Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उमंग, शौर्य, शक्ति का अनन्त नित्यकोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
त्रिभुज, स्वरद, पणव सुसज्ज झल्लरी की गूंज है
सुरों की दिव्य देह ताल वल्लरी की मूँज है
महोत्सवों में बाँसुरी की तान का विधान है
समर समय में शंख के स्वरों का शौर्यगान है
समर्पणों को तूर्य की ध्वनि का पारितोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
नागांग, घोषदण्ड और आनकों का लास्य है
मृदङ्ग का वितान और गोमुखों का भाष्य है
हृदय धरा पे भूप, सोनभद्र का प्रवाह है
तिलंग-उदय-अजेय से शिथिल क्षणों का दाह है
अमर, अकंप, अप्रतिम, अथक, अजर, अदोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
ये श्रीनिवास सुब्बु के करों का घोषदण्ड है
ये दाते, बापुराव का प्रचण्ड शक्ति खण्ड है
किरण, तिलक-कामोद सम सृजन का दिव्य क्षेत्र है
ये केशवः की तर्जनी है शंकरः का नेत्र है
ये मेघ घोष, ब्रह्म घोष और सिंह घोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Muktak, Poetry
अपमानित होना पड़ता सैनिक के खून पसीने को
रोक नहीं पाए हैं अब तक उग्रवाद के कीने को
आईएसआईएस ने मरहूम किया बेटों के जीने को
शहद लगाकर चाटेंगे क्या छप्पन इंची सीने को
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
भारत की पूर्णता का भान करने के लिए
वेद की ऋचाओं का सुज्ञान भी ज़रूरी है
मंदिरों की संध्या आरती के सुर मुख्य हैं तो
मस्जिदों से उठती अजान भी ज़रूरी है
कातिक, असौज, माघ, सावन भी अहम हैं
मीठी ईद वाला रमज़ान भी ज़रूरी है
नानक, कबीर, बुद्ध, महावीर, ईसामसीह
राम भी ज़रूरी, रहमान भी ज़रूरी है
मीरा का मुरारी, जसोदा का नंदलाल और
राधिका के सांवरे से कंत भी समान हैं
जन्म से मरण तक कोई-सा भी पंथ रहे
आदि भी समान और अंत भी समान हैं
बैरागी, फ़क़ीर, ब्रह्मचारी, त्यागी, पीर, बाबा
सिद्ध, ऋषि-मुनि, साधु-संत भी समान हैं
यंत्र भी समान, तंत्र-मंत्र भी समान और
भीतर से सारे धर्मग्रंथ भी समान हैं
झाड़-फूंक वाले टोने-टोटके भी अपने हैं
जड़ी-बूटी वाला वो इलाज भी हमारा है
शंख फूंकने से बाँसुरी की तान तक दक्ष
शस्त्र भी हमारा और साज भी हमारा है
शोणित के पान की परंपरा हमारी ही है
क्षमादान करता रिवाज़ भी हमारा है
गंगा जी का तट मणिकर्णिका हमारा ही है
जमुना किनारे बना ताज भी हमारा है
युध्द से विरक्त हो के संत जो बना था वीर
मौर्यवंशी शासक महान भी हमारा है
भोज, अकबर, शेरशाह, रणजीत, हर्ष,
महाराणा, पौरुष, चौहान भी हमारा है
भारतीय दर्शन जान के सुदर्शन
शून्य पे जो बोला था वो ज्ञान भी हमारा है
भारत हमारा, आर्यावर्त भी हमारा ही है
इंडिया हमारा, हिंदुस्तान भी हमारा है
✍️ चिराग़ जैन
