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रोटी मांगे पेट

राम जी का मंदिर बनैया रे, बनैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
सरयू जी के तट पर रमैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

रामराज की फील करा दो, सब कुछ कर दो सेट
भूखे पेट भजन का करिहैं, रोटी मांगे पेट
कित्ते दिन मंझीरा बजैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

थाली और कटोरी देखें दो रोटी की राह
चूल्हा ठण्डा पड़ा सीगड़ी कब से रही कराह
बैठी-बैठी घूरे कढ़ैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

पैटरोल के दाम डराते, देस रहा है झेल
सारी पूंजी हर कर ले गया, रावण बनकर तेल
कैसे अब गड़िया चलैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

✍️ चिराग़ जैन

रावण

यदि अब राम की शरण में चला गया; तो
मुझे मेरे भीतर का पाप मार डालेगा
एकमात्र सधवा बचेगी मेरी पत्नी तो
शेष विधवाओं का विलाप मार डालेगा
जिनसे सुशोभित थी रावण की राजसभा
उन रिक्त आसनों का शाप मार डालेगा
मृत्यु जो करेगी वह जग को दिखायी देगा
जीवन तो मुझे चुपचाप मार डालेगा

जिस अपराध से न मुक्त हो सकूंगा कभी
उसको मैं बीच मँझधार कैसे छोड़ दूँ
अब मेरा पाप मेरे साथ जग से विदा हो
पाप पर जीवन उधार कैसे छोड़ दूँ
वीर हूँ तो जीतकर जीतत्याग कर दूंगा
अन्यथा मैं भाग्य लिखी हार कैसे छोड़ दूँ
विजयी हुआ तो सिया, राम को ही सौंप दूँगा
युद्ध करने का मैं विचार कैसे छोड़ दूँ’

हारने को कुछ भी बचा नहीं है शेष अब
प्राणप्रिय पुत्र मेघनाद भी चला गया
नयनों से अधरों तलक हुआ भावहीन
हर्ष भी चला गया, विषाद भी चला गया
जीत भी गया तो किसको दिखायेगा विजय
हारने का हर अवसाद भी चला गया
रण में मरण का वरण करना ही होगा
रावण ये जानने के बाद भी चला गया

तन अट्टहास करता था निज मूढ़ता पे
मन रो रहा था अपनों के तर्पण को
जिसपे गिरा था उसके कुटुम्ब का रुधिर
चूमने चला था उस भू के कण-कण को
अपनी ही हठ से प्रचण्ड क्रुद्ध हो गया था
राम से नहीं था कोई क्षोभ दशानन को
जिससे हुई थी बन्धु-बान्धवों की देह जीर्ण
भोगने गया था उस बाण की चुभन को

उचक-उचक नभ में कुटुम्ब ढूँढ़ता था
सबको लगा जो अभिमान से भरा हुआ
दस-दस शीश धरती में गड़े जा रहे थे
अपने ही मन से स्वयम् उतरा हुआ
अपने ही हाथों अपना ही यश नष्ट कर
अपने ही आप को बहुत अखरा हुआ
रामजी ने हार-जीत की प्रथा निभायी बस
रावण तो रण में गया ही था मरा हुआ

✍️ चिराग़ जैन

अयोध्या

शोभ रही नगरी सरयू-तट, खोज रहे उपमा तुलसी
नील सरोवर में दमके, जिस भाँति कली इक रातुल-सी
मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी
या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि, अरु क्या तुलसी

