Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
आँसू भेजे हैं घाटी ने
चिथड़े बीने हैं माटी ने
फिर धोखे से घात किया है
कायरता की परिपाटी ने
अब पापी मतलब समझेगा, धोखे के परिणाम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का
छल का शीश नहीं कट पाया, तो यह रण आश्वस्त न होगा
जब तक न्याय नहीं हो जाता, तब तक सूरज अस्त न होगा
युग-युग का इतिहास खँगालो, पाप पराजित होता आया
लंका जलनी है रावण की, राघव का घर ध्वस्त न होगा
वीरों के तूणीर खुलेंगे
सोए शर ज्वाला उगलेंगे
दुःशासन का लोहू लेकर
पांचाली के केश धुलेंगे
तुमने मार्ग स्वयं खोला है, अपने पूर्णविराम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का
अनुनय की भाषा को शठ ने, रघुवर की दुर्बलता जाना
शिशुपालों ने मधुसूदन में, अपना काल नहीं पहचाना
इतने अवसर मिलने पर भी, हिंसा का पथ छोड़ न पाए
आदत से लाचार हुए हो, ज्यों कोढ़ी का कोढ़ खुजाना
फिर मस्तक पर बल उभरे हैं
कृष्ण सुदर्शन धार खड़े हैं
फिर अर्जुन के नैन झरे हैं
फिर से सारे घाव हरे हैं
फिर से बिलख-बिलख कर रोया, मंदिर अक्षरधाम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
गांधी!
जब कोई तुम्हें गाली देता है
तब मुझे महसूस होता है
कि जिस देश को
तुमने दूसरा गाल आगे करने का
पाठ पढ़ाया था
उस देश के पास गाल है ही नहीं
सिर्फ़ हाथ हैं
जो तुम्हारे गाल पर
थप्पड़ मार-मार कर
तुम्हारा ही सबक याद करने का
ढोंग कर रहा है।
बापू!
तुम्हारा कृतज्ञता ज्ञापन करने
कोई नहीं आएगा
क्योंकि हम जानते हैं
कि तुमने उन्हें भी बद्दुआ नहीं दी
जिन्होंने तुम्हें पत्थर मारे
इसलिए तुम्हें गाली देने में
कोई ख़तरा नहीं है।
महात्मा!
तुम्हारे सिद्धांत
यतीम होकर भटक रहे हैं
स्वतंत्र भारत में
क्योंकि जिन्होंने तुम्हारे नाम को भुनाकर
सत्ता पाई है
उनके पास इन सिद्धांतों को देखने की
फ़ुर्सत नहीं है
और जो तुम्हारे नाम को भुना न सके
उनके पास इन सिद्धांतों को पालने का
सामर्थ्य नहीं है।
राष्ट्रपिता!
हम तुम्हें आज़ादी का नायक नहीं मानते
क्योंकि हम यह मानते हैं
कि तुम्हें नायक मान लेने से
बाकी सब नायकों का अपमान हो जाएगा
हम बाकी सबको भी
आज़ादी का नायक नहीं मानते
बल्कि हमने झुंड बनाकर
एक एक नायक चुन लिया है
अब हर झुंड
अपने नायक को महान बताते हुए
बाकी सबको गाली देता है
ताकि किसी भी नायक को ऐसा न लगे
कि उसके लिए इस देश में कोई लड़ नहीं रहा।
हे देवदूत!
