Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
डॉ अनुज त्यागी पेशे से प्राध्यापक हैं किंतु सत्संगति के साथ ही कुसंग भी प्रभावित करता है, सो आगरे के कवियों के साथ रहकर कवि सम्मेलनों का शौक़ पड़ गया और रमेश मुस्कान के साथ रहकर पूरी कविता का कंटेंट वन-लाइनर में निपटा देने की लत लग गई। इस लत ने ‘फन्नी ढाबा’ खुलवा दिया और निरंतर व्यंग्य पकने लगे। ‘फन्नी ढाबा’ प्रसिद्ध होता गया और डॉ अनुज त्यागी के कटाक्ष तीखे होते गए। ‘फन्नी ढाबा’ की इसी लोकप्रियता से प्रभावित होकर डॉ अनुज त्यागी ने होली के अवसर पर ‘फन्नी ढाबा कवि सम्मेलन’ करवाने का निर्णय लिया है। आगरे के काव्य प्रेमियों के लिए बहुत मेहनत करके डॉ त्यागी ने एक मंच और निर्मित कर दिया है।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी ग़लत टाइमिंग की वजह से इस ढाबे के फन्नी व्यंजनों का स्वाद चखने से चूक गए हैं। इससे वे ख़ासे निराश भी हैं। कांग्रेस के उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने फोन करके डॉ अनुज त्यागी को शुभकामनाएँ दीं और कहा कि अगर उनके भाग्य में हँसी लिखी होती तो वे कवि सम्मेलन सुनने ज़रूर आते। उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने बताया कि होली खेलने के लिए चुराई हुई टोंटियों की फिटिंग करवा रहा हूँ, अगर शाम तक प्लम्बर ने काम पूरा कर दिया तो वे ज़रूर आएंगे। दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल जी ने बताया कि दिल्ली में होली पर बढ़नेवाली पानी की मांग को देखते हुए वे अपने बासठ विधायकों के साथ जमुना से मटकियाँ भर-भर कर स्टोर कर रहे हैं, ताकि जनता को फ्री पानी की कमी न पड़े। दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री मनोज तिवारी ने यह कहकर असमर्थता जताई कि वे कवियों से पंगा लेकर पहले ही बहुत दुःखी हैं। हाईकमान ने उन्हें कवियों से दूर रहने का आदेश दिया है।
सबसे दुःखी होकर डॉ अनुज त्यागी ने आगरा की जनता को आमंत्रण दिया और सभी राजनैतिक स्वार्थों से दूर रहनेवाला आम आदमी ख़ुशी-ख़ुशी आज शाम ‘फन्नी ढाबा कवि सम्मेलन’ में ठहाकों के पकवान खाने पहुँच रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय सिनेमा की बुनियाद में जो नगीने जड़े हुए हैं, उनमें कवि प्रदीप भी एक हैं। जिन दिनों स्वाधीनता संग्राम चरम पर था, तब भारतीय सिनेमा भी राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग गया था। जनता में राष्ट्रभक्ति का ज्वार भरने के लिए सिनेमा ब्रिटिश हुक़ूमत के खि़लाफ़ मुखर हो उठा।
सन 1940 में बंधन फ़िल्म के लिए कवि प्रदीप ने हिम्मत से भरी चेतावनी को गीत में पिरो दिया। गीत के बोल थे, ‘दूर हटो ऐ दुनियावालो, हिन्दुस्तान हमारा है’! यही भारतीय स्वाधीनता संग्राम का मूल स्वर भी था। अपनी क़लम के इस तेवर से जब वे ब्रितानिया हुकूमत की आँखों में खटकने लगे तो गिरफ़्तारी से बचने के लिए उन्हें भूमिगत रहना पड़ा।
