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फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

संपन्नता से वे ऑफ लिविंग बदल सकता है, लेकिन वे ऑफ थिंकिंग पर संपन्नता का कोई असर नहीं होता। झुग्गी बस्ती में पानी का टैंकर आने पर जिस तरह की झड़प होती है ठीक वैसी ही तू-तू-मैं-मैं एयरपोर्ट पर सिक्युरिटी चेक करते समय भी ख़ूब होती है। अन्तर बस इतना है कि फेंकने की सिचुएशन आने पर पानी की बाल्टी, सेमसोनाइट की अटैची से रिप्लेस हो जाती है और माँ-बहन की भद्दी गालियां अपने अंग्रेजी अनुवाद का अवतार ले लेती हैं।
पढ़ी-लिखी महिलाएं झुग्गी वाली महिलाओं की तरह एक-दूसरे के बाल पकड़कर खींचने की बजाय बात को इतना लंबा खींच देती हैं कि सामने वाला ख़ुद अपने बाल नोच लेता है।
कस्बाई शामें देसी दारू की महक से प्रारम्भ होकर मारपीट और गाली-गलौज पर संपन्न होती हैं, जबकि होटलों की शामें दिखावटी आलिंगनों से प्रारंभ होकर गाली-गलौज पर संपन्न हो जाती हैं। हाई-क्लास लोग मारपीट और हाथापाई नहीं करते, क्योंकि इस काम को करने के लिए अपना निजी शरीर प्रयोग करना पड़ता है।
पीवीआर सिनेमा की लाइन में भी लोग उसी सोच से बीच में घुसने का प्रयास करते हैं जिस चतुराई से वे मिट्टी के तेल की लाइन में चुपचाप घुसने की कोशिश करते थे। लाइन तोड़कर बीच में घुसने की जो दक्षता हम भारतीयों में है, उसका विश्व में कोई सानी नहीं है। लेकिन इसका यह बिल्कुल अर्थ नहीं है कि हर कोई ऐरा-गैरा हमारे रहते बीच में घुस जाएगा। इसका सीधा फार्मूला है, जो हमसे ज़्यादा ढीठ होगा, वही हमसे जीत पाएगा। इसीलिए सिविक सेंस, रोड सेंस और यहाँ तक कि कॉमन सेंस को भी कभी अपने बीच में जगह नहीं बनाने दी।
एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चैक की लाइन हो तो भी हम चेहरे पर फ्लाइट छूटने की चिंता का ऐसा शानदार अभिनय पोत लेते हैं कि क्रूर से क्रूर आदमी को भी पीछे हटना पड़ेगा। ये और बात है कि अंदर वही बेचारा जब विंडो शॉपिंग पर टाइम पास करता दिखता है तो उसकी आँखों में बेशर्मी तैर रही होती है।
वाहनों का इंश्योरेंस होने के बाद भी दो गाड़ीवाले सड़क पर उसी तरह से नुक़सान की भरपाई के नाम पर पैसे वसूलने की भरसक कोशिश करते हैं, जैसे किसी ऑटोरिक्शा से टच हो जाने पर साइकिलवाला अपने पैर की हड्डी टूटने की घोषणा करके लँगड़ाने लगता है।
हम दरअस्ल दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि हम बदतमीजी करते वक़्त ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब, शहरी-ग्रामीण जैसे भेदभाव नहीं करते। हम अपने मूल संस्कारों को भूलकर कोई वैभव नहीं भोग सकते। इसीलिए हमारे भूखे-नंगे से लेकर करोड़पतियों तक बकी जानेवाली गालियों में रत्तीभर फर्क़ नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

पारस और लोहा

पारस ही हर बार लोहे को छूकर सोना बना दे, यह ज़रूरी नहीं। कुछ लोहे भी इतने ढीठ होते हैं कि वो जिस पारस को छू दें उसे लोहा बना लेते हैं।
✍️ चिराग़ जैन

