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अमर पंक्तियों का व्याकरण

किसी पंक्ति में ऐसा क्या विशेष होता है कि वह अचानक युगजयी हो जाती है! हज़ारों-लाखों लोगों ने पूरा-पूरा जीवन लगा दिया काव्य रचने में, लेकिन पूरी दुनिया में उंगली पर गिने जाने योग्य कविताएँ ही अमर हुई हैं। और जो अमर हुई हैं उन पंक्तियों के शब्द शिल्प में कुछ असाधारण दिखाई भी नहीं देता। उनसे बेहतर भाषा, उनसे बढ़िया व्याकरण, उनसे अधिक अलंकार से सजी पंक्तियाँ अपने रचयिता की देहरी नहीं लांघ सकीं।
इससे यह बात साफ़ है कि काव्य की प्रसिद्धि कम से कम शिल्प पक्ष पर तो निर्भर नहीं है। लेकिन भाव भी कुछ एक्स्ट्रा ordinary नहीं जान पड़ता। कई जगह तो जन समान्य में प्रचलित ‘अच्छी बातों’ की तुकबंदी सी की हुई है। और इन बातों को अधिक प्रभावी बिम्ब विधान से कहने वाले कवि भी उपलब्ध हैं, लेकिन वे अपनी कविता को जन कविता न बना सके। अर्थात भाव पक्ष भी कविता की लोकप्रियता का आधार तत्व नहीं है।
फिर क्या ख़ास है? शायद कहने वाले का व्यक्तित्व? लेकिन ऐसा होता तो किसी कवि की हर कविता अमर हो जाती। लेकिन मीरा के समूचे साहित्य में से एकाध ही पंक्ति क्यों अमर हुई? रैदास, कबीर, तुलसी, रहीम, निराला, पंत, पाश… इनकी कोई एकाध पंक्ति ही क्यों कहावत बन सकी? इनकी कोई एक अर्द्धालि, कोई एक दोहा, कोई एक मिसरा, कोई एक श्लोक ही सूक्ति-सौभाग्य से युक्त क्यों हैं?
कवि जब सर्जना करना प्रारंभ करता है तब वह सदेह होता है, उस समय उसके मन मे लोक की अभिरुचि, जन की पसंद-नापसंद, प्रशंसा की आकांक्षा, आलोचना का भय विद्यमान रहता है। लेकिन ज्यों-ज्यों रचना स्वयं को गढ़ना प्रारंभ करती है तब लोक पीछे छूटने लगता है। फिर उसके कान लोक का कोलाहल नहीं सुन पाते। फिर उसकी चेतना देह से ऊपर उठने लगती है। फिर वह अपने अनहद को सुनने लगता है। फिर उसकी चेतना अपने अनहद की ओर आकृष्ट होने लगती है।
यहाँ से उसकी सर्जना विस्तार पाती है। उसकी चेतना गहराई में उतरती है और उसकी सर्जना ऊँचाई की ओर बढ़ चलती है। अनवरत बढ़ते-बढ़ते वह अपने अनहद को लिपिबद्ध करने लगता है और जिस पंक्ति पर अनहद लिपिबद्ध हो गया, उसका कालजयी होना सुनिश्चित है। जिस पंक्ति की चेतना जितने गहरे उतरी होगी, उसका आकाश उतना ही अधिक विस्तार पा जाएगा।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो… कुछ भी तो ख़ास नहीं इस काव्यांश में। इसका अर्थ लिखो तो एक अनुच्छेद नहीं लिखा जाएगा किंतु फिर भी यह पंक्ति अमर हो गई! क्योंकि इसको मीरा ने सोचा नहीं होगा। सोचकर लिखा गया काव्य इतना विराट हो ही नहीं सकता। सोचकर लिखे गए शब्दों में इतना अजस्र रस हो ही नहीं सकता। यह तो अनवरत तलाश के बाद बंद पलकों के भीतर किसी को पा लेने का आनंद है जो एक पंक्ति में अनूदित हो गया।
इस पंक्ति का साधारण होना ही इसके विशेष होने का प्रमाण है। और यह भी सत्य है कि इसको रचने वाली मीरा स्वयं इस बात से भिज्ञ न रही होंगी कि इस पंक्ति का वातायन कितना विराट होगा। जान जाती तो इसे और अधिक कलात्मक बनाने की चेष्टा करने लगती। और यही चेष्टा इस महान पंक्ति की हत्या कर देती।
चेष्टातीत होना ही किसी पंक्ति के अमर होने की घोषणा है।
मीरा तो कृष्ण की दीवानी थी, फिर राम रतन धन क्यों? कृष्ण रतन धन क्यों नहीं? क्योंकि जहाँ इस पंक्ति का सृजन हुआ है वहाँ संज्ञाभेद है ही नहीं। वहाँ तो स्वयं मीरा भी राम ही हो गई होंगी। वहाँ तो आनंद का उत्कर्ष घटित हुआ होगा। और आनंद के उत्कर्ष में संज्ञा का क्या काम। वहाँ तो बस नृत्य है। वहाँ तो बस अनहद है। वहाँ जाकर शब्द भी कहाँ सूझता होगा। कभी युगों के बाद ऐसी घटना घटती है कि अनुभूति के उस उत्कर्ष पर पहुंचकर यकायक किसी के मुख से कोई पंक्ति निकल पड़े। बस यही पंक्ति युग की सीमाओं के पार निकल जाती है।
इसे वायरल करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो धूप की तरह फैलती है। इसे पूरा करने की भी जरूरत नहीं पड़ती। इसे पूरा कर भी दिया जाये तो यह शेष सचेष्ट को साथ लेकर नहीं चलती। सचेष्ट लेखन इसके साथ दौड़ ही नहीं सकता। राजधानी एक्सप्रेस के इंजन से बैलगाड़ी जोड़ दोगे तो बैलगाड़ी या तो टूट जाएगी, या छूट जाएगी।
इसीलिए मानव सभ्यता के इतिहास में कई टन काव्य लिखा गया लेकिन युग, वर्ग, भाषा, देश, संस्कृति, वाद और विमर्श की सीमा से परे अम्बर के सितारों सरीखी सार्वजनिक पंक्तियाँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं।
✍️ चिराग़ जैन

