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नकारात्मकता भी आवश्यक है

नकारात्मक और सकारात्मक दोनों से मिलकर ही सृष्टि संचालित होती है। हमने नकारात्मकता को ‘ग़लत’ का पर्यायवाची समझकर बड़ी भूल की है। नेगेटिव और पॉजिटिव में से कोई भी एक तार हटा दो तो विद्युत अवरुद्ध हो जाएगी। संचरण यकायक रुक जाएगा। इसीलिए महावीर कर्म शून्यता की अवस्था को मोक्ष कहते हैं। वे पुण्य और पाप, दोनों से मुक्ति पर बल देते हैं। बहीखाते में डेबिट बचे या क्रेडिट, दोनों ही अवस्था में खाता शेष रहेगा। इसलिए एट पार जाना है। ज़ीरो बैलेन्स। न लेनी, न देनी।
लेकिन हमने लाभ को शुभ और हानि को अशुभ समझना शुरू कर दिया। यकायक देखने में हानि अशुभ लग भी सकती है। किंतु जो ठहरकर देखेगा वह जान सकेगा कि लाभ भी कम अशुभ नहीं है। यही लाभ तो हानि के भय का जनक है। आपके पास कुछ होगा ही नहीं तो लुटेरा लूट कर क्या ले जाएगा। उसे ख़ाली हाथ लौटना पड़ेगा। इसलिए महावीर ख़ाली हाथ हो जाने पर बल देते हैं। दिगंबर। नाम, गोत्र, जाति, कुल सभी अहंकार से शून्य।
लेकिन हमने प्राप्ति को सकारात्मक मान लिया। नकारात्मकता और सकारात्मकता हमारी क्षुद्र बुद्धि से उपजे विशेषण हैं। अग्नि के प्रज्वलित होने पर एक व्यक्ति ने उसमें विध्वंस की आशंका देख ली और दूसरे ने प्रकाश की संभावना। बस यही है नकारात्मकता और सकारात्मकता। लेकिन ये दोनों ही सत्य हैं। नकारात्मकता का अर्थ असत्य नहीं है। अग्नि भस्म कर सकती है यह भी उतना ही सत्य है जैसे अग्नि के प्रकाश उत्पन्न करने की बात। और अग्नि को ‘केवल’ प्रकाश का स्रोत मानने वाला भी उतना ही अल्पज्ञ है, जितना उसे केवल ध्वंसक मानने वाला है। ब्लकि अग्नि को केवल रौशनी माननेवाला अधिक बड़ा मूढ़ है। यदि वह अग्नि के ताप को न समझा तो स्वयं को झुलसा बैठेगा। फिर कोई सकारात्मकता काम न आ सकेगी। इसलिए समग्र देखना होगा। इसीलिए सर्वज्ञ होना होगा। किसी एक आयाम को नकारात्मक कहकर नकार देना तुम्हारे आत्मघाती होने की सूचना है। इसी को जैन ग्रंथों ने स्याद्वाद कहा है। यही अनेकांत है।
सत्य की खोज में किसी एक तथ्य से मोह लगा लिया तो गए काम से। समष्टि की राह में व्यष्टि पर अटक गए तो फिर कहीं न पहुँच सकोगे। ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ इसीलिए आवश्यक है। जीवित रहना है तो साँस तो लेनी ही होगी। लेकिन साँस से मोह कर लिया तो जी न सकोगे। साँस ली है तो उच्छ्वास अपरिहार्य हो जाएगी। आप प्रयास करके भी उसे रोक न सकोगे। थोड़ी देर रोक भी लिया तो दम घुटने लगेगा। फेफड़े चंद सेकेंड में ही थकने लगेंगे। आँखों में प्राण उतर आएंगे। नथुनों में भीतर का सारा संघर्ष इकट्ठा हो जाएगा। फिर कोई चारा न रहेगा। फिर साँस छोड़नी ही पड़ेगी। और जिस क्षण छोड़ दिया, ठीक उसी क्षण जो अनुभूति होगी वह सुख है।
