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पुनरागमन

आज मुद्दत बाद
मेरा गीत मेरे द्वार आया

बात में उसकी कहीं कोई परायापन नहीं था
और मेरी याद से भी थी नदारद हर शिक़ायत
ठीक पहले सी सहजता थी हमारे बीच लेकिन
आँख की इक कोर पर थी सहज होने की क़वायद
आज ख़ुद से मैं उसे ख़ुद को छिपाते देख पाया

आज से पहले उसे छूना हुआ सौ बार लेकिन
आज उसका ग़ैर हो जाना रड़क कर चुभ रहा था
बस रहा था आज भी दिल में उसी के मैं मगर अब
इस बसावट में किसी का डर धड़क कर चुभ रहा था
आज उसका खिलखिलाना एक पल को कँपकँपाया

आज पहली बार था संवाद सपनों से अछूता
आज पहली बार मिलने का बहाना ढूंढना था
आज पहली बार बातें ख़त्म होती दीखती थीं
आज पहली बार बातों में ज़माना ढूंढना था
आज का अख़बार पहली बार अपने बीच पाया
✍️ चिराग़ जैन

बेमआनी

बहुत दिन से इंतज़ार था
एक ख़ास यात्रा का
मुश्क़िल से हाथ आया
यात्रा का अवसर
घर से निकला
उत्साह से आपूरित
कुछ ही दूर पहुँचा
कि मोबाइल पर
एस एम एस आया-
“सुनो! जल्दी आना…”

…और मुझे बेमआनी लगने लगी
हर उपलब्धि।

✍️ चिराग़ जैन

आहट

वो तुमसे मेरी पहली मुलाक़ात थी
और सिर्फ़ तुम जानती थीं
कि आख़िरी भी…!

स्टेशन पर खड़े
चिड़चिड़ा रहे थे सभी लोग
कि ट्रेन लेट क्यों हो रही है
और हर आहट के साथ
सहम जाता था मैं
-’हाय राम!
कहीं गाड़ी तो नहीं आ रही!’
✍️ चिराग़ जैन

पूरा बयां हो जाऊंगा

बस तुम्हीं तो हो मेरी हर बेगुनाही के गवाह
तुम भी गर इल्ज़ाम दोगे, बेज़ुबां हो जाऊँगा

शायद उसने इसलिए मुझको अता की है शिक़स्त
हर दफ़ा जीता तो इक दिन बदगुमां हो जाऊँगा

जी रहा हूँ बांध पर ठहरी नदी की धार-सा
कोई दरवाज़ा खुलेगा तो रवां हो जाऊंगा

जो हवा जलती है मुझमें साँस बनकर रात-दिन
वो हवा झोंका बनेगी तो धुआँ हो जाऊंगा

मैं वो क़िस्सा हूँ जिसे है चंद लफ़्ज़ों की तलाश
वक़्त आएगा तो मैं पूरा बयां हो जाऊंगा

✍️ चिराग़ जैन

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