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याद प्रदीप चौबे की

ज़िन्दगी को सलीक़े से जीना क्या होता है, इस प्रश्न का उत्तर उन सबके पास है जिन्होंने प्रदीप चौबे जी को देखा है। एक ऐसा शख़्स जिसने अपनी शर्तों को किसी भी शर्त पर कभी छोड़ा नहीं। कवि सम्मेलन में गए तो होटल से लेकर मंच तक सब कुछ व्यवस्थित। संयोजन किया तो उनके द्वारा आमंत्रित कवि को क्या क्या ज़रूरत पड़ सकती है, इसका पूरा-पूरा ध्यान; कविता पढ़ी तो एक भी लफ़्ज़ बेमानी नहीं बोला; यात्रा की तो ट्रेन के बिस्तर से लेकर गाड़ी की पिछली सीट के तकिए तक सब कुछ टिप-टॉप। आरंभ के बैनर तले वे ऐसी गोष्ठियाँ करवाते थे जिनमें श्रोता चुन-चुनकर बुलाए जाते थे।
संवेदना इतनी प्रबल कि करुणा की एक पंक्ति पर बिलख पड़ते थे और आत्मबल इतना दृढ़ कि भयंकर स्थिति में भी अपने चेहरे को मटकाते हुए चुटकी ले लेते थे। दुनिया के सबसे सामान्य वाक्य को भी केवल अपनी अदा से ठहाके में तब्दील कर देने का कौशल था उनके पास। सामान्य सी बात को भी तनी हुई भृकुटियों और शरारत भरी मुस्कान के साथ जब वे आँख मारते हुए बोलते थे तो उनकी अदा आनंद उत्पन्न करती थी। बोलते हुए स्वर का आरोह-अवरोह उनके एक-एक जुमले को लतीफ़ा बना देता था। हाज़िरजवाबी ऐसी कि यदि भरे क्रोध में भी किसी को डाँटा तो उस क्षण के संवाद हास्य के संस्मरण बन गए।
कला और प्रतिभा के वे पारखी थे। संगीत, चित्रकला, कविता, अभिनय तथा नृत्य की इतनी महीन समीक्षा करते थे कि स्वयं कृतिकार आश्चर्य से भर जाता था। एक-एक शेर को इतने मन से सुनते थे, कि कोई बात छूट न जाए और जहाँ कविता होती थी, वहाँ इतनी ईमानदार सराहना करते थे कि सुनानेवाला निहाल हो जाता था।
प्रवृत्तियों को भाँपने में दक्ष थे। सामनेवाला जो नहीं कह रहा होता था, उसे पहले सुनते थे। और एक बार सामनेवाले को पढ़ लें तो प्रतिक्रिया देने में विलम्ब नहीं करते थे। छद्म और शातिर लोगों को कई बार रुलाकर लौटाने का इतिहास रहा है प्रदीप जी का।
शरारती इतने थे, कि यात्रा में दो लोगों की बातचीत में बिना शामिल हुए ही मुस्कुराते हुए भिन्न-भिन्न अर्थ निकालकर रस लेते रहते थे। इसी रस से उत्पन्न शरारती मुस्कान उनकी पहचान थी।
साफ़गोई और निर्लिप्तता ने उन्हें बेहद अंतर्मुखी बना दिया था। परफेक्शनिस्ट थे, इसीलिए अपने कम्फर्ट ज़ोन में किसी का दख़ल बर्दाश्त नहीं करते थे। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी बहुत देर तक क्रोध उन्होंने कभी नहीं किया। किसी भी अनचाहे विवाद को एक जुमले से ठहाके में बदल देने का हुनर आता था उन्हें।