साहित्य : पैथोलॉजी लैब

साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो मेडिकल प्रोसेस में पैथोलॉजी लैब की होती है। साहित्य, समाज के भीतर व्याप्त व्याधियों को ढूंढकर तंत्र के सम्मुख रखता है और फिर तंत्र अपने अनुभव, ज्ञान तथा मशीनरी के माध्यम से उस व्याधि का उपचार करता है।
कभी किसी मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट देखेंगे, तो पाएंगे कि लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में केवल उन्हीं बिंदुओं को बोल्ड अक्षरों में लिखा जाता है, जहाँ नियत मापदंडों के अनुसार परिणाम नहीं होते।
अब अगर कोई यह कहे कि पूरी रिपोर्ट में इतना कुछ बढ़िया चल रहा है, वह किसी को नहीं दिखता, एक जगह कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ आया है तो उसे बोल्ड करके दिखाया जा रहा है। या कोई यह रिपोर्ट देखकर पैथोलॉजिस्ट का गिरेबान पकड़ ले कि साले तू नेगेटिविटी फैला रहा है, तूने बीमारी ढूंढी है अब तू ही सर्जरी भी कर।
आजकल कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपनी मेडिकल रिपोर्ट देखकर भड़क कर कहते हैं कि रामलाल की रिपोर्ट में तो केवल यूरिक एसिड बढ़ा हुआ दिखाया था, मेरी रिपोर्ट में किडनी की गड़बड़ बता रहा है। ये लैब वाला रामलाल का चमचा है।
विश्वास कीजिए, पैथोलॉजी लैब आपके स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है। यदि रोगी इन लैब्स से ही इलाज पूछने लग जाएंगे तो उपचार नहीं, विध्वंस हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन

