Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
अहमपुरी के उपद्रव से व्यथित होकर दशरथ कोपभवन में बैठ गए। मन्थरा और आर्यसुमन्त ने बहुत समझाया किन्तु दशरथ न माने। कोई उपाय न सूझने पर कैकेयी ने उन्हें वचन दिया कि अहमपुरी के राजकुँवर को सिंहासन से उतार दिया जाएगा। दशरथ, कैकेयी तथा मंथरा पुष्पक विमान में बैठ अहमपुरी की ओर उड़ चले।
मानवता के पक्षधर तथा सत्ता के निर्लाेभी दशरथ की भावुकता को कैकेयी भली-भाँति समझती थी। आधे रास्ते में वह दशरथ के पास जाकर बोली- ‘स्वामी, मैंने जीवन भर तुम्हारी सेवा की है। कभी कुछ नहीं मांगा। आज एक वरदान मांगने की हिम्मत कर रही हूँ, राजकुँवर को सिंहासन से मत उतारो।’
कैकेयी की कुटिलता समझकर भी भावुक दशरथ ने मौन स्वीकृति दे दी। अहमपुरी का शासक बच गया। कैकेयी ने उसे अभयदान दे दिया। दशरथ आत्मग्लानि से भरकर दुर्बल हो गए। कुछ समय पश्चात उस राजकुँवर ने राजमहल में से दशरथ का पत्ता साफ़ कर दिया और कैकेयी तथा मन्थराओं को मार्गदर्शक बनाकर स्वयं शासक बन बैठा।
कैकेयी ने जब-जब उसे अपने उपकार याद दिलाने का प्रयास किया तब-तब उसने कैकेयी को उसी के अभयदान का सर्टिफिकेट दिखाकर चुप करा दिया। अब राजकुँवर जान-बूझकर कैकेयी, मंथरा, आर्यसुमन्त तथा ऋषि वशिष्ठ का सार्वजनिक अपमान करने लगा। एक दिन आर्यसुमंत राजकुँवर के व्यवहार से आहत होकर राजमहल छोड़ गए। कुछ समय पश्चात मंथरा भी परेशान होकर कथा से ओझल हो गई।
शत्रुघ्न ने इस निरंकुशता का विरोध किया किन्तु कैकेयी और ऋषि वशिष्ठ मौन रहे। एक दिन जब राजभवन में कक्षों का पुनर्वितरण हो रहा था तो अचानक पता चला कि कैकेयी और ऋषि वशिष्ठ को न केवल कक्ष सूची से वंचित किया गया अपितु राजभवन के बाहर चबूतरे पर भी बैठने की अनुमति नहीं दी गई।
आज कैकेयी उस दिन को कोस रही है जब उसने दशरथ से छल करके राजकुँवर को अभयदान दिलवाया था। बाबा तुलसी ने लिखा भी है- ‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा जो जस करहिं तसहु फल चाखा।’
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
किसी एक घटना से पूरे व्यक्ति का, किसी एक व्यक्ति से पूरे समुदाय का, किसी एक समुदाय से पूर समाज का और किसी एक समाज से पूरे राष्ट्र का चरित्र आकलन करना हमारा अभ्यास है। इस अभ्यास में हम तर्कहीन हो जाते हैं। प्रत्येक बहस में हम अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कूदते हैं और जब बुद्धिमत्ता बहस से पहले समाप्त हो जाती है तो ऐसे तर्क करने लगते हैं जिनसे सबको पता चल जाए कि हम केवल बुद्धिमत्ता के भरोसे बहस में नहीं आए हैं, देर तक टिके रहने के लिए हमारे पास मूर्खता भी है।
एक सांसद ने अपनी पार्टी के ही एक विधायक का जूतों से अभिनन्दन कर दिया। विवाद का कारण वही था- ‘तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद कैसे!’ इस सम्मान समारोह में बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुशासन की आहुति दी गई। इस घटना को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते समय लोग पूरी पार्टी पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगे। यह ग़लत बात है। किसी भी एक व्यक्ति के आचरण से पूरी पार्टी का आचरण तय नहीं किया जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति पूरी विचारधारा का चरित्र नहीं हो सकता। ऐसा करना अपने आकलन के साथ बेईमानी करना है।
