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देशप्रेम का क्रीम-पाऊडर

‘राजनीति महत्वाकांक्षी मस्तिष्कों का क्रीड़ाक्षेत्र है।’ -यह एक सूक्ति मात्र नहीं बल्कि मतदाताओं की उम्मीदों पर वज्रपात भी है। समाजसेवा और देशप्रेम का क्रीम-पाऊडर लगाकर कोई व्यक्ति जनता को मुँह दिखाने क़ाबिल बनता है। निरंतर ब्यूटी पार्लर भ्रमण करने के फलस्वरूप जनता एक दिन यह यक़ीन कर बैठती है कि चेहरे की यह चमक वास्तविक है। जैसे ही जनता को यह यक़ीन होता है उसी क्षण नया नेता भागकर किसी पार्टी के दफ़्तर में जाता है और अपने मेकअप पर हुए ख़र्चे की बोली लगाने का उपक्रम शुरू करता है।
पार्टी में बैठे पुराने घाघ नेता, फाउंडेशन के दम पर बनी उसकी पब्लिक फाउंडेशन का पार्टी के हित में आकलन करते हैं और एक कुशल गृहिणी की तरह आलू-प्याज की शैली में उससे उसकी औक़ात का मोलभाव करने लगते हैं। उचित मूल्य लग जाने के बाद नवनिर्मित नेताजी का चेहरा दो भागों में बाँट दिया जाता है। पार्टी कार्यालय के भीतर उनका आचरण ठीक वैसा होता है जैसा ग्राहक जुटा लेने के बाद किसी गणिका का अन्य गणिकाओं से होता है। पार्टी कार्यालय के बाहर वही गणिका अन्य ग्राहकों के सामने चरित्रवती बनकर लानत भेजने लगती है।
प्रत्येक गणिका के जीवन में एक समय ऐसा अवश्य आता है जब उसका आसामी उससे ऊब जाता है और उसे ग़ैरत की क़ीमत चुकाने में आनाकानी करने लगता है। इस परिस्थिति में हर गणिका यह समझ जाती है कि उसका ग्राहक अब ज़्यादा दिन उसे नहीं झेलेगा। मूर्ख गणिकाएँ ऐसी स्थिति को दिल से लगाकर आसामी को नपुंसक कहने लगती हैं और बिस्तर पर की गई उसकी हरक़तों को सार्वजनिक करके उसकी चरित्र हत्या का प्रयास करती हैं। किन्तु प्राणहीन की हत्या संभव कहाँ है?
समझदार और अनुभवी गणिकाएँ ऐसा नहीं करतीं। वे ग्राहक की ऊब को भाँपकर अतिरिक्त विनम्र हो उठती हैं। अन्यान्य उपायों से भरसक प्रयास करती हैं कि उसका आसामी उससे ख़ुश रह सके। किन्तु जब कोई उपाय नहीं दिखता तो वे एक दिन ग्राहक के भोजन में विष मिला देती हैं और उसकी लाश का अंगूठा कोरे काग़ज़ पर लगाकर उसकी संपत्ति का हरण कर लेती हैं। ये गणिकाएँ सर्वाेच्च पदों तक पहुँचने की क्षमता रखती हैं।
विभीषण जब रावण से अपमानित हुआ तो उसे राम याद आए। उसने राम को बताया कि मैं तो लंका में रहकर भी आप ही के नाम की उपासना करता था। सुनकर राम प्रसन्न हो गए और विभीषण को राज्यसभा भेजने का वचन दे दिया। अपनी राज्यसभा की सीट पक्की होते देख महात्मा विभीषण ने रावण की लंका, भाई-बहन और यहाँ तक कि अपने राष्ट्र से भी मुख़ालफ़त करने में हिचक न की। विभीषण के इस समर्पण से राम बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें भक्त-शिरोमणि की उपाधि दी।
उधर सुग्रीव का भाई उसकी बदतमीज़ीयों से उकताकर उसे घर-निकाला दे चुका था। सुग्रीव में इतनी हिम्मत न थी कि भाई के कान पर दो टिका दे। दुःखी सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे सीताहरण लाइव देख रहे थे। उन्होंने रावण को ऐसा पाप करने से रोकना चाहा किन्तु उन्हें लगा कि सीता का पता बताने के बदले में मैं राम से सौदेबाज़ी कर सकता हूँ। उन्होंने सीताहरण होने दिया। राम जब विकल होकर पहुँचे तो सुग्रीव उतने ही प्रसन्न हुए जितने संजीव कुमार के हाथ काटकर गब्बर सिंह जी हुए थे। उन्होंने राम से कहा कि मैं आपकी केस स्टडी तो करना चाहता हूँ लेकिन ‘फोर्स्ड बैचलर’ होने के कारण कंसन्ट्रेट नहीं कर पा रहा हूँ। राम अब तक फोर्स्ड बैचलर की पीड़ा जान चुके थे। लक्ष्मण तो इस फील्ड में सीनियर फैलो थे ही। दोनों भाइयों ने मिलकर पीएसी की मीटिंग में बाली को धूल चटाने की योजना बनाई। इसके लिए सबसे पहले सुग्रीव को पार्टी से निलंबित किया गया। उसने बाली को गालियाँ देने का अधिकृत लाइसेंस पा लिया। कुछ दिन गालियों से अभिषेक करने के बाद सुग्रीव को वापस पार्टी की सदस्यता दे दी गई। इस स्टेप से बाली बौखला गया। उसकी बौखलाहट का लाभ उठाकर उसे पार्टीविरोधी सिद्ध करते हुए राम ने बाली की हत्या कर दी।
अंगद सबसे समझदार रहा। उसने चाचा को पटाए रखा। क्योंकि वह जानता था कि राजनीति में पासा कहीं भी पड़ सकता है। यदि चाचा जीता तो अंगद की स्वामिभक्ति उसकी राज्यसभा सीट का ग्राउंड बना देगी और अगर चाचा निबट गया तो इकलौता पुत्र होने के कारण उसका अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार रहेगा ही रहेगा।
अब प्रश्न यह है कि इस सबके बीच जनता क्या करे। अरे भई, हरि का गुन गाओ…. राम का नाम भजो और अपनी दो जून की रोटी की चिंता करो। क्योंकि भूखे पेट न भजन गोपाला!

