Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक
दिन भर दुनिया भर के सब आघातों को सहते हैं
रात ढले अपनी दुविधा बस अम्मा से कहते हैं
इतने सीधे-सच्चे हैं हर छल से हिल जाते हैं
जब अपने बच्चों से मिलते हैं तो खिल जाते हैं
झट से ग़ायब हो जाती है चिंताओं की लीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक
छह दिन दफ्तर की चिक-चिक से थककर घर आते हैं
रस्ते से घर की ख़ातिर तरकारी भी लाते हैं
राशन, रिश्ते, आस-पड़ोसी, मंदिर, मेले-ठेले
इतना सब कुछ कर लेते हैं पापा सिर्फ़ अकेले
बिना थके एक्टिव रहते हैं पूरे-पूरे वीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक
गर्मी के मौसम में मैंगो-शेक पिला लाते हैं
सर्दी में मम्मी से गर्म भटूरे बनवाते हैं
मौक़ा मिलते ही हमको पिकनिक पर ले जाते हैं
थोड़े से पैसों में सारी ख़ुशियाँ ले आते हैं
सुख की रोज़ कताई करते रहते हैं बारीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक
नुक्कड़ के हर जमघट से निश्चित दूरी रखते हैं
लेकिन अपने घर की ख़ातिर सबसे लड़ सकते हैं
छुटकी की ट्यूशन के बाहर किस-किसका फेरा है
अख़बारों की हेडिंग के डर ने मन को घेरा है
ख़ुद डरकर भी हम बच्चों को रखते हैं निर्भीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक
हम घबराएं तो हिम्मत का ग्राफ बढ़ा देते हैं
दुनियादारी के आवश्यक पाठ पढ़ा देते हैं
छत पर ले जाकर तारों का लोक दिखा देते हैं
खेल-खेल में जीवन के सब ढंग सिखा देते हैं
कभी कभी बस आँखों से ही दे देते हैं सीख
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक
हुए रिटायर लेकिन घर के काम बहुत आते हैं
दूर-दूर के रिश्ते-नाते आप निभा आते हैं
ख़ुद जाकर निबटा लेते हैं सब पचड़े सरकारी
भात, सिंदारे, छूछक, मुंडन, श्राद्ध, मनौती सारी
उन्हें पता रहती है अब भी हिंदी की तारीख़
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक
तेज़ दौड़ती दुनिया से कुछ आगे ही रहते हैं
फुलवारी की चिंता करते जागे ही रहते हैं
तन से बूढ़े हैं पर मन से ख़ूब तने रहते हैं
हब सब बच्चों के सिर पर आशीष बने रहते हैं
पर अब भी रहता है उनका हर अनुमान सटीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
अपनेपन के बाहुपाश में
धड़कन ने ये शब्द सुनाए-
“अलग-अलग कर्त्तव्य रहें; पर
आपस का अधिकार बहुत है।”
बस इतना-सा प्यार बहुत है
सबकी अपनी-अपनी गति है, सबका अपना-अपना पथ है
सूरज के कुनबे में लेकिन, ना कोई इति है ना अथ है
हम-तुम अगर निकट से गुज़रे, इस अनवरत अथक घुर्णन में
तो आपस में टकराने की, इच्छा जन्म नहीं ले मन में
हम इक-दूजे के होने का कर पाएं सत्कार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है
उद्गम का हर इक कतरा तो साथ नहीं बहता जीवन भर
साथ नहीं होने का मतलब प्रतिद्वंदी होना कब है पर
पल-पल बनती और बिगड़ती लहर अलग हैं नदी एक है,
जिसमें हम सब तैर रहे हैं, इस युग की वह सदी एक है
अब तुम आगे, अब हम आगे, बहती जाए धार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है
सब नियमित संवाद कर सकें ऐसा कहीं प्रबंध नहीं है
रोज़-रोज़ मिलना सम्भव हो ऐसा भी अनुबंध नहीं है
पर मिलने का योग बने तो, सुख से खिल उठता वह क्षण हो
भावुक करती मुस्कानें हों, साँसें भरता आलिंगन हो
मुड़कर देखो हर रिश्ते में होठों का विस्तार बहुत है
बस इतना सा प्यार बहुत है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Hasya Kavita, Lapete Mein Netaji, Poetry
डेमोक्रेसी को बचा लो तुमको कुर्सी की कसम
इसकी टूटी नाव संभालो तुमको कुर्सी की कसम
जो अपने खेमे में है उसकी फाइल दबवा दो
जो विरोध करता हो उसकी कचहरी लगवा दो
इस आदत पर मिट्टी डालो तुमको कुर्सी की कसम
रामदेव के आंदोलन पर लाठीचार्ज कराया
अब पसली टूटी तो नैतिकता का पाठ पढ़ाया
भैया कुछ तो ठीक लगा लो तुमको कुर्सी की कसम
हरखू की रोटी का मुद्दा फिर फिर टल जाता है
ख़बरों में बाबाजी का बुलडोजर चल जाता है
रोटी के भी प्रश्न उठा लो तुमको कुर्सी की कसम
