवाद के माध्यम से किसी अन्य भाषा तक साध लेना लगभग असंभव है।

यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है

इस शेर में प्रयुक्त लफ़्ज़ ‘आह’ को ठीक इसी भाव के साथ किसी भी अन्य भाषा तक ले जाना सम्भव नहीं है, और इस लफ़्ज़ की इस प्रयोजनीयता के आभाव में इस शेर की प्रभावोत्पादकता भंग हो जाती है।
यही कारण है कि हिन्दी की छंदबद्ध कविताएँ या तो अनुवादकों की वरीयता पर नहीं आ पातीं या फिर अनुवाद के बाद उनकी रस-निष्पत्ति लगभग शून्य हो जाती हैं।
ऐसा माना जाता है कि एक अच्छे अनुवादक को स्रोत भाषा की सामान्य तथा लक्ष्य भाषा की विशेष जानकारी होनी चाहिए। जबकि मेरा मानना है कि एक अच्छे अनुवादक को स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा दोनों की विशेष जानकारी के साथ-साथ दोनों भाषाओं के मुहावरे की भी जानकारी होनी चाहिये। एक साहित्यिक अनुवादक को दोनों भाषाओं के सांस्कृतिक, सामाजिक तथा पौराणिक परिवेश की भी अच्छी जानकारी होनी चाहिए। तथा कविता का अनुवाद करनेवाले व्यक्ति को दोनों भाषाओं की सामाजिक संवेदना का भी गहरा ज्ञान होना चाहिए।
इस गुण के अभाव में किसी कविता का अनुवाद तो किया जा सकता है किंतु उस अनूदित कृति को ‘कविता’ नहीं कहा जा सकता।
इधर कुछ समय से हिन्दी के अनुवादकों ने अपना पूरा ध्यान कार्यालयी अनुवाद पर केंद्रित कर लिया है। राजभाषा विभाग में नौकरी प्राप्त कर लेना उनके अनुवाद कर्म का अंतिम लक्ष्य है। मैं यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि वर्तमान में अधिकतर राजभाषा विभागों में लिप्यन्तरण को अनुवाद समझा जा रहा है। यही कारण है कि सरकारी प्रपत्रों तथा दस्तावेज़ों में या तो अंग्रेजी अथवा अरबी के शब्दों को यथावत देवनागरी में लिख दिया जाता है या फिर उसको इतना क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ रूप दे दिया जाता है कि वह भाषा के उपहास का कारण बन जाते हैं।
मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि भाषा को जटिल बनाकर उसकी हँसी उड़वाने से बेहतर है कि उसे सहिष्णु बनाकर उसका सरलीकरण कर दिया जाए। कार्यालयी अनुवाद तथा वैज्ञानिक व तकनीकी अनुवाद में हमें यह बात स्वीकार करनी होगी कि विज्ञान, तकनीक तथा कार्यालयी व्यवस्थाओं का जो स्वरूप हमने वर्तमान में अंगीकार किया है, उसका उद्गम संस्कृत से न होकर अंग्रेजी अथवा अरबी से होता है। इस हेतु कम्प्यूटर को ‘संगणक’ कहने की ज़िद्द ठानने से बेहतर है कि हम उसे देवनागरी में ‘कम्प्यूटर’ लिखकर संतोष कर लें।
शब्द आयात करने में भाषा की कोई हानि नहीं होती, जबकि व्याकरण को अनदेखा कर देने से भाषा अपंग हो जाती है। कार्यालयी कामकाज में कई बार ऐसा फूहड़ अनुवाद किया जाता है कि हिन्दी के दस्तावेज़ में भी अंग्रेजी का व्याकरण शेष रह जाता है। इन काग़ज़ात को पढ़कर ऐसा लगता ही नहीं कि आप हिन्दी भाषा पढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने कभी अदालती दस्तावेज़ पढ़े हैं या निविदा आदि की सूचनाएँ पढ़ी हैं, वे मेरी बात से जल्दी सहमत हो सकेंगे।