✍️ चिराग़ जैन

सर्दी : एक श्वेतवर्णा बूढ़ी दादी

कँपकँपाते शरीर को सफेद चादर में लपेटे हुए रोज़ सुबह एक बूढ़ी दादी ठंडे-ठंडे हाथों से गाल छूती है। मैं झल्लाकर सिर तक रजाई खींच लेता हूँ। दादी हँसकर रसोई में जाती है और सरसों के साग की ख़ुशबू से मेरे आलस्य में व्यवधान करती है। खेतों में हरी सब्ज़ियों की ताज़गी देखकर बूढ़ी दादी की क्यारियों से प्यार हो जाता है।
गाजर के हलवे की रंगत और ग़ज़क-रेवड़ी की झलक दिखाकर दादी मुझे रिझाती है। मैं रोज़ सुबह अंगड़ाइयों में टूटते आलस को भूलकर दादी की रसोई में घुस जाता हूँ। स्वाद और पेट को तृप्त करके मुझे दादी की शरारतों पर फिर से खीझ उठने लगती है। मैं टूटी हुई लकड़ियाँ जोड़कर अलाव जलाता हूँ और मूंगफलियों के आनंद में व्यस्त हो जाता हूँ।
मुझे अलाव की संगत में बैठा देखकर, दादी चुपचाप अपनी कोठरी में जा दुबकती है। थोड़ी देर बाद मूंगफलियों की संख्या कम होते-होते समाप्त होने लगती है। अलाव की रंगत फीकी पड़ जाती है। मैं दादी से छुपकर रजाई के आगोश में खो जाता हूँ। सुबह होते-होते; जब तक मैं दादी को भूलने लगता हूँ; हवा का एक झोंका गाल पर मीठी-सी चपत लगाकर कहता है- ‘उठ रे, दादी चाय के लिए अदरक कूट रही है।’
✍️ चिराग़ जैन

अस्तित्व का मापदंड

फेसबुक को अपने अस्तित्व का मापदंड माननेवाले लोगों का रक्तचाप मापने के लिए प्रति पोस्ट लाइक को प्रति पोस्ट शेयर से गुणा किया जाना चाहिए। इस डिजिटल संचार माध्यम ने एक ऐसी भ्रामक सृष्टि की सर्जना कर दी है कि किसी की चार दिन की निष्क्रियता उसके डिजिटल परिवार को ‘चिंतित महसूस कर रहा है’ वाली स्माइली चिपकाने पर विवश कर देती है।
इस गंभीर स्थिति में आधार कार्ड को फेसबुक से लिंक करने की बातें हो रही हैं। यह फ़रमान फेसबुकियों के लिए ऐसा वरदान सिद्ध हुआ कि मानो नास्तिकों की बस्ती में बने मंदिर के पुजारी को भगवान की माला के फूल मिल गए हों। सरकार की इस गंभीरता को देखते हुए फेसबुकजीवियों ने लॉगिन करते हुए और अधिक गंभीर होने का निर्णय किया है।
जो लोग अपनी पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या बढ़ाने के लिए इनबॉक्स तक दौड़-भाग करते थे, वे अब पोस्ट करने के उपरान्त 5000 लोगों को फोन मिलाने की सोचने लगे हैं। किसी के नकारात्मक कमेंट पढ़कर जिनकी भृकुटियाँ तन जाती थीं वे अब सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखकर एकाउंट लॉगिन करने लगे हैं।
फेसबुक पर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए स्वयंभू साहित्यकारों में भी खासी हलचल है। मैं ऐसे कई कवियों को जानता हूँ जो ‘आत्मनिर्भरता ही सफलता की कुंजी है’ की सूक्ति को आत्मसात करते हुए पचास-साठ नक़ली फेसबुक खातों की बुनियाद पर अपनी प्रशंसाओं का विशाल भवन खड़ा कर रहे थे। एक पोस्ट करने के बाद बाक़ायदा पचास लॉगिन-लॉगआउट करना, फिर उन पचास खातों की आपसी लड़ाई करवाना और उस लड़ाई को सुलझाना… इतनी मेहनत-मशक्कत से अपने दम पर ज़िंदा ये मसिजीवी आधार लिंक करने के इस तुग़लकी फरमान से अचानक बेरोज़गार हो गए हैं।
नक़ली मुद्रा के बंद होने पर जो लोग सरकार की प्रशंसा में जुट गए थे, वे ही नक़ली खाते बन्द होने पर सरकार को कोस रहे हैं। महिला कोटे में बने खातों से लड़कियों से चुहलबाज़ चैटिंग करनेवाले संस्कारी युवा आधार लिंक करने के इस बेग़ैरत फैसले से सदमे में हैं।
सभ्यता का आधार कार्ड दिखाकर संस्कृति की दुहाई देनेवाले लोग मौब में तब्दील होते ही अशिष्ट हो जाते हैं। यदि पहचाने जाने का संकट न हो तो हम वे सब हरक़तें करेंगे जिनका हम आधार लिंक वाले खाते से विरोध करते हैं। सामाजिक नियमों की भौंडी सभ्यता की चुनरी कुण्ठाओं की सूरत पर एक आवरण डाल देती है।
फेसबुक के फेक एकाउंट्स बंद करवाने से पूर्व समाज को उन खातों से संचालित गतिविधियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करना चाहिए। इन खातों में समाज का वह चेहरा उजागर होगा, जिसे सामने लाने के मार्ग में नियमों और नैतिकता के छद्म पहाड़ों का अवरोध सदैव दिखाई दिया है। इन नक़ली खातों के डिजिटल अखाड़े की अध्यक्षता में नियमों की पुनर्स्थापना की जानी चाहिए ताकि वर्जनाओं के टैबू से त्रस्त समाज राहत की साँस ले सके।
✍️ चिराग़ जैन

