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नभ तक पसरे अंधियारे में
अनहोनी के भय से आगे
आँखों में बस एक सपन है
इस अंधे दुर्दांत तिमिर में
जिसकी किरण उजाला भर दे
वो दीपक मेरा अपना हो

वृक्ष सभी निस्पंद खड़े हों
निविड़ निशा का सन्नाटा हो
श्वानों का मातम सुन-सुनकर
अंतर्मन बैठा जाता हो
देह गलाती शीतलहर में
झींगुर का स्वर दहलाता हो
भयपीड़ित अस्तित्व सहमकर
दम साधे बढ़ता जाता हो
ऐसी कालनिशा से बचकर
शुभ-वेला का इंगित पाकर
श्वासों में उजियार उगाकर
जो जग के जीवन को स्वर दे
वो कलरव मेरा अपना हो

जीवन रेखा लुप्त हुई हो
शनि रेखा कटती जाती हो
गृह-नक्षत्र विरुद्ध खड़े हों
लग्न अशुभ युति दिखलाती हो
शनि-मंगल की युति वक्री हो
चंद्र ग्रहण हो, सूर्य अस्त हो
गुरु-चाण्डाल त्रिकोण स्थित हो
बुध पीड़ित हो, शुक्र त्रस्त हो
कर्मों के फल की चिंता तज
विधिना के लेखे विस्मृत कर
मेरे हित हर नियम भुला कर
जो धरती को अम्बर कर दे
वो ईश्वर मेरा अपना हो

✍️ चिराग़ जैन

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