प्रदीप जी की लेखनी आमूल-चूल राष्ट्रबोध से सुसज्जित थी। युवाओं में जोश भरने के लिए ‘चल-चल रे नौजवान’ भी लिखा और बच्चों को भारत का दर्शन कराने के लिए ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की’ भी लिखा; गांधीहत्या से आहत होकर ‘दे दी हमें आज़ादी’ भी लिखा और गिरते हुए मानवीय मूल्यों से त्रस्त होकर ‘आज के इस इंसान को ये क्या हो गया’ भी लिखा; आज़ादी की क़ीमत ज़ाहिर करने के लिए ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’ भी रचा और भारत-चीन युद्ध के शहीदों को नमन करते हुए ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ भी लिखा। ‘चल अकेला, चल अकेला’ जैसा उत्साहवर्धक गीत भी प्रदीप जी की ही लेखनी का वरदान था और ‘सैंया प्यारा है अपना मिलन’ सरीखा प्रेमगीत भी उसी लेखनी का क़माल है।
कवि प्रदीप ने फिल्मों में कुछ गीत गाए भी हैं- ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान’; ‘पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय’ और ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ’ जैसे गीत उनके कण्ठ से सँवर उठे हैं।
जब दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में चीन युद्ध के शहीदों की याद में कार्यक्रम आयोजित हुआ, तब लता जी ने एक गीत प्रस्तुत किया- ‘ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आँख में भर लो पानी’; भावुक माहौल में वह गीत लोगों के दिल को छू गया। प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की आँखें छलछला आईं। पण्डित जी ने अधिकारियों से कहा कि इस गीत के रचनाकार को बुलाओ। अधिकारियों ने बताया कि प्रदीप जी को इस कार्यक्रम का निमंत्रण ही नहीं भेजा गया। इतना सुनते ही पंडित जी नाराज़ हो गए, और अधिकारियों को डाँटते हुए बोले- ”कवि की कविता इस्तेमाल करते हो और कवि को निमंत्रण भी नहीं भेजते।“
सुनते हैं कि नेहरू जी पहली फ़ुरसत में ही मुंबई जाकर कवि प्रदीप से मिले, उस गीत की रचना के लिए उन्हें बधाई दी और अधिकारियों की लापरवाही के लिए क्षमा मांगी। समंदर के किनारे बैठकर माचिस की डिब्बी पर लिखा गया विचार एक अमर गीत में कैसे तब्दील हुआ यह कहानी कवि प्रदीप ने लम्हा-लम्हा जी है। भारतीय गीतों के इतिहास में कवि प्रदीप का योगदान नक्षत्रों के चूर्ण से अंकित है।
✍️ चिराग़ जैन
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कितना बोलते थे प्रमोद जी। नॉन स्टॉप। सुननेवाले का सिर दुःखने लगता था लेकिन बोलते-बोलते उनका मुँह नहीं दुःखता था। और अब ऐसी चुप्पी धार ली है कि साँसों तक की आवाज़ नहीं आ रही। एक-एक मंज़र आँखों के सामने तैर रहा है। लालकिले की वीडियो यूट्यूब पर डलवाने के लिए उनकी बेचैनी और मेरी लापरवाही की जुगलबंदी से जो गालियाँ निर्मित हुईं, उनकी मिठास मुझे अभी तक जस की तस याद है। और वह वीडियो अपलोड करने के बाद जब मैंने उनके लेखन पर लेख लिखा तो उनका अपनत्व, फोन पर मुझे डेढ़ घंटे तक झेलना पड़ा था। सिंगरौली यात्रा में बनारस से सिंगरौली तक अनवरत प्रवचन, आगरा में तेज भाई, संपत जी और रमेश भाई के सम्मुख मेरे गीतों की प्रशंसा का क्रम शुरू किया तो कार्यक्रम में विलम्ब हो जाने की क़ीमत पर भी उसे समाप्त करने को राज़ी न हुए। और पिछली 1 मार्च को दिल्ली के बीएसएफ ग्राउंड में मुरादाबादी दाल के चटखारे लेते हुए एक आँख मीचकर हौले से प्रशंसात्मक सवाल -‘क्या खाए हो गुरु, रोज़ ही लपक के गीत प गीत पेले जा रहे हो। ये वरदान है, जब तक मिल्ला है लपकते रहो। जब मिलना बंद हो जाएगा तो हमाई तरह फक्खड़ हो जाओगे।’
