Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Purushottam
राजवैभव की नहीं है चाह कोई
कीर्ति की, यश की नहीं परवाह कोई
जय-पराजय की घड़ी में मन सहज हो
शोक हो, भय हो, न हो उत्साह कोई
राम, मुझको दो भले मत आवरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
जग जिसे पाषाण माने, देख लूँ मैं साँस उसकी
जो नदी-तट पर खड़ा हो, जान पाऊँ प्यास उसकी
याचना से जो पिता को धर्मसंकट में फँसाए
मैं स्वयं को दांव पर रखकर, सुनूँ अरदास उसकी
हर कठिन क्षण का करूँ वातावरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
प्रेम की जूठन नहीं, केवल समर्पण-भाव देखूँ
वृद्ध पक्षी की पराजय भूल, उसके घाव देखूँ
मित्रता में मित्र का जीवन सुलझना प्राथमिक हो
तब कहीं निज भाग्यरेखा का कोई उलझाव देखूँ
धीर के शृंगार से अंतःकरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
जब चयन का प्रश्न आए, साधना का पथ चुनूँ मैं
कथ्य की इति हो जहाँ पर, उस जगह से अथ चुनूँ मैं
जब परिस्थितियाँ कई चेहरे बनाकर सामने हों
तब समर में जूझने को आत्मबल का रथ चुनूँ मैं
हर समय, हर भाव का हो व्याकरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
राम… एक ऐसा नाम, जिसका उच्चारण जितने गहरे स्वर में किया जाए, मन उतना ही आराम पाने लगता है। राम… एक ऐसा नाम, जिसको पुकारने के लिए किसी विशेष मनोदशा की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो हर परिस्थिति के अनुरूप लय धारण करने में सक्षम है। जिसका उच्चारण यकायक किसी साकार की छवि निर्मित न भी करे, तो भी किसी निराकार शक्ति से अनायास ही एकाकार कर देता है।
सम्बोधन से लेकर अभिवादन तक; चिंता से लेकर चिंतन तक; भेंट से लेकर विदा तक; जन्म से लेकर मृत्यु तक… हर गाम पर राम का नाम अपने पूरे अस्तित्व के साथ उपस्थित रहता है।
राम… एक शब्द के मन्त्र हो जाने का उदाहरण हैं। राम… एक मनुष्य के ईश्वर हो जाने की कथा है। राम… एक पुरुष के पुरुषोत्तम हो जाने का प्रमाण हैं। राम का चरित्र मर्यादा का एक ऐसा कथानक है, जिसकी किसी भी परिस्थिति में कल्पना करके उस परिस्थिति का सर्वाधिक मर्यादित समाधान खोजा जा सकता है। राम का चरित्र जय और पराजय से पूर्व मर्यादा की तुला से निर्मित होता है। यही कारण है कि मंथरा द्वारा बुने गए छल को राम अपनी मर्यादा के बल से ध्वस्त कर देते हैं।
लोभ और लोक की सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो राम का आचरण अनापेक्षित है। संबंधों में संशय की सर्जना करनेवाली मंथरा यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि कैकेयी द्वारा वरदान मांगे जाने पर राम इतनी सहजता से वनवासी हो जाएंगे। किन्तु वरबंधक दशरथ के सम्मुख खड़े राम ने उस समय जो आचरण किया, उससे एक ही क्षण में कैकेयी की जय, पराजित हो गई। यह मर्यादित आचरण का ही परिणाम था कि जिस पुत्र के मोह में माता कैकेयी ने साकेत का सुख भस्म कर दिया था; वही पुत्र, राम के मोह में माता कैकेयी और उनके उपलब्ध वरदानों को ठुकराकर राम को लौटा लाने चल दिये।