यह हम पूर्व में भी करते रहे हैं। एक मणिशंकर अय्यर के बयान से पूरी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। एक साध्वी के बयान से पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। इस आचरण के कारण लोकतंत्र का जनमत भीड़ के उन्माद में परिवर्तित हो जाता है। यह हमने जातियों में भी किया है।
एक गांधी, महात्मा हो गए तो सारे गांधी ख़ुद को संत बताने पर उतारू हो गए। एक मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो सारे मोदी देश का पैसा लेकर घूमने निकल लिए। ऐसा करना ग़लत है। एक राहुल गांधी पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं हैं। एक नरेंद्र मोदी पूरी भाजपा का चरित्र नहीं हैं। एक लोहिया के वैचारिक कुनबे में सारे लोहिया जन्म नहीं लेते।
अम्बेडकर के बैनर तले इकट्ठा होकर लोग अम्बेडकर के बनाए कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। लोहिया की विरासत को बपौती माननेवाले सत्ता की वसीयत को लेकर सिर फुटव्वल करते मिले। भगवा पहनने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता और चरखा चलाने से कोई गांधी नहीं हो जाता। इस बाह्य ढोंग के सहारे ही सियासत की गाड़ी चलती है।
हम सब जानते हैं कि मुसलमानों के मंच पर टोपी पहनकर चढ़नेवाले लीडर, हिंदुओं के मंच पर पहुँचते ही रामनामी ओढ़ लेते हैं। हम सबको मालूम है कि राहुल गांधी केवल वोट पाने के लिए दलितों के घर खाना खाने गए। हम सबको पता है कि सफाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने चुनावी चाल चली है। हम सबको सब पता है। हम सब कुछ जानकर भी इस अभिनय को चरित्र के झरोखे से निहारते रहते हैं।
राहुल गांधी बैंगकॉक जाते हैं, नरेंद्र मोदी मिसेज अम्बानी से हाथ मिलाते हैं, राहुल गांधी ने शादी नहीं की, नरेंद्र मोदी ने पत्नी को छोड़ दिया, राहुल गांधी को भाषण देना नहीं आता, नरेंद्र मोदी ने अमरीका के प्रेजिडेंट को झूला झुलाया, राहुल गांधी के कुर्ते की जेब फटी है, नरेंद्र मोदी का सूट बहुत महंगा है …इन मुद्दों पर हम वोट देते हैं। एक दरवाज़े से निकलता हुआ हर शख़्स एक जैसा हो, यह सम्भव नहीं है। एक बगीचे में उगनेवाले सारे फूल एक जैसे नहीं होते। कई बार चमेली भी केवल झाड़ बनकर रह जाती है और कई बार नागफनियों पर भी खूबसूरत फूल खिल जाते हैं।
एक ही व्यक्ति एक विषय पर सही और दूसरे विषय पर ग़लत हो सकता है। लेकिन हम इतने ज़िद्दी हैं कि या तो किसी को शत प्रतिशत सही मानेंगे या शत प्रतिशत ग़लत। हर शख़्स में, हर समुदाय में, हर पंथ में, हर दल में, हर विचारधारा में, हर आंगन में, हर देश में, हर घटना में कुछ सही और कुछ ग़लत ज़रूर होता है। इन दोनों को अलग-अलग न किया जाए तो अंधभक्ति और अंधविरोध जन्म लेता है, सुचारु व्यवस्थाएँ नहीं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम घटनाओं का सामान्यीकरण करने के अभ्यस्त हैं। किसी एक घटना से पूरे व्यक्ति का, किसी एक व्यक्ति से पूरे समुदाय का, किसी एक समुदाय से पूर समाज का और किसी एक समाज से पूरे राष्ट्र का चरित्र आकलन करना हमारा अभ्यास है। इस अभ्यास में हम तर्कहीन हो जाते हैं। प्रत्येक बहस में हम अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कूदते हैं और जब बुद्धिमत्ता बहस से पहले समाप्त हो जाती है तो ऐसे तर्क करने लगते हैं जिनसे सबको पता चल जाए कि हम केवल बुद्धिमत्ता के भरोसे बहस में नहीं आए हैं, देर तक टिके रहने के लिए हमारे पास मूर्खता भी है। संत कबीर नगर में भाजपा के एक सांसद ने भाजपा के ही एक विधायक का अभिनन्दन कर दिया। विवाद का कारण वही था – “तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद कैसे!” इस सम्मान समारोह में बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुशासन की आहुति दी गई। इस घटना को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते समय लोग पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। यह ग़लत बात है। किसी भी एक व्यक्ति के आचरण से पूरी पार्टी का आचरण तय नहीं किया जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति पूरी विचारधारा का चरित्र नहीं हो सकता। ऐसा करना अपने आकलन के साथ बेईमानी करना है। यह हम पूर्व में भी करते रहे हैं। एक मणिशंकर अय्यर के बयान से पूरी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। एक साध्वी के बयान से पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। इस आचरण के कारण लोकतंत्र का जनमत भीड़ के उन्माद में परिवर्तित हो जाता है। यह हमने जातियों में भी किया है। एक गांधी महात्मा हो गए तो सारे गांधी ख़ुद को संत बताने पर उतारू हो गए। एक मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो सारे मोदी देश का पैसा लेकर घूमने निकल लिए। ऐसा करना ग़लत है। एक राहुल गांधी पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं हैं। एक नरेंद्र मोदी पूरी भाजपा का चरित्र नहीं हैं। एक लोहिया के वैचारिक कुनबे में सारे लोहिया जन्म नहीं लेते। अम्बेडकर के बैनर तले इकट्ठा होकर लोग अम्बेडकर के बनाए कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। लोहिया की विरासत को बपौती मानने वाले सत्ता की वसीयत को लेकर सिर फुटव्वल करते मिले। भगवा पहनने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता और चरखा चलाने से कोई गांधी नहीं हो जाता। इस बाह्य ढोंग के सहारे ही सियासत की गाड़ी चलती है। हम सब जानते हैं कि मुसलमानों के मंच पर टोपी पहनकर चढ़ने वाले लीडर हिंदुओं के मंच पर पहुँचते ही रामनामी ओढ़ लेते हैं। हम सबको मालूम है कि राहुल गांधी केवल वोट पाने के लिए दलितों के घर खाना खाने गए। हम सबको पता है कि सफाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने चुनावी चाल चली है। हम सबको सब पता है। हम सब कुछ जानकर भी इस अभिनय को चरित्र के झरोखे से निहारते रहते हैं। राहुल