नाम को गाली बनाएँगीं नस्लें
ये नफ़रतों का ज़हर मत उलीचिये साहिब
तुम्हारे नाम को गाली बनाएँगीं नस्लें
✍️ चिराग़ जैन
ये नफ़रतों का ज़हर मत उलीचिये साहिब
तुम्हारे नाम को गाली बनाएँगीं नस्लें
✍️ चिराग़ जैन
रौशनी पर तो किसी का भी इख़्तियार नहीं
जिस जगह रास्ता देखेगी, चली आएगी
✍️ चिराग़ जैन
हम एक सुदृढ़ लोकतंत्र से वापस कबीलाई समाज व्यवस्था की ओर अग्रसर हैं। और सही कहें तो अग्रसर भी नहीं ‘उग्रसर’ हैं।
हर कबीले में लड़ाकों की और अपराधियों की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। लेकिन हर क़बीले के अपने नियम हैं। हिन्दू क़बीले का कोई बलात्कारी यदि मुस्लिम क़बीले की किसी लड़की को दबोच लेता है, तो यह गुनाह नहीं है लेकिन यदि हिन्दू क़बीले का कोई लड़का हिन्दू क़बीले की ही किसी लड़की का बलात्कार करता है तो क़बीले को सवर्ण-दलित, कांग्रेस-भाजपा या शैव-वैष्णव के आधार पर विभक्त होकर आपस में लड़ना होगा। जिस वर्ग में लड़की आएगी, उस वर्ग के लोग अपनी क्षमता के अनुरूप दंगा, धरना, प्रदर्शन, रैली, तोड़फोड़, मारपीट, बदले की कार्रवाई, क्रिया की प्रतिक्रिया अथवा कैंडल मार्च करेंगे। ठीक इसी तरह जिस वर्ग में बलात्कारी आएगा उस वर्ग के लोग विपरीत पक्ष के किसी बलात्कारी की पुरानी फाइल को सनद बनाकर अपने प्रत्याशी के पक्ष में तर्क देगा या फिर लड़की को चरित्रहीन सिद्ध करके अपने प्रत्याशी को कर्मफलदायक घोषित कर देगा।
स्त्री-पुरुष के विभाजन से प्रारम्भ हुआ यह क्रम अमीर-ग़रीब, अगड़ा-पिछड़ा, कांग्रेसी-भाजपाई, हिंदी-मराठी-तमिल, राष्ट्रवादी-वामपंथी-सेक्युलर, मोदी खेमा-आडवाणी खेमा और साक्षर-निरक्षर तक विकसित हो चुका है। विभाजन के इस क्रम के विकास की कोई सीमा नहीं है। यह तब तक ज़ारी रह सकता है जब तक मनुष्य नितांत एकाकी न हो जाए। हर व्यक्ति स्वयं में कबीला होगा। हर व्यक्ति का निजी संविधान होगा जिसकी धाराएँ प्रतिदिन उसके अनुसार बदलती रहेंगी।
राम, कृष्ण, पैग़म्बर, ईसा, नानक, महावीर, बुद्ध, गांधी, नेहरू, अम्बेडकर और पटेल जैसे कुछ लोग कबीलाई संस्कृति के इस विकास क्रम को भंग करके मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की फालतू बातें करने लगे तो हमने उनकी बातें अनसुनी करके उनके चित्र को ध्वजा बनाकर नए क़बीले बना लिए।
न्याय, कानून, मनुष्यता और करुणा को नपुंसक करके हम अनवरत विभक्त हो रहे इस स्वर्णयुग की आभा बढ़ा रहे हैं। बहुत जल्दी हम प्रति व्यक्ति एक क़बीले तक की व्यवस्था देख पाएंगे; लेकिन इस बीच हमें यह सावधानी बरतनी होगी कि तर्क, चिंतवन, निष्पक्षता, मनुष्यता और सहृदयता के शब्द लेकर कोई इस राह में अड़चन बनना चाहे तो उसे हर प्लेटफॉर्म पर गालियाँ बकनी आवश्यक है अन्यथा एकाकी खड़े रह जाने का सपना कभी पूरा न हो सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
युग बीत गए साम्प्रदायिक सद्भाव की बातें करते हुए। धार्मिक कट्टरता की अग्नि में मानवीय मूल्यों के संरक्षण की संभावनाएँ भस्म हो जाती हैं। पुरानी पुस्तकों के सफ़हे पीले पड़कर झड़ने लगे हैं। उन्हें पुनर्मुद्रित न कराया गया तो उनका नामोनिशान भी न बचेगा। मंदिरों-मस्जिदों ने खंडहर में तब्दील होकर बताया है कि समय-समय पर जीर्णाेद्धार न किया जाए तो सब कुछ विलीन हो जाता है।