यह राम के आचरण की विजय थी। यह राम की मर्यादा की विजय थी। यदि राम दशरथ से अपने अधिकार के लिए लड़े होते, तो कदाचित ननिहाल से लौटे भरत का व्यवहार बदल सकता था। वे मंथरा के सुझावों तथा माता कैकेयी की हठधर्मिता को तर्कसंगत मान सकते थे। किंतु राम की मर्यादा ने इसकी संभावना ही समाप्त कर दी।
संशय की जड़ें काटने का कौशल हैं, राम। मर्यादा की सीमा में रहकर कल्पनातीत आचरण से राम हर अंसभव को संभव बना देते हैं। वे कहीं भी रूढ़ियों के दास नहीं बनते। उनकी नैतिकता, उनके आत्मविवेक द्वारा सर्जित नैतिकता है। वे कहीं भी रटी-रटाई नैतिकता का अनुसरण करते ¬प्रतीत नहीं होते। वे अपनी राह स्वयं बनाते हैं। वे अपनी नैतिकता स्वयं गढ़ते हैं। और उनकी रची नैतिकता इतनी सहज है कि वह हर काल में, हर युग में, हर वर्ग में स्वीकार्य हो जाती है। राम की नैतिकता युगातीत है।
यदि लोकप्रचलित परंपराओं के द्वार पर राम का विवेक घुटने टेक देता तो लोक के अनुसार पत्थर हो चुकी अहल्या, जीवित न हुई होती। यदि लोकप्रचलित परंपराओं के हाथों राम का आत्मविश्वास बिंध गया होता तो मिथिला के स्वयंवर-सदन में देवाधिदेव महादेव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का साहस राम कैसे जुटा पाते? वह भी तब जबकि तमाम महाबली इस प्रयास में विफल होकर लज्जा की टोकरी में मुँह छिपाए पड़े थे।
शिवधनुष की साधना, राम के निःशंक आत्मबल की धमक से संभव हो सकी। वे शिव के धनुष को तुच्छ समझकर उसे साधने का उपक्रम नहीं करते, अपितु पूर्ण विनय के साथ, शिवधनुष को प्रणाम करके उसे स्पर्श करते हैं। ऐसी विनम्रता के आगे भला कौन-सा शस्त्र नत न हो जाएगा!
यदि आवेश में उठाने गए होते, तो ऊर्जा का समस्त कोष तो आवेश प्रकट करने में ही नष्ट हो गया होता। फिर केवल बाहुबल से शिवचाप को हिलाना संभव न हुआ होता। राम आवेशातीत हैं। राम उद्वेग से अछूते हैं।
वे माँ जानकी का हरण करनेवाले रावण पर भी आवेश में आक्रमण नहीं कर देते। उन्माद जैसा तत्व तो राम के चरित्र के साथ मेल ही नहीं खाता। इसीलिए एकांत में किसी स्त्री का हरण करनेवाले पापी से भी राम यकायक युद्ध नहीं करते, अपितु बिना युद्ध के उसे यह अवसर प्रदान करते हैं कि अपने ‘पाप’ को ‘अपराध’ मात्र मानते हुए वह प्रायश्चित कर सके। रावण, जिसने राम की अर्द्धांगिनी का छल-बल से हरण कर लिया, उसके लिए भी मृत्यु के अतिरिक्त एक विकल्प उपस्थित करने वाले उदात्त नायक हैं राम।
राम इसलिए आदर्श नहीं हैं कि वे अवध छोड़कर वनवास जाते समय व्याकुल नहीं हुए। राम इसलिए भी आदर्श नहीं हैं कि सीताहरण के बाद उनमें रावण के ¬प्रति क्रोध नहीं, बल्कि जानकी के प्रति करुणा पनपी। राम इसलिए भी आदर्श नहीं हैं कि लक्ष्मण के मूर्च्छित हो जाने पर वे प्रतिशोध की अग्नि में जलने के स्थान पर धीरतापूर्वक लक्ष्मण के उपचार का उपाय खोजते हैं। वे तो इसलिए आदर्श हैं कि इन्द्रजीत की मृत्यु के उपरांत वे उसके अंतिम संस्कार तक युद्धविराम की घोषणा करते हैं। राम इसलिए आदर्श हैं कि रावण विजय के पश्चात भी वे माल्यवान और मंदोदरी का अपमान नहीं होने देते। राम इसलिए आदर्श हैं कि युद्ध में विजित होकर भी वे झपटकर माँ सीता से मिलने नहीं चल पड़ते।