मनोरंजक चुनावी रैलियाँ

सरकार चाहती है कि दिल्ली की जनता सड़क पर पार्किंग न करे। जनता भी चाहती है कि उसे अपनी गाड़ी अनाधिकृत स्थान पर खड़ी न करनी पड़े। लेकिन सरकार गाड़ी के लिए पार्किंग का स्थान मुहैया नहीं करवा पाती। वह जनता से कहती है कि अपने घर के भीतर गाड़ी खड़ी करो। जनता हाथ जोड़ कर कहती है कि छोटे-छोटे फ्लैट्स और बिल्डर फ्लोर्स में रहनेवाला शख़्स गाड़ी घर में कैसे खड़ी करे।
उत्तर सुनते ही सरकार तुरंत नहले पे दहला मारते हुए कहती है- ‘इत्ते छोटे घर में रहनेवाला आदमी गाड़ी ख़रीदता ही क्यों है?’
जनता रुआंसी होकर कहती है- ‘माई बाप! हम डीटीसी की बस में दफ्तर जाना चाहते हैं लेकिन बस में पैर रखना तो दूर, लटकने की भी जगह नहीं होती। ऊपर से सरकारी चेतावनी और लिखी होती है कि पायदान पर यात्रा न करें। …पायदान पर कर नहीं सकते, भीतर जगह नहीं है और लटकने का सामर्थ्य नहीं है। ऑटो-टैक्सीवाले खाल उतार लेते हैं। उनकी शिकायत करो तो पुलिसवाला ऑटोवाले के प्रति नमकहलाल बनकर तब तक नहीं पहुँचता, जब तक ऑटोवाला हमें मारपीट के फरार न हो जाए। ओला-ऊबर में इतना सरचार्ज लगता है कि तीन कर्मचारियों की तनख़्वाह मिला ली जाए तो भी एक कर्मचारी दफ्तर नहीं पहुँच सकता। मेट्रो में ऑफिस टाइम पर इतनी भीड़ होती है कि जब तक मेट्रो में घुस पाते हैं तब तक बायोमेट्रिक की मशीन हमें लेटलतीफ घोषित करके हमारी आधी दिहाड़ी चट कर जाती है। गाड़ी पूल करने की सोचें, तो उसके लिए गाड़ी होना ज़रूरी है और चार दिन में एक दिन नम्बर आवे तो बाकी तीन दिन गाड़ी खड़ी करने के लिए पार्किंग की जगह चाहिए।’
इतनी सारी कहानी सुनकर सरकार थोड़ी देर मौन रहती है। अचानक उसे ध्यान आता है कि दो महीने बाद राजस्थान में चुनाव है। सरकार मन ही मन स्वयं को कोसती है- ‘मूढ़मति, दिल्ली के लोगों की समस्याएँ कभी ख़त्म नहीं होंगी। ये थैंकलैस लोग एक नम्बर के आलसी हैं। इनके चक्कर में पड़ोगे तो राजस्थान हाथ से निकल जाएगा।’
सोच-विचार करके, सरकार जनता को आश्वासन देती है कि हमने एनसीआर कमेटी को बोलकर दिल्ली का विस्तार शामली तक करवा दिया है। लगभग सौ किलोमीटर दायर बढ़ जाएगा तो पार्किंग की समस्या हल हो जाएगी। फिर आप आराम से अपनी गाड़ी पार्क करना।
इससे पहले कि जनता इस आश्वासन को सुनकर सम्भल पाए, सरकार राजस्थान के दौरे पर निकल लेती है। जनता अपने घर पहुँचकर घर के बाहर गाड़ी पार्क करती है और टीवी पर सरकार की चुनावी रैली देखने लगती है। रैली के आश्वासनों को सुनकर जनता ठहाका मारती है और न्यूज़ चैनल का मनोरंजन त्याग कर पोगो चौनल के समाचार लगा लेती है।
✍️ चिराग़ जैन

अलविदा शशि कपूर साहब!

एक पूरा जीवन समाप्त हो जाने की एक और ख़बर आई। वे शशि साहब जो कभी चहकते हुए एक नौजवान थे, वे जिनका अंदाज़ “स्टाइल” कहलाता था, वे जिनका उठना-बैठना, खानपान, आना-जाना सब कुछ सुर्खियों में तब्दील हो जाता था; आज “हमेशा” के लिए विदा हो गए। वो शरारती आंखें अब कभी नहीं खुलेंगी। कितना जरूरी और बेतुका सत्य है मृत्यु! और कितना निष्ठुर है लोकप्रियता का भ्रम! जिनका फ़िल्म में मरण देख कर लोगों की पलकें भीग जाती थीं आज उनके महागमन की ख़बर भी केवल एक सिंगल कॉलम न्यूज़ से ज़्यादा कुछ नहीं है। सामाजिक लोगों का जीवन किसी खूबसूरत जश्न जैसा है। जब इस जश्न पर नूर बरसता है तो पूरी दुनिया मुँह बाये इसकी रौशनी से झिलमिलाते संसार को देखती है लेकिन जश्न का रंग उतरने के बाद वही जीवन कितना वीरान और बदरंग हो जाता है- इसकी सुधि लेने कोई नहीं जाता। शशि जी ने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष बेहद कष्ट में गुज़ारे। राजेश खन्ना भी अवसाद के दंश से रोज़ घायल हुए और अंततः चल बसे। दिलीप साहब, अटल जी और भी अनेक दैदीप्यमान सूरज किसी गुमनाम अंधेरे में जीवन काट रहे हैं। ये सब घटनाएँ आज इसलिए संदर्भित हो गई हैं कि कभी हमारे मनोरंजन, खेल, विज्ञान, राजनीति, कला, उद्योग और अन्य क्षेत्रों की धुरि रहे व्यक्तित्व हमारे भविष्य की धरोहर हैं। उनके अनुभवों की ऊर्जा को व्हील चेयर पर घिसटने के लिए छोड़ देने की बजाय यदि भविष्य के निर्माण हेतु प्रयोग करने का उपक्रम किया जाए तो संभवतः निजी जीवन को तिरोहित कर अनवरत मेहनत करने वाले लोग अधिक जिजीविषा से मानव जाति की सेवा कर पाएंगे। अलविदा शशि साहब!
✍️ चिराग़ जैन

