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न्याय के मुँह पर जूता

भारतीय लोकतन्त्र लगभग उस मुकाम पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ से ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ के मध्य की खाई इतनी चौड़ी हो जाती है कि किसी के लिए भी दोनों ओर पैर रखकर टिके रहना असंभव हो जाए। एक ओर तन्त्र है, जो संविधान की मूल भावना से भटककर अपने-अपने वाद तथा अपने-अपने गुटों के साथ इस हद तक छितरा गया है कि अब इस ताने-बाने का हर ताना अपने बाने पर प्रतिशोध तानकर खड़ा दिखाई देता है।
दूसरी ओर है लोक, जो तन्त्र से नाराज़ रहते हुए भी सदैव तन्त्र की ओर ही आशा भरी निगाहों से देखता है। यह लोक वर्तमान में अपने-अपने ‘सोशल मीडिया समूहों’ द्वारा प्रसारित विचारधाराओं तथा नैतिकताओं का अनुसरण करते-करते इतना अंधा हो गया है कि अराजकता की सीमा-रेखा इसे दिखाई देनी बंद हो गयी है।
एक शिष्ट तथा समृद्ध लोकतन्त्र में तन्त्र, लोक की भावनाओं का सम्मान करते हुए संविधान लागू करवाता है और लोक, तन्त्र की सीमाओं को समझते हुए संविधान लागू करने में सहयोग करता है। किन्तु वर्तमान स्थितियों में कम से कम अपने देश में लोकतन्त्र का यह सौहार्द लगभग धूमिल हो चुका है। न जनता के मन में तन्त्र के लिए कोई सम्मान शेष रह गया है, न ही तन्त्र के मन में जनता के लिए कोई सौहार्द।
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका नामक तीन शक्तियाँ लोकतन्त्र के ब्रह्मा-विष्णु-महेश के रूप में लोकतन्त्र की समूची सृष्टि को सुचारू रूप से संचालित करती हैं। सृष्टि के संचालनार्थ कभी सुरों को तो कभी असुरों को वरदान दिये जाते रहे हैं। यदि किसी परिस्थितिवश कोई एक शक्ति किसी अयोग्य पात्र को अनुचित वरदान दे भी आई तो शेष दोनों शक्तियों ने अपनी बुद्धिमत्ता से उस वरदान का निदान खोजा और सृष्टि को विनाश से बचा लिया।
चूँकि मूल उद्देश्य सृष्टि का कल्याण ही है, इसलिए यदि किसी वरदान को निष्फल करने का उपाय ढूँढने में किसी शक्ति को विषपान भी करना पड़ा तो वह उससे कभी पीछे नहीं हटा। ऐसी किसी चूक का सुधार करने के लिए किसी शक्ति को अपमान भी झेलना पड़ा तो वह शक्ति उससे पीछे नहीं हटी।मैंने ‘पुरुषोत्तम’ में दो पंक्तियाँ लिखी हैं-
जब राजसभा पर राजा की निजता हावी हो जाती है
तब राजनीति की चाल अचानक मायावी हो जाती है

