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बिटिया की विदाई

चल पड़ी ससुराल बिटिया सज-सँवर के
मन बिलखकर रह गया इस पल अचानक
देहरी की आँख नम होने लगी है
मौन रहने लग गयी साँकल अचानक

याद आता है अभी कल ही हमारी
गोद में इक पाँखुरी सी आई थी तुम
बस अभी कल ही कोई साड़ी पहनकर
देखकर दर्पण बहुत इतराई थी तुम
लांघकर बचपन, हुई थी तुम सयानी
याद आने लग गया वो पल अचानक

जो चहकती थी सुबह से शाम घर में
आज वो चिड़िया पराई हो रही है
ख्वाहिशें घूंघट के नीचे छिप गयी हैं
नाज-नखरों की विदाई हो रही है
साध ली सिंदूर ने कलकल समूची
और गुमसुम हो गयी पायल अचानक

लाड़ इक विश्वास के आगे झुका है
भाग्य के हाथों तुम्हारा हाथ है अब
उम्र भर का पुण्य जो कुछ है हमारा
हर क़दम पर वह तुम्हारे साथ है अब
दिल बिना धड़कन, ठिठककर थम गया है
आँख से चोरी हुआ काजल अचानक

सात फेरों का सफ़र पूरा हुआ है
है पराया आज अपनापन हमारा
एक नग अधिकार पीछे रह गया है
घर तुम्हारा, बन गया पीहर तुम्हारा
याद की गठरी टटोले जा रहे हम
हो गई तुम आँख से ओझल अचानक

✍️ चिराग़ जैन

जैन धर्म के अनुयायी

हम जैन धर्म के अनुयायी
हम नियम निभाने वाले हैं
श्रावक अणुव्रत के धारी हैं
श्रमणों ने महाव्रत पाले हैं

हम सिद्धशिला का लक्ष्य बना, अरिहंतों की पूजा करते
आचार्य कथित पथ को तजकर, नहीं काम कोई दूजा करते
पाठक परमेष्ठी से पढ़कर
मुनि मार्ग को जाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

वैभव के मग चलते-चलते हम राह अचानक मोड़ गये
हम बाहुबली के वंशज हैं, जो जीत-जीत कर छोड़ गये
हम भामाशाह, राष्ट्रहित में
सर्वस्व लुटाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

दिन ऐसा एक नहीं जाता, जब हम जपते नवकार नहीं
जिसमें हो अहित चराचर का, ऐसा करते व्यापार नहीं
हो लोभ न जिसमें उतना ही
हम लाभ कमाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

रत्नत्रय को धारण करके, हम चार कषाय अहित मानें
पाँचों पापों से दूर रहें, छह द्रव्य, तत्व सातों जानें
कर नष्ट अष्ट कर्मों को हम
अष्टम भू पाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

हम शांत सहज जीवन जीते, लड़ने की देते राय नहीं
कैसी भी कठिन समस्या हो, अड़ने से कोई उपाय नहीं
हम अनेकांत के साधक हैं
स्याद्वाद सिखाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

हम चेतन से मतलब रखते, तन से रखते हैं मोह नहीं
इसलिए हमें सुख-दुःख देते, ये लौकिक मिलन-बिछोह नहीं
जिसको अपना कहते उसको
शिवमार्ग दिखाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

हम पर्व मनाते हैं ऐसे, पूरे दिन का उपवास करें
निस्पृह जीवन जीने वाले, दश धर्मों का अभ्यास करें
हम मृत्यु महोत्सव से पथ का
पाथेय जुटाने वाले हैं
हम जैन धर्म के अनुयायी

✍️ चिराग़ जैन

टिकट लेते आना

चाहे झूठ बोल के, चाहे भेद खोल के
लेते आना, टिकट लेते आना

तुम साइकिल पर पर चढ़ जाना
इक टोपी लाल लगाना
थोड़ा डण्ड पेल के
थोड़ा दण्ड़ झेल के
लेते आना
टिकट लेते आना

तुम कमल का फूल खिलाना
पूरे भगवा रंग जाना
जय श्री राम बोल के
जट श्री श्याम बोल के
लेते आना
टिकट लेते आना

