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स्वर्णिम भविष्य

कल बना लेगा उदाहरण जग हमारे निर्णयों को
पर अभी हम आपके उपहास का संत्रास झेलें
कल हमारे अनुकरण की सीख देना पीढ़ियों को
आज हम अपने किये पर धृष्टता का त्रास झेलें

जब कभी गौतम नकारेगा गँधाती रीतियों को
तब उसे उद्दण्ड कहकर विश्व कर देगा बहिष्कृत
जब वही कृशकाय होकर लकड़ियों जैसा बनेगा
तब उसे गृहिणी करेगी देवता कहकर पुरस्कृत
स्वर्णबिंबित हो पुजेंगे कल तथागत विश्व भर में
आज भीषण जंगलों में कष्टप्रद संन्यास झेलें

जब किसी वैधव्य को जीवित चिता स्वीकार ना हो
तब उसे कुलटा बताकर राजगृह दुत्कार देंगे
बावरी जब कृष्ण की दीवानगी में मग्न होगी
तब नियम उसको गरल का पात्र देकर मार देंगे
कल तुम्हारी अर्चना का गान बन जाएंगी मीरा
आज भगवत भक्ति में वे दण्ड का विषग्रास झेलें

जग यही करता रहा है, जग यही करता रहेगा
अब जिसे द्रोही कहा है, कल उसे ईश्वर कहेगा
जिस कथा को हीन कहकर आज कर दोगे उपेक्षित
कल उसी पोथी से जग की आस्था का रस बहेगा
कल समूचा जग यही चौपाइयाँ गाता फिरेगा
आज तुलसी ज्ञानियों के दम्भ का परिहास झेलें
✍️ चिराग़ जैन

बारहमासा

मीत! तुम्हारी सुधियों का ये कैसा बारहमासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

पल में मुखड़े पर जगमग दीवाली-सी आ जाती है
पल में मन में चैत दुपहरी की वीरानी छाती है
पल में डरकर मन बेचारा पूस निशा-सा कँपता है
पल में आषाढ़ी चातक-सा चंद्रकिरण को तकता है
क्षणिक हताशा, क्षणिक पिपासा, क्षणिक मिलन अभिलाषा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

जब पुरवा के बहकाने से मन भरमाने लगता है
तब बिन मौसम की बारिश से खेत लजाने लगाता है
दुनियादारी के पचड़ों से आलस करने लगता है
इस बैरागी मन में महुए का रस झरने लगता है
मन संतृप्त हुआ बैठा है पर तन भूखा-प्यासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

इधर हृदय के पास अचानक जेठ पिघलने लगता है
उधर पुराने पल से तपकर अन्तस् गलने लगता है
सपनों के कजरारे बादल अम्बर तक बढ़ जाते हैं
धूप चढ़े तो इच्छाओं के मृग काले पड़ जाते हैं
इस पल शांत तथागत है मन, अगले पल दुर्वासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

✍️ चिराग़ जैन

प्रश्न संस्कृति

अंधियारे में चलते रहने से जग का उत्थान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

भगवद्गीता उत्तर ही तो है अर्जुन की जिज्ञासा का
यम तक ने सम्मान किया है नचिकेता की अभिलाषा का
समवशरण में प्रश्न न हों तो आगम ज्ञान कहाँ से आता
प्रश्न गरुड़ यदि पूछ न पाते गरुड़ पुराण कहाँ से आता
ज्ञानपिपासा तृप्त हुई तो ईश्वर का अपमान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

यक्षों की अनदेखी करके प्यास बुझाना सम्भव है क्या
शंकाओं का उत्तर देना सचमुच एक पराभव है क्या
कनक, कसौटी से कतराए ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है
जिज्ञासा से आँख चुराए, वह मेरा आराध्य नहीं है
प्रश्न सुने तो आपा खो दे, वह मानुष विद्वान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

सावित्री की हठ ने चाहा उसके पति के प्राण न जाएँ
तब तक प्रश्न उठाते रहिए जब तक विधिना मान न जाएँ
प्रश्नों के ही ताड़पत्र पर हर इक ग्रंथ लिखा होता है
प्रश्नों की आधारशिला पर ही गणतंत्र टिका होता है
जो प्रश्नों को द्रोह कहे उस शासक का यशगान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

दम्भी राजा की मनमानी का प्रतिकार गुनाह नहीं है
अभिमानी की पूजा करना प्रह्लादों की चाह नहीं है
मृत्यु प्रकट होती खम्भे से अहम् अगर सिर चढ़ आता है
वरदानों का दंभ किया तो विधि का लेखा मिट जाता है
राम अमर होंगे युग-युग तक, रावण का अभिमान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