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अगर पूरी हक़ीक़त जानने की चाह रखते हो
अमां फिर मुल्क के हालात अख़बारों से मत पूछो
जहाँ तक हो सके हर शख़्स की बढ़कर मदद कीजे
तरक़्क़ी आएगी कैसे? -ये सरकारों से मत पूछो
हमें अब अम्न की बातें महज बकवास लगती हैं
वतन से प्यार करनेवालों की खिल्ली उड़ाते हैं
सियासत के नुमाइंदे वतन को खा रहे जमकर
कभी मुम्बई निगलते हैं, कभी दिल्ली उड़ाते हैं
हमारी फ़िक्र घुटकर रह गई है एक बुलेटिन तक
बसों में वक़्त कटने के लिए बातें भी करते हैं
महज फ़ीगर समझ बैठे हैं हम भी आदमी को अब
हमें सिहरन नहीं होती कहीं जब लोग मरते हैं
हमें मसरूफ़ करके रोज़ बेमतलब के मुद्दों में
सियासत चैन से अपनी ज़मीनें सींच आती है
हमें गंगाजली और आबे-ज़मज़म की क़सम देकर
हुक़ूमत पैग पटियाला लपककर खींच आती है
अगर हम आपसी नफ़रत का थोड़ा शोर कम कर दें
तो फिर अहले-रियाया की आवाज़ें मर नहीं सकती
अगर हम रोज़मर्रा के मसाइल को तवज्जोह दें
सियासत फिर कोई भी बदतमीज़ी कर नहीं सकती
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
ओ मगरमच्छ के भ्रष्ट रूप, ओ दानव के कल्पित स्वरूप
इतिहास हमें बतलाता है, बड़बोला हानि उठाता है
बासठ की याद दिलाते भी, क्या बिल्कुल लाज नहीं आई
तब तेरे पुरखे भजते थे, हिंदी-चीनी भाई-भाई
ऊपर-ऊपर मीठा बनता, भीतर से खड़े सरौते सा
कहने भर को चीनी है पर, कड़वा है सड़े चिरौते सा
तिब्बत को आँख दिखाता है, लतियाता है शरणागत को
छल-द्वेष-धूर्तता ओढ़-ओढ़, शर्मिंदा किया तथागत को
क्या पता कौन सा दाँव कहाँ, कब कैसा मंज़र ले आए
ये सड़क बनाने का चस्का, कब तुझे सड़क पर ले आए
ओ चीनी मिट्टी से चिकने, ओ ड्रैगन से अस्तित्वहीन
ये बात भलाई की सुन ले, मत अहंकार में फूल चीन
तुझसे बातें करने में भी, नज़रें नीची करता भारत
ये बासठ वाला दौर नहीं, लड़ने से कब डरता भारत
ये समय विश्व-बंधुत्व का है, अब झगड़ा-वगड़ा ठीक नहीं
मानवता के उन्नति पथ पर, आपस का रगड़ा ठीक नहीं
भारत के सिंह दहाड़े तो, तेरा ड्रैगन डर जाएगा
दिल्ली शॉपिंग बंद कर दे तो, पीकिंग भूखा मर जाएगा
फिर भी मन बना चुका है तो तू देख लड़ाके भारत के
तू बस माचिस को हाथ लगा, फिर झेल धमाके भारत के
हम अनुनय भी कर सकते हैं, हम तीर चलाना भी जानें
सागर पूजन करते-करते, सागर लंघ जाना भी जानें
सागरमाथा फिर देखेगा बल-पौरुष कंचनजंगा का
फिर से गौरव गुंजित होगा दुनिया में अमर तिरंगा का
हम संख्या में हैं न्यून किन्तु हिम्मत में तुझसे न्यारे हैं
पाण्डव हर युग में जीते हैं कौरव हर युग में हारे हैं
है शांतिपर्व अंतिम अवसर समझौते वाली बोली का
इसके उपरांत महोत्सव है माँ रणचण्डी की डोली का
आमंत्रण मत दे मातम को ओ हठधर्मी दो पल डट जा
तेरा हित सिर्फ़ इसी में है सेना लेकर पीछे हट जा
✍️ चिराग़ जैन