गांधी बैंगकॉक जाते हैं, नरेंद्र मोदी मिसेज अम्बानी से हाथ मिलाते हैं, राहुल गांधी ने शादी नहीं की, नरेंद्र मोदी ने पत्नी को छोड़ दिया, राहुल गांधी को भाषण देना नहीं आता, नरेंद्र मोदी ने अमरीका के प्रेजिडेंट को झूला झुलाया, राहुल गांधी के कुर्ते की जेब फटी है, नरेंद्र मोदी का सूट बहुत महंगा है …इन मुद्दों पर हम वोट देते हैं। एक दरवाज़े से निकलता हुआ हर शख़्स एक जैसा हो, यह सम्भव नहीं है। एक बगीचे में उगने वाले सारे फूल एक जैसे नहीं होते। कई बार चमेली भी केवल झाड़ बनकर रह जाती है और कई बार नागफनियों पर भी खूबसूरत फूल खिल जाते हैं। एक ही व्यक्ति एक विषय पर सही और दूसरे विषय पर ग़लत हो सकता है। लेकिन हम इतने जिद्दी हैं कि या तो किसी को शत प्रतिशत सही मानेंगे या शत प्रतिशत ग़लत। हर शख़्स में, हर समुदाय में, हर पंथ में, हर दल में, हर विचारधारा में, हर आंगन में, हर देश में, हर घटना में कुछ सही और कुछ ग़लत ज़रूर होता है। इन दोनों को अलग-अलग न किया जाए तो अंधभक्ति और अंधविरोध जन्म लेता है, सुचारु व्यवस्थाएं नहीं।
✍️ चिराग़ जैन
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दो देश आमने-सामने खड़े हैं। सीमा पर तनाव है। नभ, थल और जल में होनेवाली हर आहट किसी अनहोनी की आशंका से मन कँपा रही है। यह कंपन, भय का कंपन कतई नहीं है। देश की रक्षा में तैनात वीर बेटों को मृत्यु से भयभीत होने की फ़ुर्सत होती ही कहाँ है।
मीडिया, युद्ध के उन्माद को भुनाकर टीआरपी बटोर रहा है। अपने आरामदायक बिस्तर पर लेटकर दर्शक किसी एक्शन फिल्म की तरह इन बुलेटिन्स को देखते हुए उन्मादी हो रहे हैं। टीवी की स्क्रीन से नज़र हटाकर मोबाइल की स्क्रीन पर टिकाओ तो सोशल मीडिया पर युद्ध की उतावली दिखाई देने लगती है। पाकिस्तान में पकड़े गए भारतीय पायलट की दुर्दशा का वीडियो क्लिप फॉरवर्ड करके हर कोई अपने मोबाइल में दर्ज संपर्कों पर यह इम्प्रेशन जमा रहे हैं कि मेरे पास सबसे पुख्ता और लेटेस्ट जानकारियाँ हैं।
इससे शायद हमारा कोई सूक्ष्म अहंकार पुष्ट होता होगा लेकिन एक पल के लिए उस परिवार के प्रति करुणा भी जागनी चाहिए जिसका बेटा इस वीडियो में दुश्मनों के बीच घिरा दिखाई दे रहा है। हम शेखचिल्ली की तरह वीरता की बड़बोली बातें करते समय यह कल्पना ही नहीं कर पाते कि इस अपरिचित पायलट की जगह हमारा अपना कोई इस वीडियो में दिखाई दे रहा होता तो शायद उंगलियाँ रूह से पहले काँप जातीं।
दो-दो विश्वयुद्ध लड़ चुकने के बाद यूरोप ने युद्ध से तौबा कर ली है। पूरा यूरोप सीमाविहीन हो चला है। युद्ध, अफ़वाह, शौर्य के खोखले जुमले, बदला, हमला, विध्वंस और खून-ख़राबे में नष्ट होनेवाले संसाधन मानव के जीवन स्तर को सुधारने में व्यय हो रहे हैं। कहते हैं कि कलिंग का रक्तपात देखकर राजहठ का शौर्य भी विरक्त हो गया था। कहते हैं कि मरणासन्न सुयोधन ने श्वास डूबने से पूर्व युधिष्ठिर का पश्चाताप देखा था।
