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लाॅकडाउन

ससुरे दफ़्तर है गए बन्द
घर पर बैठे मूसरचन्द
घर पर मूसरचन्द
खाली हो गए सबरे फंड

देसी घी के परठाँ में भी कमी बताने वारे
साँझ-सबेरे लूखी रोटी चाब रहे बेचारे
भूल गए रबड़ी श्रीखण्ड
घर पर बैठे मूसरचन्द
घर पर मूसरचन्द
खाली हो गए सबरे फंड

आसपास की ग्वालिन के संग रास रचाना छूटा
कलियाँ सबरी ग़ायब है गई, भँवरे का दिल टूटा
कलियन को बन गौ गुलकंद
घर पर बैठे मूसरचन्द
घर पर मूसरचन्द
खाली हो गए सबरे फंड

बीड़ी भई पराई, दारू हुई पहुँच से दूर
सूख-सूख कर भए छुआरे, रस से भरे खजूर
सबका ठंडा हुआ घमंड
घर पर बैठे मूसरचन्द
घर पर मूसरचन्द
खाली हो गए सबरे फंड

✍️ चिराग़ जैन

बिरहन का सवैया

ऐसी दारी की आई बीमारी अबै, सब देस के आँगन-द्वार बंधे हैं
कौन गली भर्तार बंधे, काऊ खोह में सोलह सिंगार बंधे हैं
इत गाय के मौह पे छीको बंधो, उत खूटे पे दूर बिजार बंधे हैं
जमुना जी के पार फँसी बंसुरी, अरु ओंठ मुए इस पार बंधे हैं

✍️ चिराग़ जैन

भूख

सिर
बर्दाश्त कर रहा है
अपनी क्षमता से अधिक भार।
हथेलियाँ कर चुकी हैं
अपनी खुरदरी छुअन को स्वीकार।
पैर सीख गए हैं
बोझा लेकर चलने की कला।
पीठ जान चुकी है
कि देह पर बोझ बन जाने से
बोझा ढोना भला।

कानों को
सुनाई नहीं देता उपहास
नाक को
गंदगी से नहीं आती है बास

अपनी काया को देखकर
आँख भी
बिल्कुल नहीं रोती है
क्योंकि पेट को
भूख
बर्दाश्त नहीं होती है।

✍️ चिराग़ जैन

किस्सों को खूंटी पर टाँको

दूर खड़े रहकर मत आँको
झाँक सको तो मन में झाँको
घटनाओं की परतें खोलो
किस्सों को खूंटी पर टाँको
आँखें क्यों छोटी कर दी हैं, होठों के उल्लास ने
आँसू की नदियाँ ढक ली हैं मुस्कानों के व्यास ने

कैकई मैया का राजा के महलों बीच ठिकाना था
नौकर, चाकर, दास, दासियाँ सबका आना-जाना था
होने को तो उसके आगे सुविधाओं का मेला था
लेकिन मन के भीतर केवल मरघट का वीराना था
पानी तक पहुँची तो बदला रंग पुरानी प्यास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

अपमानित शकुनी इक ज़िद पर पूरा जीवन वार गया
अपमानित चाणक्य उसी ज़िद पर हर बाज़ी मार गया
विष्णुगुप्त नायक है युग का और शकुनी खलनायक है
इसका मोहरा जीत गया है, उसका मोहरा हार गया
जो भी जीता उसे सिकंदर मान लिया इतिहास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

क़िस्सा क्या है, आधे सच को ढकता एक झरोखा है
कथा, विजेता की सहमति से होने वाला धोखा है
आँखों देखी को भी बाँचो, किसकी आँखों से देखी
सच जो पर्दे के पीछे है, उसका रूप अनोखा है
वैभव की झोली खाली है, सुख पाया संन्यास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

✍️ चिराग़ जैन

ओ कोरोना

ओ कोरोना
हम पर पहले ही है काफ़ी रोना-धोना
तुम जीवन दुश्वार करो ना!

तुमको क्या लगता है, क्यों बे
हम खाँसी से डर जाएंगे
ऐसी खाँसी करने वाले तो भारत में
सीएम बने फिरा करते हैं

हाथ मिलाने से बढ़ते हो
ताप बढ़े तो मर जाते हो
भारत में टेम्प्रेचर
अड़तालीस डिग्री तक चढ़ जाता है
राख तलक भी नहीं मिलेगी

राजनीति के हाथ अगर तुम चढ़ जाओगे
नामो-निशां नहीं बचने का
ये वज्रोदर
पुल, चारा, शौचालय सब कुछ खा जाते हैं
इनकी महाक्षुधा के आगे
तुम बिन सैनेटाइज़र के ही मिट जाओगे
इन्हें नहीं आता कुछ भी जीवन भर ढोना
ओ कोरोना!

अगर किसी दिन
किसी मीडिया के चैनल में धरे गए तो
प्रश्नों का तूफ़ान उठेगा
उत्तर देने तक का अवसर नहीं मिलेगा
इनके लिए तुम्हारी कोई
चार बुलेटिन से ज़्यादा औक़ात नहीं है
अगली बड़ी ख़बर आने तक
तुम हो इनका खेल-खिलौना
ओ कोरोना!

उत्सव सारे मंद हो गए
खेल-तमाशे बंद हो गए
आना-जाना बंद हुआ है
हँसना-गाना बंद हुआ है
ओ सन्नाटै के उद्घोषक
शर्म नहीं आती क्या तुमको
काफ़ी आफ़त मचा चुके हो
अब तुम जाकर किसी कुँए में डूब मरो ना!
ओ कोरोना!

✍️ चिराग़ जैन

इंसानियत के क़त्ल की अफ़वाह उड़ा दो

कुर्सी के लिए क़ौम की परवाह उड़ा दो
नारों की आंधियों में हर इक आह उड़ा दो
लफ़्ज़ों की आग से भी न गर मुल्क जले तो
इंसानियत के क़त्ल की अफ़वाह उड़ा दो

✍️ चिराग़ जैन

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