गूगल ट्रांसलेशन की सुविधा से इस प्रदूषण में दिन दूनी, रात चौगुनी प्रगति हुई है। अंग्रेजी के पत्र को गूगल ट्रांसलेशन से हिंदी में कन्वर्ट करके कार्यालय की दृष्टि में हिंदी को और अधिक अनुपयोगी बनाने में कर्मठ राजभाषा कार्मिकों ने महती भूमिका निभाई है।
राजभाषा विभागों की प्रतिष्ठापना करनेवालों ने स्वप्न यह देखा था कि एक दिन सभी सरकारी दस्तावेज़ मूल रूप से हिंदी में होंगे और विभाषीय क्षेत्रों में पत्राचार करने के लिए उनको अंग्रेजी भाषा में अनूदित करके प्रेषित किया जाएगा। किन्तु अनुवाद की लापरवाही के कारण वस्तुस्थिति यह है कि आज दफ़्तरों में प्रत्येक पत्र मूलतः अंग्रेजी में है और राजभाषा के आँकड़े पूरे करने के लिए उनका अल्लम-गल्लम देवनागरी रूपांतरण करके उन्हें आवश्यक औपचारिकता के रूप में द्विभाषी बनाकर संलग्न कर दिया जाता है। इस अनूदित काग़ज़ की क्षमता तथा उपयोगिता का अनुमान स्वयं कार्यालय को भी होता है, इसी कारण अक्सर द्विभाषी दस्तावेज़ों पर यह डिस्क्लेमर दिया जाता है कि किसी विवाद की स्थिति में अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत नियमावली को प्रमाण माना जाएगा।
अनुवाद को उत्तरदायित्व के स्थान पर औपचारिकता बनाने का ही एक दुष्परिणाम यह है कि गणित, तकनीक तथा विज्ञान जैसे विषयों के हिन्दी अनुवाद केवल ख़ानापूर्ति के लिए प्रकाशित किये जाते हैं। उनकी उपादेयता के विषय में न तो अनुवादक गम्भीर दिखाई देते हैं, न ही प्रकाशक। हाँ, विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करनेवाले मंत्रालय तथा विभाग अपने राजभाषा विभाग के आँकड़े पूरे करने के लिए इस प्रकार के फूहड़ अनुवादों को पुरस्कृत करके हिन्दी के प्रति गाम्भीर्य का अभिनय अवश्य कर लेते हैं।
अर्थशास्त्र तथा सांख्यिकी जैसे विषयों के अनुवादकों ने इतना सहयोग अवश्य किया है कि उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों में इन विषयों की उच्च शिक्षा का माध्यम हिन्दी रखना सम्भव हो सका। अभियांत्रिकी तथा चिकित्सा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र इस सुख से भी या तो वंचित हैं या फिर कोरी औपचारिकता के निर्वहन से धीरज धरे बैठे हैं।
अनुवादक यदि ठान लें तो वे बहुत कम समय में हिंदी की प्रयोजनमूलकता में इतनी वृद्धि कर सकते हैं कि राजभाषा का स्वप्न देखनेवाली आँखों की पथराई पुतलियाँ चमकने लग जाएँ। विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों की सूची में हिंदी की भी कुछ रचनाएँ सम्मिलित हो सकें। यदि अनुवादक थोड़े गम्भीर हो जाएँ, तो हिन्दी क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में पढ़कर बड़े हुए बालकों को यह उलाहना नहीं सुनना होगा- ‘अबे, मेडिकल का फॉर्म तो भर रहा है, इंग्लिश मीडियम से पढ़ना पड़ेगा।’

