चोर का साझेदार
चोर को चोरी करते देख भी जो शोर न मचा पाए, या तो वह अपनी चोरी छुपाने में व्यस्त है या फिर चोर का साझेदार है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
चोर को चोरी करते देख भी जो शोर न मचा पाए, या तो वह अपनी चोरी छुपाने में व्यस्त है या फिर चोर का साझेदार है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
जो लोग पहचान से काम पाना चाहते हैं, उन्हें काम से पहचान नहीं मिलती।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
वो दौर गये जब लोग वसीयतों में ज़मीन-जायदाद छोड़कर जाते थे, आजकल तो चार सोशल मीडिया अकाउंट्स, कुछ हज़ार फॉलोवर्स और दस-पाँच ब्लॉक्ड प्रोफाइल्स से ज़्यादा किसी के पास कुछ नहीं है छोड़ने को…
सफेद बाल और अरथी देखकर वैराग्य घटित होनेवाली कहानियां सुनकर बड़े हुए थे, पर अब पता चला कि व्हाट्सएप-इंस्टाग्राम थोड़ी देर को बन्द हो जाए तो जीवन निरर्थक लगने लगता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose, Quotation
राजनीति की स्क्रिप्टिंग और प्रशासन का अभिनय देखकर लगता है कि उत्तर प्रदेश में फ़िल्म इंडस्ट्री बनाने का विचार निराधार नहीं था।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
जो बड़ा होता है, उसे बताना नहीं पड़ता
जिसे बताना पड़ता है, वो बड़ा नहीं होता
जो अपना होता है, उसे सफ़ाई नहीं देनी पड़ती
जिसे सफाई देनी पड़े, वो अपना नहीं होता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Purushottam, Quotation
रामजी ने जिस मुहूर्त में कोई शुभकार्य किया, ग्रहों के उसी संयोग को हम शुभ मुहूर्त मानते थे। आज राजनीति ने हमें इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि रामजी के मंदिर के लिए शुभ मुहूर्त का टंटा पड़ रहा है।
अरे, उनका नाम लेकर तो जिस मुहूर्त में ईंट रख दो, वही शुभ है मूढ़ो! भूल गए क्या, उनके नाम से तो पत्थर तिर गए थे! पर उस समय राम जी के सब कारज इसलिए सिद्ध हो जाते थे, क्योंकि तब नल-नील की पूरी ऊर्जा पुल बनाने में केंद्रित थी, यदि वे भी राजनीति कर रहे होते तो चार सीटें फालतू मिलने पर रावण के हाथों बिक जाते और राम जी के आगे नाटक करते रहते कि ‘पुल वहीं बनाएंगे’!
✍️ चिराग़ जैन
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