Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कुछ तालाबों की चर्चा कर क़िस्से महफ़िल लूट गए हैं
इस चर्चा में जाने कितने सागर प्यासे छूट गए हैं
कौन बताए तूफ़ानों से कैसे जूझा बूढ़ा बरगद
अंधा बनकर देख रहा था गिरते पेड़ जमूरा बरगद
उस बूढ़े का द्वंद समूचे समरांगण से बहुत बड़ा था
उसने भी तो अठारह दिन ख़ुद से भीषण युद्ध लड़ा था
किन्तु विजय का ताज पहनने बस कीकर के ठूँठ गए हैं
इस चर्चा में जाने कितने सागर प्यासे छूट गए हैं
घाटों तक पहुँची नदिया के गीत सुना देते हैं क़िस्से
पानी की हर इक हलचल को गरज बना देते हैं क़िस्से
जिससे प्यास धुली धरती की, उसकी कोई फ़िक्र नहीं है
जो खेतों में खेत हुई है, उस धारा का ज़िक्र नहीं है
बलिदानों के शव पर अवसरवादी चांदी कूट गए हैं
इस चर्चा में जाने कितने सागर प्यासे छूट गए हैं
राजतिलक पर जिन माँओं के नैन झरे; उनकी चर्चा हो
कायर के आगे अड़ कर जो वीर मरे; उनकी चर्चा हो
ये चर्चा हो युग केवल पाँचाली के आभारी क्यों थे
पाँचाली के केश, हिडिम्बा की ममता पर भारी क्यों थे
उन नयनों की पीड़ा गाओ, जिनसे सपने रूठ गए हैं
इस चर्चा में जाने कितने सागर प्यासे छूट गए हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Nazariya, Prose, Reviews
ज़िन्दगी जीने का सबसे सही तरीका यही है कि उसे हर हाल जिया जाए। जीवन के इस दर्शन को पर्दे पर बेहद शानदार तरीके से उतारा गया है “102 नॉट आउट” में। ठहाकों और उल्लास के सूत्र में पिरोई गई कहानी इतनी रवाँ है कि कहीं कोई गाँठ दिखाई ही नहीं देती।
अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की लाजवाब जुगलबंदी ने अभिनय का उम्दा उदाहरण प्रस्तुत किया है। संवाद अपने नयेपन के साथ अभिनेताओं की टाइमिंग से दोगुने प्रभावी बन गए हैं।
बुढ़ापे में ज़िन्दगी से भरे रहने का संदेश देती यह फ़िल्म जीवन की कठिनाइयों से परास्त मनुष्यों के लिए ग्लूकोज़ की तरह है। फ़िल्म का सबसे ख़ूबसूरत पक्ष है इसके संवादों की सहजता। 102 वर्ष की आयु में अमिताभ बच्चन बोलते हैं कि “मैं मरने के सख़्त ख़िलाफ़ हूँ, मैं अपनी ज़िंदगी में आज तक कभी नहीं मरा।” …जीवन का इतना बड़ा दर्शन एक ठहाके के साथ घटित हो जाता है। मनुष्य अपनी मृत्यु को भी सेलिब्रेट कर सकता है। वह मृत्यु के बाद भी अपने होने का आभास करा सकता है। और वह चाहे तो जीते जी मर भी सकता है।
अकेलेपन और संबंधों की त्रासदी झेल रहे लोगों के लिए यह फ़िल्म मरहम की तरह है। “औलाद जब नालायक निकल जाए तो उसका बचपन याद करना चाहिए।” -इस निचोड़ को बेहद ख़ूबसूरती से कहानी में बुना गया है। भावनात्मक शोषण से ठगे गए लोगों के लिए अपने आप को आज़ाद कराने का नुस्ख़ा है इस सिनेमा में। फ़िल्म में लाइन स्केच के मर्जर से दृश्यों का परिवर्तन एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है।
अमित जी के जीवंत अभिनय पर कहीं कहीं ऋषि दा का वैविध्यपूर्ण अभिनय भारी पड़ा है। जिमित त्रिवेदी ने भी अपना क़िरदार बेहतरीन निभाया है।
दत्तात्रेय वखारिया और बाबूलाल वखारिया के शांति निवास में ज़िन्दगी जीने के दो अलग अलग तरीक़ों का लुत्फ़ लीजिये और अश्लीलता, फूहड़ता, कानफोड़ू संगीत, गाली-गलौज और विदेशी लोकेशन्स के दम पर फिल्में बनाते बॉलीवुड में सौम्य जोशी के एक नाटक पर आधारित इस साफ-सुथरी फ़िल्म का स्वागत कीजिये।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
पुरखों से आशीष, बुज़ुर्गों से जीवन का ज्ञान मिला
ऐसे मुझको जीवन भर मुस्काने का वरदान मिला
ईश्वर की अनुकम्पा है या फिर गत कर्मों का फल है
ख़ुशियां मेरी मीत हो गईं, दुख मुझसे अनजान मिला
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
किसी की ज़िन्दगी अपने ठिकाने तक नहीं पहुँची
किसी की मौत ही वादा निभाने तक नहीं पहुँची
बुज़ुर्गों की क़दमबोसी मेरी फितरत रही लेकिन
मेरी हसरत कभी उनके ‘सिराने तक नहीं पहुँची
ज़माने के लिए जो शख्स घुट-घुट कर मरा आख़िर
ख़बर उस शख्स की ज़ालिम ज़माने तक नहीं पहुँची
हवा के साथ उसकी ख़ुश्बुएँ आती रहीं लेकिन
कभी वो शय हमारे आशियाने तक नहीं पहँची
लहर से जूझना ही क्यों लिखा था मेरी क़िस्मत में
मेरे किश्ती कभी भी क्यों मुहाने तक नहीं पहुँची
✍️ चिराग़ जैन