बेताल पचीसी

पत्रकारिता, सम्राट विक्रम की तरह राजनीति के बेताल को अपनी पीठ पर लादकर, जनमत की यज्ञशाला तक ले आने में समर्थ थी।
जब भी पत्रकारिता, राजनीति को वश में करके यज्ञशाला की ओर चलती, तो बेताल किसी अनावश्यक कहानी में उसे उलझा देता था। भ्रमित विक्रम, यज्ञशाला का लक्ष्य भूलकर कहानी के समाधान में भटक जाता। ज़रा-सी चूक होते ही बेताल हाथ से निकल जाता था और विक्रम देखता रह जाता था।
एक दिन विक्रम ने साधु के हाथ-पैर बांधकर उसे ही पीठ पर लाद लिया। थोड़ी दूर चलते ही बेताल ने दूर बैठकर एक कहानी शुरू की और फिर कहानी बीच में छोड़कर भाग गया।
विक्रम ने साधु को रास्ते में पटका और कहानी पूरी करने निकल गया। इससे पहले कि कहानी पूरी हो, बेताल फिर से कोई नई कहानी उसके हाथ में थमाकर भाग निकला।
अब, साधु बीच रास्ते में बंधा हुआ कराह रहा है। यज्ञशाला पर बेताल ने कब्ज़ा कर लिया है। और विक्रम बेचारा, रोज़ एक कहानी को अधूरा छोड़कर, नई कहानी को पूरा करने में व्यस्त है।

✍️ चिराग़ जैन

तोंद गाथा

जब 25वां साल चढ़ा
तब अपना भी पेट बढ़ा
जो खाता, वो लगता था
प्रतिदिन पेट निकलता था
लड़कीवाले आते थे
तोंद देख भग जाते थे

इक दिन इक लड़की के घर
जा पहुँचा रिश्ता लेकर
साँस खींचकर बैठा था
पेट भींचकर बैठा था
बटन काज में अटका था
दिल में हर पल खटका था
तभी अचानक वो आईं
मुझे देखकर मुस्काई
प्रणय भाव में उछल गया
दायित्वों को कुचल गया
पेट ख़ुशी से फूल गया
सारी सीमा भूल गया
बटन बेचारा हार गया
पेट शर्ट के पार गया
सपनों का संसार धुला
कहाँ तीसरा नेत्र खुला
निकला तीर कमान दिखी
भीतर की बनियान दिखी

जैसे-तैसे ब्याह हुआ
फिर मैं बेपरवाह हुआ
टायर का आकार बढ़ा
पूरा गोलाकार बढ़ा
कटि बढ़कर कटिहार हुई
हर इक सीमा पार हुई
पत्नी ने कुछ फील किया
मुझे प्यार से डील किया
तुम तो शोना-बाबू हो
खाने में बेकाबू हो
चाट पकौड़ी भाती है
ज़रा शर्म नहीं आती है
मटके जैसा पेट लिए
ख़ुद को इन्डिया गेट किए
ठुमक-ठुमककर चलते हो
स्मार्टनेस को खलते हो
थोड़ा तो कंट्रोल करो
अब मत टाल-मटोल करो

सेहत का अपमान है तोंद
बीमारी का भान है तोंद
बॉडी से मिसमैच है तोंद
भोंदूपन का बैज है तोंद
कुंभकर्ण की फ्रेंड है तोंद
आलसियों का ट्रेंड है तोंद
कितना बैड रिजल्ट है तोंद
इक सोशल इंसल्ट है तोंद

ये सब सुनकर नाड़ झुकी
नाड़ झुकी तो तोंद दिखी
फटने को था गुब्बारा
मैंने ख़ुद को धिक्कारा
लानत है इस जीवन पर
कुछ कंट्रोल नहीं मन पर
खूब समोसे खाता है
पुचके पर ललचाता है
सीधी रेखा चाप हुई
शेप बिगड़कर शाप हुई
खुद को कुछ इस्ट्राँग किया
मैंने इक संकल्प लिया
तला-भुना सब छोड़ूंगा
मीठे से मुँह मोड़ूंगा
काम अजायब कर दूंगा
चर्बी ग़ायब कर दूंगा
चटखारे बिसरा दूंगा
ये ब्रह्मांड हिला दूंगा