कविता सुनने की तमीज़

शेर कहने का सलीक़ा तो ज़रूरी है मगर
शेर सुनने के भी आदाब हुआ करते हैं

कविता सुनने वाले अगर कविता की हर पंक्ति से प्रस्फुटित रश्मियों के पीछे दौड़कर अर्थ के असंख्य बिम्ब देख पाएं तो कविता-पाठ करने वाले को आनंद आ जाता है। कवि की भावभूमि का पर्यटन यदि श्रोता न कर पाए, तो कविता-पाठ नाद बनने की बजाय शोर बनकर रह जाता है।
लेकिन बीते बुधवार अर्द्धचंद्र की संतुलित चांदनी में गुलाबी सर्दी की मीठी बयार के बीच, कविता के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बैठक में सुनाने वालों को भी सुनने वालों से कम आनंद नहीं आया होगा।
यूँ समझ लीजिए कि खेत से निकलकर फसल मंडी में बिकने की बजाय बीज बन रही थी। श्रोता दीर्घा में श्रीमती ममता कालिया, डॉ सरिता शर्मा, गुणवीर राणा,
श्लेष गौतम, सुदीप भोला, राजीव राज, निकुंज शर्मा, रामायण धर द्विवेदी, स्वयं श्रीवास्तव, ज्ञान प्रकाश आकुल, गौरव दुबे, शिखा दीप्ति, शंभू शिखर, रमेश मुस्कान, मध्यम सक्सेना, ओम निश्छल, कुमार संजाॅय सिंह, सुमित अवस्थी, अरुण महेश्वरी, विमल त्यागी, आयुष और अदिति सरीखे सावचेत मन विद्यमान हों। काव्यपाठ के लिए कबीरी तेवर के यश मालवीय जी हों, किशन सरोज सरीखी गीतता से युक्त विनोद श्रीवास्तव जी हों और ऑलपिन पर शहद लगाने का हुनर रखने वाले शायर इक़बाल अशहर हों। संचालन के माइक पर कविता तिवारी हों। व्यवस्था को चाक चौबंद रखने के लिए प्रवीन पाण्डेय जैसे कुशल व्यवस्थापक हों और इस पूरे वृत्त के निर्माण का केन्द्रबिन्दु डॉ कुमार विश्वास का सम्मोहक व्यक्तित्व हो तो ऊर्जा और आनंद के लिए वहाँ घटित होना स्वाभाविक था।
इस महफ़िल में हर पंक्ति पर प्रतिक्रिया थी। आँसू को भी कविता बना लेने वाले ये श्रोता कभी दर्द में डूबी हुई किसी ग़ज़ल पर ठठाकर हँस पड़ते थे, तो कभी किसी आनंद की अभिव्यक्ति को सुनकर उस आनंद के पार्श्व में विराजित टीस पर त्राटक करने लगते थे। कभी मिसरा-ए-सानी की अदायगी से पहले ही किसी चुटकी से महफ़िल में ठहाका गूँज जाता था तो कभी किसी गीत-सूक्ति पर कोई दो श्रोता आँखों ही आँखों में हज़ारों बातें कर गुज़रते थे। लेकिन श्रोता दीर्घा की यह जीवंतता कविता-पाठ के लिए व्यवधान न होकर संगत बनी जाती थी।
बहुत दिन बाद ऐसे कविता सुनी, जैसे आज से एक दशक पहले मंच पर बैठकर हम और हमारे वरिष्ठ सुनते थे। जीवंतता और आनंद की कोई कमी नहीं होती थी, प्रत्युत्पन्नमति के अस्त्र से कविता पाठ कर रहे कवि के साथ थोड़ी छेड़छाड़ और शरारत भी हो जाती थी लेकिन इस सबसे काव्यपाठ में व्यवधान नहीं होता था। लोगों का मानना है कि उस दिन केवी कुटीर में अच्छा कवि होने की झलकी दिखाई गई, जबकि मुझे लगता है कि इस कार्यक्रम की श्रोतादीर्घा वाले कैमरे को मास्टर बनाकर एडिटिंग की जाए तो दुनिया समझ पाएगी कि- “देखो, ऐसे सुनी जाती है कविता!”