राम इसलिए महान नहीं हैं कि उन्हें अपनी पराजय के समय धैर्य धरना आता है, अपितु वे इसलिए महान हैं कि वे अपनी विजय के समय भी धीरज धरना जानते हैं। वे युद्ध करते अवश्य हैं, किन्तु युद्ध से एकाकार नहीं होते। वे रावण सरीखे वीर योद्धा का वध करने के उपरांत भी उतने ही शांत रहते हैं, जितने अवध से प्रस्थान के समय थे। वे युद्धोन्मत्त उद्वेगी के समान रावण के शव के चारों ओर पाशविक नृत्य नहीं करते, बल्कि वे तो उस पराजित की विद्वत्ता का सम्मान करके उसका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार कराने की व्यवस्था करते हैं।
राम और रावण में इसी उदात्तता का अंतर है। विपरीत परिस्थितियों में संयत रहनेवाला राम हो गया और अपेक्षा की उपेक्षा होने पर आपा खो देने वाला रावण बन गया। यही कारण है कि राम की हमारे अंतःकरण में जो छवि है, वह उदात्त नायक की छवि है। क्रोध कभी घटित भी हुआ तो इतना प्रक्षालित होकर घटित हुआ कि जिस पर राम क्रुद्ध हुए, वह स्वयं विनत हो गया। सागर का अहंकार राम की विनम्रता के आगे पानी-पानी हो गया। राम इतने विनम्र हैं कि जिस रावण से युद्ध करने जा रहे हैं, उसके दरबार में बैठे दरबारी ही राम की भलमनसाहत के हवाले से रावण को आत्मसमर्पण की सलाह देते हैं।
यह चमत्कार नैतिकता के आत्मबल के सिवाय अन्य किसी माध्यम से संभव नहीं है। राम की कीर्तिध्वजा उनकी नैतिकता के ध्वजदण्ड पर फहराती है। इसीलिए राम का भक्त भी विवेक और विनम्रता की इस मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर पाता। पूँछ जलाने जैसे अपमान के बावजूद हनुमान इतने सविवेकी थे, कि उनके द्वारा भड़काई गई लपटों ने अशोक वाटिका की ओर प्रस्थान नहीं किया। आसन न दिये जाने के बावजूद अंगद ने रावण के दरबार में अपने दूतकार्य की सिद्धि के उपरांत कोई पराक्रम दिखाना आवश्यक न समझा।
इसीलिए रामभक्ति की प्रथम वरीयता है, विनम्रता। राम साधना का प्रथम सोपान है शांति। राम सिद्धि का प्रथम प्रमाण है उदात्तता। इसीलिए राम युद्ध का घोष नहीं, बल्कि अध्यात्म की लय बन जाते हैं। इसीलिए राम बोलने के बाद अधर बंद हो जाते हैं, मानो कह रहे हों कि अब कुछ और बोलना आवश्यक नहीं है।
‘पुनि-पुनि कहहिं-सुनहिं सब सन्ता’ -यह अर्द्धाली रामकथा के अजस्र सौन्दर्य का वर्णन करती है। रामकथा का यही वह गुण है, जिस पर कवि रीझते रहे हैं। कई बार लिखी जा चुकने के बावजूद इस कथा में हर बार कोई न कोई ऐसा नया आयाम मिल ही जाता है, जिसे लिखकर कवियों को सृजन-संतोष प्राप्त होता है।
यही कारण है कि रामायण की प्रवाहमयी कथा के बीच भी कवियों ने अनेक बिन्दु ऐसे ढूंढ ही लिये जिन पर मूलकथा को अक्षुण्ण रखते हुए नये सिरे से लिखा जा सकता था। ऐसे ही सार्थक प्रयासों ने विश्व को ‘राम की शक्तिपूजा’ तथा ‘साकेत’ जैसी अद्वितीय रचनाएँ प्रदान कीं। रामकथा की एक-एक घटना पर अलग-अलग दृष्टिकोण से गीत, मुक्तक, दोहे तथा छन्दमुक्त कविताएँ अनवरत लिखी जाती रही हैं।
हाँ, पिछले कुछ दशकों में राजनैतिक लहर के कारण राम के चरित्र तथा राम की कथा से विलग होकर राम को एक नारे के रूप में प्रयोग करके भी कुछ साहित्य रचा गया है। यह भी सत्य है कि राम की कविता के नाम पर जब उन नारों को परोसा जाता है तो वे एक बार रामकथाधारित काव्य होने का भ्रम भी उत्पन्न कर देते हैं, किन्तु न तो उन रचनाओं की आयु रामकथा की भाँति अनन्त होती है, न ही उनकी उपादेयता सार्वभौमिक होती है। वे किसी राजनैतिक आन्दोलन की भाँति उगती हैं और राजनैतिक परिवेश बदलते ही विस्मृत हो जाती हैं।
