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लाचारी

उनको जाने क्या-क्या सहना पड़ता है ख़ुद से आँख चुराकर रहना पड़ता है हम तो केवल सच से काम चलाते हैं उनको थोड़ा झूठ भी कहना पड़ता है ✍️ चिराग़...

सृजन और आलोचना

जिनका कोई अर्थ नहीं है, उन पर क़लम चलाना छोड़ें जो चर्चा को दूषित कर दें, उन सबको समझाना छोड़ें हमें ओस के कण चुन-चुनकर, अपने सपने सच करने हैं अपनी ओस बचाना सीखें, उनके पेड़ हिलाना छोड़ें ✍️ चिराग़...

झाँसी की रानी

उन हाथों में बिजली की तेज़ी थी; तलवारों से पूछो दुर्गा का साक्षात रूप थी; युग के हरकारों से पूछो आँखों में अंगार, पीठ पर ममता लेकर ऊँचाई से कैसे कूदी थी इक रानी; जाकर दीवारों से पूछो हिम्मत की राहों में जब भी आईं तो चुक गयी दीवारें कैसे कूदेगी अम्बर से रानी; उत्सुक भयी...

देशभक्ति

कैसे इस पर न्यौछावर हो अपना ख़ून-पसीना सीखें वक़्त पड़े तो फौलादी साबित हो हर इक सीना, सीखें शीश कटे तो उसका, जिसने भारत-भू पर आँख उठाई हम इस पर मरना क्यों चाहें, इसकी ख़ातिर जीना सीखें ✍️ चिराग़...

हिंदुस्तान बोलेगा

अगर इंसान बनकर आए तो इंसान बोलेगा ज़ुबां मिसरी सरीखी मीर का दीवान बोलेगा अगर हैवानियत लेकर इधर आए तो फिर सुन लो शिवाजी की ज़ुबां में सारा हिंदुस्तान बोलेगा ✍️ चिराग़...

अयोध्या

शोभ रही नगरी सरयू-तट, खोज रहे उपमा तुलसी नील सरोवर में दमके, जिस भाँति कली इक रातुल-सी मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि, अरु क्या तुलसी ✍️ चिराग़...
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