आपने एक अटकाव को छोड़ना स्वीकार किया और आपको एक क्षण का सुख मिल गया। यही कारण है कि जिसके भीतर संन्यास घटित हुआ उसने सारा अटकाव छोड़ दिया। फिर उसके चेहरे पर सुख नहीं आनंद की आभा दमक उठी।
इस दमक में ध्वंस नहीं, केवल रौशनी है। यह अग्नि को सम्पूर्ण जान लेने से सम्भव हुई। यह नकारात्मकता और सकारात्मकता को समभाव से देखने के बाद घटित हुई। इसीलिए उन्होंने जो त्यागा उससे भी घृणा नहीं की। लेकिन हम सोच रहे हैं कि जो त्याग दिया वह घृणित ही होगा। वे तो स्याद्वाद के अन्वेषक थे। घृणा और मोह, दोनों ही की फ़ुरसत नहीं थी उनके पास।
‘बनाकर फकीरों का हम भेस ग़ालिब, तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं’ -जीवन का लुत्फ़ लेना है तो उसे तमाशा समझकर देखना होगा। उसमें कुछ बदल देने की इच्छा जगी और आप बंदर की तरह गुलाटी मारने लगते हो। कर्ता भाव जगा और आप अतिथि से मजदूर हो गए। यह ऐसा ही है ज्यों कोई फिल्म देखने जाए और उसे खलनायक से नफ़रत हो जाए। फिर वह फिल्म नहीं देख सकेगा। फिर वह ख़ुद फिल्म बन जाएगा। सिनेमाघर में बैठे लोग पर्दे से दृष्टि हटाकर उस पर टिका लेंगे। वह होगा भी बहुत मज़ेदार। ज्यों ही पर्दे पर खलनायक आएगा, वह दोनों हाथों से कसकर कुर्सी के हत्थे पकड़ लेगा। उसके जबड़े भिंच जाएंगे। वह आवाज़ लगाकर नायक को खलनायक की चाल बताने की कोशिश भी कर सकता है। वह नायक को ऑर्डर भी दे सकता है कि ‘मार साले को!’ यह व्यक्ति अन्य लोगों को बड़ा हास्यास्पद प्रतीत होगा। क्योंकि यह व्यक्ति पर्दे को सत्य और स्वयं को निर्देशक समझ बैठा है।
ठीक यही भूल हम अपने जीवन में कर रहे हैं। हम ख़ुद को कर्ता मान बैठे हैं और अपने आसपास के लोगों को नायक और खलनायक मानकर उनके प्रति मोह और घृणा से भरे बैठे हैं। जिस क्षण हमने यह समझ लिया कि नकारात्मक और सकारात्मक तो केवल भूमिका हैं। हमें भूमिका की नहीं अभिनय की प्रशंसा करनी सीखनी होगी। निर्देशक ने जिसे जो भूमिका दी, वह उसे कितनी साकार कर पाता है, यह एक अभिनेता के आकलन का आधार है।
शोले फिल्म से गब्बर की भूमिका बदल कर देखिये। पूरी फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। गब्बर का क्रूर होना ठाकुर के प्रतिशोध को नायकत्व प्रदान करता है। अन्यथा गब्बर सीधा-सादा काश्तकार हो और ठाकुर दो कुख्यात बदमाशों को उसकी सुपारी देता तो ठाकुर की शक़्ल तक से नफ़रत हो सकती थी। लेकिन गब्बर की बर्बरता ने जय-वीरू के सुपारी किलिंग जैसे अपराध को जस्टीफाई कर दिया।
इसलिए नकारात्मकता और सकारात्मकता, दोनों ही कहानी को चलाने के लिए आवश्यक हैं। इसमें सही-ग़लत तलाशने वाले कुर्सी पर उछलता हुआ वह दर्शक है जिसकी हरकतें देखकर पूरा सिनेमाघर ठहाके लगा रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