✍️ चिराग़ जैन

महीयसी महादेवी

बचपन में पाठ्यक्रम में एक रेखाचित्र पढ़ा था- ‘गौरा’। इसे पढ़कर गाय के प्रति तो मन आकृष्ट हुआ ही; महादेवी जी के प्रति भी मन प्रेम से भर उठा। फिर तो मैंने खोज-खोजकर महादेवी जी को पढ़ना शुरू कर दिया। उनका गद्य मेरे लिए प्रेरणास्रोत बनता गया और उनका पद्य मेरे संवेदी तंतुओं की ख़ुराक़ बन गया।
महादेवी जी से मेरा प्रथम परिचय शब्दों के माध्यम से ही हुआ था। कई वर्ष तक उन्हें पढ़ता रहा किन्तु कभी उन्हें देखने की उत्कंठा उत्पन्न नहीं हुई। हाँ, ज्यों-ज्यों उन्हें पढ़ता; उनके प्रति प्रेम और प्रगाढ़ होता जाता था।
मैंने उन्हें पढ़-पढ़कर उनकी एक छवि अपने मन में बना ली थी, जिसमें सिर पर पल्ला किये एक सम्भ्रांत महिला का आकार-सा तो था किंतु चेहरे के नैन-नक्श की कोई मूर्ति नहीं थी। यूँ कहें कि मन इतना जुड़ गया था कि चेहरे की कभी आवश्यकता ही महसूस न हुई। उन दिनों गूगल नहीं था, इसलिए किसी साहित्यकार का चित्र देखना इतना सरल नहीं था, जितना अब है।
बहुत वर्ष बाद, एक दिन पुस्तक मेले में महादेवी जी की तस्वीर एक एलबम में देखी। देखकर मुझे कोई आश्चर्य न हुआ। बल्कि अनुभूति हुई कि दैव ने सौंदर्य के एक-एक तत्व का समावेश उनके मन के निर्माण में कर दिया, अतएव देहयष्टि के लिए सौंदर्य का कोष बचा ही न रहा होगा।
उस दिन महादेवी जी की तस्वीर को बहुत देर तक निहारा और उनकी तमाम रचनाओं को उस मुखाकृति के साथ पुनः अनुभूत किया… उस दिन से मुझे महादेवी जी से और अधिक प्रेम हो गया।
एक दिन श्री रामनिवास जाजू जी की पुस्तक डिज़ाइन करते समय मोहन गुप्त जी ने मुझे महादेवी जी का खिलखिलाता हुआ चित्र दिया। उस दिन मैंने महीयसी को पहली बार खिलखिलाते हुए देखा… मैं और अधिक प्रेम से भर उठा। उनकी खिलखिलाहट में उनकी पीड़ा और भव्य हो उठी थी। वह चित्र आज भी मेरे कोष में सुरक्षित है और उस चित्र की खिलखिलाहट आज भी पीड़ा की उस साकार मूर्ति के प्रति मुझे सम्मोहित कर देती है।
आज सब महादेवी जी के विषय में कुछ-कुछ लिख रहे हैं। मेरा भी मन हुआ… तो उनके प्रति अपनी मनोदशा यथावत लिख डाली। और हाँ, यह लिखते हुए मैं महादेवी जी के प्रति और भी अधिक प्रेम से भर उठा हूँ!