किन्तु वर्तमान संदर्भों में लोकतंत्र के इन त्रिदेवों के मध्य ऐसा ईगो-क्लैश जारी है कि देव और दानव अपनी समस्याएँ लेकर इनके पास जाने की बजाय अपने स्तर पर ही लड़-भिड़कर समाधान निकालने में विश्वास रखने लगे हैं।
यह परिस्थिति घातक ही नहीं, विध्वंसक भी है। यह परिस्थिति स्वीकार्य नहीं है। तन्त्र को चाहिए कि वह लोकतन्त्र के अस्तित्व को बचाने के लिए अपने-अपने वर्चस्व की लड़ाई से बाहर निकलें। और लोक को चाहिए कि स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने की बजाय तन्त्र की विवशताओं का सम्मान करना सीखे।
हमने विधायिका के चेहरे पर स्याही फेंकी, हमने राजनीति के गाल पर तमाचे मारे, हमने कार्यपालिका के साथ धक्का-मुक्की की, हमने पुलिसवालों का अपमान किया …यह सब हमेशा से होता रहा है। यद्यपि मैं व्यक्तिगत रूप से इस आचरण को भी अराजकता ही मानता हूँ। किन्तु अब जब हमने न्यायपालिका पर जूता फेंकना सीख लिया है तब मैं अपने ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ दोनों के सम्मुख यह निवेदन रखना चाहता हूँ कि अराजकता की आंधी जब आपका घर उजाड़ रही हो तो अपनी जान बचाना स्थिति-सम्मत है, किंतु अराजकता की आंधी के साथ मिलकर अपना घर उजाड़ने में सहयोग करना कोरा पागलपन है।
भारत एक सक्षम देश है। विचारधाराओं की कहासुनी इसके लोकतान्त्रितक स्वरूप को पुष्ट करती है किन्तु खरेपन और बदतमीज़ी के मध्य का अंतर करना यदि हमने अपने युवाओं को नहीं सिखाया तो हमारी यही युवापीढ़ी एक सुंदर देश को गृहयुद्ध की त्रासदी से ग्रस्त होते देखेगी।

✍️ चिराग़ जैन

ट्रम्प का टुल्लूपम्प

आजकल पूरी दुनिया में चौंकानेवाली राजनीति का ट्रेंड है। मुझे तो लगता है कि दुनिया भर के राजनेता रात को सोने से पहले यह सोचकर सोते होंगे कि कल ऐसा क्या करना है, जिससे लोग भौंचक्के रह जाएँ। जब तक चौंकाने का कोई सॉलिड उपाय मिल न जाए, तब तक नेताजी को नींद नहीं आती होगी।
कल्पना कीजिए, दिन भर के सब काम निपटाने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प अपने बिस्तर पर लेटे हैं। उनका एक हाथ उनके तकिये और सिर के बीच में फँसा हुआ है। उनकी नज़रें छत पर टिकी हुई हैं और उनके मस्तिष्क में भारत के खि़लाफ़ कोई नई ख़ुराफ़ात चल रही है। अचानक उनका चेहरा ऐसे खिल उठा, मानो किसी मासूम लड़की को छेड़ने के बाद कोई लपूझन्ना मुस्कुरा रहा हो।
सुबह उठते ही व्हाइट हाउस ने वीज़ा फ़ीस बढ़ाने की घोषणा कर दी। चारों ओर हाहाकार मच गया। इस अफ़रा-तफ़री को देखकर ट्रम्प मन ही मन नागिन डांस कर उठे होंगे। प्रवासी भारतीयों के माथे से जो पसीना बहा, उसे देखकर ट्रम्प के कलेजे को ठण्डक पड़ी होगी। भारत सरकार और भारतीय मीडिया में पूरी तरह छा जाने के बाद ट्रम्प इस खेल से बोर हो गए और उन्होंने स्पष्टीकरण जारी करके सूचना दी कि मैंने भारत की ओर पत्थर तो फेंका है, लेकिन वह उतना बड़ा नहीं है, जितना आपको लग रहा है।
स्पष्टीकरण के बाद मामला लगभग ठण्डा पड़ गया और ट्रम्प फिर से अपने बैडरूम में लेटकर कोई नई खुराफ़ात सोच रहे होंगे। मुझे पूरा विश्वास है ट्रम्प के दिल में ज़रूर ऐसा कोई टुल्लू पम्प फिट है, जिसमें से रोज़ कोई नया पंगा निकलता है।
मोदी जी के पास ऐसा अवसर आया था कि वे इस टुल्लू पम्प का इलाज करवा सकते थे। कुछ वर्ष पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प कुछ घंटों के लिए भारत आए थे तो मोदी जी ने उन्हें सीधे आगरा भेजा था। आगरा भेजने के मोदी जी के निर्णय से मुझे यह भ्रम हुआ था कि मोदी जी बहुत दूरदर्शी आदमी हैं। लेकिन जब बिना इलाज कराए उन्होंने ट्रम्प को छोड़ दिया तो लगा कि हमने हाथ आया अवसर छोड़ दिया।
आप कहेंगे कि इंटरनेशनल डिप्लोमेट इम्यूनिटी के तहत ट्रम्प का इलाज नहीं किया जा सकता था लेकिन ह्यूमेनिटी भी कोई चीज़ होती है। और विश्वगुरु बनने जा रहा भारत कम से कम ट्रम्प जैसे मस्तिष्क को ह्यूमेनिटी सिखाकर विश्व कल्याण में सहयोगी तो बन ही सकता था।