कुछ घंटों, कुछ दिनों, कुछ सप्ताहों का एक युद्ध दो देशों को विकास की दौड़ में दशकों पीछे धकेल देगा। कुछ क्षणों का उन्माद सैंकड़ों चौखटों को हमेशा हमेशा के लिए अंधियारे से भर देगा। कुछ पलों का प्रतिशोध एक पूरी पीढ़ी को अनाथ कर देगा। हमारे पास केवल आँकड़े आएंगे कि भारत के इतने सैनिक ‘शहीद हुए’ और पाकिस्तान के इतने सैनिक ‘मारे गए’। हम मारे गए सैनिकों की संख्या के सम्मुख शहीद हुए सैनिकों की संख्या रखकर कम-ज़्यादा का आकलन करेंगे और क्रिकेट मैच के स्कोरबोर्ड की तरह यह ज्ञात कर पाएंगे कि किसका पलड़ा भारी है। इस प्रक्रिया के संपन्न होने के बाद हम उन आँकड़ों को भुला देंगे और बेचैनी से न्यूज़ बुलेटिन देखने लगेंगे।
एक पल के लिए भी हम उस मारे गए अथवा शहीद हुए किसी सैनिक के परिवार की मनोदशा का अनुमान लगाने की ज़हमत नहीं उठाएंगे। ख़ूब खून-ख़राबा होने के बाद हमारे यहाँ के डिप्लोमेट्स, उस दुश्मन के डिप्लोमेट्स के साथ बातचीत का लिए स्वीकृति दे देंगे और फिर कुछ घंटों की मशक्कत के बाद किसी समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। इस बीच जिन परिवारों के चिराग़ बूझेंगे उनकी सुधि किसी को नहीं आएगी। मीडिया सीमा रेखा को भूलकर शिखर वार्ता की तैयारियों, अतिथि देश के प्रधानमंत्री की पोशाक, खानपान, रुकने के स्थान और पर्यटन की कवरेज में व्यस्त हो जाएगा।
हम अपने सैनिकों के शौर्य को बिसारकर अपने देश की मेहमान नवाज़ी पर रीझने लगेंगे। एक काग़ज़ के टुकड़े पर हस्ताक्षर होंगे। दोनों मुल्कों के राष्ट्राध्यक्ष हाथ मिलाते हुए फ़ोटो खिंचवाएंगे। फिर एक साझा बयान जारी होगा और दस-बारह साल के लिये छुटपुट घटनाओं के भरोसे अपने सैनिकों को छोड़कर अपने-अपने काम में व्यस्त हो जाएंगे।
काश, हम अपने उन्माद के अंधियारे में बेटे खोने का दुःख टटोलने की कोशिश कर पाते। काश हम समझ पाते कि दो मुल्कों के एक सौ चालीस करोड़ लोगों के जीवन और भविष्य की कीमत पर युद्ध की ओर बढ़ना किसी के लिए भी सुखद नहीं होगा। काश हम स्वीकार कर पाते कि बातचीत की टेबल तक कि यात्रा यदि युद्ध के मैदान से होकर न जाए तो कई आंगनों को बिलखने से बचाया जा सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
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कृष्ण : युद्ध लड़ो पार्थ!
अर्जुन : युद्ध किसी के हित में नहीं है माधव।
कृष्ण : किन्तु युद्ध क्षत्रिय का धर्म है कौन्तेय।
अर्जुन : फिर आप शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर क्यों गए थे मधुसूदन?
कृष्ण : क्योंकि वह मेरा धर्म था कौन्तेय।
✍️ चिराग़ जैन
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आवेग बीत चुका है। भारतीय मानस में सुलग रहे शोलों पर रोज़मर्रा की ज़रूरतों के छींटें पड़ चुके हैं। मीडिया अगली बड़ी ख़बर आने तक पुलवामा को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाए रखने के लिए विवश है। इसी कारण भारतीय गाली-गलौज से निचुड़ने वाली सारी टीआरपी बटोरने के बाद अब हमें पाकिस्तानी गालियाँ सुनवाई जा रही हैं। इमरान खान के बयान पर हर चैनल चर्चा कर रहा है। और हर चर्चा के अंत में एंकर भारतीय शौर्य की कोटिंग करके इमरान का प्रचार करने के पाप से मुक्ति पा रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने स्वभाव के अनुसार पुनः आरोप-प्रत्यारोप, छीछालेदर, गठबंधन, चरित्र हत्या, जोड़-तोड़, दल-बदल, रैली, भाषण और वोट-मैनेजमेंट जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की ओर उन्मुख हो चुकी हैं। इन सबसे फ़ुर्सत पाकर बीच-बीच में “बदला लिया जाएगा” जैसे जुमले बोलकर यह भी जताया जा रहा है कि “न भूलेंगे न मुआफ़ करेंगे” हमें याद है। इससे भावुक देशभक्तों की वोट पक्की होती है। अनिल अंबानी से सुप्रीम कोर्ट ने कुछ करने को कहा है। और बात न मानने पर कारावास की चेतावनी भी दी है। किंतु हमारी मीडिया इतनी संवेदनशील है कि इस ख़बर को कुछ सेकेण्ड के लिए ही चलाया गया। क्योंकि मीडिया जानती है कि किसी मुआमले में फैसला आने से पहले आरोपी को अपराधी नहीं माना जा सकता। मीडिया यह भी जानती है कि न्यायालय अम्बानी जी को सज़ा बाद में देगा लेकिन अम्बानी सर की नेगेटिव न्यूज़ चलाने की सज़ा मीडिया को ज़रूर मिल जाएगी। सरकारी दफ्तर, बसें, नुक्कड़ और चौपालें अभी भी दो गुटों में बँटे हुए विश्वयुद्ध लड़ रहे हैं। एक गुट का मानना है कि मोदी जी कोई भगवान टाइप की आइटम हैं जो नोटबंदी की तरह एक दिन अचानक टीवी पर आकर बताएंगे कि हमारा पड़ोसी पाकिस्तान अब हमारे बीच नहीं रहा। दूसरे गुट की विचारधारा अधिक ड्यूरेबल है। उनकी हमेशा यही मान्यता रही है कि सब साले चोर हैं, सबको अपनी कुर्सी की चिंता है, देश की किसी को कोई फिक्र नहीं है। एक तीसरा पक्ष भी है, जिसे हम निर्गुट मानते हैं। उसका मानना है कि भैया हमें तो हड्डे कटाकर पेट भरना है, न कांग्रेस कुछ देगी न भाजपा। स्कूलों में लड़के रात के बुलेटिन और व्हाट्सएप्प से प्राप्त ज्ञान को इस आत्मविश्वास के साथ बाकी जमघट को सुनाते हैं जैसे रात भर मोदी जी के साथ भारतीय सेना के शस्त्रागार का मुआयना करके लौटे हों। राजनैतिक दलों की “वानर सेनाएँ” किसी कश्मीरी को पीट कर, किसी जगह पुतले जलाकर, किसी जगह देशभक्ति का अभिनय करके अपने ऊपर होने वाले ख़र्चे को जस्टिफाई कर रही हैं। सोशल मीडिया पर अफवाहें अभी भी फैलाई जा रही हैं। फोटोशॉप सेना अभी भी सक्रिय है। पुलवामा के सैनिकों की चिताओं से फूल चुने जा चुके हैं, अब राजनीति उस राख में से वोट चुनने का प्रयास कर रही है। जिन परिवारों के बेटे वीरगति को प्राप्त हो गए अब राजनैतिक अनदेखी के कारण वे परिवार भी दुर्गति को प्राप्त होने जा रहे हैं। भारत सरकार ने “सदा-ए-सरहद” (दिल्ली-लाहौर बस सेवा) को बंद कर दिया है ताकि सरहद के जवानों की चीख़-पुकार देश को विह्वल न करे। लेकिन “समझौता एक्सप्रेस” (अटारी-लाहौर रेल सेवा) को जारी रखा है ताकि आवश्यक कामकाज होता रहे। 1947 से अब तक ऐसे तनावग्रस्त अवसर कई बार आए हैं जब दोनों ही मुल्कों की आम जनता का खून खौला है। यही सब गाली-गलौज, प्रतिबंध, आक्रोश, बयानबाज़ी हर बार होती है और फिर कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। दोनों ही देशों की जनता को यह नहीं मालूम कि जब भी तनाव बढ़ता है तब सिर्फ क्रिकेट का खेल बन्द किया जाता है, सियासत का नहीं।
✍️ चिराग़ जैन