✍️ चिराग़ जैन

कविता की नयी पौध

मुझे प्यार करनेवालों का कहना है कि मैं बहुत अच्छा लिखता हूँ। सुनकर अच्छा लगता है। मेरे अपनों का मानना है कि मैं सबसे अच्छा लिखता हूँ। सुनकर आश्वस्ति होती है कि मेरे पास मुझे ‘अपना’ माननेवाले ख़ूब लोग हैं। मेरे पाठकों का कहना है कि मुझ जैसा कोई नहीं लिख सकता। सुनकर एक मीठा-सा अहंकार उपजता है।
इस अहंकार में जब मैं अन्य ‘अच्छा लिखनेवालों’ की वॉल पर जाता हूँ तो मेरे भीतर उपजता अहंकार का अंकुर क्षण भर में सूख जाता है। आयु में मुझसे दस-बारह वर्ष कम रहकर भी कुछ लोग इतना श्रेष्ठ लेखन करते हैं कि कई बार अपना समस्त लेखन निरर्थक जान पड़ता है।
पिछले दिनों फेसबुक पर संजू शब्दिता को पढ़ा। उनकी वॉल विचार के खोजियों के लिए ख़ज़ाना हाथ लगने जैसा अनुभव है। हर पोस्ट में दो मिसरे हैं और हर मिसरे में आपको सुखद आश्चर्यबोध से भर देने का सामर्थ्य है। चूँकि मैं सर्वज्ञ नहीं हूँ अतः यह तो नहीं लिख सकता कि वे इस दौर की सर्वश्रेष्ठ शायरा हैं, लेकिन इतना अवश्य लिख सकता हूँ कि किसी विचार को जिस नज़रिए से संजू ग़ज़ल तक लाती हैं, वैसा नज़रिया मेरे संज्ञान में अन्यत्र कहीं नहीं मिला। पीड़ा की ख़ुद्दारी और निर्वेद की स्थिति तक दार्शनिक होती हुई इनकी शायरी बड़े-बड़े सुख़नवरों के लिए सोच के नये रास्ते खोलती है। ईमानदारी से कहूँ तो संजू शब्दिता वे पहली लेखिका हैं, जिनके कुछ अशआर से मुझे ईर्ष्या हुई कि काश यह बात मैंने कही होती।
उधर एक रचित दीक्षित हैं। ये शख़्स इस दौर का औघड़ है। कबीर जैसा बेलाग। मन के भीतर जो बात, जिस शब्दावली में उतरती है; उसे जस का तस काग़ज़ पर उतार देता है। तेवर ऐसा कि उसकी छोटी सी कविता बिना म्यान के नश्तर की तरह सीधे अवधान के आर-पार हो जाती है। नैतिकता और सामाजिकता की रस्म निभाती मान्यताएँ यकायक मनुष्यता की एक सपाटबयानी के आगे बौनी सिद्ध हो जाती हैं। बहुत समय बाद रचित के रूप में एक ऐसा कवि पढ़ने को मिला है, जो जन-मान्यता के अनुरूप नहीं मन-मान्यता के अनुरूप शब्द गढ़ता है।
एक नन्हीं-सी बालिका है इति शिवहरे। भाषा के जिस मुहावरे से स्वयं भाषाविद पल्ला झाड़ चुके थे, उस प्रांजल शब्दावली को बहते पानी की रवानी बना देती है अपने गीत में। उसे पढ़ता हूँ तो अनुभूत कर पाता हूँ कि क्लिष्ट शब्दावली से रसास्वादन करनेवाला मेरे भीतर का पाठक इस समय में कहीं पूर्ण तृप्त हो सकता है तो वह इति की लेखनी है। फोन पर बात की तो पाया कि उसकी आवाज़ ने अभी बचपन की देहरी पार नहीं की है लेकिन उसकी शब्दावली प्रौढ़ता की भी दूसरी पीढ़ी के पार पहुँच गयी है। इति को पढ़कर हमेशा यही दुआ की है कि काश ईश्वर समाज के भाषा संस्कार को इस योग्य बनाए कि इस बच्ची को अपनी भाषा का सरलीकरण करके साहित्य रचने पर विवश न होना पड़े।
एक स्वधा रवीन्द्र जी हैं। उनकी लेखनी से साक्षात्कार किया तो एकाध गीत तक तो ऐसा लगा कि हाँ, हो गया होगा किसी पुण्य के फल से कोई एकाध गीत। लेकिन ज्यों-ज्यों स्क्रोल करता गया… मन किसी अदृश्य शिकंजे में जकड़ता चला गया। भाव की ऐसी तरलता कि गीत यकायक पढ़नेवाले के चेहरे की भंगिमा से अठखेलियाँ करने लगे। अलक, भृकुटि, ओष्ठ-अन्त, नथुने, कण्ठ, नयनकोर… एक-एक अंग-उपांग उनके गीत की भावभूमि के पर्यटन पर निकल जाए। वे अक्सर मुझे ‘बालक’ कहकर संबोधित करती हैं। लेकिन उन्हें पढ़कर लगता है कि उन पर सरस्वती की जितनी कृपा है उसके अनुरूप उनका यह संबोधन ही मुझे वाग्देवी से कुछ आशीष दिला देता होगा।
एक वाशु पाण्डेय। शायरी करता है। ग़ज़ल के व्याकरण और कथ्य दोनों को पूरी शिद्दत से साधता हुआ यह नौजवान ज़िन्दगी में सर्वाधिक मुहब्बत क़लम से ही करता है। उससे कभी बतियाने की कोशिश करेंगे तो उसकी हर बात में शायरी मिल जाएगी। जज़्बा ऐसा कि जैसे एक दिन पूरे ज़माने को अपने जैसा बनाकर ही दम लेगा। तबीयत ये कि जो बात हमारे दिल में आ गयी उसे ठीक वैसे ही न कहा तो काहे के शायर। वाशु के ढेर सारे अशआर कब मेरी बातचीत को प्रभावी बनाने के काम आने लगे… मुझे पता ही नहीं चला। उसकी शायरी को पढ़ते हुए ऐसा कई बार लगा है कि इस उम्र में ये हाल है तो दस-बीस साल बाद ये लड़का क्या करेगा!
आप भी कभी फ़ुर्सत निकालकर इन सबको पढ़ लें और फिर मुझे बताएँ कि इनमें से किसी के विषय में ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं लिख दिया। तब तक मैं अपने अहंकार को ध्वस्त करने के लिए क़लम के और सितारों की तलाश जारी रखूंगा।

✍️ चिराग़ जैन

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