अपने कम्फर्ट के दायरे में प्रवेश करने का अधिकार उन्होंने कभी भी किसी को नहीं दिया। शब्दों का अपव्यय उन्हें कतई पसंद नहीं था। उनकी एक ख़ासियत यह भी थी कि वे यदि किसी की प्रशंसा कर रहे होते थे तो उसकी वास्तविकता में कोई संशय नहीं हो सकता था, क्योंकि जो कुछ उन्हें नापसन्द होता था उसको अपनी नापसंदगी जताने में वे कभी नहीं हिचकते थे। जीनियस शब्द और जीनियस लोग उन्हें बेहद पसंद थे। चाटुकारों और दिखावटी लोगों से उन्हें परहेज था। वे जीनियस और खरे लोगों की संगत पाकर प्रसन्न होते थे।
सच बोलते समय वे सामने वाले के मन की चिंता करना बहुत ज़्यादा अनावश्यक समझते थे। झूठी प्रशंसा करनेवालों को बर्दाश्त करने की उनकी क्षमता कुछेक सेकेण्ड में जवाब दे जाती थी। क़िस्सागोई और बतरस के वे मास्टर थे। भयंकर आपात स्थिति की रिपोर्टिंग भी इतने चुटीले अंदाज़ में करते थे कि तनाव छूमंतर हो जाए। भीतर बाहर एक सरीखा जीवन जीनेवाले प्रदीप जी जैसे लोग अब शायद मुश्किल से ही देखने को मिलेंगे, जो अपने ड्राइंग रूम की दीवार पर लिखवा सकें कि- ‘इतना तो चलता है, यहाँ नहीं चलता है।’
मुझे याद है, उन दिनों मैं लगभग रोज़ गीत लिखता था। यात्राओं में अन्य कविमित्र इस बात पर परिहास भी करते थे कि इसे अकेला छोड़ दो तो ये नया गीत लिख लाएगा। प्रदीप जी को ग़ज़लों का शौक़ था। मैंने बिराटनगर से बागडोगरा आते हुए रास्ते में उन्हें कुछ अशआर सुना दिए। उन्होंने भरपूर सराहना की। घण्टे भर बाद अपने सुप्रसिद्ध अंदाज़ में वाक्यों को लगभग गाते हुए बोले- ‘चिराग़, तुम बहुत बढ़िया शेर कहते हो… मुझे भेज दिया करो…’ इससे पहले कि मैं कुछ बोलता उन्होंने उसी सुर में आरोह बढ़ाते हुए वाक्य पूरा किया ‘….गीत मत भेजना!’
जब वे संवाद करते थे तो उनके ओंठ, उनकी आँखें, उनकी भृकुटि, उनकी गर्दन, उनके हाथ, उनकी उंगलियाँ… सब एक साथ बोलने लगते थे।
इतने जीवन्त कवि ने यकायक इस दुनिया को अलविदा कहा तो महसूस हुआ कि हँसता-हँसाता वह व्यक्तित्व कितने सारे तनाव झेलता था, इसका अनुमान किसी को नहीं था। हँसानेवाले का आँसू सृष्टि की सबसे अनावश्यक वस्तु है… प्रदीप जी इस बात को समझ गए थे, इसलिए उन्होंने अपने आँसुओं को अपने व्यक्तित्व के शोरूम में कभी डिस्प्ले नहीं किया।
उनके पास दिल से लेकर जिस्म तक अनेक घाव रहे लेकिन उन्होंने मंच पर कभी इन घावों की संवेदना नहीं बटोरी। प्रदीप जी एक संपूर्ण कवि थे। कभी वक़्त ने आकलन किया तो पता चलेगा कि 11 अप्रैल 2019 को ग्वालियर में जो काया भस्म हुई थी, उसमें एक प्रदीप्त सूर्य ने सत्तर बरस तक प्रवास किया था।
✍️ चिराग़ जैन