आषाढ़ के दो दिन

एक वर्ष पूर्ण हो गया। आज ही के दिन सुबह दस बजे अपने घर को और घर के दरवाज़े पर खड़ी माँ को जी भरकर निहारने के बाद मैं अस्पताल पहुँच गया था। मेदांता के एक बेड पर मेरा नाम लिख दिया गया था। हाथ पर एक पट्टा बांध दिया गया था, जिसके रहते अस्पताल की अनुमति के बिना सशरीर उस परिसर से बाहर निकलना सम्भव नहीं था।
डॉ अनिल भान ने मेरी रिपोर्ट्स देखकर अगले ही दिन ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। अगले दिन ऑपरेशन हो जाए इसके लिए अच्छी-ख़ासी रक़म एडवान्स जमा करनी थी। उस पर भी तकनीक का तुर्रा ये कि अस्पताल केवल क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ही राशि स्वीकार करता था। लाखों रुपये यकायक क्रेडिट कार्डस से भुगतान करने के लिए मेरा परिवार एक-एक संपर्क को फोन करने में जुट गया।
अस्पताल प्रशासन को अनुभव था कि जिसका मरीज़ जीवन-मृत्यु के बीच जूझ रहा हो वह पैसा जुटा ही लेगा। सो, परिवारवालों को उनके संघर्ष के भरोसे छोड़कर मेरी आवश्यक जाँच कराने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। व्हीलचेयर पर बैठकर मैं विभाग दर विभाग भटकता रहा। हाथों में इतनी बार सूई चुभ चुकी थी कि अब दर्द होना बंद हो गया था।
परिवार का जो सदस्य मेरे साथ इस परीक्षण-पर्यटन में उपस्थित होता, वह बाहर चल रही आर्थिक कवायद को छुपाने का भरसक प्रयास करता लेकिन भय से भीगी आँखों में उत्पन्न झुंझलाहट में मैं वह सब पढ़ पा रहा था।
मेरी दोनों बहनों और बहनोई ने धरती-अम्बर एक करके रात 2 बजे तक अस्पताल की पेमेंट क्लियर कर दी। इस संघर्ष से पार पाकर जब छोटी बहन मेरे पास आई तो मुझे एंजियोग्राफी के लिए ले जाया जा रहा था। सुबह जिस भाई को स्मार्ट कपड़ों में भर्ती कराया था उसे अस्पताल के ढीले ढाले कपड़ों में नलियों से घिरा देखकर उसके चेहरे का रंग उतर गया। मुझसे नज़रें मिलीं तो अलक तक चढ़ आए आँसू को भीतर धकेलने की हिम्मत दिखाते हुए बोली- ‘सब फिट हो गया, डॉक्टर ने कहा है कल ऑपरेट हो जाएगा। सारे टेस्ट परफेक्ट हैं।’
मैं भी अपने हिस्से का अभिनय करता हुआ हामी भरकर एंजियोग्राफी के लिए चल पड़ा। सुबह से उपवास पर था, और उस पर परीक्षण की भागदौड़ के कारण सामने खड़ी मृत्यु से भयभीत होने की फुर्सत ही नहीं मिली।
जब भी कोई नर्स या डॉक्टर इंजेक्शन लेकर आता तो मैं ‘मंटो’ की ‘खोल दो’ कहानी याद करके हँसते हुए दोनों हाथ आगे कर देता था। अस्पताल के भीतर समय का भान ग़ायब हो गया था।
