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सनातन धर्म और सहिष्णुता

सनातन संस्कृति की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि यहाँ भक्त और भगवान के मध्य जो बातचीत होती है, वह केवल भक्तिरस तक ही सीमित नहीं है। बल्कि उसमें काव्य के अन्य सभी रसों की सृष्टि सम्भव है।
विश्व के अन्य किसी धर्म में यह चमत्कार सम्भव नहीं है। किसी अन्य धर्म के आराध्य की होली खेलते, रास रचाते, गोपियों के वस्त्र चुराते, जूठे बेर खाते आप कल्पना नहीं कर पाएंगे। किसी अन्य धर्म के पास ठिठोली करता ईश्वर नहीं मिलेगा। किसी अन्य धर्म का आराध्य हनुमान की तरह अशोक वाटिका उजाड़ कर किसी पेड़ से फल तोड़कर खाने लगे तो यह उसके व्यक्तित्व को सूट नहीं करेगा।
यह सब केवल सनातन परम्परा में संभव है। यहाँ ईश्वर को जीवन के प्रत्येक क्षण में सम्मिलित किया गया है। सनातन परम्परा ईश्वर को किसी धर्मस्थल विशेष तक सीमित करने की पक्षधर नहीं है। यहाँ तो ईश्वर को साथ लेकर घूमने का रिवाज़ है।
घर में विराजमान लड्डू गोपाल बाक़ायदा घर के सदस्य की तरह रहते हैं। वे परिवार के साथ उठते हैं, सोते हैं, खाते-पीते हैं, नहाते हैं और घूमने भी जाते हैं। वे नाराज़ भी होते हैं और मानते भी हैं। पारलौकिक से ऐसा लौकिक संबंध अन्यत्र कहीं सम्भव नहीं है।
यही कारण है कि हमारा ईश्वर हमारे साथ हँसता है। खिलखिलाकर हँसता हुआ ईश्वर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। यह केवल हमारे पास सम्भव है।
माँ अनुसूया के पालने में त्रिदेव के खेलने की घटना इस बात की प्रमाण है कि सनातन परंपरा का ईश्वर वात्सल्य का सम्मान करता है। जसुमति मैया से झूठ बोलता कन्हैया ईश्वर के वात्सल्यबोध का परिचायक है। शबरी के जूठे बेर खाते राम और विदुरानी के हाथों से केले के छिलके खाते कृष्ण प्रेम की प्रतीति के उदाहरण हैं। रास रचाते कृष्ण संयोग सिंगार के प्रतिमान हैं और विकल होकर वन्य-वनस्पति से सीता का पता पूछते राम वियोग शृंगार के प्रतीक हैं। रुक्मणि के कृष्ण सदेह प्रेम की स्वीकारोक्ति हैं और मीरा के गिरिधर विदेह प्रेम के बिम्ब हैं। प्रह्लाद की आस्था पर खम्भ से उत्पन्न नृसिंह जब अपने नख से हिरण्यकश्यप का वध करते हैं तो भयानक रस साकार हो उठता है, और सती के आत्मदाह से क्रुद्ध शिव जब ताण्डव करते हैं तो रौद्र रस की सर्जना होती है। वामन अवतार में राजा बलि की समस्त सम्पदा नाप लेने वाले ईश्वर ने अद्भुत रस का उदाहरण प्रस्तुत किया। आँसुओं से सुदामा के चरण पखारते कृष्ण करुणरस का निमित्त हैं और नारद को हरिमुख देकर परिहास का पात्र बनाने वाले विष्णु हास्यरस की स्वीकृति हैं। युद्धक्षेत्र में भी उग्र न होकर संयत रहनेवाले राम शान्तरस का प्रमाण बन गए हैं।
