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एक ज़रा-सा झोंका

एक ज़रा-सा झोंका आया नैया ने खाये हिचकोले जिन लहरों पर तैर रही थी उन लहरों पर डगमग डोले बस इतने भर से इस पल में हम पूरे मुस्तैद हो गये अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये बदले-वदले भूल चुके हैं, सपने-वपने याद न आए जैसे भी हो इन लहरों से नैया पार लगा ली जाए...

सामाजिक जीवन

बाहर से जीते-जीते हैं, भीतर से हारे-हारे हैं पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं अपने सिर पर ओट रखी है, सारी दुनिया की सिरदर्दी इनकी दिनचर्या लगती है, घर भर को आवारागर्दी सामाजिक जीवन जीने की चाहत ने सब कुछ छीना है जो सबको जीवित रख पाये, वो जीवन इनको जीना...

पायल की रुनझुन

हर एक मुहूरत का जग में सत्कार मुझी से सम्भव है बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है बर्तन की खनखन चौके में पायल की रुनझुन आंगन में मेरे होंठो पर सजती है गीतों की गुनगुन सावन में जीवन के सोलह सपनों का सिंगार मुझी से सम्भव है बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार...

प्यार समझना मुश्किल क्यों है

इस दुनिया में प्यार रहे तो भावों का सत्कार रहे तो कितना प्यारा होगा ये संसार समझना मुश्किल क्यों है प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है किस्सा सुनकर मन सबका कहता है इसमें भूल हुई है बिन मतलब की दुनियादारी पाँखुरियों में शूल हुई है जो रांझे के साथ हुई थी...

अपनों से हारा लालकिला

जब लालकिला बदरंग हुआ हथियार चले हुड़दंग हुआ उस दिन पानी-पानी क्यों था सारा का सारा लालकिला अपनों से हारा लालकिला इस लालकिले ने कितने ही तख़्तों की उलट-पलट देखी साज़िश देखीं, धोखे देखे, इतिहासों की करवट देखी जब भी कोई दुश्मन आया, तब-तब हुंकारा लालकिला अपनों से हारा...

दिल्ली

रोज़ उजड़े, रोज़ सँवरे, इस शहर का दिल अलग है मत मिसालें दो हमारी, अपना मुस्तकबिल अलग है कुछ अलग है नूर दिल्ली का दिल बहुत मशहूर दिल्ली का खण्डहरों के साथ कितने युग खड़े हैं मुँह उठाए ख़ून में भीगी रही है साज़िशों के ज़ख़्म खाए पर इन्हीं सब साज़िशों ने रच दिया इतिहास जग में...
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