✍️ चिराग़ जैन

आज़म ख़ान हाज़िर हैं!

चारों ओर हल्ला मचा हुआ है कि आज़म ख़ान आ रहे हैं। शोर-शराबा सुनकर मुझे लगा कि शायद कोई युद्ध-वुद्ध जीतकर आ रहे होंगे। मैंने हो-हल्ले की दिशा में कान लगाकर सुना तो पता चला कि जेल से आ रहे हैं।
मेरा माथा भनभना गया। मैंने अपने एक पत्रकार मित्र को फोन करके पूछा, ”क्यों भाई, ये आज़म ख़ान के जेल से छूटने पर ख़ुशी का माहौल क्यों है?
वे बोले, ”चिराग़ भाई, दरअस्ल अदालत ने उन्हें सभी 72 मामलों में ज़मानत दी है।”
मैंने टोकते हुए पूछा, “मतलब, अभी निर्दोष सिद्ध नहीं हुए हैं। और वो भी 72 मामले… ऐसा उन्होंने क्या किया था भाई?“
पत्रकार मित्र बोले, “अरे भाईसाहब, राजनीति में ये सब सामान्य बात है। राजनीति में सौ-पचास मुक़द्दमे तो हो ही जाते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इससे किसी को अपराधी नहीं कहा जा सकता।“
भारतीय राजनीति के प्रति पत्रकार मित्र के भाव सुनकर मेरा मन श्रद्धा से भर गया। मैंने जिज्ञासावश पूछा, “अगर ये सब सामान्य है तो उन्हें जेल क्यों भेजा गया?“
वे बोले, ”वो तो सरकार बदल गई इसलिए उन्हें जेल जाना पड़ गया। वरना ये सब मामले तो तब भी थे जब वो ख़ुद सरकार में थे। लेकिन तब किसी की हिम्मत नहीं थी जो उनको हाथ लगा दे।“
“मतलब उन्हें सरकार ने जेल में डाला है, न्यायालय ने नहीं?“ मेरे स्वर में आश्चर्य था।
”अरे भाई आदेश न्यायालय का ही रहा होगा। गिरफ़्तार कार्यपालिका ने ही किया होगा। लेकिन होता सब कुछ सरकार के इशारे पर ही है।“ पत्रकार मित्र ने मेरी जानकारी में इज़ाफ़ा किया।
”सरकार किसी को तेईस महीने जेल में रखने के लिए पूरे सिस्टम को बाध्य कर सकती है?“ मैंने डरते हुए पूछा।
पत्रकार मित्र ठहरकर बोले, “सरकार कुछ भी कर सकती है भाईसाहब।“, पत्रकार मित्र का स्वर गंभीर हो गया।
मैंने फिर पूछा, ”सरकार कुछ भी कर सकती है तो अब ये ज़मानत कैसे मिल गई।“
”ये सब राजनीति के खेल हैं भैया, सरकार जब चाहे उठा ले, जब चाहे छोड़ दे। आज ज़मानत मिल गई, कल ज़रूरत हुई तो फिर उठा लेंगे।“ पत्रकार महोदय बेपरवाह होकर बोले।
मैंने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा, “जिसे आप खेल कह रहे हैं, वह दरअस्ल सिस्टम से खिलवाड़ है।“
सुनकर पत्रकार महोदय की हँसी छूट गई, ”आप जिसे सिस्टम समझते हैं ना चिराग़ भाई, उसी का नाम सरकार है।“

