Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
एक मैं, कितना झमेला
विश्व मुझ जैसों का मेला
इस समूची सृष्टि को जो
साध लेता है अकेला
बस उसी के खेल का विस्तार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
मैं वही जिसने जनम के साथ इक परिवार पाया
हार हो या जीत हो, परिवार सब स्वीकार पाया
जब जहाँ जो भी मिला सब भोगकर जीता रहा हूँ
प्यार और मनुहार और अधिकार और सत्कार पाया
जब मिले दुत्कार तो दुत्कार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
मंच पर हूँ, मंच का मालिक मगर बेशक नहीं हूँ
पात्र भर हूँ, किन्तु मैं इस स्वांग का लेखक नहीं हूँ
जब मिले जो भूमिका, भरपूर उसको खेलता हूँ
क्यों कहानी की करूँ चिंता मैं निर्देशक नहीं हूँ
रोग का हो दृश्य तो उपचार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
हर कोई है इस जहाँ में, हर किसी का इक जहाँ है
हर किसी को इस कथा का केंद्र होने का गुमाँ है
कौन जाने कौन किसका कब कहाँ पर्दा गिरा दे
मैं अभी तक मंच पर हूँ ये कृपा भी कम कहाँ है
जो निरंतर हो रहा उपकार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
दिल बच्चा है; सपनों के संग पिकनिक करता रहता है
बूढ़ा एक दिमाग़ हमेशा चिकचिक करता रहता है
वक़्त; जिसे तुम पूरी दुनिया का सरताज समझते हो
मेरी इक दीवार घड़ी में टिकटिक करता रहता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
पीर से कह दो
मुझे आँसू पचाना आ गया है
अब किसी आघात से घायल नहीं हो पाऊंगा मैं
प्यास को अपने पसीने से बुझाना आ गया है
दोपहर की धूप से बिल्कुल नहीं घबराऊंगा मैं
भाग्य के दरबार से संत्रास लेकर लौट आया
आस के आवास से उपहास लेकर लौट आया
मैं स्वयं में इक नया विश्वास लेकर लौट आया
अब किसी के सामने झोली नहीं फैलाऊंगा मैं
अब समस्या भी मुझे भयभीत कर सकती नहीं है
नियति अब कुछ भी मेरे विपरीत कर सकती नहीं है
हार ने जो कर दिया, वह जीत कर सकती नहीं है
युध्द के परिणाम पर हर हाल में मुस्काऊंगा मैं
आपदा में धीर का व्यवहार करना आ गया है
मुस्कुरा कर दर्द का उपचार करना आ गया है
अब मुझे हर वार को स्वीकार करना आ गया है
डूब कर भी धार के उस पार तो लग जाऊंगा मैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ओ ईश्वर कहलानेवाले
सारा विश्व बनानेवाले
क़िस्मत के पर्दे में छुपकर
सारा खेल रचानेवाले
अपना नाटक ख़ुद ही खेले मानव को इतना अवसर दे!
कर पाए, तो इतना कर दे!
तेरी मर्ज़ी होती है तो हम इस धरती पर आते हैं
तेरी मर्ज़ी से जीते हैं, तू कहता है, मर जाते हैं
तेरे हाथों की कठपुतली
जैसे चाहा वैसे उछली
पल भर को ढीली भी कर दे
हर इक कठपुतली की सुतली
एक दफ़ा पुतलों की डोरी, पुतलों के हाथों में धर दे
कर पाए, तो इतना कर दे!
सुनते हैं तूने ही सारी दुनिया को वरदान दिए हैं
कहने को इक जीभ बनाई, सुनने को दो कान दिए हैं
आवाज़ें सुंदरतम भर दीं
साँसों तक में सरगम भर दी
हर ख़ामोशी के ज़ख़्मों में
तूने सुर की मरहम भर दी
जो मन में ताण्डव करते हैं, उन शब्दों को भी तो स्वर दे
कर पाए तो इतना कर दे!
हो सकता है ऐसा हो तो, हम जीवन को दुःख से भर लें
हो सकता है यह सब कुछ हम शायद तुझसे बेहतर कर लें
या तो मन से जी लेने दे
या फिर मन से मर लेने दे
जो होगा देखा जाएगा
हमको मन की कर लेने दे
सुख-दुख जो भी हो, वो होगा खुद हासिल करने का वर दे
कर पाए तो इतना कर दे!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
मुम्किन है कोई ख़ौफ़ मुझे थाम ले कहीं
ऐ हौसले तू दो घड़ी आराम ले कहीं
मैं मुश्किलों से टूट ही जाऊँगा शौक़ से
हिम्मत तो साथ छोड़ने का नाम ले कहीं
✍️ चिराग़ जैन