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शिव : साधना सहजता की

शिव… जहाँ पीड़ा और उत्स एकाकार हो जाते हैं। शिव… जहाँ काव्य के नौ रस बिना किसी भेदभाव के एक साथ रहते हैं। शिव… जहाँ सृष्टि के समस्त भावों को प्रश्रय मिल जाता है। शिव… जिसके द्वार किसी के लिए भी बंद नहीं हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि जहाँ द्वार जैसा...

पतंग

धागे से बंधी पतंग उड़ा के जाती है आपके भीतर के सारे तनाव को दूर… बहुत दूर और आप तैरने लगते हो आनन्द के आकाश में पतंग बनकर! ✍️ चिराग़...

परोपकार

अपने दर्द पर इतना ध्यान न देना कि औरों की कराह सुनाई न दें अपने पसीने की इतनी परवाह न करना कि औरों के आँसू दिखाई न दें ✍️ चिराग़...

काँटे

मुश्किलो, और बढ़ो, और बिछाओ काँटे राह में, पाँव में, दामन में सजाओ काँटे दर्द कम होगा तो आराम की याद आएगी दूर मन्ज़िल है अभी, ढूंढ के लाओ काँटे ✍️ चिराग़...

तो क्या हुआ

तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता...
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