✍️ चिराग़ जैन

धैर्य बनाम कायरता

एकाएक देखने पर धैर्य भी कायरता जैसा ही लगता है। धैर्य की साधना वास्तव में शौर्य के उद्वेग को संयमित करने का पराक्रम ही है।
क्रोध और आवेग का पर्याप्त कारण मिलने पर भी संयत रह पाना किसी पराक्रम से कम नहीं है। किन्तु यह पराक्रम सविवेक है। यह ओज की कुण्डलिनी जागृत करने की तपश्चर्या है। यह शौर्य का सदुपयोग करने का अभ्यास है। और इस तप के फलस्वरुप जो आत्मबल अर्जित होता है, वह शौर्य को दुविधा से अछूता कर देता है।
इसीलिये अनवरत प्रार्थना के उपरांत सागर के समक्ष अग्निबाण तानते हुए राम के मन में कोई दुविधा नहीं रही। इसीलिए निन्यानबे गालियाँ गिननेवाले कृष्ण, सौवीं गाली पर शिशुपाल का वध करते समय संबंध की किसी संवेदना के असमंजस में नहीं घिरे।
यही कारण है कि लाक्षागृह, चीरहरण, वनवास और अज्ञातवास के दौरान कायर प्रतीत होनेवाले पाण्डव; कुरुक्षेत्र में सौ कुरुपुत्रों के रक्त में स्नान करते समय किसी ग्लानिबोध से पीड़ित न हुए। यही कारण है हस्तिनापुर के प्रति निष्ठा का घूंघट ओढ़कर मौन रहनेवाले पितामह की काया को शरशैया तक ले आनेवाले अर्जुन की डबडबाई आँखों से भी कोई निशाना चूक न पाया।
पत्नी का अपहरण करनेवाले रावण के सम्मुख भी राम ने जब अंगद के माध्यम से संधि प्रस्ताव भेजा तब रावण को राम कायर प्रतीत हुए होंगे। किन्तु उस क्षण राम के धैर्य को कायरता समझने की भूल रावण को कितनी महंगी पड़ी, यह सर्वविदित है।
अपना दिल बड़ा करके जब कोई बिना क्षमायाचना के भी आपको क्षमा कर दे तो उसके बड़प्पन का सम्मान करना, क्योंकि अपनी पीड़ा को भुलाकर जो आपको क्षमा करने का आत्मबल जुटा ले, उसको अपने शौर्य का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं रह जाती। और जिसके पास अपने क्रोध पर विजय पाने का सामर्थ्य है, उसकी शक्ति को नापने के लिए उसे रणभूमि में घसीटना आत्मघात जैसी मूर्खता है।
✍️ चिराग़ जैन

सृजन सुख

इस तपोवन में सृजन की साधनाएँ चल रही हैं
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

मन गहन संवेदना अनुभूत करने में जुटा है
तन अभी स्वर-व्यंजनों में प्राण भरने में जुटा है
भाव का उत्कर्ष छूकर नयन खारे हो रहे हैं
इस सृजन सुख में जगत् के डर किनारे हो रहे हैं
शब्द से सच का सहज चेहरा उकेरा जा रहा है
झूठ सुन ले, यह किसी षड्यंत्र की चौसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

इस जगह पर कामना के पर कतरने का नियम है
लाभ से दामन छुड़ाकर कर्म करने का नियम है
कान सबके दूसरों के आँसुओं की आह पर हैं
ध्यान सबका सृष्टि भर के अप्रतिम उत्साह पर है
इस धरा पर स्वार्थ को पूरा निचोड़ा जा रहा है
वासनाओं के लिए यह धाम कुछ हितकर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

इस समय वात्सल्य का उल्लास-उत्सव चल रहा है
रच रहे हैं आज नटवर रास; उत्सव चल रहा है
कृष्ण के आनंद में सुख से भरी हैं कुंजगलियाँ
पीर की काया बड़ी है, संकरी हैं कुंजगलियाँ
द्वेष से मिलने कन्हैया आएंगे मथुरा स्वयं ही
कंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है

✍️ चिराग़ जैन

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