Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ताननेवाले जमाने भर की तोपें तान लें
हौसला बारूद से डरता नहीं, ये जान लें
छोड़िये साहिब, खुशी से कौन मरता है भला
दर्द ही हद से गुजर जाए तो फिर भी मान लें
जो कभी हमको कहा करते थे अपनी जिंदगी
खुदकशी के मूड में हों तो हमारी जान लें
देख लीजे कुछ हमारे पास बचने पाए ना
ख्वाब लें, उम्मीद लें, अल्फाज लें, अरमान लें
इस भरे बाजार में हम भी बहुत बेचैन हैं
वे पुराना लूट लें तो हम नया समान लें
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आओ अपने घर में सूरज का इक अंश उठा लाएँ
आओ जीवन के अंधियारे का विध्वंस उठा लाएँ
जिस सूरज की स्वर्णिम किरणें धरती को दमकाती हैं
जिस ऊर्जा से पोषित होकर सब फसलें लहराती हैं
उस सूरज की एक किरण का जगमग वंश उठा लाएं
जो सूरज की ऊर्जा वैदिक मंत्रों में ढल सकती है
वो ऊर्जा घर के भीतर बिजली बनकर जल सकती है
यंत्रों के इस मानसरोवर का इक हंस उठा लाएं
ये ऊर्जा मानवता के हित ईश्वर का उपहार सखे
इस पर कुछ अवरोध नहीं ना सिस्टम ना सरकार सखे
बिजली के उस इंतज़ार का सार्थक ध्वंस उठा लाएं
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मैं तुम्हारी आँख में कुछ स्वप्न अपने आँज आया
तुम मेरे सपनों को अपने आँसुओं में मत बहाना
जब तुम्हें आभास हो, गंतव्य दुर्गम हो रहा है
या सफलता के प्रयासों के जकड़ ले पाँव कोई
राह का मौसम गुलाबी हो करे कर्तव्य विस्मृत
या तुम्हें आकृष्ट कर बैठे, मनोहर गाँव कोई
तब घड़ी भर देखना दर्पण में अपनी पुतलियों को
तब घड़ी भर इस अनोखे स्वप्न से आँखें मिलाना
एक दिन तुमको समूची साधना मिथ्या लगेगी
एक दिन उलझाएगी तुमको इसी पथ की पहेली
एक दिन थककर तुम्हारे पाँव भी दुखने लगेंगे
एक दिन तुम भी चलोगी साधना-पथ पर अकेली
बस उसी दिन जान लेना, है बहुत नज़दीक मंज़िल
बस उसी दिन और भी जीवट जुटाकर पग बढ़ाना
मन्त्र हैं निष्प्राण उनमें साधना के प्राण भर दो
शब्द को अनुभूतियों का स्पर्श दो, वह जी उठेगा
जिस समंदर ने तुम्हारे वक़्त की नैया डुबोई
चंद्रमा की ओर बढ़ता ज्वार उससे ही उठेगा
जब नई आभा छलक आए सफलता के नयन में
तब नयन की कोर पर उसको सजाकर मुस्कुराना
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सत्य तो लगती नहीं, परलोक की अवधारणा पर
आपसे मिलने की हर इक आस इस ही पर टिकी है
हाथ की रेखाओं का कोई नहीं हो अर्थ फिर भी
आपसे आजन्म दूरी की कथा इनमें लिखी है
कुछ नहीं होता है करवा चौथ के निर्जल व्रतों से
किन्तु अपनी आस्था को घोल देना अर्घ्य जल में
पत्थरों के कान सुन पाते नहीं हैं प्रार्थनाएँ
किन्तु संशय आप मत रखना तपश्चर्या के बल में
आस्था होगी विजय, तो मान्यता यह ध्वस्त होगी
है वही सच, जो मेरी आँखों के आगे भौतिकी है
इस जनम में चूक हो जाए किसी सम्बन्ध की तो
कोई भव उसकी सटीकी के लिए होता तो होगा
जिस कृषक ने शुष्क भू पर धान रोपी मूढ़ता से
वह कभी बिल्कुल सही फसलें कहीं बोता तो होगा
कर्मकाण्डों की निठुरता से सदा ही क्षुब्ध हूँ मैं
किन्तु व्यवहारिक जगत् में भावना सस्ती बिकी है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं
मुझ पर रस्मों का ज़ोर नहीं
मेरे सपनों को बांध सके
ऐसी दुनिया में डोर नहीं
कोमल हूँ कन्यापूजन में
चण्डी हूँ दुष्टों से रण में
जब ठान लिया तो मिला दिया
धरती को अम्बर से क्षण में
मुश्किल की कोई भी आंधी
मुझको सकती झकझोर नहीं
मेरे सपनों का देश अलग
मेरा ख़ुद का परिवेश अलग
सारी दुनिया की बात अलग
मेरे मन का संदेश अलग
कुछ भी सुनकर चुप रह जाऊँ
ऐसा अब होगा और नहीं
अर्पण की घड़ी अगर आई
अपना सर्वस्व लुटा दूंगी
धोखे से छलना चाहोगे
भारी विध्वंस मचा दूंगी
हर पल कोमल भी नहीं मगर
हर पल को बहुत कठोर नहीं
आँखों में सपना पलता है
दिल हिरण चैकड़ी भरता है
क़दमों में बिजली सी तेज़ी
मन में बेहद चंचलता है
मैं दौड़ जिसे छू नहीं सकूं
ऐसा तो कोई छोर नहीं
✍️ चिराग़ जैन