हम चुनाव पर आँख गड़ाकर बैठे घात लगाए
भूख, ग़रीबी, शिक्षा इनका जो हो वो हो जाए
अब ये साफ़-साफ़ कह डालो तुमको कुर्सी की कसम
नफ़रत, गाली, झूठ, सियासी दांव-पेंच और दंगा
इनका भगवा उनका हरिया, घायल हुआ तिरंगा
इन घावों पर लेप लगा लो तुमको कुर्सी की कसम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
ऐसे प्रश्नों की झड़ियां लगा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
है नाक में नकेल भाइयो
समन भेज कर पलट दिया है खेल समूचा ईडी ने
बिन बल्ले के शॉट लगाया कितना ऊँचा ईडी ने
ग्यारह घण्टे तक बैठाकर की है पूजा ईडी ने
जिनको कोई नहीं पूछता उनको पूछा ईडी ने
इनको कुर्सी की ताक़त दिखा दी, ये चकरी सी घुमा दी
बनी हुई है रेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
तुम नाराज़ हुए सिस्टम का यूज पर्सनल करने पर
ईडी-सीबीआई सबके अपने पीछे पड़ने पर
उनको ज्ञान सुनाते हो तुम यूँ मनमानी करने पर
तुमने भी तो बैठाए हैं दो-दो सीएम धरने पर
गहलोत जी की ड्यूटी लगा दी, चटाई सी बिछा दी
धरने पर हैं बघेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
कांग्रेस को खूब पता है कैसे क्या क्या होता है
किस दफ्तर से हुआ इशारा, किस दफ्तर का न्योता है
कौन भला किसके कहने पर किसके कपड़े धोता है
इनसे ज़्यादा किसे खबर है कौन कहाँ का तोता है
बीजेपी ने तुम्हारी मुनादी, तुम्हीं को सुना दी
पहचानो ये गुलेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
जिसके हाथ रहेगी सत्ता वो ही रंग दिखाएगा
जो विपक्ष में है वो नैतिकता की बात बनाएगा
ऑर्डिनेंस फाड़ा था तुमने तुमको याद न आएगा
कोई लाठी, कोई अपना बुलडोजर ले आएगा
सबने सिस्टम की धज्जी उड़ा दी, इमारत गिरा दी
ये ही है रेलम पेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
धुन: डोली में बिठाइके कहार…
अभी तो लगाई फटकार
जल्दी ही लेना पुचकार
जड़ दिया मुँह पर प्रवक्ता के ताला
नूपुर हुए हैं ख़ामोश
जो हमसे अब अपना दामन बचाय रहे
उनने ही भरा था ये जोश
लुट गया अचानक
लुट गया न जाने कैसे
लुट गया साहिब का प्यार
अभी तो लगाई फटकार
जो भी विरोधी मिला
उसको ही हमने जी भर के कर दिया ट्रोल
कल तक तो साहब को
खूब सुहाते थे अपने ये नफरत के बोल
अब काहे हो रामा
अब काहे ओ स्वामी मोहे
अब काहे रहे दुत्कार
अभी तो लगाई फटकार
फुनवा मिलाय दिया कोई बिदेसिया
मालिक के भर दीन्हे कान
हमको किनारे करके साहिब बचाय लीन्हा
अपनी छबि का नुक़सान
मुख मोड़ा, क्यों ऐसे
मुख मोड़ा क्यों ऐसे भला
मुख मोड़ा परवरदिगार
अभी तो लगाई फटकार
ट्विटर पे ऐसी-ऐसी गरिया सुनाई
किया नहीं किसी का लिहाज
अपनी प्रोफाइल पर लिख नहीं पा रहे
हम एक अक्षर भी आज
छिन गया हमारा
छिन गया सारा रोज़गार
अभी तो लगाई फटकार
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ख़ुश होते तो आँख चमकती
मन हँसता तो देह दमकती
डर लगता तो दिल की धड़कन
ख़ुद चेहरे तक आन धमकती
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
हाथ-पैर हिलते-डुलते हैं, पर मन में उत्साह नहीं है
साँसें आती हैं, जाती हैं पर जीने की चाह नहीं है
कैसी है ये हालत समझो
इसकी आज हक़ीक़त समझो
ये काया की आदत भर है
इसको ही जीवन मत समझो
बिन छत की दीवारें हैं ये, कैसे इन्हें मकान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
शब्द उगलना नित्य क्रिया है, मन कह पाना स्वर्गिक सुख है
कानों में जो शोर भरा है, उसमें केवल सत्य प्रमुख है
मेघ घिरे हैं, वृष्टि नदारद
आँख खुली हैं दृष्टि नदारद
जिसके भीतर मन टूटा हो
उसके हित यह सृष्टि नदारद
दो हाथों से छूने को ही क्या सच का अनुमान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
मुस्काना उसको कहते हैं, जिससे तन-मन खिल-खिल जाए
जीवन, जिसमें मन दीपक हो, रोम-रोम तक झिलमिल आए
कुंजगली अभिराम नहीं है
गोकुल है, घनश्याम नहीं है
उन महलों में सन्नाटा है
जिन महलों में राम नहीं है
जिसमें कोरी भौतिकता हो, उसको कब तक ज्ञान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
✍️ चिराग़ जैन