मैं राजघाट पर तुम्हें पुष्पांजलि देने
कभी नहीं आऊंगा
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि तुम वहाँ हो ही नहीं।
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि तुम नज़रें झुकाकर जा चुके हो
ये देश छोड़कर
कई बार…।
कई बार तुम्हारी हताश उच्छ्वासों ने
उच्चारा है – “हे राम!”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
नाम रहेगा शेष हमारा
सर्वोत्तम परिवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
आज़ादी के नग़मे गाकर, देशप्रेम की अलख जगाकर
स्वाभिमान हित जी लेते हैं, सिर्फ़ घास की रोटी खाकर
पल भर में तलवार हमारी हो सकती है खूं की प्यासी
पल भर में ही हो सकते हैं, शस्त्र त्यागकर हम सन्यासी
विष पीता अखिलेश हमारा
वज्र बना दरवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
ओज रुधिर में, रौद्र नयन में, रूप भयानक वैरी के हित
करुणा निर्दोषों के दुःख पर, पीठ बंधा वात्सल्य सुरक्षित
हमने सीखा ढंग से जीना, हमने सीखा ढंग से मरना
सुंदरता पर आँच हुई तो, हमने सीखा जौहर करना
शाश्वत सुख उद्देश हमारा
शांतिपरक निर्देश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
हम अनुनय की बोली बोलें, रस्ता मांगें हाथ पसारे
अभिमानी के लिए भरे हैं हमने आँखों में अंगारे
हम अपनी पर आ जाएँ तो सागर से अमृत चखते हैं
हम अपनी पर आ जाएँ तो पर्वत उंगली पर रखते हैं
सागर-सा आवेश हमारा
दास हुआ लंकेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
मस्त फ़क़ीरों की धरती है, शांति-अहिंसा के अभिलाषी
वन्देमातरम गाते-गाते, रण में कूद पड़े संन्यासी
हमने सागर को लांघा है, पर्वत लेकर उड़े गगन में
एक वचन पूरा करने को, चैदह वर्ष बिताए वन में
सीधा-सादा वेश हमारा
प्रेम-त्याग संदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
आपस में लड़ते हैं तो क्या, दुःख में साथ खड़े होते हैं
हर मुश्किल के आगे हम ही, सीना तान अड़े होते हैं
जब संकट ने पाँव पसारे, जब भी कोई आफत आई
एक साथ मिलकर जूझे हैं, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई
शौर्य रहेगा शेष हमारा
मिट जाएगा क्लेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
वनवासों को पूजा हमने, राजपाट हमने ठुकराया
जिससे मोह किया वो छूटा, जिसको त्याग दिया वो पाया
हम घर में रहकर वैरागी, हम वन में रहकर शासक हैं
योग-भोग दोनों के साधक, हम प्रियतम के आराधक हैं
मत मानो आदेश हमारा
पर समझो उपदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
ये नफ़रतों का ज़हर मत उलीचिये साहिब
तुम्हारे नाम को गाली बनाएँगीं नस्लें
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
तुमको राष्ट्र अधिक प्यारा था, या फिर अपनी भीष्म प्रतिज्ञा?
अम्बा की अनुनय ठुकराई, गुरु-आज्ञा भी रास न आई
निज नियमों से न्याय किया पर, अम्बा के ठहरे अन्यायी
बिन आमंत्रण काशी जाकर
बीच स्वयंवर शौर्य दिखाकर
अम्बा को हर कर लाए, फिर
छोड़ दिया परिणय ठुकराकर
एक नियम की रक्षा के हित, शेष नियम भी भूल न जाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
दुःशासन ने सीमा लांघी, दुंदुभि गूंजी प्रलय-समर की
एक तरफ़ थी भीष्म प्रतिज्ञा, एक तरफ़ मर्यादा घर की
तब भी तुमको लाज न आई
तब भी देह नहीं थर्राई
कुरुकुल की सब आन लुटाकर
तुमने झूठी शान बचाई
कुलवधुओं का आँचल से अब, अपनी सूरत को न छुपाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
ठीक कथानक रच सकता था, रक्त-समर भी बच सकता था
और तुम्हारा वचन भुलाना, इतिहासों को पच सकता था
अधर हिला भी सकते थे तुम
भृकुटि तना भी सकते थे तुम
किसमें क्षमता है शासन की
ये समझा भी सकते थे तुम
युग का चेहरा काला करके, अपने श्वेत वसन दमकाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
✍️ चिराग़ जैन