Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिसको सुख का उत्सव समझा,
वो दुख का आयोजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे,
उसका नाम विभीषण निकला
जीवन भर विश्रांत रहा जो, हमने उसको शांतनु माना
जिसने हर अनुशासन तोड़ा, उसका नाम सुशासन जाना
जिसका जीवन लाचारी था, उसका परिचय भीष्म बताया
अपशकुनों का मूल रहा जो, वह जग में शकुनी कहलाया
कृष्ण कहा जिसको दुनिया ने, वह जग का आभूषण निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
नाम श्रवण था जिसका, उसने आहट नहीं सुनी दशरथ की
एक मंथरा क्षण भर में ही इति बन गई हर सुख के अथ की
मानी को समझाने अंगद बनकर बुद्धि स्वयं आई थी
कुम्भकर्ण तक जाग गया पर रावण पर तंद्रा छाई थी
मुख दिखलाने योग्य नहीं जो, वह कुल्हन्त दशानन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
जिस वेला में राजतिलक होता उसमें वनवास हुआ है
उत्सव की चौसर पर कुल की लज्जा का उपहास हुआ है
कंचन मृग लाने निकले थे, घर की मृगनयनी खो बैठे
खाण्डव वन को स्वर्ग किया था, ख़ुद ही वनवासी हो बैठे
जिस अवसर पर मेल लिखा था, उसका अंत विभाजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
नींव भी पुष्ट हो
कुछ कंगूरे भी हों
एक साँकल भी हो
चौक पूरे भी हों
इन सभी से सजी ये इमारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
थार की रेत पश्चिम में बिखरी रहे
और पूरब निरंतर बरसता रहे
हिमशिखर भी युगों तक अडिग रह सकें
और सागर हमेशा लरजता रहे
हो मिठासों से इफ़्तार रमज़ान में
और फागुन में थोड़ी शरारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
सोच का रंग धानी हमेशा रहे
और आँखों में पानी हमेशा रहे
चाह में सावधानी हमेशा रहे
बाजुओं में रवानी हमेशा रहे
कोई तिरछी नज़र से अगर देख ले
तब रगों में ज़रा-सी हरारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
प्यास के रंग में कोई अंतर न हो
गागरें हों अलग, पर कुंआ एक हो
मंदिरों-मस्जिदों में भरोसा रहे
हों इबादत अलग, पर दुआ एक हो
क्यारियों की भले हों अलग खुशबुएँ
बाग़ बनने का उनमें महारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
जब हलाहल हवाओं में घुलने लगे
नीलकंठी बनें हम जगत् के लिए
सत्व पर आक्रमण जब कभी तम करे
दान हम कर सकें सर्व सत् के लिए
अपना सब कुछ लुटाकर नफ़े में हों हम
इस तरह की हमारी तिज़ारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
घर पड़ोसी का भी धूप से बच सके
ये सबक़ बरगदों ने सिखाया हमें
जो करिश्मा सिंहासन नहीं कर सके
त्याग ने वो भी करके दिखाया हमें
जब कभी हम नई आफ़तों से घिरें
तब दिमाग़ों पे दिल की सदारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
भूल जाना नहीं हम मिटे हैं सदा
देहरी के लिए, आन के वास्ते
ज़िंदगानी को चौसर पे मत हारना
शेख़ियों के लिए, शान के वास्ते
नफ़रतें, दहशतें जब रवानी पे हों
तब मुहब्बत की ज़िंदा इबारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
अपने घर को ही दुनिया समझते हैं जो
उनसे कह दो कि दुनिया हमारा है घर
हम चुनौती से आँखें चुराते नहीं
सावधानी रखी, कब रखा कोई डर
ग़ैर की भी हमें कुछ ज़रूरत रहे
ग़ैर को भी हमारी ज़रूरत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
✍️ चिराग़ जैन
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घुट-घुट कर साँस लेते आदमी को
घुटने से बचाने के लिए
व्यवस्था के घुटने बहुत काम आते हैं
दहशत में साँस लेती जनता को
एक ही बार में
साँस की चिंताओं से
मुक्त कर जाते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : George Floyd Death Issue in America
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Muktak, Poetry
छोरी बैठी लाइव पर, दीखन कू तैयार
चार छिछोरे आ गए, भली करे करतार
भली करे करतार, कैमरा हिला अचानक
आधे मेकअप का पूरा व्यू मिला अचानक
जल्दी से ऑफलाइन हो गई कह के सोरी
निक्कर पर साड़ी अटकाए बैठी छोरी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
एक राजा, एक रानी
कुछ वज़ीरों की कहानी
चंद घोड़े, चंद हाथी
बस यही है राजधानी
ऊँट रस्ता तक रहे, चुपचाप भादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
कोई मजबूरी जताकर मार डालोगे हमें तुम
कल बिसातों पर मगर फिर से सजा लोगे हमें तुम
दाँव पहला, हर दफ़ा हम ही चलेंगे खेल में पर
हम घिरे तो खेल से बाहर निकलोगे हमें तुम
जानते हैं रंग हम सबके लबादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
हाँ, ज़माने के लिए तुम हर तरह हम से बड़े हो
पर हक़ीक़त में हमारी ओट में दुबके पड़े हो
जंग के मैदान में दोनों तरफ़ से घिर गए हम
सामने दुश्मन खड़ा है, और पीछे तुम खड़े हो
वार सहना है हमें सबके इरादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
भूलना मत, हम नहीं हैं अब तुम अपने आसरे हो
भूलना मत, जिस जगह हम थे, वहाँ अब तुम धरे हो
भूलना मत ढाल तुमको, बोझ लगने लग गई थी
हम तुम्हारे मोहरे थे, तुम किसी के मोहरे हो
अब दिखेगा नूर सारे शाहज़ादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
थम गया संसार सारा
हो रहा ओझल किनारा
साँस डर कर ले रहे हैं
विष घुला है हर नज़ारा
किन्तु हम ख़ुद को पुनः सुकरात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
मानते हैं, आदमी से भूल भारी हो रही थी
एक अंधी दौड़ की सब पर ख़ुमारी हो रही थी
इस हवस का अंत होगा, होड़ का अवसान होगा
फिर नई दुनिया बसेगी, फिर सृजन का गान होगा
खेत, वन सबका सही अनुपात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
देख लेना इस नए जग की सुरीली तान होगी
श्वास में विश्वास होगा, आँख में मुस्कान होगी
प्रेम का व्यवहार होगा, प्रीत का सत्कार होगा
फिर नए बिरवे उगेंगे, फिर नया संसार होगा
हर तरफ़ उल्लास को तैनात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
लोभ का प्रतिकार करना जानता हो, वो बचेगा
सत्य को स्वीकार करना जानता हो, वो बचेगा
जो बचेगा, वो मनुजता के लिए वरदान होगा
जो बचेगा, वो नए युग का नवल उत्थान होगा
साथ मिलकर फिर वही हालात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
धड़कनें इस बात की पहचान है, जीवन अमर है
ज़िन्दगी क्या है, शिराओं में लहू का वेग भर है
श्वास में संगीत होगा
धड़कनों में ताल होगी
तन समूचा स्वस्थ होगा
ज़िन्दगी ख़ुशहाल होगी
देह को उपचार में निष्णात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे
✍️ चिराग़ जैन