✍️ चिराग़ जैन

दिल की डायरी

दिल में काफी बड़ा घोटाला पकड़ा गया है। जिस विभाग को शरीर में ख़ून वितरित करने का उत्तरदायित्व दिया गया था, वह पिछले 36 वर्ष से कुछ रक्त बचाकर दिल के भीतर फेंकता रहा है। इस भ्रष्टाचार की वजह से दिल का पूरा तंत्र कमज़ोर होता रहा और अब वह अपनी क्षमता का एक-चौथाई काम ही कर पा रहा है।
जाँच कमेटी ने उक्त विभाग को बदल देने की कड़ी सिफ़ारिश की है। काफ़ी देर तक पड़ताल के बाद जाँचकर्ताओं को पता चला कि दिल बड़ा है। यह सुनकर मुझे हँसी आ गयी। छोटा रहा होता, तो कविता कैसे लिख पाता!
बहरहाल, ज़िन्दगी ने मुझे यह अवसर दिया है कि अपना दिल चीर के दिखा सकूँ। देख लेना, कुछ नहीं निकलेगा इसमें। फिर मैं डंके की चोट कह सकूंगा कि मैं कोई बात दिल में नहीं रखता।
✍️ चिराग़ जैन

मशहूर कविता, गुमनाम कवि

रचना और रचनाकार का सम्बन्ध पिता और सन्तति का सम्बन्ध होता है। यह किसी रचनाकार की सफलता का उत्कर्ष है कि उसकी कोई पंक्ति जनभाषा के मुहावरे में शुमार हो जाये। ‘अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो’ से लेकर ‘पोशम्पा भई पोशम्पा’ तक का हमारा बचपन ऐसी ही सौभाग्यशाली कविताओं की उंगली थामकर चला है। किन्तु इन कविताओं के साथ एक दुर्भाग्य भी जुड़ा हुआ है कि इनके रचनाकार का नाम इनकी लोकप्रियता के वेग में कहीं गुम हो गया है। यदि मेरे जीते जी विज्ञान ने टाइम मशीन बना ली तो ऐसी उपयोगी कविताओं के कवि को तलाशने की इच्छा ज़रूर पूरी करूंगा।
कभी-कभी लगता है कि अपने कवि के नाम के बिना दुनिया भर में घूम रही इन कविताओं के रचनाकारों के साथ अनजाने में ही सही, लेकिन बड़ा अन्याय हो गया है। मैंने अपने आसपास के भाषाई मुहावरे की पड़ताल की, तो पाया यह अन्याय आज भी बदस्तूर जारी है। बल्कि सोशल मीडिया के दौर में तो इसमें ख़ासी वृद्धि देखने को मिलती है।
कोई एक काव्यप्रेमी कवि की वॉल से कविता कॉपी करता है तो न जाने क्यों उसका माउस कविता के नीचे लिखा कवि का नाम कॉपी नहीं कर पाता। फिर वही रचना व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और न जाने किन-किन मुहल्लों में बिना नाम के घूमती-फिरती है और एक दिन कोई अन्य काव्यप्रेमी उसका ख़ूबसूरत वॉलपेपर डिज़ाइन करके उसके नीचे ग़ालिब, बच्चन या गुलज़ार का नाम चिपका देता है। इस यात्रा में और भी अनेक पड़ाव आते हैं, लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी करूंगा।
फिलहाल मैं आपको कुछ ऐसी कविताओं से परिचित करा रहा हूँ जिन्हें आप अपनी अभिव्यक्ति को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए सहज ही प्रयोग कर लेते हैं। कभी मुहावरा बनकर तो कभी लोकोक्ति बनकर ये कविताएँ हमारी बोलचाल में इतनी रच बस गयी हैं कि इनके रचनाकार का नाम जानने का हमें ख़्याल ही नहीं आता। कबीर इस प्रवृत्ति के सर्वाधिक शिकार रहे हैं। उनके कुछ दोहों की पंक्तियाँ तो बाक़ायदा मुहावरा बन चुकी हैं। आइए आपको कुछ दोहों से परिचित करवाया जाये –

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

और

करता था तो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय

शायद ही हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाये, जिसे इन दोनों रचनाओं की पहली पंक्ति याद हो। और शायद ही हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाए, जिसे इन दोनों रचनाओं की दूसरी पंक्ति याद न हो। यद्यपि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम जनजीवन में सर्वाधिक उद्धृत किये जानेवाले कवियों में कबीर अग्रणी हैं। कबीर का ही एक और दोहा है जिसकी पहली पंक्ति प्रसिद्धि को प्राप्त हुई और दूसरी गुमनामी को –

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैंठ
मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ

उर्दू शायरी में भी अनेक ऐसे मिसरे मिल जाते हैं, जो इतनी तेज़ी से लोकभाषा का मुहावरा बन गये कि उनका अपना दूसरा मिसरा ही उनकी गति का साथ न दे सका। ऐसे में ये मिसरे अकेले ही प्रचलन में आ गये। इस मुआमले में उर्दू के ग़ालिब की स्थिति भी लगभग वैसी ही है जैसी हिन्दी में कबीर की है। मिर्ज़ा ग़ालिब के कुछ मिसरे देखें –

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

इसी तरह जिगर मुरादाबादी का ये शेर देखिए –

ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

उर्दू में ऐसे और भी अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ कोई एक ही मिसरा दूर तक पहुँचा और दूसरा मिसरा अपने शायर के नाम के साथ गुमनाम रह गया। मसलन मुज़फ्फर रज़्मी का एक मिसरा लगभग रोज़ ही कहीं न कहीं पढ़ा जा रहा होता है –

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई

इसी तरह फै़ज़ अहमद फै़ज़ की नज़्म का एक मिसरा हर नुक्कड़-चौपाल पर सुनने को मिल जाता है –

और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा

दिल्ली के बाशिंदे अक्सर ज़ौक़ साहब के इस शेर का एक ही मिसरा दोहराते देखे जाते हैं –

इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़कर

कभी कोई काव्यांश किसी फिल्मी गीत में प्रयुक्त हो गया तो फिर उसके मूल रचनाकार और रचना को तलाशना और कठिन हो जाता है। मसलन तुराब ककोरबी के इस शेर का एक मिसरा ज्यों ही फिल्मी गीत में जा मिला तो अस्ल शेर याद करने की न तो किसी को फुरसत मिली न ज़रूरत ही महसूस हुई –

शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी
कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को

इसी तरह मियाँ दाद खां सय्याह के इस शेर का एक मिसरा अक्सर वक़्त-ए-शाम सुनने को मिल जाता है –

कैस जंगल में अकेला है, मुझे जाने दो
ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता ‘बबूता का जूता’ की एक पंक्ति फिल्मी गाने से जुड़ गई और मूल कवि का ज़िक्र तक करने की नैतिकता नहीं निभाई गई। जब यह फिल्म आयी थी तो इस विषय को लेकर शायद कुछ कानूनी विवाद भी हुआ था लेकिन सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की ओर से लड़नेवालों की इतनी पहुँच नहीं थी कि फिल्मी गुलज़ारों से टक्कर ले पाते –

इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में

बुल्लेशाह के लेखन पर तो ऐसी फिल्मी डकैती ख़ूब पड़ती रहती है। उनके लिखे को अपनी शायरी में फिट करके कई लोगों के चमन गुलज़ार हुए जा रहे हैं। अब बात करते हैं उन रचनाओं की जो उद्धृत तो कविता के रूप में ही होती हैं लेकिन उनके रचनाकार की सुधि किसी को नहीं आती।
एक गीत जो झण्डा फहराते समय ख़ूब गाया जाता है। बचपन में विद्यालय के महोत्सवों से लेकर दफ़्तर में स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण करने तक यह गीत हर भारतीय ने दर्जनों बार सुना भी है और गाया भी है। इस भूमिका से ही गीत के बोल आपको याद आ गये होंगे- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।’ लेकिन इस गीत के रचयिता का नाम जाननेवाले लोग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। यह अमर गीत रचा है श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने।
लगभग इतनी ही प्रसिद्धि प्राप्त करनेवाली दो पंक्तियाँ ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटनेवालों का यही बाकी निशां होगा’ भी जगदम्बिका प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ जी के नाम को पीछे छोड़कर बहुत आगे निकल गईं।
‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ गीत देश भर के विद्यालयों में रोज़ सुबह प्रार्थना की तरह गाया जाता है। यह दरअस्ल एक फिल्मी गीत है, जो अभिलाष जी ने अंकुश फिल्म के लिये लिखा था। इसके बावजूद किसी विद्यालय में विद्यार्थी तो क्या अध्यापकों तक के भीतर यह जिज्ञासा नहीं उपजती कि जिसकी रचना से दिन की शुरुआत की जाती है उसे रचनेवाला शख़्स कौन है! जो गीत भजन बन गया उसके रचनाकार का नाम ग़ायब हो जाना तो लगभग निश्चित ही है। कीर्तन मंडलियाँ और जागरण की आर्केस्ट्रा पार्टियाँ किसी भी भजन को गाते समय उसमें अपना नाम इतनी बेहूदगी के साथ घुसेड़ती हैं कि यदि मूल रचनाकार सुन ले तो स्वयं अपनी रचना पर दावा करने का विचार त्याग दे। इस प्रवृत्ति ने मीराबाई की रचना ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’ तक को नहीं छोड़ा। ‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर’ वाली पंक्ति गाते समय ‘मीरा’ शब्द को न जाने किस-किस के नाम से बदल दिया जाता है और प्रभु गिरिधर नागर चुपचाप देखते रह जाते हैं।
कुछ रचनाएँ ऐसी भी हैं जो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति ने किसी सन्दर्भ में उद्धरित कर दें तो लोग उन्हें उन्हीं व्यक्तित्वों के नाम से जानने लगे। इस क्रम में नरसी भगत की रचना ‘वैष्णव जन ते तेने कहिये’ सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह गीत महात्मा गांधी का प्रिय गीत था, किन्तु एक बहुत बड़ा तबका इसे गांधी जी का गीत ही मान बैठा है। इसी प्रकार शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की रचना ‘ना हार में ना जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं’ किसी सभा में श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने उद्धृत की तो लोग इसे अटल जी की रचना ही मानने लगे।
इसी तरह एक ग़ज़ल है, जो भारतीय क्रांति के इतिहास में रह-रहकर याद की जाती है। ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ -यह ग़ज़ल आज़ादी के दीवानों का मंत्र बन गयी, लेकिन इसके शायर, बिस्मिल अज़ीमाबादी को इसका श्रेय मिलने की बजाय इसे क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से जाना जाता है।
श्री सोहनलाल द्विवेदी जी का एक गीत भी ऐसे ही किसी भ्रम के कारण श्री हरिवंशराय बच्चन जी के नाम से मशहूर हो गया। और यहाँ तक मशहूर हुआ कि बाद में श्री अमिताभ बच्चन ने सार्वजनिक मंच पर इस बात का स्पष्टीकरण दिया कि ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ श्री सोहनलाल द्विवेदी जी की ही रचना है।
इसी प्रकार श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध की रचना ‘उठो लाल अब आँखें खोलो’ कहीं सोहनलाल द्विवेदी जी के नाम से लिखी मिलती है तो कहीं द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी के नाम से।
श्री गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ जी का एक काव्यांश ‘जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।’ इस रचना को अपने भाषण आदि में प्रयोग करने वाले लोग भी सनेही जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना अक्सर भूल जाते हैं।
राजेन्द्र राजन जी का एक क़त्अ है जो राजनैतिक तथा सामाजिक जलसों में अक्सर प्रयोग किया जाता है:

वतन की जो हालत बताने लगेंगे
तो पत्थर भी आँसू बहाने लगेंगे
कहीं भीड़ में खो गई आदमीयत
जिसे ढूंढने में ज़माने लगेंगे

इसी प्रकार जयशंकर प्रसाद जी की ये पंक्तियाँ भी जाने किस-किसके नाम से यत्र-तत्र लिखी मिल जाती हैं –

नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत-नग पगतल में
पीयूष स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में

प्रसाद जी की ही यह कविता भी भरपूर उद्धृत की जाती है-

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतन्त्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पन्थ है बढ़े चलो, बढ़े चलो

सुमित्रानन्दन पन्त जी का भी एक काव्यांश भरपूर प्रयोग किया जाता है। यद्यपि अधिकतर यह कवि के नाम के बिना ही प्रयोग किया जाता है, लेकिन इसके रचनाकार के नाम की गवाही देने वाले लोग अभी जीवित हैं-

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान
निकलकर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान

इसी क्रम में श्री गोपालदास नीरज जी के गीत का यह मुखड़ा भी ख़ूब सुनने को मिलता है-

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये

दुष्यंत कुमार का एक शेर ख़ूब रेखांकित किया जाता है, लेकिन उसे बिल्कुल सही पढ़ने वाले लोग बहुत कम हैं। कोई आकाश की जगह आसमान या अम्बर पढ़ने लगता है तो कोई सूराख को छेद पढ़कर शेर की जान निकाल देता है। शब्दों का क्रम बिगाड़कर शेर को बेबह्रा पढ़नेवाले तो बहुतायत में हैं ही। बहरहाल, यहाँ वह शेर अपने मूल स्वरूप में प्रस्तुत है-

कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो!