थकान जब तनाव से लिपट कर सो रही थी, तब मुझे यह सोचने की मोहलत मिली कि शायद अपना सफ़र यहीं तक का था। यह बात सोचकर घबराने ही वाला था कि किसी ने कान में कहा- ‘मूर्ख, विचलित क्यों होता है। यही तो विवेक की परीक्षा है। विपरीत परिस्थिति में सहज रह सके तभी तो पता चलेगा कि स्थितप्रज्ञ क्या होता है।’ नज़र घुमाकर देखा तो कमरे में कोई नहीं था। शायद मैं ख़ुद से बात कर रहा था।
‘समस्या को स्वीकार कर लेना समाधान की ओर पहला क़दम है। जो होगा देखा जाएगा, तू बस इस पूरी प्रक्रिया को साक्षीभाव से देख। अगर जिवित बच गया तो यह अनुभव तेरे सृजन को प्रभावी बना देगा।’
मैंने आँख खोली तो नीले कपड़े पहने एक नर्स अपनी पूरी जान लगाकर मेरे हाथ पर एक पट्टी कस रही थी। कलाई पर जहाँ एंजियोग्राफी का कट लगा था, उस हिस्से पर बिटाडीन जैसी कोई दवाई पुती हुई थी और एक सख़्त-सी चीज़ से कटी हुई नस को दबाकर बहुत टाइट पट्टी बांध दी गई थी। वह सख़्त चीज़ लगातार हाथ को पीड़ा पहुँचा रही थी। पीड़ा का अभ्यास करते हुए जाने कब मुझे नींद आ गई। सुबह आँख खुली तो पूरी कलाई पर नील पड़ गया था। समान्य स्थिति में इतना गहरा नील दिखता तो चिन्ता हो जाती, लेकिन अब एक बड़ी समस्या सामने थी इसलिए इस नील से कोई भय उत्पन्न नहीं हुआ।
कलाई लगातार दुःख रही थी। लेकिन मैं इस प्रक्रिया के अधिकतम कष्ट को स्वीकार कर चुका था, सो यह पीड़ा मेरी भंगिमा को प्रभावित नहीं कर पा रही थी। मुझे समझ आ गया था कि यह जो कुछ हो रहा है इसका न तो कारण मैं हूँ, न ही इसका निवारण मेरे पास है। इसलिए क्षोभ, करुणा, पीड़ा जैसा कोई भाव मुझे स्पर्श नहीं कर पाता था। सृजन का भरपूर सुख भोगा था इसलिए जीवन से कोई शिक़ायत भी नहीं थी। वैभव और सांसारिक कष्ट ख़ूब भोगे थे इसलिए कोई अधूरी इच्छा भी याद नहीं आ रही थी। माता-पिता के बुढ़ापे को सोचकर पलकें भीगी ज़रूर, लेकिन अपनी बहनों के समर्पण और विश्वास का सम्मान रखने के लिए नयन कोर को आँसू के भार से बचाए रखा।
बच्चे याद आए तो भी मन को यह कहकर समझा लिया कि वे अपनी ‘माँ’ के संरक्षण में हैं, इसलिए मेरा अभाव झेल जाएंगे।
मेरी दोनों बहनें और बहनोई मुझे यमराज से छीन लाने की सावित्री साधना कर रहे थे। माँ घर पर रहकर इस संशय से जूझते हुए सबका खाना बनाकर भेजती रही और पिताजी मेरी तरह निःशब्द होकर इस घड़ी के बीत जाने की बाट जोहते रहे।
नर्स ने बताया, पेशेंट को सर्जरी के लिए ले जाना है। जो बहनें इस घड़ी के लिए कल रात तक पैसा जुटा रही थीं, उनका मौन चीख पड़ा। कुछ ही मिनिट बाद मैं सब अपनों से दूर प्री-ओटी में था। यहाँ एक बार फिर ब्लड प्रेशर और स्ट्रेस लेवल की जाँच की गई। रिपोर्ट का हर आँकड़ा परफेक्ट था। मेरी देह और मेरा मानस शल्यक्रिया के लिए तैयार था।