तुम बिन मतलब ही लड़ना
पंजे की उंगली पकड़ना
बिंदी साथ लेके
चूड़ी हाथ ले के
लेते आना
टिकट लेते आना

जनता की बात न करना
असली मुद्दों से बचना
कभी जेब फाड़ के
कभी झोला झाड़ के
लेते आना
टिकट लेते आना

✍️ चिराग़ जैन

तो क्या हुआ

तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है

जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है
अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है
जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है
भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता है
पत्ता-पत्ता झरना सीखा, तब जाकर मधुमास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है

फूल लदी डालों से जो तूफान भिड़े, वो महक उठे हैं
साजिंदे की उंगली से जो साज छिड़े, वो चहक उठे हैं
जिस राघव ने घर छोड़ा था, उसने पूरा युग जीता है
जिस रानी ने सुख मांगा था, उसका अंतर्मन रीता है
कैकेयी ने तो ख़ुद अपने ही जीवन में वनवास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है

खोने को तो पांचाली के पाँच सुतों ने जीवन खोया
लेकिन जो रण में जूझा था युग उसके ही शव पर रोया
काया वज्र बनानी है तो तय मानो, लोहा पीना है
उत्सव के हर इक कारण को एकाकी जीवन जीना है
शबरी ने जीवन भर आँसू भोगे, तब उल्लास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
✍️ चिराग़ जैन

कविता बुन लेता हूँ

शोर-शराबे में भी दिल की धड़कन सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ

इस दुनिया के छोटे-छोटे हिस्से घूम रहे हैं
लोग नहीं हैं, दो पैरों पर किस्से घूम रहे हैं
होंठों पर मुस्कान दिखी, मस्तक ग़मगीन दिखे हैं
हर चेहरे को पढ़कर देखो, कितने सीन लिखे हैं
इस सारी सामग्री में से मोती चुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ

देह भले ठहरी है लेकिन मन में चहल-पहल है
मौन धरा है अधरों पर और भीतर कोलाहल है
जिन आँखों में झाँका, उनमें ही संवाद भरा है
जो जितना चुप, उसमें उतना अनहद नाद भरा है
इस सरगम से मैं अपने गीतों की धुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ

मीठी यादों के तकिये पर सिर रखकर सोती है
मन पिघले तो दो आँखों की कोरों को धोती है
ठिठकी हुई खड़ी मिलती है किसी नदी के तीरे
कभी स्वयं ही चलकर आती, मुझ तक धीरे-धीरे
दो शब्दों के बीच जड़ी चुप्पी को सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
✍️ चिराग़ जैन

अब उसकी कुछ आस नहीं है

सूखी हुई नदी के तट पर नौका लेकर आने वाले
जिस कलकल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

चलते-चलते बहा पसीना, ठहर-ठहर कर नदिया सूखी
तू होता जाता था लथपथ, वो होती जाती थी रूखी
लहर-लहर लहरा-लहरा कर तुझको पास बुलाने वाले
जिस आँचल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

माना तूने इन राहों पर, दर्द सहा है, चुभन सही है
लेकिन तुझको इंतज़ार की घड़ियों का एहसास नहीं है
अपनी उम्मीदों की नौका, मन्ज़िल तक पहुंचाने वाले
जिस समतल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

हालातों से लड़ते-लड़ते कितनी नौकाएं टूटी हैं
उनका क्या चर्चा करना है, जिनसे धाराएँ रूठी हैं
इस क्षण का सारा सन्नाटा अपने भीतर पाने वाले
जिस हलचल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

कौन सही है, कौन ग़लत है -अब इसमें कुछ सार नहीं है
यही अंत है इस किस्से का और अधिक विस्तार नहीं है
सही-ग़लत की उलझी-उलझी गुत्थी को सुलझाने वाले
तू जिस हल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

इस तट पर जाने कितने ही प्राण पड़े हैं पत्थर होकर
तू भी वापिस ले जाएगा जग में अपनी काया ढोकर
जीवित होने के अभिनय से दुनिया को भरमाने वाले
जिस इक पल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है
✍️ चिराग़ जैन

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