इन सब रचनाओं के इतर यहाँ ऐसी अनेक रचनाओं की सूची दी जा रही है, जो या तो अपने रचनाकार के नाम के बिना प्रयुक्त हो रही हैं, या किसी अन्य के नाम से चल रही हैं या फिर आधी-अधूरी और ग़लत-सलत तरीक़े से उद्धृत की जा रही हैं-

जब नाश मनुज पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है
-रामधारी सिंह दिनकर

सदियों की ठण्डी बुझी आग सुगबुगा उठी
मिट्टी, सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन ख़ाली करो, कि जनता आती है
-रामधारी सिंह दिनकर

देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो, किन्तु उकताते नहीं
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं
-अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

चार हाथ, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूकै चौहान
-चन्द बरदाई

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटि तानी थी
बूढ़े भारत में भी आयी, फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की क़ीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी
बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
ख़ुब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी
-सुभद्राकुमारी चौहान

जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करुणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
-महादेवी वर्मा

यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता जमुना तीरे
मैं भी इस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे
-सुभद्राकुमारी चौहान

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक
-माखनलाल चतुर्वेदी

होंगे क़ामयाब, हम होंगे क़ामयाब एक दिन
मन में विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे क़ामयाब एक दिन
-गिरिजाकुमार माथुर

ऐसे और भी अनेक काव्यांश हैं, जिनके मूल रचयिता का नाम कहीं समय की परतों के नीचे खो गया है। हाल ही में एक राजनैतिक दल ने एक नारा देकर देश की राजनीति का रंग-रूप बदल दिया। इस नारे के प्रचार से सत्ता परिवर्त्तन जैसा बड़ा उद्देश्य हासिल कर लिया गया। यद्यपि दावा किया गया कि यह नारा इस अभियान के मुख्य क़िरदार के मुख से अनायास ही निकला, लेकिन पुरानी कविताओं को खंगालते हुए उस नारे के दर्शन एक गीत के मुखड़े में हो गये।

जब दुःख पर दुःख हों झेल रहे, बैरी हों पापड़ बेल रहे
हों दिन ज्यों-त्यों कर ढेल रहे, बाक़ी न किसी से मेल रहे
तो अपने जी में यह समझो
दिन अच्छे आने वाले हैं
-गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’

