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पिंक इस दौर की एक बेहतरीन फ़िल्म है। लेकिन कुछ अर्थों में मुझे फ़िल्म देखकर ऐसा लगा कि एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा स्त्री-विमर्श की आड़ में छुपकर रह गया है। फ़िल्म में पुरुष मानसिकता और नारी की स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह उजागर होता है कि इस देश का पुलिसिया तंत्र किस तरह काम कर रहा है। थाने में एक पहुंच विहीन नागरिक के साथ क्या व्यवहार होता है। पीड़ित व्यक्ति को किस तरह पुलिसवाले डराते हैं। किस भाषा में वे नागरिकों से बात करते हैं। कैसे रसूखदार लोगों की सेवा की जाती है। कैसे बैक डेट में रिपोर्ट लिखी जाती है। कैसे चार्जशीट बनाई जाती है। और भी ढेर सारे सवाल फ़िल्म में छूट से गए हैं।
मुझे लगता है कि पुलिसिया भ्रष्टाचार और सिस्टम की नपुंसकता पर यदि चर्चा उठे तो किसी नागरिक को न्याय की गुहार के लिए न तो स्त्री बनना पड़ेगा, न पुरुष; न उसे दलित बनना होगा न सवर्ण, न उसे हिन्दू होकर न्याय मांगना होगा न मुसलमान होकर इन्साफ की गुहार लगानी होगी।
इंसाफ़ सिर्फ सही अथवा ग़लत की परिभाषा जानता है। और उस इन्साफ के रखवाले हमारे थाने किसी नेता, किसी उद्योगपति या किसी बाहुबली के इशारों की नचैया बनकर रह गए हैं। ऐसे में यदि कोई सरकार पुलिस को जनता के हित में काम करने के लिए बाध्य कर सकेगी तो किसी रसूखदार टपोरी की इतनी हिम्मत नहीं होगी कि वह कानून को जेब में रखकर विटनेस बॉक्स में खड़ा हो।

✍️ चिराग़ जैन

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