इसी स्थिति के स्पष्टीकरणार्थ कविग्राम ने यह अंक उन रचनाओं को समर्पित किया है, जिनमें रामकथा के किसी पात्र, किसी बिम्ब अथवा किसी घटनाक्रम को आधार बनाया गया है।
राम के अप्रतिम व्यक्तित्व पर लिखी गयी कविताएँ बाबा तुलसी की साधना का ही विस्तार मात्र है। राम भारतीय संस्कृति के वह केन्द्र है, जिस पर प्रकार की नोक टिकाकर जो भी वृत्त बनाया जाएगा, वह भारतीयता के परिधिमण्डल से कदापि बाहर नहीं जा सकेगा। इस वृत्त का क्षेत्रफल ज्यों-ज्यों बढ़ता जाएगा, त्यों-त्यों कथा के क्षुद्र पात्रों का आकार भी बढ़ता जाएगा।
मंथरा, सुलोचना, शबरी और केवट ही क्या सुषेण और आर्यसुमंत सरीखे पात्र भी विस्तार के साथ-साथ अधिक महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। जिन शत्रुघ्न को रामकथा में अधिक संवाद नहीं मिल सके हैं, उन शत्रुघ्न को भी यदि नये सिरे से किसी खण्डकाव्य, महाकाव्य अथवा गीत का नायक बनाकर सोचा जाए तो यह मौन पात्र भी अनवरत बोल सकता है। और जब कोई पात्र बोलता है तो वह कुछ भी बोल सकता है। वह मूलकथा के महानायक की भक्ति भी कर सकता है और उससे प्रश्न भी कर सकता है। नायक बनने के लिए किसी भी पात्र को दोनों ही तरफ़ अपना विस्तार करना होगा। यदि वह केवल भक्ति में संलग्न हो जाएगा तो भी उसका नायकत्व अधूरा रहेगा और यदि वह केवल आलोचना में रत हो जाएगा तो भी उसका व्यक्तित्व नायक बनने से चूक जाएगा।
साकेत की उर्मिला केवल करुणा की पात्र भर न होकर, स्त्री के धैर्य तथा सहिष्णुता की जीवन्त मूर्ति भी है। और उर्मिला की सहिष्णुता को शब्दों में अवतरित करने के लिए आवश्यक है कि मूलकथा के उन अंशों को रेखांकित किया जाए, जिसमें कुछ ‘सहन करने जैसा’ स्पष्ट हो सके। और जिसे सहन करना पड़े वह स्थिति कम से कम सुखद तो नहीं कही जा सकती। अब यदि कोई यह आरोप लेकर बैठ जावे कि साकेत में रघुकुल में घटित घटनाक्रम की आलोचना की गयी है… तो यह कवि के साथ बेईमानी होगी। यह सृजन की संभावनाओं पर कुठाराघात होगा।
जिसने रामकथा को अपनी लेखनी का आधार बनाया है, उसकी राम में आस्था कम से कम उनसे तो अधिक होगी, जो राम का उपयोग केवल किसी लौकिक प्रयोजन हेतु करने में रत हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
राज्य, वैभव और निज पहचान तक से हाथ धोकर
चल दिये पाण्डव स्वयं के शौर्य से अज्ञात होकर
वीरता के उपकरण को गौण रहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
भाग्य ने क्या खेल खेला है विवशता के पलों में
सूख जाने की अनोखी खलबली है बादलों में
शस्त्र, जिनको प्राप्त करने के लिए काया गलाई
अब उन्हीं सबको छुपाते फिर रहे हैं जंगलों में
प्राण के बिन, देह को चुपचाप दहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
देख लो, राजा युधिष्ठिर कंक बनकर जी रहे हैं
द्यूतगृह में दांव हारे, रंक बनकर जी रहे हैं
विश्व जिनकी वीरता को देखकर इतरा रहा था
वे स्वयं के शौर्य का आतंक बनकर जी रहे हैं
