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किस्सों को खूंटी पर टाँको

दूर खड़े रहकर मत आँको
झाँक सको तो मन में झाँको
घटनाओं की परतें खोलो
किस्सों को खूंटी पर टाँको
आँखें क्यों छोटी कर दी हैं, होठों के उल्लास ने
आँसू की नदियाँ ढक ली हैं मुस्कानों के व्यास ने

कैकई मैया का राजा के महलों बीच ठिकाना था
नौकर, चाकर, दास, दासियाँ सबका आना-जाना था
होने को तो उसके आगे सुविधाओं का मेला था
लेकिन मन के भीतर केवल मरघट का वीराना था
पानी तक पहुँची तो बदला रंग पुरानी प्यास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

अपमानित शकुनी इक ज़िद पर पूरा जीवन वार गया
अपमानित चाणक्य उसी ज़िद पर हर बाज़ी मार गया
विष्णुगुप्त नायक है युग का और शकुनी खलनायक है
इसका मोहरा जीत गया है, उसका मोहरा हार गया
जो भी जीता उसे सिकंदर मान लिया इतिहास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

क़िस्सा क्या है, आधे सच को ढकता एक झरोखा है
कथा, विजेता की सहमति से होने वाला धोखा है
आँखों देखी को भी बाँचो, किसकी आँखों से देखी
सच जो पर्दे के पीछे है, उसका रूप अनोखा है
वैभव की झोली खाली है, सुख पाया संन्यास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

✍️ चिराग़ जैन

नृत्य : हर्ष का उत्कर्ष

सृष्टि के समस्त नाद की अनूदित कृति है नृत्य। सुर के अनुरूप गति, ताल के अनुरूप थाप, अर्थ के अनुरूप मुद्रा और भाव के अनुरूप भंगिमा; इन सबको एक साथ साधने का कौशल है नृत्य। नर्तक नटराज की प्रतिकृति है। शब्द से भंगिमा तक की यात्रा का सारथी नर्तक है।
देह के एक-एक अंग को अलग-अलग करके एक ही लय ताल में थिरकाना नर्तक का कौशल है। भृकुटि, नेत्र और दृष्टि… तीनों अलग-अलग होकर एक साथ नाचने लगती हैं। अधर, कपोल, ग्रीवा, कंधे, वक्ष, भुजाएँ, कलाई, हथेली, अंगुलियाँ, कटि, नितम्ब, चरण… सब नाचते हैं… विलग किन्तु एकाकार। मन बावरा होकर नाचता है। धरती एड़ी से टकराकर नूपुर में स्वर भरने लगती है।
शेष साज दूर खड़े नर्तक के स्पर्श को तरसते रहते हैं और नूपुर कलाकार के पैर पकड़कर नृत्य का अंग बन जाता है। नूपुर यह संदेश देता है कि आनन्द से एकाकार होना है, तो पैर ही पकड़ने होंगे। यदि पैर न पकड़े जाएँ तो आनन्द के दर्शन सम्भव हैं, स्पर्श नहीं। कृष्ण की बाँसुरी आनन्द उत्पन्न कर सकती है किंतु कृष्ण के नृत्य का अंग नहीं बन सकती। किन्तु मीरा के घुंघरू मीरा के साथ-साथ नाच सकते हैं। क्योंकि बाँसुरी ने अधर चुने और घुंघरुओं ने पग।
नृत्य स्वयं में एक दर्शन है। देह के विदेह होने की झाँकी है। वातावरण में घुल जाने का अनुभव है। मन के भीतर जुट आए उत्स का मूर्त रूप है। झिझक और संकोच से विरक्ति है नृत्य। सहजता का महापर्व है नृत्य। निश्छल हो जाने का उद्घोष है नृत्य। निस्पृह हो जाने की सूचना है नृत्य। आत्मा के अलंकृत और मन के झंकृत हो उठने का पल है नृत्य। हर्ष के उत्कर्ष का अनुवाद है नृत्य। यही कारण है कि जिसने उसे पा लिया, वह नाचने लगा। नाचने के लिए कुछ पा लेने की ख़ुशी; न्यूनतम अर्हता है। मीरा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। राधा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। सूर, कबीर, रैदास, तुलसी… सब नाचते हुए लोग हैं। यहाँ तक कि लंगड़ा मनसुखा भी नाच उठता है। नाचने के लिए देह चाहिए ही नहीं। नृत्य तो मन में घटित होता है, देह तक तो केवल कम्पन पहुँचता है। जैसे धरती के गर्भ में हुई हलचल का कम्पन भर भूकम्प बन जाता है, किन्तु भूकम्प हलचल का कारण नहीं है। कारण तो अदृश्य है। बहुत गहरे, मन की भीतरी परतों में।
यही कारण है कि जब कोई प्रेम में होता है तो मन की इस हलचल का असर चेहरे पर दिखाई देने लगता है। फिर स्वयं प्रेमी भी किसी तरह इस असर को रोक नहीं सकता। हलचल हुई है तो भूकम्प का आना तय है। मन नाच उठा है तो देह का थिरकना अवश्यम्भावी है। इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है।
बरसात होती है तो वृक्ष नाचने लगते हैं। बादल घिरते हैं तो पवन की थिरकन दिखाई देती है। समुद्र लहर-लहर नाचता है, झीलें, नदियाँ… सब नृत्यमय हैं। मरुस्थल भी नाचता है। पर्वत जड़ होकर भी वादियों में नृत्य करता प्रतीत होता है। झरने गाते हुए नाचते हैं। इन सबका नाचना ही प्रकृति के स्वास्थ्य का द्योतक है। रुग्ण व्यक्ति नाच नहीं सकता।
नाचने के लिए स्वस्थ होना ही पड़ेगा और स्वस्थ बने रहने के लिए नाचना ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

