Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
कोरोना से निबटने के लिए पहले जनता कर्फ़्यू और फिर लॉकडाउन की एहतियात बरती गई। अनुमान था कि 21 दिन की तालाबंदी कोरोना को पूरी तरह समाप्त कर देगी।
बहरहाल, सरकार ने यह क़दम जनता के हित में ही उठाया था। बाद में लॉकडाउन भी बढ़ता रहा, वायरस भी फैलता रहा और रोजगार सम्बन्धी समस्याएँ भी विकट से विकटतम होती गईं। ठप्प पड़े देश में केवल एक चीज़ थी, जो कभी बन्द नहीं हुई, और उस अति आवश्यक चीज़ का नाम है राजनीति।
बाद में कुछ एहतियात बरतते हुए कम स्टाफ के साथ सरकारी दफ़्तर खोले गए। सरकार से प्रेरित होकर निजी क्षेत्र के दफ़्तर भी खुल गए। व्यापारियों ने प्रदर्शन किए तो बाज़ार भी खुल गए। फिर चुपके से दफ्तरों में भी शत प्रतिशत स्टाफ की अनुमति मिल गई। नेताजी की नेतागिरी में सोशल डिस्टेंसिंग की अनदेखी होती ही रही। चीन से हुई मुठभेड़ में शहीद हुए वीर सैनिकों की अंतिम यात्रा में भी हज़ारों लोग बाक़ायदा भीड़ की तरह सड़कों पर दिखे। जगन्नाथ जी की यात्रा के समय ज़िद्द की गई तो कुछ एहतियातों के साथ यात्रा निकालने की इजाज़त मिल गई। बकरीद के समय ज़िद्द की गई तो कुछ एहतियातों के साथ ईद मनाने की भी इजाज़त मिल गई। अयोध्या में प्रसाद के लाखों पैकेट बनवाए गए हैं, मतलब लाखों लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परस्पर सम्पर्क में आएंगे।
आजकल अक्षय कुमार एक विज्ञापन के माध्यम से बताते हैं कि सरकार ने उनके इलाज के लिए पूरा इलाज कर रखा है इसलिए कोरोना से डरकर घर मत बैठो, काम पर जाओ। उनकी बात सुनकर अखिलेन्द्र मिश्र भी मास्क लगाकर काम पर चल पड़ते हैं।
यह विज्ञापन देखकर मुझे बहुत आश्चर्य होता है। लॉकडाउन के बढ़ते जाने के दौर में जब कोई यह कहता था कि ‘सरकार इलाज की व्यवस्था दुरुस्त करे, बाक़ी देश को चलने दे’ -तो उसे ग़ैर-ज़िम्मेदार, लापरवाह, विरोधी चमचा और न जाने क्या-क्या कहकर अपमानित किया जाता था। और आज सरकार दो महंगे अभिनेताओं को पैसा देकर उसी बात का प्रचार करवा रही है।
जहाँ ज़िद्द की गई, वहाँ इजाज़त मिल गई। जहाँ प्रदर्शन हुए, वहाँ भी अनुमति मिल गई। सरकारी दफ़्तरों में सौ फीसदी उपस्थिति से कोरोना नहीं फैलेगा लेकिन शिक्षण संस्थानों में इसका पूरा ख़तरा है। नेताजी सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ाते हुए भीड़ जुटाएंगे तो कोरोना नहीं फैलेगा, लेकिन सिनेमाघर में या प्रेक्षागृह में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भी कोरोना फैल जाएगा। तन-मन को बेसुध करनेवाली शराब का धंधा जारी रहना ज़रूरी है, लेकिन मन को स्वस्थ करने वाली कलाओं का प्रदर्शन बंद रहना चाहिए।
यह सब सोच ही रहा था, कि अक्षय कुमार फिर बताने लगे कि घर मत बैठो, काम पर जाओ क्योंकि सरकार ने हमारे इलाज की पूरी व्यवस्था कर रखी है।
…यदि ज़िन्दगी क़ीमती है तो सबकी ज़िन्दगी क़ीमती होनी चाहिए। कोरोना को यह कैसे पता चलेगा कि रामलाल शोरूम खोलने जा रहा है और श्यामलाल पटरी पर माल बेचने जाएगा। वायरस कैसे जान सकेगा कि आयाराम राम मंदिर का प्रसाद बाँटने जा रहा है और गयाराम राम जी की कथा सुनाने जाएगा।
फ़िल्म जगत्, कलाकार, इवेंट मैनेजर्स, पर्यटन, होटल, दिहाड़ी मजदूर और ऐसे ही तमाम वर्ग प्रदर्शन और ज़िद्द किये बिना सरकार के निर्णय की प्रतीक्षा में विपन्न होते जा रहे हैं, उनकी भी कुछ चिंता सरकार को करनी चाहिए, क्योंकि उन्हें सरकार के निर्णयों पर ‘प्रदर्शन करने वालों से’ ज़्यादा विश्वास है। और रोटी की आवश्यकता तो सबको होती है!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिसके चेहरे की पीड़ा को पढ़कर तुम बेचैन हुए थे
उसकी आँखों के आँसू से तुमने कैसे आँख चुरा ली
जिसकी हर इच्छा का बिरवा, तुमने साँसों से पोसा था
उसकी चाहत के झूले से कैसे तुमने शाख़ चुरा ली
