+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

एक क़लम ऐसी

इस महफ़िल में चुपचुप बैठी एक क़लम ऐसी है जिसने
ग़ालिब से ग़ज़लें सीखी हैं, तुलसी से चैपाई ली है
अम्बर के उद्दीप्त सितारो, उसको किरणों से दुलराना
जिसने कविता के उपवन में अभी-अभी अंगड़ाई ली है
✍️ चिराग़ जैन

एक ख़ालिस कवि का जीवन

नीरज जी ने जब भी नज़र उठा कर देखा तो उनकी अदा दिल पर छप गई। उन्होंने अपनी भारी आवाज़ में कुछ आदेश कर दिया तो लगा कि हम धन्य हो गए। नीली लुंगी और जेब वाली बनियान पहने जब वे लोगों को सम्मोहित करते दिखते थे तब महसूस होता था कि कोई फकीर अपनी अल्हड़ मस्ती में हम नए साधकों को चपत लगाते हुए कहा रहा है कि – ‘अरमानी के सूट पहनने से कुछ नहीं होगा बे, अरमानों को स्वर देना सीख!’
उनका पूरा जीवन एक ख़ालिस कवि का जीवन था। कोई बड़ा आदमी भी उनसे मिलने आया तो उन्होंने उसके प्रभाव में कपड़े बदलना ज़रूरी न समझा। अपने अंतर्नाद में वे इतने सहज हो गए थे कि मुख्यमंत्री से बात करते समय भी उनके स्वर का आरोह-अवरोह ठीक वैसा होता था जैसा शशांक से या चिराग़ से बात करते हुए होता था।
उन्होंने 93 वर्ष की आयु में अपने भीतर के किशोर को कभी धीमा न पड़ने दिया। प्रशंसा और प्रसिद्धि की इतनी ऊँचाइयाँ देख चुके थे कि भय या लोभ उन्हें कुछ ओढ़कर जीने के लिए प्रेरित न कर सके।
उनके व्यवहार में साफ दिखता था कि वे हर मिलनेवाले पर अपनत्व का अधिकार अनुभूत करते थे। कार्यक्रम में पहुँचकर अपने स्वास्थ्य के अनुरूप अपने काव्यपाठ का क्रम तय करने में कभी संकोच नहीं करते थे। उनका आदेश इतना अधिकारपूर्ण होता था कि उससे उत्पन्न होनेवाली तमाम व्यवहारिक चुनौतियाँ नगण्य लगती थीं।
उनके आदेश को टालना या उन्हें उसकी कठिनाई बताने का प्रयास असंभव था। मुझ जैसे नए कवियों के नाम याद न रहने पर जब वे शशांक भाई से ‘दिल्लीवाला लड़का’ कहकर मेरा ज़िक्र करते थे तो लगता था कि किस वटवृक्ष ने झुककर एक तिनके का माथा चूम लिया हो।
वे बहुत प्यारे थे। वे बहुत सच्चे थे। वे बहुत अच्छे थे। और सबसे अच्छा यह था कि वे अब तक हमारे साथ थे। उनकी उपस्थिति में काव्यपाठ करते समय ऐसा लगता था कि कविता उनके कानों में धुलकर निखार पा रही हैं और किसी पंक्ति पर वे वाह कर देते थे तो लगता था कि बस, क़िला फतह हो गया।
वे हमें बहुत उपलब्ध थे। इतने कि उन्हें सहेजने की बात याद ही न रही। पर अब वे पूरी तरह अनुपलब्ध हैं, अब हम उन्हें चाह कर भी सहेज नहीं सकते।
अलीगढ़ में अग्नि ने गीतों के विदेह देवता को आलिंगनबद्ध कर लिया है। आसमान बरसकर उनके इस अंतिम गीत को संगीत दे रहा है। तिरंगे ने अपनी संस्कृति के इस लाडले रचनाकार को भरे मन से विदा किया। और हम उनकी स्मृतियों में डूबते-उतराते उनके सैंकड़ों गीत गुनगुनाकर ख़ुद को तसल्ली दे रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

अलविदा शशि कपूर साहब!