ऐसा भीषण प्रण करके
कुछ संयम धारण करके
मैं घर से बाहर निकला
नुक्कड़ पर ही दिल पिघला
दृष्टि भूल से छली गई
तभी जलेबी तली गई
मुँह में पानी भर आया
बहुत तरस ख़ुद पर आया
तन और मन में ठन आई
ठीक सामने हलवाई
गरम जलेबी तलता था
मन उस ओर मचलता था
रस की भरी करारी थी
छोटी प्यारी-प्यारी थी
क्या बतलाऊं कैसी थी
ठीक मेनका जैसी थी
कठिन तपस्या भंग हुई
भीष्म प्रतिज्ञा तंग हुई
जब कंट्रोल न हो पाया
तब ख़ुद को यूँ समझाया
कल से नियम निभाऊंगा
आज जलेबी खाऊंगा

कई दिनों तक ट्राई किया
एक अर्थ-स्काई किया
कोई मन्तर नहीं चला
रोज़ किसी ने मुझे छला
कभी भठूरे-छोले ने
कभी बर्फ के गोले ने
गर्मागर्म समोसे ने
कभी मसाले डोसे ने
आलू, चाट, पकौड़ी ने
भजिया, पाव, कचौड़ी ने
केसर चढ़ी इमरती ने
भोजन भूषित धरती ने

तप में नित व्यवधान किया
नियमों का अपमान किया
पूरा जग रसवान दिखा
हर पदार्थ पकवान दिखा
झरने कलकल करते थे
शर्बत बनकर झरते थे
पर्वत जी का जाल लगे
वर्क सुसज्जित थाल लगे
किचन सूंघकर आती थी
पुरवा भूख बढ़ाती थी
पेड़ सुना, पेड़ा सूझा
गेंदे को लड्डू बूझा
सुबह-सुबह प्रण लेता था
शाम तलक तज देता था

लेकिन इक दिन मैं जीता
लार गटककर दिन बीता
पूरा दिन रुक पाने में
डाइट चार्ट निभाने में
बस थोड़ी-सी दूरी थी
मगर प्लेट में पूरी थी
पुनः प्रतिज्ञा छली गई
पूर्ण उदर में चली गई

इक दिन मुझको ज्ञान हुआ
भोजन का सम्मान हुआ
बेर राम को भाते हैं
कान्हा माखन खाते हैं
जो ईश्वर को भाता है
वह प्रसाद बन जाता है
फिर विचार कुछ करना क्या
तोंद-वोंद से डरना क्या
वही तोंद से बचता है
जिसको घी नहीं पचता है
लोग भसककर खाते हैं
तोंद उगा नहीं पाते हैं
नींद भूख जब पूर्ण मिलें
सुख के स्वर्णिम पुष्प खिलें
तब कुछ तोंद निकलती है
क्यों दुनिया को खलती है

तोंद बढ़ाना खेल नहीं
भूख-पेट का मेल नहीं
पतला खाना खाता है
मोटों के सिर आता है

तोंद उसी के लगती है
जिसको लक्ष्मी फबती है
गणपति की पहचान है तोंद
ईश्वर का एहसान है तोंद
वैभव का वरदान है तोंद
सेठों का अभिमान है तोंद
सबके ताने सहती है
फिर भी आगे रहती है
कृत्रिम होना ठीक नहीं
तोंद गिफ्ट है, भीख नहीं
नेचर का सत्कार करो
बस ख़ुद को स्वीकार करो