पहेली सी बूझ रहा हूँ कि मैं अपने साथ उनके इस अंतिम संवाद को आशीर्वाद मानूँ, सुझाव मानूँ या चेतावनी …काश उस ही रात उनसे पूछ लेता। उनकी यादें अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के साथ जीवन की पूंजी बन गई हैं।
अपने कवि होने पर उन्हें अहंकार बिल्कुल नहीं था, लेकिन ठसक पूरी थी। मूलतः पत्रकारिता से जुड़े रहे इसलिए उनके आँख, नाक, कान हमेशा तैनात रहते थे। ज़िन्दगी की किताब के इतने पृष्ठ पलट चुके थे कि अपने अनुभव साझा करते हुए वे कभी थकते ही नहीं थे।
मंचीय जोड़-तोड़ से वे अक्सर खिन्न रहा करते थे लेकिन उनकी प्रस्तुति और मंच पर उनकी धमक से यह खिन्नता कभी अनर्गल नहीं लगती थी। नॉन-स्टॉप बोलने में उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था। किसी यात्रा में यदि उन्हें ड्राइवर के साथ न बैठने को मिले तो वे पूरी यात्रा के दौरान आगे की दोनों सीटों के बीच ही स्थापित रहते थे ताकि संवाद की सम्प्रेषणीयता में कोई बाधा न आ सके।
किसी के व्यक्तिगत जीवन में झाँकना उन्हें बहुत पसंद नहीं था लेकिन मंचीय व्यवहार की कोई भी हरक़त उनकी नज़र से बच नहीं सकती थी। मन को भरपूर जीनेवाले प्रमोद तिवारी जी हिंदी कवि सम्मेलनीय जगत् में गीत का एक अनोखा तेवर स्थापित कर गए हैं।
आज भी जब कोई नया साधक उनके बिंब-विधान और उनकी मस्ती को गीत में साधने का प्रयास करता है तो भीतर से आवाज़ आती है कि कानपुर-लखनऊ हाइवे पर घटी दुर्घटना में उस सुबह केवल उनका शरीर ध्वस्त हुआ था, उनका मन आज भी गीत रच रहे बालकों को डपटकर बोलता है- ‘मस्ती भरे गीत लिखो बे!’
✍️ चिराग़ जैन
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ज़िन्दगी जीने के एक रवैये का नाम है – ‘रमेश मुस्कान’! आडम्बर, झूठ, परिश्रम, महत्वाकांक्षा और औपचारिकता से रहित एक सहज, प्रसन्न, उन्मुक्त और संतुष्ट जीवन का सटीक उदाहरण है रमेश मुस्कान का जीवन।
मंच पर जमने और कविता लिखने की कला किसी से भी सीखी जा सकती है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी तनाव से मुक्त रहने की स्थितप्रज्ञता सिखाने के लिए रमेश मुस्कान के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति मेरे आसपास नहीं है।
दृष्टि इतनी तेज़ कि सामने वाले की आँखों में यदि एक पल के लिए भी कोई रंग उतरा हो तो वह अनदेखा नहीं रह सकता। कान इतने तेज़ कि बात करने वाले के शब्दों की सरसराहट में छिपे हुए भाव की आहट भी सुन लें। आकलन इतना स्पष्ट कि उठने के अंदाज़ से किसी के गिरने की अवस्था भाँप लें और अन्वेषण इतना ईमानदार कि जो व्यक्ति अभी-अभी हानि पहुँचा कर गया हो उसके वार की भी प्रशंसा करने से न चूकें।
एक व्यक्ति के रूप में बेहद शानदार और एक कवि के रूप में उतने ही आलसी। शब्द चयन और अन्वेषण की विलक्षण क्षमताओं को देखते हुए अनेक नक्षत्रों ने ठहर कर इनके किसी परिधि पर आने की प्रतीक्षा की, लेकिन पूरी आकाशगंगा चक्कर खाती फिर रही है कि कोई ध्रुवतारा रंचमात्र भी हिले बिना कैसे प्रकाशमान रह पाता है!