एनेस्थीसिया के डॉक्टर ने मुझे पहचान लिया। वह टीवी पर मुझे देख चुका था। उसने बातचीत करनी शुरू की और मेरी सहजता को और निश्चिंत कर दिया।
मुझे व्हीलचेयर पर बैठकर ऑपरेशन थियेटर तक चलने को कहा गया लेकिन मैंने अनुरोध करके अपने पैरों पर चलकर जाना चाहा। हल्की सी ना-नुकर के बाद डॉक्टर ने मेरा अनुरोध मान लिया। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं इस महत्वपूर्ण सफ़र को अपने पैरों से तय करना चाहता था।
मुझे अच्छी तरह याद है, ओटी की ओर जाते समय डॉ भान ने एक दरवाज़े में से झाँककर कहा था- ‘चलो कवि जी, आपसे दिल खोलकर मिलते हैं।’
मुझे उनका हास्यबोध अच्छा लगा। ओटी में स्ट्रेचर पर लेटते ही डॉक्टर्स की एक फौज ने मेरे स्ट्रेचर को घेर लिया। सब तेज़ी से अपने अपने काम में जुट गए। मेरे शरीर पर अलग-अलग नलियाँ लगने लगीं, तरह-तरह की मशीनों से मुझे जोड़ दिया गया। मेरठ के एक डॉक्टर साहब ने मुझसे कविता सुनाने का आग्रह किया। मैं थोड़ा घबराया हुआ था सो उन डॉक्टर साहब की शक्ल देखने लगा। वे मेरी मनोदशा भाँप गए और बोले, चलो मैं सुनाता हूँ। उन्होंने रश्मिरथी का शांतिपर्व पढ़ने की शुरुआत की। …सह धूप घाम पानी पत्थर …पाण्डव आए कुछ और निखर …मेरा भय विलुप्त हो गया। मुझे लगा कि यह शल्यक्रिया मृत्यु की ओर नहीं ब्लकि एक निखरे हुए जीवन की ओर ले जा रही है। मेरी मनोदशा सकारात्मक हो गई।
क्षण भर में मैंने महसूस किया कि देशभर में मेरे अपने मेरे जीवन की दुआ कर रहे हैं। सुरेन्द्र जी, अरुण जी, मनीषा, प्रवीन, देवदत्त, सुष्मीत, पँवार जी… इन सबसे तो मेरी बात हुई थी। सभी की आवाज़ में स्नेहसिक्त चिंता थी। जब इतने सारे लोग चिन्ता करने के लिए उपस्थित हैं तो मैं क्यों चिन्ता करूँ। मैंने रश्मिरथी के पाठ में अपना स्वर मिला दिया। …मुझमें विलीन झंकार सकल …मुझमें लय है संसार सकल …अमरत्व फूलता है मुझमें …तभी मेरी काया में सूई चुभी और मेरी चेतना लुप्त हो गयी।
इसके बाद किसी ने मेरे गाल थपथपाते हुए मेरा नाम पुकारा। मैंने आँखें खोलीं तो नाक, मुँह और पेट में अलग-अलग तरह की नलियाँ लगी थीं। गाल थपथपाने वाले व्यक्ति ने पूछा- ‘कुछ पिछला याद है?’ मैंने वेंटिलेटर लगे गले से बोलने का प्रयास किया- ‘सब कुछ।’
डॉक्टर- ‘कुछ ऐसा याद करो, जो बचपन में पढ़ा हो।’
मैं- ‘जटाटवीगलज्ज्वल प्रवाहपावितस्थले…’
‘मेमोरी ओके!’ -डॉक्टर ने बीच में ही टोक दिया।