पार्थ ने गांडीव तज, शृंगार पहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
द्रौपदी को साज और सिंगार की अनुमति नहीं है
भीम को निज जीभ के सत्कार की अनुमति नहीं है
वीरता भयभीत है, कोई उसे पहचान ना ले
अब अनुज को अग्रजों के प्यार की अनुमति नहीं है
आह, हर इक चाह का अवसाद गहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
शौर्य के हर चिह्न से परहेज करना पड़ रहा है
धैर्य की भी धड़कनों को तेज़ करना पड़ रहा है
यश बढ़ाने का हर इक आशीष अब अभिशाप सा है
हाय अपने आपको निस्तेज करना पड़ रहा है
रक्त तक को धमनियों में शांत बहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
इस पराभव का जनक क्या द्यूत का षडयंत्र बल है
कर्म के अनुरूप फल होगा, नियम ये भी अटल है
दांव पर थी लाज और भुजदण्ड में कंपन नहीं था
यह विवशता उस नपुंसक शौर्य से उत्पन्न फल है
इक घड़ी का मौन अब दिन-रात सहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
नंदलला, कन्हैया, कान्हा, गिरिधर, मुरलीधर, गोपाल, मोहन, गोविन्द, मधुसूदन, केशव, रणछोड़, माधव, श्याम, वासुदेव, पीताम्बर… और भी दर्जनों संज्ञाएँ मिलकर थोड़ी-थोड़ी झलक भर दे पाती हैं एक कृष्ण की। और ये सब संज्ञाएँ कृष्ण के नाम भर नहीं हैं, अपितु ये सब नाम कृष्ण के जीवन के अलग-अलग किस्सों के शीर्षक हैं, जिनको एक क्रम में लगा देने से कृष्ण की कथा बन जाती है।
आश्चर्यजनक बात यह है कि इनमें से कोई भी किस्सा अपनी पूर्णता के लिए किसी अन्य किस्से पर निर्भर नहीं है, लेकिन फिर भी जब इन अलग-अलग मोतियों को एक सूत्र का पथ मिल जाए, तो ये सब मिलकर ‘एक’ हो जाते हैं।
यह इसलिए संभव हो पाता है कि कृष्ण, जीवन के प्रत्येक पल को भरपूर जीते हैं। हर क्षण में व्याप्त जीवन का रस भोगने में इतने तल्लीन हो जाते हैं कि फिर उस क्षण को लादकर अगले क्षण तक ले जाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। क्षण तो दूर की बात है, उस क्षण की स्मृति भी अगले किसी क्षण तक यात्रा करने का साहस नहीं जुटा पाती। कृष्ण जहाँ हैं, वहाँ अपनी सम्पूर्ण चेतना के साथ हैं। यही कारण है कि कृष्ण कथा के पीछे नहीं भागते, उल्टे कथा ही कृष्ण के पीछे भागती प्रतीत होती है।
जीवन को पूर्णता से जी लेना ही वह तृप्तिबोध है, जो व्यक्ति को आकांक्षा, उत्कंठा और अपेक्षा से मुक्त कर देता है। कृष्ण की पूरी कथा में वे कहीं भी भाग्य से रुष्ट नहीं दिखाई देते। क्योंकि कृष्ण, समय की सूक्ष्मतम इकाई को भी, समय की नदिया से विलग करके जीना जानते हैं।
इसीलिए कृष्ण का कोई एक किस्सा, किसी दूसरे किस्से पर निर्भर नहीं है। नंदबाबा के घर मे पलता कन्हैया, पूरी तरह अपने बालसुलभ दृश्यों से कथा को अपने इर्द-गिर्द सम्मोहित कर लेता है। यहाँ बचपन के रस में कृष्ण इतने सराबोर हैं कि वीभत्स शत्रुओं का वध करने के लिए भी बालपना नहीं त्यागते। अपितु उसी सहजता से शत्रु को परास्त करते हैं, ज्यों कोई नवजात स्तनपान कर रहा हो; ज्यों पालने में किलोल करता कोई बालक हाथ-पैर चला रहा हो।
