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आज़म ख़ान हाज़िर हैं!

चारों ओर हल्ला मचा हुआ है कि आज़म ख़ान आ रहे हैं। शोर-शराबा सुनकर मुझे लगा कि शायद कोई युद्ध-वुद्ध जीतकर आ रहे होंगे। मैंने हो-हल्ले की दिशा में कान लगाकर सुना तो पता चला कि जेल से आ रहे हैं।
मेरा माथा भनभना गया। मैंने अपने एक पत्रकार मित्र को फोन करके पूछा, ”क्यों भाई, ये आज़म ख़ान के जेल से छूटने पर ख़ुशी का माहौल क्यों है?
वे बोले, ”चिराग़ भाई, दरअस्ल अदालत ने उन्हें सभी 72 मामलों में ज़मानत दी है।”
मैंने टोकते हुए पूछा, “मतलब, अभी निर्दोष सिद्ध नहीं हुए हैं। और वो भी 72 मामले… ऐसा उन्होंने क्या किया था भाई?“
पत्रकार मित्र बोले, “अरे भाईसाहब, राजनीति में ये सब सामान्य बात है। राजनीति में सौ-पचास मुक़द्दमे तो हो ही जाते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इससे किसी को अपराधी नहीं कहा जा सकता।“
भारतीय राजनीति के प्रति पत्रकार मित्र के भाव सुनकर मेरा मन श्रद्धा से भर गया। मैंने जिज्ञासावश पूछा, “अगर ये सब सामान्य है तो उन्हें जेल क्यों भेजा गया?“
वे बोले, ”वो तो सरकार बदल गई इसलिए उन्हें जेल जाना पड़ गया। वरना ये सब मामले तो तब भी थे जब वो ख़ुद सरकार में थे। लेकिन तब किसी की हिम्मत नहीं थी जो उनको हाथ लगा दे।“
“मतलब उन्हें सरकार ने जेल में डाला है, न्यायालय ने नहीं?“ मेरे स्वर में आश्चर्य था।
”अरे भाई आदेश न्यायालय का ही रहा होगा। गिरफ़्तार कार्यपालिका ने ही किया होगा। लेकिन होता सब कुछ सरकार के इशारे पर ही है।“ पत्रकार मित्र ने मेरी जानकारी में इज़ाफ़ा किया।
”सरकार किसी को तेईस महीने जेल में रखने के लिए पूरे सिस्टम को बाध्य कर सकती है?“ मैंने डरते हुए पूछा।
पत्रकार मित्र ठहरकर बोले, “सरकार कुछ भी कर सकती है भाईसाहब।“, पत्रकार मित्र का स्वर गंभीर हो गया।
मैंने फिर पूछा, ”सरकार कुछ भी कर सकती है तो अब ये ज़मानत कैसे मिल गई।“
”ये सब राजनीति के खेल हैं भैया, सरकार जब चाहे उठा ले, जब चाहे छोड़ दे। आज ज़मानत मिल गई, कल ज़रूरत हुई तो फिर उठा लेंगे।“ पत्रकार महोदय बेपरवाह होकर बोले।
मैंने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा, “जिसे आप खेल कह रहे हैं, वह दरअस्ल सिस्टम से खिलवाड़ है।“
सुनकर पत्रकार महोदय की हँसी छूट गई, ”आप जिसे सिस्टम समझते हैं ना चिराग़ भाई, उसी का नाम सरकार है।“