सनातन परंपरा का ईश्वर जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में हमारे साथ हो सकता है। यही कारण है कि विवाह के लिए सजती दुल्हन को गौरी का स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है और बारातियों को शिव के गण मानकर गारी गायी जाती है। कन्या के पिता को जनक मानकर गीत गाने का चलन आज भी हमारे समाज में है।
हमने ईश्वर की अनुभूति के ताने को दिनचर्या के बाने के साथ ऐसे बुन दिया है कि गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक हर जगह किसी न किसी पौराणिक सन्दर्भ का प्रतीक मानकर जीव को ईश्वर के समतुल्य मान लिया जाता है।
अन्य लगभग सभी धर्मों की कट्टरता या अदृश्य कट्टरता ने उनके ईश्वर को केवल धर्मस्थलों तक सीमित कर दिया है। यही कारण है कि उनके ईश्वर के साथ केवल भक्ति का सम्बंध बनता है। प्रेम, क्रोध, वात्सल्य और हास-परिहास के संबंध की कल्पना तक नहीं की जा सकती। ऐसा कुछ करते ही उनकी भावनाएँ आहत हो जाती हैं। ऐसा कुछ करते ही वे असहिष्णु हो जाते हैं।
लेकिन सनातन परम्परा में यह सब कुछ सम्भव था। इसीलिए हमारे यहाँ ईश्वर को प्रतीक मानकर ख़ूब काव्य रचा गया। यदि हमारे यहाँ भी कट्टरता का रोग होता तो कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करनेवाले सूरदास को सूली पर चढ़ा दिया गया होता। कृष्ण की प्रेम लीलाओं का चित्रण करनेवाले रसखान की गर्दन काट दी गयी होती। बिलखते हुए राम से परिचय करानेवाले तुलसी लोकनिंद्य हो चुके होते। शिव की बारात का बखान करनेवाले पुराण निषिद्ध हो चुके होते।
यह सनातन परम्परा का ही कनवास है कि यहाँ नारद मुनि के हास्यबोध और परशुराम तथा दुर्वासा सरीखे क्रोधित ऋषियों की कथा एक साथ स्वीकार्य है। जहाँ इंद्र तक को उसकी ग़लती का एहसास कराने के लिए कृष्ण गौवर्द्धन उठाने से नहीं हिचकते। गौवर्द्धन की घटना ईश्वर की ओर से मनुष्यता को यह संदेश देती है कि देवराज होने से ही कोई हमेशा सही सिद्ध होने का अधिकारी नहीं बन जाता।
शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करनेवाले कृष्ण जिस धर्म के पास हैं, उनको यदि ऐसा लगने लगे कि कोई बात, कोई परिहास, कोई उपालम्भ, कोई तर्क, कोई चर्चा उनके ईश्वर का अपमान कर सकती है तो यह उनकी नासमझी से अधिक कुछ नहीं है।
ईश्वर तो मान-अपमान से काफ़ी दूर निकल गया है। वह भक्त के निश्छल अपनत्व का छोर पकड़कर कठौती तक चला आता है। यह अपनत्व किसी भी भाव से पूर्ण हो सकता है। यहाँ तो शत्रुभाव से ईश्वर का स्मरण करने वाले रावण और कंस तक को तारने का रिवाज़ रहा है।
इसलिए इन दिनों जो लोग ईश्वर के सम्मान के ठेकेदार बने घूम रहे हैं, उनको स्मरण हो कि जब तक कट्टरता से बचा हुआ है तब तक सनातन धर्म का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता; और बाक़ी रही ईश्वर के सम्मान की बात तो उसकी चिंता ईश्वर पर छोड़ दें।

