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आसरा

लड़खड़ाकर गिरे नहीं होते गर तेरे आसरे नहीं होते कमनसीबी का दौर है वरना हम भी इतने बुरे नहीं होते ✍️ चिराग़...

मिरी आँखों का मंज़र देख लेना

मिरी आँखों का मंज़र देख लेना फिर इक पल को समन्दर देख लेना सफ़र की मुश्क़िलें रोकेंगी लेकिन पलटकर इक दफ़ा घर देख लेना किसी को बेवफ़ा कहने से पहले ज़रा मेरा मुक़द्दर देख लेना बहुत तेज़ी से बदलेगा ज़माना कभी दो पल ठहरकर देख लेना हमेशा को ज़ुदा होने के पल में घड़ी भर ऑंख भरकर देख...

इक पहेली हूँ

धूप में निखरोगे मेरी छाँव में जल जाओगे इक पहेली हूँ, कहाँ तुम ढूंढने हल जाओगे बर्फ़-सी ठंडक तो उसकी बात में होगी मगर छू लिया जिस पल उसे उस पल ही तुम जल जाओगे विषधरों के दंश का संकट भी झेलोगे ज़रूर जब कभी लेने किसी जंगल से संदल जाओगे धूप बनकर तुम दलानों में पसरते हो मगर...

कल की छोड़ो, कल का क्या है

ऐसा मत सोचो कि जब सब सोचेंगे तब सोचेंगे पहले हम सोचेंगे तब ही तो इक दिन सब सोचेंगे आख़िर बंदूकों से ही जब सारे काम निकलने हैं आयत रटने से क्या हासिल अहले-मक़तब सोचेंगे दो और दो को पाँच बनाने की तरक़ीबें क्या होंगीं इस उलझन का हल कुर्सी पर बैठे साहब सोचेंगे आज जिन्हें...

क़ुसूर

सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं क़ुसूरवार हूँ कोई गुनाह्गार नहीं मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है मुझे किसी के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं ✍️ चिराग़...
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