कृष्ण कालिया दाह में भी ‘गेंद’ के पीछे कूदते हैं और किसी अबोध बालक के समान ही भयानक विषधर के फन पर नृत्य करते हुए प्रकट होते हैं। यदि यहाँ बालपन छोड़कर कृष्ण, विजेता बन जाते तो वे कालिया पर नाचते हुए नहीं, बल्कि उसको मारते हुए कालिंदी से बाहर आते। यदि इसी दृश्य में कृष्ण पर्यावरण की चिंता करनेवाले ज्ञानी बन जाते तो उन्हें कालिया से भयभीत होना पड़ता, क्योंकि ज्ञान भय का सहोदर है। लेकिन कृष्ण न तो विजेता के अहंकार से युक्त हुए, न ज्ञानी के भय से… वे तो अबोध बालक के समान भयावह दृश्य में कलरव करते दिखाई देते हैं।
उधर गौवर्द्धन को तर्जनी पर रखनेवाले कृष्ण, एक किशोर होते बालक के समान ही जिज्ञासा से उत्पन्न कौतूहल में वह असंभव कार्य कर लेते हैं, जो अन्य किसी मनोदशा में संभव नहीं है। कैशोर्य के द्वार पर खड़ा बालक, अपने समाज की परंपरा पर प्रश्न उठा सकता है। चूँकि अभी वह आस्था की अनुत्तरित वीथियों में गुम नहीं हुए हैं, इसलिए वे पूजित की उपादेयता पर भी तर्कयुक्त प्रश्न उठा लेते हैं। क्योंकि वे तर्क से उत्पन्न ऊर्जा से संचालित हैं, इसीलिए वे किसी की सत्ता का अंधानुकरण करने के स्थान पर उसके भय को न केवल चुनौती देते हैं, अपितु उसका विकल्प उपस्थित करके उसके अनुयायियों को परंपरा की लीक तोड़ने के लिए तैयार भी कर लेते हैं।
कृष्ण के ये सब किस्से उद्वेग तथा उत्तेजना से दूषित नहीं हैं। इसीलिए कृष्ण ‘माधुर्य’ के अधिपति हैं। कृष्ण की बाँसुरी से लेकर उनके पांचजन्य तक सब मधुर हैं। कृष्ण का तो चक्र भी ‘सुदर्शन’ है। इसी कारण कृष्ण के व्यक्तित्व में प्रेम की अथाह संभावना मिलती है। बालसुलभ शरारतों की तरह माखन चुरानेवाले कृष्ण, इस चोरी के लिए गोपियों के कोप के नहीं, प्रेम के भाजन बनते हैं। प्रेम, कृष्ण के व्यक्तित्व का अद्र्धांग है। प्रेम से गढ़े गए व्यक्तित्व का रास भी स्तुत्य होता है। प्रेम से युक्त मनुष्य अश्लील हो ही नहीं सकता। वह तो पीताम्बर धारण किए किसी योगी की भाँति प्रेम की पावनता का भोग करता है। वह देह की सीमाओं के पार, प्रेम की विदेह सम्पदा का रसिया हो जाता है। क्योंकि वहाँ देह महत्त्वहीन है इसीलिए कृष्ण को स्त्रीवेश बना लेने में भी कोई आपत्ति नहीं होती। वहाँ स्त्री-पुरुष जैसा कुछ है ही नहीं, वहाँ तो कोरा प्रेम है। ऐसा प्रेम, जो होली के अलग-अलग रंगों की तरह एक-दूसरे में ऐसे मिल गए हैं कि सभी रंग अपनी पहचान छोड़कर एक नए रंग की सर्जना कर देते हैं, यही रंग प्रेम का रंग है, यही रंग कृष्ण का रंग है।
प्रेम से सिक्त कृष्ण को देखकर ऐसा लगता है कि अब इस कथा में कुछ शेष नहीं रहा। किन्तु कृष्ण यहीं नहीं रुकते। वे एक झटके में प्रेम का यह कुंजवन त्यागकर कत्र्तव्यपथ पर कदम बढ़ा देते हैं। समान्य बुद्धिवाले लोग कथा के इस बिंदु पर कृष्ण को निर्मोही कह सकते हैं। गोपियों के विरह से विचलित संसारी जीव इस बिंदु पर कृष्ण को क्रूर न कह दें इसीलिए कथाकार ने कृष्ण को गोकुल से मथुरा लिवा लाने के लिए जिसे भेजा है, उसका नाम ‘अक्रूर’ है।