✍️ चिराग़ जैन

भीड़ हैं हम

हमने ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसने हमें ‘भीड़’ से ‘जनता’ बनाना चाहा। हमें भीड़ बने रहना पसंद है। हम भीड़ बनकर जीते हैं और भीड़ बनकर मर भी जाते हैं। इसीलिए हमारे अख़बारों की सुखिऱ्याँ हमारा नाम नहीं जानतीं। कभी यात्री, कभी श्रद्धालु, कभी किसान, कभी तीर्थयात्री, कभी विद्यार्थी, कभी मज़दूर, कभी आदिवासी और कभी पुलिसवाले बनकर हम मर जाते हैं; हमारा कोई नाम नहीं होता। हमें एक ‘भीड़’ के नाम से जाना जाता है।
अपराधियों के नाम होते हैं, लेकिन निरपराध का कोई नाम नहीं होता। अपराध तो छोड़िए साहब, हम शहर में गाड़ी लेकर निकलते हैं, कहीं किसी कारणवश गाड़ी सड़क के किनारे रोकते हैं तो पुलिसवाला हमें भीड़ की तरह यह कहकर खदेड़ देता है, ‘यहाँ गाड़ी खड़ी करना मना है’। हम पूछते हैं, ‘तो फिर कहाँ खड़ी करें?’
इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं होता। वह डाँट देता है, ‘यहाँ से आगे ले बे!’ हम आगे ले लेते हैं।
हमारे तंत्र ने जिन देशों की सड़कों के किनारे से ‘नो पार्किंग’ का डिज़ाइन टीपा है, उन देशों से हम व्यवस्थित पार्किंग सिस्टम की कॉपी करना भूल गए।
विश्व समुदाय भी हमें कोई विश्वगुरु नहीं मानता, उनके लिए भी हम केवल एक भीड़ हैं। एक भीड़, जिसे अपना माल बेचा जा सकता है। एक भीड़ जिसे सपने बेचे जा सकते हैं।
शुरुआत में राजनीति भी हमें ‘जनता’ कहकर ही संबोधित करती है लेकिन अंततः वह हमें ‘भीड़’ की तरह इस्तेमाल करती है। जिस मंच से वह हमें जनता कहकर हमसे वोट मांग रहे होते हैं, उसी मंच की रिपोर्टिंग में हमें भीड़ कहा जा रहा होता है और हम तालियाँ पीट रहे होते हैं।
अगर कहीं जनता के लिए राजनीति के हाथों कुछ हितकर्म हो भी जाए, तो हम भीड़ बनकर उस विकास की ऐसी धज्जियाँ उड़ाते हैं कि राजनीति को अपने किए पर क्रोध आने लगता है। फिर वह हमें साम्प्रदायिक भीड़ में बदल देती है, फिर वह हमें जातियों की भीड़ में बदल देती है। हम ख़ुशी-खुशी भीड़ बन जाते हैं और दूसरी भीड़ के विरुद्ध गालियाँ तलाशने लगते हैं।
हमें भीड़ बनकर लड़ने की आदत हो गई है। हमें जैसे ही कोई साइनबोर्ड मिलता है, हम तुरंत उसके नीचे भीड़ बनकर जुटने लगते हैं। ‘गांधी’; ‘लोहिया’; ‘अम्बेडकर’; ‘हेडगेवार’; ‘कांशीराम’; ‘जयप्रकाश’; ‘मोरारजी’; ‘वीपी सिंह’; ‘मुलायम’; ‘माया’; ‘जयललिता’; ‘करुणानिधि’; ‘ठाकरे’; ‘अन्ना’; ‘केजरीवाल’; ‘मोदी’; ‘राहुल’; ‘ओवैसी’… ये सब हमारे लिए साइनबोर्ड बन गए और हम इनके नीचे भीड़ बनकर जुटते रहे।
इन सबने हमें मनुष्य बनाना चाहा तो हमने इनको पूरी ताकत से यह एहसास कराया कि हमें इंसान समझने की ग़लती मत करना। हमें भीड़ समझो, वर्ना हम तुम्हारे खिलाफ़ खड़े होकर तुम्हें औंधे मुँह गिरा देंगे।

✍️ चिराग़ जैन

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