मूर्तियाँ खण्डित हो जाएँ तो उन्हें वेदी से हटाकर संग्रहालय में रख लेना आवश्यक हो जाता है। मुस्कुराहट मनुष्य का सहज स्वभाव है। जो संबंध मनुष्य के इस स्वभाव में विघ्न डालेगा; मानव उसे बिसार देगा।
किसी संत, मौलवी या धार्मिक व्यक्ति के कुकृत्य पर शर्मिंदा होने से बेहतर है कि मस्तिष्क और मन की खिड़कियों को खोलकर यह विचार करें कि आख़िर क्या कारण है कि त्याग और आत्म कल्याण के पथ पर बढ़ते साधक को भ्रष्ट होने की परिस्थितियाँ आकृष्ट कर लेती हैं। या फिर हमारी साधना की दिव्य वीथियों में धूर्त मस्तिष्कों के प्रवेश का कौन सा द्वार बन गया है; इसकी पड़ताल करनी होगी। किन्तु यह पड़ताल धर्म के अनुयायी होकर नहीं की जा सकती। इसके लिए धर्म का शुभचिंतक होना होगा।
‘राजनीति धर्म को भ्रष्ट करती है’ -यह वाक्य इस युग का सबसे बड़ा भ्रम है। मानव की आत्मा के विकास का कोई संस्थान राजनीति जैसी किसी क्षणिक बुद्धि से प्रभावित होकर अपने पथ से भटक जाए; इसका अर्थ जिसे आप धर्म कह रहे हैं, वह एक छल है। ध्यान रखना, जो डिग जाए वह धर्म नहीं है।
हम प्रत्येक युग की समाप्ति पर धर्म के परिष्करण हेतु महाकुम्भ का आयोजन करनेवाले भारतीय हैं। हम गुरु परंपरा की शुचिता बनाए रखने के लिए एक ग्रंथ को गुरु मान लेनेवाले भारतीय हैं। हम अपने ही शिष्य को अपने आसन पर विराजित कर उसके चरणों में बैठनेवाले भारतीय हैं। हम राष्ट्रधर्म पर मातृधर्म निछावर करनेवाले भारतीय हैं। हम कलिंग में रक्तस्नान करने के उपरांत धवल वस्त्र दीक्षा धारण करनेवाले भारतीय हैं। हम कुरुक्षेत्र में काल-पात्र-स्थान के अनुरूप क्षण-क्षण नियम बदलनेवाले भारतीय हैं। हम फ़क़ीरों की याद में फूलों की चादरें संजोनेवाले भारतीय हैं।
जिन लोगों को धर्म अपनाना था, वे मौन हो गए। उन्हें शब्द अनावश्यक लगने लगे। उन्हें बखान की ज़रूरत ही महसूस न हुई। लेकिन जिन्हें धर्म भुनाना था, उन्होंने शोर मचाना शुरू किया। नारे लगानेवाले और शोर-शराबा करनेवाले लोग धर्म को भुनानेवाले लोग हैं। किसी भी संप्रदाय के प्रवर्तक ने, किसी भी पंथ के उद्घोषक ने किसी को पकड़कर अपने मार्ग से नहीं जोड़ा। उसके आचरण में ऐसा चुम्बक बन गया कि लोग स्वतः ही खिंचे चले आए। महावीर, बुद्ध, नानक, राम, कृष्ण, पैगम्बर, जीसस, परमहंस और विवेकानंद जैसे लोगों ने मुनादी नहीं करवाई कि उनके पंथ पर चलो, उन्होंने तो बस स्वयं चलना शुरू कर दिया। फिर गाँव के गाँव उनके पीछे हो लिये। उन्होंने कोई पोस्टर नहीं छपवाया कि आज यहाँ प्रवचन होगा। वे तो बस, यकायक बोलने लगे होंगे, ख़ुद से बतियाने लगे होंगे। फिर यह होश ही कहाँ होगा कि हज़ारों लोग सुन रहे हैं या दस-बीस। उन्हें किसी को सुनाना ही न था। वे तो बस बतिया रहे थे स्वयं से। उन्होंने किसी को दिखाना थोड़े ही था, वे तो स्वयं को देखने में व्यस्त रहे।