सिसकी भरने से पहले ही, तुम दुलराने आ जाते थे
दुनिया से मन ऊब न जाए, प्यार जताने आ जाते थे
एकाकीपन की सर्दी से जब अंतर्मन काँप रहा था
तुमने भी उस ही मौसम में रिश्तों की पोशाक चुरा ली
उम्मीदों का साथ न हो तो, साँसें कुम्हलाने लगती हैं
मन में कोई आस न हो तो, आँखें पथराने लगती हैं
तुमसे ही उम्मीद बची है, उसको मत मर जाने देना
दुनिया ने बाक़ी उम्मीदें, सीना करके चाक चुरा लीं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Hasya Kavita, Lapete Mein Netaji, Poetry
किसने बोला काम करो
घर बैठो, आराम करो
कितना कुछ है मुमकिन देख
घर पर बैठ बुलेटिन देख
बहसों से कर टाइम पास
कितने हैं अच्छे दिन देख
भूख लगी हो ख़बरें खा
ख़बरों से ही प्यास बुझा
दिन भर अख़बारों को पढ़
फिर अख़बारों पर सो जा
ख़बरों पर विश्राम करो
घर बैठो आराम करो
बाहर क़ाफ़ी गर्दी है
गर्मी, बारिश, सर्दी है
दो रोटी के चक्कर में
तूने आफत कर दी है
दाम चढ़ेंगे, बढ़ने दे
रोग बढ़ेंगे, बढ़ने दे
तंत्र मलाई खाएगा
तू बस ख़ुद को कढ़ने दे
हर सपना नीलाम करो
घर बैठो, आराम करो
माना, तेरी आदत है
लेकिन बाहर दहशत है
तुझको ज़िंदा रखना है
तेरी अभी ज़रूरत है
भाषण हो तो बाहर जा
रैली में नारे लगवा
नेताजी को वोट दिला
फिर मरता हो तो मर जा
ऐसे उम्र तमाम करो
घर बैठो आराम करो
दुःखड़ा गाकर क्या होगा
सच दिखलाकर क्या होगा
गूंगी-बहरी जनता को
गीत सुनाकर क्या होगा
हम ऐसे फरियादी हैं
हर शोषण के आदी हैं
भीतर दहके अंगारे
बाहर गांधीवादी हैं
मन ही मन संग्राम करो
घर बैठो आराम करो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
बात 2011 की है। उन दिनों मैं जम्मू में नौकरी करता था। पहली बार अपने घर से दूर, अकेला रह रहा था। सत्वारी के लक्ष्मी निवास में पेइंग गेस्ट की तरह रहता था। बिना बतियाए न रह पाने की आदत के कारण सप्ताहांत काटना पहाड़ जैसा लगता था।
उस घर का आंगन बहुत बड़ा था। यह आंगन मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था। अकेलेपन का अभिशाप झेलने को विवश; मैंने आंगन की फुलवारी से दोस्ती कर ली।
जम्मू की भूमि बहुत उर्वरा है। लीची, आम, अंगूर, अमरूद, नारंगी, नाशपाती और अखरोट के पेड़ लगभग हर आंगन का हिस्सा हैं। मैंने लक्ष्मी निवास के आंगन की फुलवारी से बतियाना शुरू किया। तरह-तरह के पॉम, गोल्डन डुरंटा की हैज, वॉल स्टिक और तमाम पौधों के साथ समय बीतने लगा। ख़ूब चित्र खींचता अपने इन दोस्तों के।
एक दिन बरसात की बूंदें, आंगन की फुलवारी के साथ खेलने आईं। मैं भी कैमरा लेकर इस उत्सव को सहेजने लगा। उस दिन पहली बार, मैंने आनन्द को बरसते हुए देखा। उस दिन पहली बार, मैंने पोर-पोर तृप्त होने का अर्थ समझा। उस दिन पहली बार,मुझे आभास हुआ कि प्यास बुझने का सुख कैसा होता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
जो बड़ा होता है, उसे बताना नहीं पड़ता
जिसे बताना पड़ता है, वो बड़ा नहीं होता
जो अपना होता है, उसे सफ़ाई नहीं देनी पड़ती
जिसे सफाई देनी पड़े, वो अपना नहीं होता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Purushottam, Quotation
रामजी ने जिस मुहूर्त में कोई शुभकार्य किया, ग्रहों के उसी संयोग को हम शुभ मुहूर्त मानते थे। आज राजनीति ने हमें इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि रामजी के मंदिर के लिए शुभ मुहूर्त का टंटा पड़ रहा है।
अरे, उनका नाम लेकर तो जिस मुहूर्त में ईंट रख दो, वही शुभ है मूढ़ो! भूल गए क्या, उनके नाम से तो पत्थर तिर गए थे! पर उस समय राम जी के सब कारज इसलिए सिद्ध हो जाते थे, क्योंकि तब नल-नील की पूरी ऊर्जा पुल बनाने में केंद्रित थी, यदि वे भी राजनीति कर रहे होते तो चार सीटें फालतू मिलने पर रावण के हाथों बिक जाते और राम जी के आगे नाटक करते रहते कि ‘पुल वहीं बनाएंगे’!
✍️ चिराग़ जैन