डॉक्टर के चेहरे के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि युद्ध जीता जा चुका है, अब ये नलियाँ हटाने की साधना करनी है।
अब तक बाहर खड़े रहकर मेरी मृत्यु से लड़ रहे मेरे अपने आईसीयू के द्वार तक आ पहुँचे थे। मैं उन सबकी हँसती हुई आँखों में वो सारा दर्द देख पा रहा था, जो मेरे दिल की चीर-फाड़ के समय एनेस्थीसिया की ओट में छिप गया था।
एक महीने बाद जब घर लौटा तो घर में घुसते ही मैं बिलखकर रो पड़ा था। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि इस घर में मैं सही-सलामत लौट आया हूँ।
अब वही भागदौड़, वही व्यस्तता, वही आपाधापी फिर से जीवन का हिस्सा बन गई है। इस एक वर्ष में मैंने हर उस दुआ का आभार व्यक्त किया है जो उस समय मेरे जीवन यज्ञ की समिधा बनने को तैयार थी।
अब जब कभी कोई संकट मेरे पास आना चाहता है, तो मैं उसे 6-7 जुलाई 2021 की कहानी सुनाकर ठहाका लगाता हूँ कि कहीं और जा बे, मैं तेरे अब्बा से मिल चुका हूँ!

✍️ चिराग़ जैन

इतना-सा प्यार

अपनेपन के बाहुपाश में
धड़कन ने ये शब्द सुनाए-
“अलग-अलग कर्त्तव्य रहें; पर
आपस का अधिकार बहुत है।”
बस इतना-सा प्यार बहुत है

सबकी अपनी-अपनी गति है, सबका अपना-अपना पथ है
सूरज के कुनबे में लेकिन, ना कोई इति है ना अथ है
हम-तुम अगर निकट से गुज़रे, इस अनवरत अथक घुर्णन में
तो आपस में टकराने की, इच्छा जन्म नहीं ले मन में
हम इक-दूजे के होने का कर पाएं सत्कार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है

उद्गम का हर इक कतरा तो साथ नहीं बहता जीवन भर
साथ नहीं होने का मतलब प्रतिद्वंदी होना कब है पर
पल-पल बनती और बिगड़ती लहर अलग हैं नदी एक है,
जिसमें हम सब तैर रहे हैं, इस युग की वह सदी एक है
अब तुम आगे, अब हम आगे, बहती जाए धार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है

सब नियमित संवाद कर सकें ऐसा कहीं प्रबंध नहीं है
रोज़-रोज़ मिलना सम्भव हो ऐसा भी अनुबंध नहीं है
पर मिलने का योग बने तो, सुख से खिल उठता वह क्षण हो
भावुक करती मुस्कानें हों, साँसें भरता आलिंगन हो
मुड़कर देखो हर रिश्ते में होठों का विस्तार बहुत है
बस इतना सा प्यार बहुत है

✍️ चिराग़ जैन

भीतर-बाहर

ख़ुश होते तो आँख चमकती
मन हँसता तो देह दमकती
डर लगता तो दिल की धड़कन
ख़ुद चेहरे तक आन धमकती
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे

हाथ-पैर हिलते-डुलते हैं, पर मन में उत्साह नहीं है
साँसें आती हैं, जाती हैं पर जीने की चाह नहीं है
कैसी है ये हालत समझो
इसकी आज हक़ीक़त समझो
ये काया की आदत भर है
इसको ही जीवन मत समझो
बिन छत की दीवारें हैं ये, कैसे इन्हें मकान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे

शब्द उगलना नित्य क्रिया है, मन कह पाना स्वर्गिक सुख है
कानों में जो शोर भरा है, उसमें केवल सत्य प्रमुख है
मेघ घिरे हैं, वृष्टि नदारद
आँख खुली हैं दृष्टि नदारद
जिसके भीतर मन टूटा हो
उसके हित यह सृष्टि नदारद
दो हाथों से छूने को ही क्या सच का अनुमान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे

मुस्काना उसको कहते हैं, जिससे तन-मन खिल-खिल जाए
जीवन, जिसमें मन दीपक हो, रोम-रोम तक झिलमिल आए
कुंजगली अभिराम नहीं है
गोकुल है, घनश्याम नहीं है
उन महलों में सन्नाटा है
जिन महलों में राम नहीं है
जिसमें कोरी भौतिकता हो, उसको कब तक ज्ञान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे

✍️ चिराग़ जैन

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