धर्म का नाम लेने पर अधर खिल जाएँ, आँखें चमक उठें, सीना चौड़ा हो; यह तो ठीक है किंतु उसी नाम पर माथे में बल पड़ जाएँ, चेहरे पर चिंता उभर आए तो स्थिति शोचनीय है। अपने धर्म पर अभिमान करना आस्था है किन्तु अन्य धर्मों को अपमानित करना कट्टरता है। त्रिकूट पर्वत पर खच्चर चलाते मुल्ला जी का परिवार एक हिन्दू देवी की आस्था से पलता है। जिस चद्दर पर बिखरे मोती चुन-चुनकर राखियाँ बुनी जाती हैं उन पर कभी-कभी नमाज़ भी पढ़ी जाती है। जिन बगीचों में मज़ारों पर चढ़नेवाले फूल उगते हैं उन्हीं की कुछ क्यारियाँ रामजी की मूर्ति पर चढ़नेवाली मालाएँ भी उगाती हैं।
हैरत की बात ये है कि कर्बला में मुहम्मद का नवासा जिनसे लड़ रहा था, वे लोग हिन्दू नहीं थे और कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु जिनसे जूझ रहा था, वे सातों महारथी मुस्लिम नहीं थे। जो पंचवटी से सीता को चुरा ले गया था, वह शैव ब्राह्मण था और जिन्होंने मीरा को विष का प्याला दिया था वे सब हिन्दू राजपूत थे।
सृष्टि के आदि से चलता आया सुर और असुर संग्राम; रामायण काल का शैव-वैष्णव युद्ध; महाभारत काल का कौरव-पाण्डव संग्राम; जैन-बौद्ध; ब्राह्मण-बौद्ध; मौर्य; चोल; मंगोल ये सब तो लगभग एक ही वृक्ष की शाखाएँ थीं। राजपूतों की आपसी लड़ाइयाँ, रजवाड़ों की निजी मुठभेड़ें; इन सबमें धर्म कहाँ और कब जुड़ गया यह बिंदु इतिहास से नदारद है। सेना में लड़नेवाले बेटे धर्म पूछ कर दुश्मन पर गोली नहीं चलाते।
हम यदि अपने सामाजिक व्यवहार को करुणा और मानवता की छलनी से छान लेंगे तो कोई राजनैतिक अवसरवादी हमें इमारतों की जाति के प्रश्न में उलझाकर थाली से नदारद हुई रोटियों के सवाल से विमुख न कर सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
भारत की पूर्णता का भान करने के लिए
वेद की ऋचाओं का सुज्ञान भी ज़रूरी है
मंदिरों की संध्या आरती के सुर मुख्य हैं तो
मस्जिदों से उठती अजान भी ज़रूरी है
कातिक, असौज, माघ, सावन भी अहम हैं
मीठी ईद वाला रमज़ान भी ज़रूरी है
नानक, कबीर, बुद्ध, महावीर, ईसामसीह
राम भी ज़रूरी, रहमान भी ज़रूरी है
मीरा का मुरारी, जसोदा का नंदलाल और
राधिका के सांवरे से कंत भी समान हैं
जन्म से मरण तक कोई-सा भी पंथ रहे
आदि भी समान और अंत भी समान हैं
बैरागी, फ़क़ीर, ब्रह्मचारी, त्यागी, पीर, बाबा
सिद्ध, ऋषि-मुनि, साधु-संत भी समान हैं
यंत्र भी समान, तंत्र-मंत्र भी समान और
भीतर से सारे धर्मग्रंथ भी समान हैं
झाड़-फूंक वाले टोने-टोटके भी अपने हैं
जड़ी-बूटी वाला वो इलाज भी हमारा है
शंख फूंकने से बाँसुरी की तान तक दक्ष
शस्त्र भी हमारा और साज भी हमारा है
शोणित के पान की परंपरा हमारी ही है
क्षमादान करता रिवाज़ भी हमारा है
गंगा जी का तट मणिकर्णिका हमारा ही है
जमुना किनारे बना ताज भी हमारा है
युध्द से विरक्त हो के संत जो बना था वीर
मौर्यवंशी शासक महान भी हमारा है
भोज, अकबर, शेरशाह, रणजीत, हर्ष,
महाराणा, पौरुष, चौहान भी हमारा है
भारतीय दर्शन जान के सुदर्शन
शून्य पे जो बोला था वो ज्ञान भी हमारा है
भारत हमारा, आर्यावर्त भी हमारा ही है
इंडिया हमारा, हिंदुस्तान भी हमारा है
✍️ चिराग़ जैन