हौसला मत छोड़ देना

राह कितनी भी कठिन हो, हौसला मत छोड़ देना
यह नियत है, हर डगर के अंत में मंज़िल मिलेगी
जो सफ़र पूरे हुए हैं, उन सभी का हाल पूछो
हर विजय की राह हर युग में बहुत बोझिल मिलेगी

राम होने के लिए वन-वन भटकना ही पड़ेगा
भाई की हत्या बिना सुग्रीव निष्कासित रहेगा
जो दशानन के सिंहासन पर सुशोभित हो गया है
वह विभीषण वंशहंता हो के अभिशापित रहेगा
वीर लक्ष्मण की कथाएँ जब खंगालेगा कोई तो
राजमहलों के सुखों में घुट रही उर्मिल मिलेगी

जंगलों को छाँट कर चाहे नगर निर्माण कर लें
रण बिना पूरा हुआ क्या, पांडवों की जीत का पथ
द्यूत, लाक्षागृह, कठिन वनवास और फिर दास जीवन
हर क़दम जर्जर हुआ है न्याय की उम्मीद का रथ
मौन रहकर भी समय को काटना चाहा कभी तो
कीचकों के रूप में निश्चित कोई मुश्किल मिलेगी

भोर की पहली किरण का मार्ग अंधियारा रहेगा
रात के अंतिम पहर को दीप की झिलमिल मिलेगी
प्रेम को सारे ज़माने की घृणा सहनी पड़ेगी
नफ़रतों को हर क़दम पर प्यार की महफ़िल मिलेगी
जिंदगानी के सफ़र में मौत का साया रहेगा
मौत को मंज़िल कहा तो, मौत भी तिल-तिल मिलेगी

✍️ चिराग़ जैन

गौवर्द्धन पर्व

सत्ता चाहे जिसकी भी हो, अहम् नहीं स्वीकार प्रजा को
कर्मकांड से कर्मयोग ने पल में लिया उबार प्रजा को
गोकुलवालो छोड़ो छलिया इंद्रदेव का पूजन करना
पर्वत ढोकर ही मिलता है, जीने का अधिकार प्रजा को

सत्ता की मनमानी का करना होगा प्रतिकार प्रजा को
चुप रहने से निर्भरता का होता व्याधि-विकार प्रजा को
श्रमजीवी भी दान-दया का पात्र बने तो युग कोसेगा
कर्म छोड़ कर कृपा निहारे तो सौ-सौ धिक्कार प्रजा को

✍️ चिराग़ जैन

दर्पण में उनका चेहरा है

जो सबके अपराध टटोलें
मीठे पानी में विष घोलें
जो जल से जल-जल जाते हैं
जब बोलें कड़वा ही बोलें
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
दर्पण में उनका चेहरा है, उस पर भौंहें तान रहे हैं

हर युग में कान्हा जन्मे हैं, हर युग में शिशुपाल हुए हैं
जिस धरती पर बुद्ध चले थे, उस पर अंगुलिमाल हुए हैं
दशरथ ने मर कर समझाया, अनुचित के आगे मत झुकना
जब-जब कोपभवन की मानी, तब-तब युग बदहाल हुए हैं
कभी सुदर्शन से समझाए
कभी समर्पण के पथ आए
तम के चेले कभी, कहीं भी
सत के आगे टिक ना पाए
सच का जीवित रहना तय है, इसके बहुत प्रमाण रहे हैं
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं

ईर्ष्या ढूंढ रही है कमियाँ, प्रतिभा बस बढ़ती जाती है
तिनके तकते रह जाते हैं, और लता चढ़ती जाती है
बिन समझे कहने वालों ने, माटी सनी हथेली देखी
लेकिन लगन उसी माटी से, अमृत घट गढ़ती जाती है
अपनों को दुत्कार चुके हैं
यश-वैभव सब हार चुके हैं
एक ज़रा सी ज़िद्द के आगे
पूरा कुल संहार चुके हैं
ख़ुद के हित का ज्ञान नहीं है, कहने को विद्वान रहे हैं
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन

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