एक पूरा जीवन समाप्त हो जाने की एक और ख़बर आई। वे शशि साहब जो कभी चहकते हुए एक नौजवान थे, वे जिनका अंदाज़ “स्टाइल” कहलाता था, वे जिनका उठना-बैठना, खानपान, आना-जाना सब कुछ सुर्खियों में तब्दील हो जाता था; आज “हमेशा” के लिए विदा हो गए। वो शरारती आंखें अब कभी नहीं खुलेंगी। कितना जरूरी और बेतुका सत्य है मृत्यु! और कितना निष्ठुर है लोकप्रियता का भ्रम! जिनका फ़िल्म में मरण देख कर लोगों की पलकें भीग जाती थीं आज उनके महागमन की ख़बर भी केवल एक सिंगल कॉलम न्यूज़ से ज़्यादा कुछ नहीं है। सामाजिक लोगों का जीवन किसी खूबसूरत जश्न जैसा है। जब इस जश्न पर नूर बरसता है तो पूरी दुनिया मुँह बाये इसकी रौशनी से झिलमिलाते संसार को देखती है लेकिन जश्न का रंग उतरने के बाद वही जीवन कितना वीरान और बदरंग हो जाता है- इसकी सुधि लेने कोई नहीं जाता। शशि जी ने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष बेहद कष्ट में गुज़ारे। राजेश खन्ना भी अवसाद के दंश से रोज़ घायल हुए और अंततः चल बसे। दिलीप साहब, अटल जी और भी अनेक दैदीप्यमान सूरज किसी गुमनाम अंधेरे में जीवन काट रहे हैं। ये सब घटनाएँ आज इसलिए संदर्भित हो गई हैं कि कभी हमारे मनोरंजन, खेल, विज्ञान, राजनीति, कला, उद्योग और अन्य क्षेत्रों की धुरि रहे व्यक्तित्व हमारे भविष्य की धरोहर हैं। उनके अनुभवों की ऊर्जा को व्हील चेयर पर घिसटने के लिए छोड़ देने की बजाय यदि भविष्य के निर्माण हेतु प्रयोग करने का उपक्रम किया जाए तो संभवतः निजी जीवन को तिरोहित कर अनवरत मेहनत करने वाले लोग अधिक जिजीविषा से मानव जाति की सेवा कर पाएंगे। अलविदा शशि साहब!
✍️ चिराग़ जैन

श्रद्धांजलि : अनुपम मिश्र जी को

सूखी बावड़ी
बिलख कर रोई है आज;
सूखे कुओं की कागलें
क्षण भर छलछला कर
सूख गई हैं फिर से;
जर्जर तालाबों की मिट्टी
बैठ गई है थक कर!

पानी की पीर को
बानी देने वाली आवाज़
ख़ामोश हो गई है आज।
सूखे स्रोतों से बतिया कर
जो तर कर देता था उनका दामन
वो निःशब्द हो गया है।

एक पानीदार कहानी
अचानक
गुम हो गई है
किसी पुरानी अभागी नदी की तरह।
धाराओं की बीमारियाँ
तलाशती उँगलियाँ
टटोल नहीं पाईं
अपनी काया को जकड़ रहे
केकड़े का शिकंजा।

किसी मीठे तालाब की
आख़िरी बूंद सूखने जैसा है ये पल
किसी मीठी बावड़ी के
पाट दिए जाने जैसा है
ये समाचार
किसी लबालब कुँए के
रीत जाने जैसा है ये अवसाद

…अनुपम मिश्र को
जिन्होंने जाना है
उनकी आँखें छलकी नहीं हैं;
सूख गई हैं!

✍️ चिराग़ जैन

रामधारी सिंह दिनकर

भारत के ओज स्वरावतार
जनता के मन की दृढ़ पुकार
कविता के तेजस्वी सपूत
वाणी में शौर्य सुधा अकूत
ज्वाला से जब भर गए नेत्र
शब्दों में उतरा कुरुक्षेत्र
गाया करुणा की भृकुटि तान
वह रश्मिरथी का महागान
गीतों में सामधेनी धधकी
जनहित की ज्यों दामिनी दमकी
श्रृंगार रचा उर्वशी सजी
कविता के घर पाजेब बजी
ऐसा शब्दों का प्यार सधा
श्रृंगार सधा, अंगार सधा
शोध अरु इतिहास मिलाय रचे
संस्कृति के चार अध्याय रचे
शासन से आँख मिलाय जिया
नभपिण्डो से बतियाय जिया
है कौन निविड़ जो हरा नहीं
दिनकर जीवत है मरा नहीं
जब भी सत्ता बौराती है
जनता दिनकर को गाती है
जब भी अंधियारा गहरेगा
दिनकर प्राची में प्रहरेगा
रश्मियाँ नहीं लेतीं विराम
दिनकर को शत्-शत् है प्रणाम

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!