जब कोई शुभचिंतक इनके लाभ के लिए इनके श्रमरूप का दर्शन करने की प्रतीक्षा करने लगता है तो ये और अधिक स्थिर होकर उस शुभचिंतक के थक जाने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। इतिहास साक्षी है कि प्रतीक्षाओं की इस स्पर्धा में आज तक रमेश मुस्कान विजयस्थल से टस-से-मस नहीं हुए हैं।
पर्यटन और बतरस उनके प्रिय चाव हैं। यदि पर्यटन का लोभ न होता तो कदाचित इनकी लेखनी से हिंदी साहित्य के हाथ उतना भी ख़ज़ाना न लगा होता, जितने लिखे को ये महाशय बहुत माने बैठे हैं। बतरस में निश्चित ही इनका कोई विकल्प नहीं है, लेकिन माइक के समक्ष ये एकदम सीरियस हो जाते हैं और माइक के विकिरण से अपनी रक्षार्थ शीघ्रातिशीघ्र अपने आसन पर आ विराजते हैं। माइक से दूर होते ही मंच पर इनकी प्रत्युत्पन्नमति पुनः बांबी में से बाहर निकल आती है।
चूँकि लाभ और रमेश मुस्कान के मध्य आलस्य की एक गहरी खाई है, अतएव सत्य बोलते हुए इन्हें कभी डर नहीं लगता। ये जानते हैं कि कोई चाहकर भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि इस कार्य के लिए ये पूर्णतया आत्मनिर्भर हैं।
इतने सब के बावजूद एक सत्य अकाट्य है कि जिसके पास रमेश मुस्कान जैसा दोस्त हो वह कभी असफल नहीं हो सकता क्योंकि असफल होने के सारे रास्ते रमेश मुस्कान जानते हैं और अपने दोस्तों को कभी उन रास्तों पर जाने नहीं देते।
✍️ चिराग़ जैन
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किसी की भावनाओं का सत्कार करना, प्रेम है। किसी की अनुभूतियों को शब्द में ढलने से पहले ही अक्षरशः समझ लेना, प्रेम है। किसी के अभीष्ट को अपनी आकांक्षाओं से अधिक वरीयता देना, प्रेम है। अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का कौशल, काव्य सृजन की प्रथम अर्हता है। यही कारण है कि प्रेमजन्य समर्पण, मनुष्य को कवि बनाता है और कवि को बेहतर कवि।
जब कोई प्रेम में होता है तो कविता की ओर उसकी रुचि बढ़ जाती है। चूँकि मनुष्य जीवन में एक बार प्रेम अवश्य करता है इसीलिए मनुष्य जीवन में एक बार कविता भी अवश्य लिखता है। जीवन के इस मोड़ से कुछ लोग कविता का राजमार्ग पकड़कर प्रेम की स्मृतियों को सजीव बनाए रखते हैं, और बाक़ी लोग कविता, प्रेम और उसकी स्मृतियाँ वहीं छोड़कर दुनियादारी की पगडंडियों में ग़ुम हो जाते हैं।
राजेन्द्र राजन जी इन दोनों प्रकार के लोगों से विलग हैं। वे न तो कविता के राजमार्ग की ओर आकृष्ट हुए, न ही दुनियादारी के जंजाल में ग़ुम हुए। वे तो उसी गाम पर ठहरकर गीत के एक ऐसे विराट वृक्ष बन गए, जिसकी डालियाँ काव्य के राजमार्ग पर बढ़नेवाले पथिकों को भी छाँव देती रहती हैं और दुनियादारी में खो चुके लोगों को भी उनके खो चुके हरेपन का एहसास कराती रहती हैं।
राजमार्ग वाले बटोही स्वयं के कवि होने का दम्भ लिए लोकप्रियता की अंधी दौड़ में दौड़ते रहते हैं और पगडंडियों के जंजाल में फँसे लोग रोज़मर्रा की उलझनों का हल ढूंढते रह जाते हैं। लेकिन भावनाओं और विवशताओं के जंक्शन पर खड़ा यह कल्पवृक्ष अनवरत गीतपुष्पों की वर्षा करता रहता है। यह स्वयं चलकर कहीं नहीं जाता, लेकिन कोई इसके साए में से गुज़रता है, तो यह बिना कहे उसे गुनगुनाहट की महक और संवेदनाओं की ऑक्सीजन से सराबोर कर देता है।