इसी तरह वंशीधर शुक्ल जी का लिखा ‘उठ जाग मुसाफ़िर भोर भयी’ भी रोज़ कहीं न कहीं रेखांकित किया जाता है, लेकिन कवि का नाम लेने को यहाँ भी कोई तैयार नहीं होता। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी का क़दमताल गीत ‘क़दम-क़दम बढ़ाये जा, ख़ुशी के गीत गाये जा, ये ज़िन्दगी है क़ौम की, तू क़ौम पे लुटाये जा’ भी मूल गीतकार के नाम के बिना ही दुनिया भर में जोश भरने का काम कर रहा है। इस गीत का अनेक फिल्मों में भी प्रयोग किया गया है।
देश की एक प्रमुख विचारधारा की नियामक संस्था में तो यह नियम ही है कि वह जिस भी रचना का प्रयोग करेगी, उसके रचनाकार का नाम नहीं बतायेगी। इस नियम में भी एक बेईमानी झलकती है। क्योंकि उस संस्था के संस्थापकों की किताबें छापते समय इस नियम का ध्यान नहीं रखा जाता और माननीयों की किताबें सुरुचिपूर्वक उनके नाम के साथ ही छापी जाती हैं। इस संस्था के इस नियम के कारण ही राष्ट्रीय महत्व की अनेक रचनाएँ अपने रचयिता की पहचान खो चुकी हैं। समझ नहीं आता कि सर्जक का कृतज्ञता ज्ञापन करने से कौन सी नैतिकता भंग हो जाती है!
बहरहाल, जयशंकर प्रसाद की रचना ‘ले चल वहाँ भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे’; बालकृष्ण शर्मा नवीन की रचना ‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये, एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये’; अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की रचना ‘सबसे ख़तरनाक़ होता है सपनों का मर जाना’; भारतेन्दु हरिश्चंद की ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’; संत रविदास की ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’; भगवती चरण वर्मा की ‘हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले’; द्वारका प्रसाद माहेश्वरी की ‘वीर तुम बढ़े चलो’; श्याम नारायण पाण्डेय की ‘हल्दीघाटी’; भवानी प्रसाद मिश्र की ‘गीतफ़रोश’; हरिवंश राय बच्चन की ‘अग्निपथ’, ‘मधुशाला’ और ‘जो बीत गयी सो बात गयी’; मैथिलीशरण गुप्त की ‘नर हो न निराश करो मन को’ तथा ‘सखि, वे मुझसे कहकर जाते’; रघुवीर सहाय की ‘रामदास’; अल्लामा इक़बाल का क़ौमी तराना ‘सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा’; सोहनलाल द्विवेदी की ‘खड़ा हिमालय बता रहा है’; कुम्भनदास जी की ‘सन्तन को कहा सीकरी सों काम’; मजरूह सुल्तानपुरी का शेर ‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मग़र, लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया’; बशीर बद्र का शेर ‘दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है, जो भी गुज़रा है, उसने लूटा है’; मीर का शेर ‘देख तो दिल कि जां से उठता है, ये धुआँ-सा कहाँ से उठता है’; रबीन्द्रनाथ टैगोर का ‘एकला चलो रे’; नवाज़ देवबन्दी का शेर ‘उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नम्बर अब आया, मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नम्बर आपका है’; रहीम का दोहा ‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय’; कबीर के दोहे ‘निन्दक नियरे राखिये’, ‘प्रेम गली अति साँकरी’ और ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’; तुलसीदास की ‘सकल पदारथ हैं जग माही, कर्महीन नर पावत नाही’ मलूकदास जी का दोहा ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गये सबके दाता राम’ जैसी अनेक रचनाओं ने जनता की अभिव्यक्ति को रोचक तथा प्रभावी बनाने में महती भूमिका निर्वाह की है, लेकिन हमने इन रचनाकारों को श्रेय देने में पूरी ईमानदारी नहीं दिखाई।
सोशल मीडिया के इस दौर में यदि इस श्रेय देने की परम्परा का प्रादुर्भाव इस लेख के बाद हो सका, तो सृजन की इस बगिया में जड़ों की देखभाल करने वाले लोगों को अपने मिट्टी सने हाथों को देखकर क्षोभ न होगा। एक बार हमें ठहरकर यह विचार करना चाहिए कि रचनाकार को ‘कर्त्ताभाव’ से मुक्त करने के चक्कर में कहीं हम स्वयम् तो ‘कृतज्ञताभाव’ से मुक्त होकर कृतघ्न नहीं हो गये।
✍️ चिराग़ जैन

तहख़ाना

विचारों के भाजी बाज़ार से दूर,
मस्तिष्क के
पिछवाड़े वाले तहख़ाने में
भरे पड़े हैं
ऐसे हज़ारों बिम्ब
जिन्हें आँखों ने
चित्त के शिकंजे से बचाकर
यहाँ छिपा दिया था।

जब कभी
सहजता की सवारी करके
प्रिविष्ट हुआ हूँ
इस तहख़ाने में
बस तभी
बटोर लाया हूँ
…ढेर सारे बिम्ब
…ढेर सारी कविताएँ!

आपके भीतर भी होगा
ऐसा ही इक तहख़ाना;
बस इसमें
कभी मुखौटा लगाकर
मत जाना!
✍️ चिराग़ जैन

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