✍️ चिराग़ जैन

धैर्य बनाम कायरता

एकाएक देखने पर धैर्य भी कायरता जैसा ही लगता है। धैर्य की साधना वास्तव में शौर्य के उद्वेग को संयमित करने का पराक्रम ही है।
क्रोध और आवेग का पर्याप्त कारण मिलने पर भी संयत रह पाना किसी पराक्रम से कम नहीं है। किन्तु यह पराक्रम सविवेक है। यह ओज की कुण्डलिनी जागृत करने की तपश्चर्या है। यह शौर्य का सदुपयोग करने का अभ्यास है। और इस तप के फलस्वरुप जो आत्मबल अर्जित होता है, वह शौर्य को दुविधा से अछूता कर देता है।
इसीलिये अनवरत प्रार्थना के उपरांत सागर के समक्ष अग्निबाण तानते हुए राम के मन में कोई दुविधा नहीं रही। इसीलिए निन्यानबे गालियाँ गिननेवाले कृष्ण, सौवीं गाली पर शिशुपाल का वध करते समय संबंध की किसी संवेदना के असमंजस में नहीं घिरे।
यही कारण है कि लाक्षागृह, चीरहरण, वनवास और अज्ञातवास के दौरान कायर प्रतीत होनेवाले पाण्डव; कुरुक्षेत्र में सौ कुरुपुत्रों के रक्त में स्नान करते समय किसी ग्लानिबोध से पीड़ित न हुए। यही कारण है हस्तिनापुर के प्रति निष्ठा का घूंघट ओढ़कर मौन रहनेवाले पितामह की काया को शरशैया तक ले आनेवाले अर्जुन की डबडबाई आँखों से भी कोई निशाना चूक न पाया।
पत्नी का अपहरण करनेवाले रावण के सम्मुख भी राम ने जब अंगद के माध्यम से संधि प्रस्ताव भेजा तब रावण को राम कायर प्रतीत हुए होंगे। किन्तु उस क्षण राम के धैर्य को कायरता समझने की भूल रावण को कितनी महंगी पड़ी, यह सर्वविदित है।
अपना दिल बड़ा करके जब कोई बिना क्षमायाचना के भी आपको क्षमा कर दे तो उसके बड़प्पन का सम्मान करना, क्योंकि अपनी पीड़ा को भुलाकर जो आपको क्षमा करने का आत्मबल जुटा ले, उसको अपने शौर्य का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं रह जाती। और जिसके पास अपने क्रोध पर विजय पाने का सामर्थ्य है, उसकी शक्ति को नापने के लिए उसे रणभूमि में घसीटना आत्मघात जैसी मूर्खता है।
✍️ चिराग़ जैन

सृजन सुख

इस तपोवन में सृजन की साधनाएँ चल रही हैं
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

मन गहन संवेदना अनुभूत करने में जुटा है
तन अभी स्वर-व्यंजनों में प्राण भरने में जुटा है
भाव का उत्कर्ष छूकर नयन खारे हो रहे हैं
इस सृजन सुख में जगत् के डर किनारे हो रहे हैं
शब्द से सच का सहज चेहरा उकेरा जा रहा है
झूठ सुन ले, यह किसी षड्यंत्र की चौसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

इस जगह पर कामना के पर कतरने का नियम है
लाभ से दामन छुड़ाकर कर्म करने का नियम है
कान सबके दूसरों के आँसुओं की आह पर हैं
ध्यान सबका सृष्टि भर के अप्रतिम उत्साह पर है
इस धरा पर स्वार्थ को पूरा निचोड़ा जा रहा है
वासनाओं के लिए यह धाम कुछ हितकर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

इस समय वात्सल्य का उल्लास-उत्सव चल रहा है
रच रहे हैं आज नटवर रास; उत्सव चल रहा है
कृष्ण के आनंद में सुख से भरी हैं कुंजगलियाँ
पीर की काया बड़ी है, संकरी हैं कुंजगलियाँ
द्वेष से मिलने कन्हैया आएंगे मथुरा स्वयं ही
कंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

✍️ चिराग़ जैन

पराश्रित प्रतिभा

द्रुपद से प्रतिशोध की आकांक्षा रखनेवाले द्रोण जब आश्रम की शुचिता में राजनीति का हस्तक्षेप स्वीकार कर लेते हैं तब केवल कुछ कर्ण और एकलव्य ही अन्याय का दंश झेलते हैं।
किन्तु यदि कोई प्रतिभाशाली कर्ण किसी भी परिस्थिति में अपनी निष्ठा के अश्व किसी दुर्योधन के द्वार पर बांध देते हैं तो पूरा युग कुरुक्षेत्र में आ खड़ा होता है।