✍️ चिराग़ जैन

पुनर्समीक्षा

किस पर्वत से पत्थर आया, कैसे रूप धरा पत्थर ने
बस इतने भर से मूरत की, प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी
पूछ लिया यदि उत्सुक होकर, शिल्पी की घायल उंगली से
तो फिर इस पूरे मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

रामकथा लिखना चाहो तो, केवट का किस्सा सुन लेना
कैसे त्याग गए पल भर में, शासन का हिस्सा सुन लेना
सागर से सुनना यश गाथा, जिसको क्रोध दिखा राघव का
शबरी और निषाद कहेंगे, जिनको शोध दिखा राघव का
वह पत्थर गाथा गाएगा परस जिसे इंसान किया था
उन ऋषियों के दल से पूछो जिन सबका कल्याण किया था
लिखना, कैसा युद्ध हुआ था राघव का दम्भी रावण से
पूछ नहीं लेना भूले से, परित्यक्ता सीता के मन से
अगर सिया ने मन खोला तो बहुत प्रतीक्षा करनी होगी
तो फिर इस पूरे मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

बस यह लिखना कैसे निर्धन ब्राह्मण से संबंध निभाया
बस यह लिखना किस कौशल से कालयवन का अंत कराया
बस यह लिखना उस नटवर का रणकौशल में यश कितना था
बस यह लिखना पूरे युग पर मधुसूदन का वश कितना था
गौवर्द्धन पर्वत बोलेगा जिसको उंगली पर रखा था
भीष्म-धनंजय की सुन लेना, जिनने रूप विराट लखा था
गीता के श्लोकों को पढ़कर, श्रद्धा का लेखा भर देना
राधा के बिरही यौवन को, बिल्कुल अनदेखा कर देना
राधा से उद्धव उलझे तो विस्मृत शिक्षा करनी होगी
फिर इस पूरे ही मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

बोधगया के वन बोलेंगे कितने थे विद्वान तथागत
नालंदा जगकर बोलेगा क्या थे दिव्य महान तथागत
ईश्वर का अवतार वही था, नगरवधू का मन बोलेगा
शांति-अहिंसा का गायक था, धरती का कण-कण बोलेगा
मुख पर कैसी दिव्य प्रभा थी, शिष्यों की टोली बोलेगी
इक दिन यह सारी मानवता उनकी ही बोली बोलेगी
तप की इक अनुपम शैली से युग के पन्ने मोड़ गए थे
राहुल से मत चर्चा करना, उसको सोता छोड़ गए थे
परित्यक्ता के अधर खुले तो खंडित निष्ठा करनी होगी
फिर इस पूरे ही मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

जो तरु जग को फल देता है उसकी जड़ें उमस सहती है
जो घाटों की प्यास बुझा दे, वह नदिया प्यासी रहती है
अक्सर दीपक के भीतर ही गहन अंधेरा छुप जाता है
तेज दुपहरी की आभा में, मौन सवेरा छुप जाता है
जिस पर्वत में करुणा जागी उसके जल को बहना होगा
अमृत घट उपजाकर भी सागर को खारा रहना होगा
जग की भूख मिटानी है तो हल की चुभन सहन कर लेना
उजियारा फैलाना है तो निज को पूर्ण दहन कर लेना
हर पूजित को दायित्वों की कठिन परीक्षा करनी होगी
इतिहासों को हर मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

✍️ चिराग़ जैन

पराजित विजेता

धर्मराज स्वीकार करोगे?
रण से जीते इस शासन में
कुछ अनबोले वृक्षों के शव भी शामिल हैं सिंहासन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

लाक्षागृह की कालनिशा में जिस भिलनी को दमित किया था
जिनके शव की भस्म बनाकर दुर्योधन को भ्रमित किया था
उन बच्चों की दग्ध अस्थियां चुभती होंगी सिंहासन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

अर्जुन के जीवन की रक्षा हेतु भतीजा भेंट चढ़ा था
बर्बरीक की छल-हत्या पर सारा मजमा मौन खड़ा था
क्या इनका बलिदान पढ़ोगे शपथ ग्रहण के अभिभाषण में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

अर्जुन, भीम सदा आगे थे हर अवसर पर गौण रहे तुम
द्रोणप्रवर के विश्वासों की हत्या करके मौन रहे तुम
भ्रम को पोषित करना भी क्या पाप नहीं है अनुशासन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

मेघों से गठबंधन करके अर्जुन के प्रण पूर्ण कराए
एक नपुंसक के पीछे छिपकर पौरुष पर तीर चलाए
कोई भेद नहीं था उस क्षण तुम सबमें और दुःशासन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

भूल गए वह ब्राह्मण का घर; झूठ जहाँ कहकर ठहरे थे
द्रुपदसुता के बँटवारे पर तुम कितने गूंगे-बहरे थे
कैसे बाँट सके तुम पाँचो इक जीवित नारी राशन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

✍️ चिराग़ जैन

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