✍️ चिराग़ जैन

घूरे में पड़ा अतीत: आशापुरी

भोपाल के पास एक छोटा-सा कस्बा है, आशापुरी। यहाँ उत्खनन में कुछ प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले हैं। सड़क किनारे एक अहाते में खुले चौक में लाल पत्थर की भव्य मूर्तियाँ रखी गई हैं। पूछने पर पता चला कि खुदाई में इन्हें बरामद करने के बाद यहाँ रखा गया है। सर्दी, गर्मी, बरसात में यह बहुमूल्य धरोहर बेकद्री की शिकार है।
इन मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व तो है ही, लेकिन इनको देखकर जो आस्था उपजती है, वह तो मूल्यातीत है। केयरटेकर टाइप के एक लड़के से पूछा कि इनकी ख़ैर-ख़बर लेने कोई आता है क्या, तो वह बेपरवाह होते हुए बोला- ‘कोई कछु ना पूछै साहब!’ उसकी बात का प्रमाण खोजते हुए इन अवशेषों की पड़ताल की तो देखा गंधर्व, तोरण, देहरी, वेदी, गणेश, महावीर, कुबेर, शिव, विष्णु, नृसिंह, नवावतर, इंद्र और न जाने कितने ही शिल्प यहाँ खुले में पड़े अपने उद्धार की राह देख रहे हैं। इनमें से कुछ खंडित हैं और कुछ समय की मार से स्वयं को बचा लाए हैं।
घूरे में पड़ी इन मूर्तियों पर पीपल और जंगली घास ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। एक तराशे हुए विशाल पत्थर पर हरियाली बेल ऐसे इठलाकर बढ़ी है जैसे शिल्पी द्वारा पत्थर पर तराशी हुई बेल से ईश्वर अपनी बेल की प्रतियोगिता कर रहा हो। इस विलक्षण सौंदर्य को निहार ही रहा था कि अचानक ऐसा लगा जैसे ये हरी बेल इन मूर्तियों को ताना मार रही हो कि, ‘धरती मैया की गोद में रहकर तो दम घुटता था, अब यहाँ घूरे में पड़कर चैन मिल गया!’
आस्था और इतिहास पर गर्व करनेवाली संस्कृति में यह दृश्य मन को भीतर तक कचोट गया। इधर क्षोभ बढ़ रहा था, उधर कौतूहल। इसी कस्बे में आगे एक पहाड़ी जैसे इलाके की चोटी पर वह स्थान देखने को मिला जहाँ से ये मूर्तियाँ निकाली गई हैं। देखकर, समझा जा सकता है कि यहाँ कभी कितना भव्य देवालय रहा होगा! पत्थर का एक भी टुकड़ा ऐसा न मिला जिस पर किसी कलाकार ने नक्काशी से कोई आस्था न उकेरी हो।
क गर्भगृह अभी भी लगभग गर्भगृह जैसा ही लग रहा है। उसमें शिवलिंग का स्थान अभी तक यथावत है। किन्तु उसमें से शिवलिंग निकालकर एक पुजारी ने पास के ही मंदिर में स्थापित कर लिया है। अब जब भी कोई ‘पर्यटक’ इन खंडहरों की दुर्दशा देखने आ जाता है तो पुजारी जी वह शिवलिंग दिखाने के बहाने उसे अपने नवनिर्मित मंदिर में ले आते हैं और वहीं माथा टिकवाकर उससे दक्षिणा की डिमांड करते हैं। इस दृश्य पर अपने स्थान से अलग हुआ शिवलिंग ठठाकर हँस पड़ता है कि चलो इतने बड़े मंदिर का कोई हिस्सा तो किसी का रोज़गार बन सका।
यह मुझे नहीं पता चला कि यह अमूल्य धरोहर किसी धर्मांध आततायी की कट्टरता का शिकार हुई है या फिर धरती की किसी करवट ने ईश्वर के इस भव्य मंदिर को तहस-नहस कर डाला है। लेकिन इतना मुझे ज़रूर समझ आया कि अब, जब यह अमूल्य धरोहर स्वतः ही अपनी गर्द झाड़ कर चमकना चाह रही है तब सरकारी ढर्रे की लापरवाही इन खण्डहरों को दिन-प्रतिदिन जर्जर किये जा रही है।

✍️ चिराग़ जैन

राममंदिर का शिलान्यास

पथराए हुए नयन बोले
देहरी बोली, आंगन बोले
फिर राम अयोध्या लौटे हैं
पुलकित होकर जन-जन बोले
साकेत स्वर्ग हो जाएगा, अब रामराज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

अब नहीं कहीं कोई अबला, पत्थर बनकर दिन काटेगी
अब नहीं कहीं कोई रेखा, मानव-मानव को बाँटेगी
शबरी के बेर चखें राघव, फिर ये रिवाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

जिस धाम चुनौती उपजेगी, उस धाम उपाय निकालेंगे
नल-नील, गिलहरी सब मिलकर, सागर पर सेतु बना लेंगे
अपने सीमित संसाधन से हर कामकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

अब कहीं किन्हीं सुग्रीवों के अन्तस् में क्षोभ नहीं होगा
अब युद्ध जीतने वाले को, लंका का लोभ नहीं होगा
अपनी-अपनी मर्यादा में, अब राजकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

✍️ चिराग़ जैन

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