कृष्ण का व्यक्तित्व ‘स्वीकार’ का व्यक्तित्व है। वे मन के विरुद्ध उत्पन्न परिस्थितियों को स्वीकार करने में अग्रणी रहते हैं। इसीलिए वे अपने भूतकाल के बोझ से अपने वर्तमान को प्रभावित नहीं होने देते। इसीलिए कंस का वध करनेवाले कृष्ण, गोकुल के कन्हैया से बिल्कुल अलग दिखाई पड़ते हैं। इसीलिए कंस सरीखे बलवान शासक को मार देनेवाले कृष्ण, कालयवन की छाती पर चढ़कर उसे परास्त नहीं करते, अपितु युगों की पोथियों से खोजकर वह युक्ति निकालते हैं, जिससे शत्रु के वरदान का कवच भेदन किया जा सके। कृष्ण, लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखते हैं किंतु मार्ग को भी निरर्थक नहीं होने देते। वे इस दृश्य में यह संदेश देते हैं कि किसी अपयश से बचने के लिए युद्ध हार जाने से श्रेष्ठ है कि ‘रणछोड़’ बनकर विजय प्राप्त की जाए।
कृष्ण की यही युक्तिसंगत चेतना उन्हें पूर्ण बनाती है। परम्परा से परे रहकर जीने की उनकी यही चेष्टा उन्हें अपराजेय बनाती है। कृष्ण अनप्रेडिक्टेबल हैं। कृष्ण की सोच का कोई मैथड ड्रॉ नहीं किया जा सकता। कृष्ण के एक्शन्स का कोई पैटर्न ड्राफ्ट नहीं किया जा सकता। कृष्ण सोच के ठीक विपरीत कार्य कर सकते हैं। युद्ध के मैदान में गीता बाँचना विश्व में विरोधाभास का उत्कृष्ट उदाहरण है। और गीता भी ऐसी-वैसी नहीं, समय की अजगरी धाराओं पर भी प्रासंगिक बने रहनेवाला अद्वितीय प्रवचन है गीता। गीता को पढ़ो तो आभास होता है कि युद्ध घटित हो सके इसके लिए गीता नहीं गढ़ी गई है, बल्कि गीता उत्सर्जित हो सके, इसके लिए युद्ध गढ़ा गया है। कुरुक्षेत्र की उपलब्धि अर्जुन का शौर्योपयोग नहीं है। कुरुक्षेत्र का प्राप्य युधिष्ठिर का राज्याभिषेक नहीं है। कुरुक्षेत्र का हासिल तो श्रीमद्भागवत गीता है।
सुदर्शन से युक्त होकर भी रथचक्र को अस्त्र बना लेने का कृत्य शत्रु के आत्मविश्वास पर आक्रमण है। कोई सपने में भी नहीं सोच सकता कि सुदर्शन उपलब्ध होने के बावजूद कोई रथ का पहिया उठाकर फेंकने लगेगा। जिस पर आक्रमण हुआ, उसने अपना पूरा अवधान सुदर्शन से बचने पर केंद्रित किया होगा। पहिये से बचने के लिए उसने कोई नीति ही नहीं बनाई होगी।
सुभद्रा विवाह, विदुर के घर भोज, मित्र का सारथी बनने की स्वीकृति… यह सब परंपराओं के विरुद्ध अपने व्यक्तित्व का स्वीकार विराट कर लेना है। कृष्ण अपने ही आचरण के ठीक विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं। युद्ध के उन्माद में अंधे हुए जा रहे पांडवों को टोकते हुए जो कृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाते हैं, वही कृष्ण, युद्ध से विरक्त हो रहे अर्जुन को युद्धोन्मुख करते हैं। यह कृष्ण का अपनी बात से पलट जाने जैसा प्रतीत होता है, किंतु इस विरोधाभास में यह स्पष्ट है कि सही और गलत की परिभाषा समय-स्थान-परिस्थितियों के अनुरूप बदलती हैं। जब कृष्ण शांति का संदेश लेकर गए तब युद्ध रोकने के लिए विराट रूप धारण कर लिया। और जब सारथी बनकर कुरुक्षेत्र में आ पहुँचे तब युद्ध करवाने के लिए विराट हो गए। अर्जुन के रण छोड़ देने से कृष्ण के प्रति उनकी मित्रता पर कोई प्रभाव न पड़ता, क्योंकि कृष्ण तो स्वयं रणछोड़ हैं। किन्तु कृष्ण, अर्जुन के माध्यम से समाज का यह विवेक जागृत करना चाहते हैं कि एक्शन का अनुकरण करते समय कारण का संज्ञान न लिया जाए तो कृत्य ढोंग बन जाता है।
…फिलहाल यहीं विराम लेता हूँ। कन्हैया के अनुराग के वशीभूत किसी दिन मेरी मनसुखा सी लेखनी फिर नाची तो इस विषय पर और लिखूँगा।
✍️ चिराग़ जैन