✍️ चिराग़ जैन

शिव : साधना सहजता की

शिव… जहाँ पीड़ा और उत्स एकाकार हो जाते हैं।
शिव… जहाँ काव्य के नौ रस बिना किसी भेदभाव के एक साथ रहते हैं।
शिव… जहाँ सृष्टि के समस्त भावों को प्रश्रय मिल जाता है।
शिव… जिसके द्वार किसी के लिए भी बंद नहीं हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि जहाँ द्वार जैसा कुछ है ही नहीं। शिव तो द्वाररहित हैं। शिव तो मार्गरहित हैं। मार्ग, द्वार, यात्रा ये सब तो भौतिक शब्द हैं! शिव इन सबसे परे हैं। शिव कोई संज्ञा नहीं हैं, वे तो एक घटना हैं। वे तो घटित होते हैं।
और घटना का कोई मार्ग अथवा द्वार नहीं हो सकता। वह तो कहीं भी घटित हो जाए। उसके घटित होने का बाद उस स्थल का मार्ग अथवा द्वार अवश्य हो सकता है। किंतु वह उस वैराट्य का स्मारक मात्र होगा। द्वार और मार्ग से जहाँ कोई पहुँचेगा वहाँ उसे उस घटना के चिह्न मिल सकते हैं… घटना तो घटित हुई और विलीन हो गयी।
इसीलिए शिव तक पहुँचने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता ही नहीं है। इसीलिए शिव का स्वरूप किसी प्रदेश, लोक जाति, देश, वर्ण, नस्ल, वर्ग, ग्रह, योनि, काल अथवा धर्म तक सीमित नहीं है। शिव असीम हैं। उन्हें जो देखे वो उसे ‘अपने’ लगते हैं।
शिव किसी एक के हो भी कैसे सकते हैं। शिव तो सबके हैं। सबकी पीड़ा का निदान हैं। शिव किसी भी प्रकार के परहेज से परे हैं। भूत, प्रेत, व्यंतर, मनुष्य, नाग, नक्षत्र, पशु, नदी, पर्वत, सुर, असुर और यहाँ तक कि मसान तक को शिव से अपनत्व मिल जाता है।
शिव के अर्द्धांग में प्रतिष्ठित पार्वती प्रेम का अस्तित्व हैं तो शिव के कण्ठ में विद्यमान विष उनके वात्सल्य का द्योतक है। चिताभस्म का लेप वैभत्स्य को जीवंत करता है, त्रिशूल पर ओज विराजित है और जटाओं से प्रस्फुटित गंगा आश्चर्य उत्पन्न करती है। शिव के गणों में हास्य के दर्शन होते हैं और हृदय में करुणा वास करती है। त्रिपुण्ड के मध्य स्थित नेत्र उन्हें रौद्र कर देता है तो निमीलित नयनों से वे अपने निर्वेद होने की सूचना देते हैं।
शिव के चरण पर्वत पर हैं और शीश पर चंद्रमा विद्यमान है। यह स्वरूप शिव के वैराट्य का प्रमाण है। मृगछाल और गंगोद्गम उनके प्राकृतिक होने का उद्घोष है। शिव समाधान का पर्यायवाची है। वहाँ समस्या कोई है ही नहीं। सभी समस्याओं के समाधिस्थ हो जाने की स्थिति है शिव। इस अद्भुत स्वरूप में किसी परहेज की संभावना ही नहीं है। वहाँ सब स्वीकार्य है। शिव के लिए ‘कुछ’ बनना नहीं पड़ता। शिव को पाने के लिए कुछ ओढ़ना नहीं पड़ता।
वहाँ तो ठीक वैसे ही पहुँचा जा सकता है, जैसे आप हैं। जितने अधिक स्वाभाविक होते जाएंगे, शिव का नैकट्य उतना ही अधिक होता जाएगा। कृत्रिमता हटी और शिव घटित हो गये। बनावट का विलीन हो जाना ही शिव का घटित होना है। विश्व में जो-जो असम्भव है, वह सब भी शिव के यहाँ सम्भव हो जाता है। वहाँ नकार है ही नहीं। वहाँ तो सब कुछ साकार है। वहाँ सब कुछ सम्भव है।
शिव का स्वीकार इतना बड़ा है कि उसके आगे कोई अस्वीकार टिक ही नहीं पाता। वे संसार के समस्त भावों को एक सरीखा स्वीकार कर लेते हैं। अन्यत्र आपको ऐसा कहीं नहीं मिलेगा। अन्यत्र ऐसा कहीं तलाशने भी न लगना। मन के भीतर घट रहे हर ‘अजीब’ को शिव के अतिरिक्त कहीं व्यक्त किया तो पागल कहलाओगे। किन्तु शिव के यहाँ सब स्वीकार्य है। वहाँ मन को खोलकर रख देना। वहाँ हर आवरण हटा देना। वहाँ हर नियम के दायरे से बाहर निकल आना। वहाँ हर नैतिकता के खोल से ऊपर उठ जाना। क्योंकि वहाँ कुछ अनैतिक नहीं। वहाँ कुछ अराजक नहीं। वहाँ कुछ अनावृत नहीं… वहाँ तो सब सहज ही सहज है।
इसलिए शिव को पाने की तपस्या सहज हो जाने की तपस्या है। सहज होने के लिए सर्वाधिक तपस्या करनी पड़ती है। बनावट के लिए तो दुनिया भर के पार्लर खुले हुए हैं। बनावट के लिए तो दुनिया भर के मठ, धर्मस्थल, विद्यालय, संस्थान, इदारे खुले हुए हैं। लेकिन सहज होने के लिए कोई इंस्टीट्यूट नहीं है। इन सब संस्थानों और इदारों से बच निकले तो आप शिव के निकट आ जाएंगे। स्वाभाविक होना सबसे कठिन काम है। क्योंकि इसमें कुछ करना नहीं होता। सायास कुछ न करना सबसे कठिन है। क्योंकि जब-जब कुछ सायास किया जाएगा तो वह आपको कृत्रिमता की ओर ले जाएगा, किन्तु जब आपकी अंतःचेतना आपसे अनायास ही कुछ करा लेगी तो वह प्राकृतिक होगा। उसमें कुछ असत्य नहीं होगा। उसमें कुछ असुन्दर नहीं होगा। वह तो पूर्ण सत्य होगा। वह तो पूर्ण सुन्दर होगा। वह तो शिव होगा।

✍️ चिराग़ जैन

पतंग

धागे से बंधी पतंग
उड़ा के जाती है
आपके भीतर के सारे तनाव को
दूर… बहुत दूर
और आप
तैरने लगते हो
आनन्द के आकाश में
पतंग बनकर!

✍️ चिराग़ जैन

परोपकार

अपने दर्द पर इतना ध्यान न देना कि औरों की कराह सुनाई न दें
अपने पसीने की इतनी परवाह न करना कि औरों के आँसू दिखाई न दें
✍️ चिराग़ जैन

काँटे

मुश्किलो, और बढ़ो, और बिछाओ काँटे
राह में, पाँव में, दामन में सजाओ काँटे
दर्द कम होगा तो आराम की याद आएगी
दूर मन्ज़िल है अभी, ढूंढ के लाओ काँटे
✍️ चिराग़ जैन

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