एक क़लम ऐसी

इस महफ़िल में चुपचुप बैठी एक क़लम ऐसी है जिसने
ग़ालिब से ग़ज़लें सीखी हैं, तुलसी से चैपाई ली है
अम्बर के उद्दीप्त सितारो, उसको किरणों से दुलराना
जिसने कविता के उपवन में अभी-अभी अंगड़ाई ली है
✍️ चिराग़ जैन

एक ख़ालिस कवि का जीवन

नीरज जी ने जब भी नज़र उठा कर देखा तो उनकी अदा दिल पर छप गई। उन्होंने अपनी भारी आवाज़ में कुछ आदेश कर दिया तो लगा कि हम धन्य हो गए। नीली लुंगी और जेब वाली बनियान पहने जब वे लोगों को सम्मोहित करते दिखते थे तब महसूस होता था कि कोई फकीर अपनी अल्हड़ मस्ती में हम नए साधकों को चपत लगाते हुए कहा रहा है कि – ‘अरमानी के सूट पहनने से कुछ नहीं होगा बे, अरमानों को स्वर देना सीख!’
उनका पूरा जीवन एक ख़ालिस कवि का जीवन था। कोई बड़ा आदमी भी उनसे मिलने आया तो उन्होंने उसके प्रभाव में कपड़े बदलना ज़रूरी न समझा। अपने अंतर्नाद में वे इतने सहज हो गए थे कि मुख्यमंत्री से बात करते समय भी उनके स्वर का आरोह-अवरोह ठीक वैसा होता था जैसा शशांक से या चिराग़ से बात करते हुए होता था।
उन्होंने 93 वर्ष की आयु में अपने भीतर के किशोर को कभी धीमा न पड़ने दिया। प्रशंसा और प्रसिद्धि की इतनी ऊँचाइयाँ देख चुके थे कि भय या लोभ उन्हें कुछ ओढ़कर जीने के लिए प्रेरित न कर सके।
उनके व्यवहार में साफ दिखता था कि वे हर मिलनेवाले पर अपनत्व का अधिकार अनुभूत करते थे। कार्यक्रम में पहुँचकर अपने स्वास्थ्य के अनुरूप अपने काव्यपाठ का क्रम तय करने में कभी संकोच नहीं करते थे। उनका आदेश इतना अधिकारपूर्ण होता था कि उससे उत्पन्न होनेवाली तमाम व्यवहारिक चुनौतियाँ नगण्य लगती थीं।
उनके आदेश को टालना या उन्हें उसकी कठिनाई बताने का प्रयास असंभव था। मुझ जैसे नए कवियों के नाम याद न रहने पर जब वे शशांक भाई से ‘दिल्लीवाला लड़का’ कहकर मेरा ज़िक्र करते थे तो लगता था कि किस वटवृक्ष ने झुककर एक तिनके का माथा चूम लिया हो।
वे बहुत प्यारे थे। वे बहुत सच्चे थे। वे बहुत अच्छे थे। और सबसे अच्छा यह था कि वे अब तक हमारे साथ थे। उनकी उपस्थिति में काव्यपाठ करते समय ऐसा लगता था कि कविता उनके कानों में धुलकर निखार पा रही हैं और किसी पंक्ति पर वे वाह कर देते थे तो लगता था कि बस, क़िला फतह हो गया।
वे हमें बहुत उपलब्ध थे। इतने कि उन्हें सहेजने की बात याद ही न रही। पर अब वे पूरी तरह अनुपलब्ध हैं, अब हम उन्हें चाह कर भी सहेज नहीं सकते।
अलीगढ़ में अग्नि ने गीतों के विदेह देवता को आलिंगनबद्ध कर लिया है। आसमान बरसकर उनके इस अंतिम गीत को संगीत दे रहा है। तिरंगे ने अपनी संस्कृति के इस लाडले रचनाकार को भरे मन से विदा किया। और हम उनकी स्मृतियों में डूबते-उतराते उनके सैंकड़ों गीत गुनगुनाकर ख़ुद को तसल्ली दे रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

