नाम को गाली बनाएँगीं नस्लें
ये नफ़रतों का ज़हर मत उलीचिये साहिब
तुम्हारे नाम को गाली बनाएँगीं नस्लें
✍️ चिराग़ जैन
ये नफ़रतों का ज़हर मत उलीचिये साहिब
तुम्हारे नाम को गाली बनाएँगीं नस्लें
✍️ चिराग़ जैन
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
तुमको राष्ट्र अधिक प्यारा था, या फिर अपनी भीष्म प्रतिज्ञा?
अम्बा की अनुनय ठुकराई, गुरु-आज्ञा भी रास न आई
निज नियमों से न्याय किया पर, अम्बा के ठहरे अन्यायी
बिन आमंत्रण काशी जाकर
बीच स्वयंवर शौर्य दिखाकर
अम्बा को हर कर लाए, फिर
छोड़ दिया परिणय ठुकराकर
एक नियम की रक्षा के हित, शेष नियम भी भूल न जाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
दुःशासन ने सीमा लांघी, दुंदुभि गूंजी प्रलय-समर की
एक तरफ़ थी भीष्म प्रतिज्ञा, एक तरफ़ मर्यादा घर की
तब भी तुमको लाज न आई
तब भी देह नहीं थर्राई
कुरुकुल की सब आन लुटाकर
तुमने झूठी शान बचाई
कुलवधुओं का आँचल से अब, अपनी सूरत को न छुपाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
ठीक कथानक रच सकता था, रक्त-समर भी बच सकता था
और तुम्हारा वचन भुलाना, इतिहासों को पच सकता था
अधर हिला भी सकते थे तुम
भृकुटि तना भी सकते थे तुम
किसमें क्षमता है शासन की
ये समझा भी सकते थे तुम
युग का चेहरा काला करके, अपने श्वेत वसन दमकाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
✍️ चिराग़ जैन
उमंग, शौर्य, शक्ति का अनन्त नित्यकोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
त्रिभुज, स्वरद, पणव सुसज्ज झल्लरी की गूंज है
सुरों की दिव्य देह ताल वल्लरी की मूँज है
महोत्सवों में बाँसुरी की तान का विधान है
समर समय में शंख के स्वरों का शौर्यगान है
समर्पणों को तूर्य की ध्वनि का पारितोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
नागांग, घोषदण्ड और आनकों का लास्य है
मृदङ्ग का वितान और गोमुखों का भाष्य है
हृदय धरा पे भूप, सोनभद्र का प्रवाह है
तिलंग-उदय-अजेय से शिथिल क्षणों का दाह है
अमर, अकंप, अप्रतिम, अथक, अजर, अदोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
ये श्रीनिवास सुब्बु के करों का घोषदण्ड है
ये दाते, बापुराव का प्रचण्ड शक्ति खण्ड है
किरण, तिलक-कामोद सम सृजन का दिव्य क्षेत्र है
ये केशवः की तर्जनी है शंकरः का नेत्र है
ये मेघ घोष, ब्रह्म घोष और सिंह घोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
✍️ चिराग़ जैन
छोरे उचक्कों से दिन-रात घर की रखवाली करते थे। घर का बूढ़ा उचक्कों के मुहल्ले से होकर गुज़रता था।
उचक्कों की भाभी बूढ़े को देखकर स्माइल पास करती थी। स्त्री की मुस्कुराहट से बूढ़े को थोड़ी-थोड़ी गुदगुदी होती लेकिन उचक्कों की हरकतें ध्यान आते ही वह तेज़ी से आगे बढ़ जाता। गर्मी का मौसम आया तो बूढ़ा कभी-कभी थकान मिटाने के लिए उचक्कों की भाभी के चबूतरे पर बैठ जाता। भाभी ने भी मौक़ा देखकर बूढ़े को बैठते ही ठंडा पानी पिलाना शुरू कर दिया। एक दिन शर्बत पिलाते हुए भाभी ने बूढ़े से कहा- “ए जी, आपके घर के बाहर जवान लौंडे पहरा देते हैं तो मेरे देवर घर में सेंध नहीं लगा पाते। आप उन्हें रोकते क्यों नहीं। कम से कम अगली दिवाली तक अपने छोरों को पहरेदारी से हटा लो ताकि बेचारे सेंधमार उचक्के आपके घर से कुछ बर्तन-भांडे चुरा कर दिवाली का जुआ खेल सकें।”
भाभी की बात सुनकर बूढ़े को अपने छोरों पर क्रोध आया और उचक्कों पर दया आई। घर लौटते ही तमतमाकर छोरों की क्लास लगाई, और बोला- “एक महीने बाद दिवाली है, अगर किसी उचक्के की धरपकड़ की तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। जाओ कुछ हिल्ला करो, आज से ये लठैती बंद!”
नोट : इस कहानी को कश्मीर से जोड़ कर मुझे शर्मिंदा न करें।
Ref : Military restrictions in Kashmir on Eid
✍️ चिराग़ जैन
सुना है एक मदमस्त हाथी ने
बिल्ली के कहने पर
शेरों के हाथ बांध दिए
ताकि भेड़िये मेमनों की दावत उड़ा कर
ईद मना सकें।
शेरों को आदेश है
कि लकड़बग्घे उन्हें अपमानित करें तो हो लें
क्योंकि बेचारे लकड़बग्घों का रमज़ान है
उनसे अपमानित हो लोगे तो बेचारे ख़ुश हो जाएंगे।
✍️ चिराग़ जैन