पराश्रित प्रतिभा, चंदन की लकड़ी से बना कोयला है।

✍️ चिराग़ जैन

सामान्यीकरण

एक दवाई अलग-अलग शरीर पर अलग-अलग प्रभाव डालती है। एक ही परिस्थिति में दो अलग-अलग मनुष्य अलग-अलग व्यवहार कर सकते हैं। एक ही मनुष्य किसी एक बिन्दु पर नैतिक और दूसरे बिंदु पर अनैतिक हो सकता है।
इतनी सामान्य सी बात हम समझना क्यों नहीं चाहते? इतनी साधारण सी बात को समझने में हमें कठिनाई क्यों होती है?
एक लड़की ने हनीमून पर अपने पति की हत्या कर दी। यह एक घटना है। इसके झरोखे से प्रत्येक नवविवाहिता का आकलन करना उचित नहीं है। ठीक इसी प्रकार एक परिवार ने दहेज के लोभ में अपनी वधू की हत्या कर दी; इस घटना को साक्ष्य मानकर सभी ससुरालवालों को खलनायक मान लेने का अपराध हम कर चुके हैं।
दहेज हत्या सामाजिक बुराई अवश्य थी, किंतु यह समाज की प्रवृत्ति नहीं थी। ऐसी दुर्घटनाओं की बेतहाशा चर्चा और इन चर्चाओं से समाज में उत्पन्न घृणा ने संबंधों की चूल हिला डाली। सिनेमा ने लगातार ‘बेचारी बहुओं’ का ऐसा चित्रण किया कि सास, ननद और जेठानी जैसे रिश्ते अपमानित होकर रह गए।
जिस वधू को विश्वास और आश्वस्ति के साथ ससुराल आना था, वह संशय और भय के साथ बाबुल का घर छोड़ने की अभ्यस्त हो गई। इस संशय का परिणाम यह हुआ कि ससुराल की राई जैसी खटपट को भी बहू ने पर्वत जैसा संकट समझ लिया। नकारात्मकता की छोटी सी चिंगारी भी ज्वालामुखी दिखने लगी।
इस स्थिति में जो कलह घटित हुईं, उनके परिणामस्वरूप दहेज विरोधी कानून बना दिए गए। घरेलू हिंसा अधिनियम बन गया। अब बहू के हाथ मजबूत हो गए और ससुरालवालों के मन में संशय बैठ गया। इन कानूनों ने बीमारी का इलाज नहीं किया, बल्कि संशय को स्थानांतरित कर दिया।
तब हमने सभी बहुओं को ‘बेचारी’ मानकर वैवाहिक संस्था को ध्वस्त किया था और अब हम मेरठ से मेघालय तक कि घटनाओं का हवाला देकर सभी बहुओं को ‘क्रूर’ मानकर उसी भूल की पुनरावृत्ति कर रहे हैं।
जिसने पति की हत्या कर दी, वह एक महिला अपराधी है। इससे सभी महिलाओं को अपराधी नहीं माना जा सकता। जिसने पति को धोखा दिया, वह एक लड़की चरित्रहीन है। उसका उदाहरण देकर सभी ल़डकियों को चरित्रहीन नहीं माना जा सकता।
सामान्यीकरण की इस बीमारी ने समाज के सौहार्द को आघात पहुँचाया है। सोशल मीडिया के दौर में यह बीमारी अधिक व्यापक हो चली है।
एक भाजपा नेता का वीडियो वायरल हुआ और हम सभी भाजपाइयों को अश्लील मानने लगे। एक कांग्रेसी के चरित्र से पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं परखा जा सकता। एक भारतीय पूरे भारतवर्ष का उदाहरण नहीं हो सकता। एक स्त्री पूरी स्त्री जाति नहीं है।
डॉक्टरों को भगवान बनाकर हमने इसी सामान्यीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। फिर मानव अंगों के व्यापार में शामिल डॉक्टरों को उदाहरण मानकर, सभी डाक्टर्स को दैत्य मानना भी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।
एक आध्यात्मिक व्यक्ति के कदाचार से सभी संतों के चरित्र को घिनौना मानना अपराध है। एक साधु के रावण निकलने पर राम ने सभी साधुओं को रावण नहीं मान लिया था।
सामान्यीकरण समाज के विवेक का हत्यारा है। इससे अपने समाज को, अपनी विधायिका को, अपनी न्यायपालिका को और अपने परिवारों को बचाना हम सबका कर्त्तव्य है।

✍️ चिराग़ जैन

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