बैरागी जी को शब्दाजंलि

शब्दों को ईंधन करने का
जीवट ठण्डा होता है क्या
ज्वाला में दहकर भी कंचन
अपनी आभा खोता है क्या
यम के आदेशों से डरकर
कब कीर्तियान रुक पाते हैं
कुछ श्वासों के थम जाने से
क्या झंझावत चुक जाते हैं
मिट्टी को भस्म बना देना
-बस यही चिता कर पाती है
अक्षुण्ण वज्र रह जाता है
और स्वयं चिता मर जाती है
काया ने आँखें मूंदी हैं
चिंतन के नेत्र प्रखर ही हैं
जिव्हा ने चुप्पी ओढ़ी है
भावों के शब्द मुखर ही हैं
दीपक की पीर समझने को
बलिदान कई रातें करके
जो थका नहीं इक क्षण को भी
नक्षत्रों से बातें करके
जिसने जर्जर पीड़ाओं को
समिधा का मान दिलाया हो
जिसने जग की तृष्णाओं को
अंजलि से अमिय पिलाया हो
जिसने कविता में जीवन भर
अनहद का अंतर्नाद रचा
जिसने ज्वाला की लपटों का
कविताओं में अनुवाद रचा
जिसने आँसू की आह सुनी
जिसने करुणा का रोर सुना
जिसने युग की पीड़ा गाई
जिसने आशा का शोर सुना
यमदूत उसे ले जाने का
उपक्रम कैसे कर सकता है
जिसने शब्दों में प्राण भरे
वह स्वयं कहाँ मर सकता है
करुणा में जब पग जाते हैं
फिर अक्षर ध्वस्त नहीं होते
सूरज-वूरज होते होंगे
बैरागी अस्त नहीं होते

✍️ चिराग़ जैन

अलविदा शशि कपूर साहब!

एक पूरा जीवन समाप्त हो जाने की एक और ख़बर आई। वे शशि साहब जो कभी चहकते हुए एक नौजवान थे, वे जिनका अंदाज़ “स्टाइल” कहलाता था, वे जिनका उठना-बैठना, खानपान, आना-जाना सब कुछ सुर्खियों में तब्दील हो जाता था; आज “हमेशा” के लिए विदा हो गए। वो शरारती आंखें अब कभी नहीं खुलेंगी। कितना जरूरी और बेतुका सत्य है मृत्यु! और कितना निष्ठुर है लोकप्रियता का भ्रम! जिनका फ़िल्म में मरण देख कर लोगों की पलकें भीग जाती थीं आज उनके महागमन की ख़बर भी केवल एक सिंगल कॉलम न्यूज़ से ज़्यादा कुछ नहीं है। सामाजिक लोगों का जीवन किसी खूबसूरत जश्न जैसा है। जब इस जश्न पर नूर बरसता है तो पूरी दुनिया मुँह बाये इसकी रौशनी से झिलमिलाते संसार को देखती है लेकिन जश्न का रंग उतरने के बाद वही जीवन कितना वीरान और बदरंग हो जाता है- इसकी सुधि लेने कोई नहीं जाता। शशि जी ने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष बेहद कष्ट में गुज़ारे। राजेश खन्ना भी अवसाद के दंश से रोज़ घायल हुए और अंततः चल बसे। दिलीप साहब, अटल जी और भी अनेक दैदीप्यमान सूरज किसी गुमनाम अंधेरे में जीवन काट रहे हैं। ये सब घटनाएँ आज इसलिए संदर्भित हो गई हैं कि कभी हमारे मनोरंजन, खेल, विज्ञान, राजनीति, कला, उद्योग और अन्य क्षेत्रों की धुरि रहे व्यक्तित्व हमारे भविष्य की धरोहर हैं। उनके अनुभवों की ऊर्जा को व्हील चेयर पर घिसटने के लिए छोड़ देने की बजाय यदि भविष्य के निर्माण हेतु प्रयोग करने का उपक्रम किया जाए तो संभवतः निजी जीवन को तिरोहित कर अनवरत मेहनत करने वाले लोग अधिक जिजीविषा से मानव जाति की सेवा कर पाएंगे। अलविदा शशि साहब!
✍️ चिराग़ जैन

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