सरकारी दफ्तर में काम

किसी सरकारी दफ़्तर में काम अटक जाये तो हर भारतीय के पास दो विकल्प होते हैं। पहला, वह ईमानदारी की लड़ाई लड़े और अपने सब काम-धंधे छोड़कर अधिकारियों, थानों, अदालतों, मीडिया और विजिलेंस के चक्कर लगाने शुरू कर दे। इस प्रक्रिया में काफ़ी परेशानी और ज़िल्लत उठाने के बाद अंततः यह पता चलता है कि जिस क्लर्क अथवा विभाग ने आपके आवेदन पर कार्य शुरू किया था, उसने ज़िम्मेदारी से काम नहीं किया इसलिए एक ज़िम्मेदार ईमानदार करदाता को महज कुछ वर्षों की परेशानी उठानी पड़ी। अंत में किसी पिछले जन्म के पुण्य के उदय से आपको हुई परेशानी के लिये खेद जताते हुए आपका कार्य सम्पन्न करने के आदेश जारी हो जाते हैं और उसी क्लर्क की चिढ़ी हुई शक्ल के अंतिम दर्शन करके आप अपना मनोरथ पूर्ण कर लेते हैं।
दूसरा विकल्प यह है कि आप किसी मंत्री, अधिकारी अथवा दलाल को नए नोट या अपना सामाजिक रुतबा दिखाकर वह काम करवा लें।
दूसरे वाले विकल्प का प्रयोग करनेवाले लोग सामान्य भाषा में जुगाड़ू और न्यायिक शब्दावली में भ्रष्टाचारी कहलाते हैं। जबकि पहले विकल्प का प्रयोग करनेवाले लोग अदालतों और अधिकारियों की दृष्टि में ईमानदार लेकिन अपने परिवार, यार-दोस्तों, रिश्तेदारों और परिचितों की दृष्टि में सनकी, झक्की और मूर्ख कहलाते हैं।
स्वतंत्र भारत में हमें जनहित में एक ऐसा तंत्र मुहैया कराया गया है, जिसमें कोई भी नागरिक किसी काम को हल्के में नहीं ले सकता। सहजता से मिलनेवाली चीज़ का मोल कम हो जाता है; इसी उक्ति को ध्यान में रखकर हमें कोई भी इच्छापूर्ति के लिए बाक़ायदा तपस्या करवाई जाती है। भारत देश के लोग ईश्वर को भूल न जाएँ, इसलिए हमें हर टेबल पर इतनी जटिलताओं में उलझाया जाता है कि क़दम-क़दम पर ईश्वर का स्मरण बना रहे।
हर सरकारी दफ़्तर उस सुरसा की भूमिका में मुँह बाए बैठा है कि जैसे ही कोई जीव उसके आगे से गुज़रे तो वह उसकी तरक्की की परछाई को पकड़ ले। यदा-कदा कोई बजरंगी सुरसा के विशालकाय मुँह में एप्रोच का जीरा डालकर ख़ुद को मुक्त करा ले, तो यह उसकी व्यक्तिगत करामात है।
देश के विकास की फाइलें ऐसे ही दफ़्तरों की किसी कतार में चप्पल घिस रही है और उसे अनावश्यक औपचारिकताओं में उलझाकर घर लौटता हर सरकारी बाबू सरकारी बस में लटकते हुए झल्लाकर कहता है- ‘कुछ नहीं हो सकता इस देश का।’

✍️ चिराग़ जैन

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