राजन जी के गीतों की सहजता, उनकी इसी निस्पृहता का सुफल है। वे मिलन और विरह को एक साथ गुनगुनाते हैं। वे प्रेम के पूरब और पश्चिम को अपने एक गीत से जोड़ने की क्षमता रखते हैं। वे किसी भी एक ओर झुके हुए नहीं दिखाई देते, इसी कारण वे लिख पाते हैं कि-
केवल दो गीत लिखे मैंने
इक गीत तुम्हारे मिलने का,
इक गीत तुम्हारे खोने का
जिस गीतकार ने मिलने और खोने, दोनों अवसरों में कविता की तलाश कर ली हो, उसे स्थितप्रज्ञ कहा जा सकता है। राजन जी के लिए जीवन की हर परिस्थिति को गीत कर देना ही श्वासों की सार्थकता रहा। उन्होंने संसार से कभी कोई अपेक्षा भी नहीं की। उनकी अभिलाषा रही कि उन्हें नित्य क्षीण होती उनकी देह के साथ एकाकी छोड़ दिया जाए, ताकि इस क्षरण को गीत बनाने में उन्हें कोई बाधा न झेलनी पड़े-
माना अंधियारे कोने हैं
जिन कोनों में मैं रहता हूँ
जिस पल का प्रारब्ध रुदन है
उस पल भी हँसता रहता हूँ
टूट रहा हूँ- हर पल, हर पग
मांग रहा हूँ फिर भी ओ जग
मुझसे मेरे अंग न छीनो
मुझसे मेरे रंग न छीनो
राजन जी का व्यक्तित्व, एक संपूर्ण कवि का व्यक्तित्व है। गहराई बढ़ने के साथ-साथ समुद्र के चेहरे पर जो शांति घटित होती है, वह राजन जी के व्यक्तित्व में आसानी से दिखाई देती है। वे नैराश्य के अंधियारे को आशा की एक किरण थमाने में विश्वास रखते हैं-
तीरगी में इक उजाले कि किरण मिल जाए बस
इससे ज़्यादा चाहिए भी क्या किसी फ़नकार से
वे किसी का मन हल्का करने के लिए अपने पूरे व्यक्तित्व को एक कंधा बना देने के पक्ष में दिखाई देते हैं-
भले ही देर तक सुनता रहा हूँ उसका अफ़साना
मगर मैं और सुन लूंगा, कि उसका मन तो हल्का हो
यदि कवि की कविताओं से उसके व्यक्तिगत अनुभवों का चित्र बनाना समीचीन हो तो राजेन्द्र राजन जी के गीतों में झाँककर देखा जा सकता है कि उनके अनुभवों में प्रेम की ऐसी गहन अनुभूतियों का एक किरदार श्वास लेता है, जिसके निमीलित नयनों की कोरों पर अश्रु खिलखिलाते हैं और सूखे हुए अधरों से मुस्कुराहट बहती है।
वे प्रेम की भीगी हुई यादों को गुनगुनाते हुए भी उतने ही संतुष्ट दिखते हैं, जितने सहज प्रेम की भोगी हुई यामिनियों को गाते हुए दिखते हैं। राजन जी सप्रयास कवि नहीं बने हैं। सप्रयास कवि बना भी नहीं जा सकता। वे तो अन्तस में बहती कविता की धारा में से गीत की अंजुरी भरने का कौशल जानते हैं। निजी अनुभूतियों को अलगनी पर लटकाकर उनसे टपकते रस का चित्र उकेरने की क्षमता है उनके पास। ‘सुख की भूख न दुःख की चिंता’ जैसे मन की साधना से प्रस्फुटित उनका रचनाकार अपने समय की प्रेम मनोदशाओं का ऐसा कैमरा बना, जो गणपति भाव से अपनी आँखों को कान बनाकर अनुभूत को शब्द देता रहा। उन्होंने कहा भी है-
एहसासों के संबंधों में आँखों की भाषा मुखरित है
जिन रिश्तों को मन छूता है, हाथों से छूना वर्जित है
✍️ चिराग़ जैन