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ओशो कम्यून की पहली शर्त

ख़ुद से मिलने की ख़ुशी क्या होती है, इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैंने कम्यून में प्रवेश किया। हर चेहरे पर एक नैसर्गिक प्रसन्नता, हर आँख में एक प्राकृतिक चमक, हर पाँव में एक अनायास थिरक …उत्सव वहाँ आयोजित नहीं, घटित हो रहा था। वहाँ सब अपने पूरे अस्तित्व के साथ घूम रहे थे। वहाँ सब अपने पूरे अस्तित्व के साथ ख़ुश थे।
यत्र तत्र सर्वत्र मैरून रोब में ‘मनुष्य’ घूम रहे थे। मैंने पहली बार महसूस किया कि यदि तरतीब से उकेरा जाए तो हरियाली के बीच कंक्रीट की उपस्थिति भी ख़ूबसूरत लगने लगती है। कम्यून में कहीं भी प्रकृति से होड़ नहीं दिखाई देती, बल्कि ऐसा अनुभूत होता है कि कोई पूर्ण मनुष्य प्रकृति के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा हो गया होगा और प्रकृति ने ‘सहर्ष’ उसे स्वीकार लिया होगा। यही कारण है कि पूरे परिसर में प्रकृति और मनुष्य के मध्य परस्पर ‘अभय’ का सम्बंध है।
जब मैं चाय लेने के लिए काउंटर पर गया तो एक मोर अपने गज भर लंबे पंखों के साथ मेरे आगे क्यू में लगा हुआ था। दिन में प्लाजा में बैठे थे तो एक कौवा मनुष्यों के साथ अपने पूरे अस्तित्व के साथ सहज ही बैठा रहा।
मन में आह्लाद लिए जब कोई मनुष्य वंश-झुरमुट के पास से गुज़रता है तो वयोवृद्ध बांस भी हवा का हाथ थामकर अंगड़ाई लेने लगते हैं। उस समय बांस के परस्पर स्पर्श से जो आवाज़ उत्पन्न होती है वह किसी पुराने किवाड़ के खुलने का स्वर है। सचमुच, उस परिसर में विवेक के कपाट खुलने लगते हैं। सचमुच, उस परिसर में सोच ख़ूबसूरत होने लगती है। सचमुच उस परिसर में काग का कर्कश स्वर भी जीवन के अनवरत संगीत का सहयोग करने लगता है।
नृत्य और हास्य; इन दो तत्वों से परिसर का वातावरण लबालब भरा हुआ है। और इन्हीं दोनों तत्वों ने पूरे परिसर को आनंदधाम बना दिया है। परिसर की वनस्पति इस पवित्र आनंद से एकाकार हो चुकी है। यही कारण है कि सूर्य की रोशनी भी कम्यून की धरती को स्पर्श करने से पहले पेड़ों की शीतलता से कर-प्रक्षालन कर लेती है।
ओशो समाधि के पीछे एक लगभग जंगल जैसा रास्ता भोजनालय की ओर जाता है। इस रास्ते पर कहीं पेड़ के नीचे बुद्ध की मूर्ति रखी दिखाई देती है, तो कहीं बुद्धत्व की एकांत साधना में तिष्ठ कोई साधक दिखाई दे जाते हैं। एकांत और मौन कितना सुंदर होता है, यह इस छोटे से जंगल में पता चलता है।
भोजन करने के बाद हम ओशो समाधि पर गए। लगभग 25-30 मिनिट उस स्थान पर बैठकर मैंने मौन का सुख भोगा। मैंने महसूस किया कि जब कान दुनियावी आवाज़ों से फ़ुरसत पाते हैं तो कुछ देर तक मन मुखर हो जाता है और जब मन भी अवाक् हो जाता है, तब जो घटित होता है …वह आनंदातीत है।
मैंने अनुभव किया उत्सव तक पहुँचने के लिए निश्छल होना प्रथम वरीयता है। उत्सव आसान काम नहीं है। उत्सव के लिए संपूर्ण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसीलिए उत्सव मनाते समय मन को अपनी समस्त चेतना एकाग्र करनी होती है। तब कहीं जाकर भीतर के टर्बाइन घूमते हैं, तब कहीं जाकर विद्युत उत्पन्न होती है, तब कहीं जाकर जीवन उज्ज्वल हो उठता है।
इस प्रक्रिया में अन्यत्र ध्यान ले जाने की गुंजाईश ही नहीं है। इस प्रक्रिया में ध्यान भटकाने का स्कोप ही नहीं है। इस प्रक्रिया में किसी अनुसरण का होश ही नहीं है। इस प्रक्रिया में कोई प्रक्रिया ही नहीं है। इसीलिए वहाँ हर व्यक्ति अपने पूरे अस्तित्व के साथ उत्सवमयी था।
कोई एकांत में बैठकर ध्यान कर रहा है, तो कोई पिछले द्वार पर बनी दो समाधियों के पास चटाई बिछाकर सो रहा है। कोई किसी वृक्ष से आलिंगनबद्ध है, तो कोई बस यूँ ही किसी शिला पर बैठकर वातावरण को जी रहा है। कोई आते-जाते मनुष्यों को साक्षीभाव से निहार रहा है तो कोई प्रकृति के अनवरत अनायास संगीत पर थिरक रहा है। कहीं मेज के चारों ओर कुर्सियाँ बिछाकर ठहाकों का रॉक शो हो रहा है तो कहीं स्वादिष्ट भोजन के चटखारे से स्वाद की ग्रंथियां सरस हो रही हैं।
शाम होते-होते मैरून मनुष्य श्वेतवर्णी हो उठे। बड़े से जलाशय के मध्य काले पत्थर से बने रास्ते को ये श्वेताकृतियाँ जब समूह में पार करती हैं, तो किसी कल्पनालोक का दृश्य उपस्थित होता है। सरोवर के श्यामल दर्पण में जब इन श्वेतवसनधारियों का प्रतिबिंब बनता है तो ऐसा लगता है मानो रात के निविड़ अंधियारे में हंस तैर रहे हों।
ऐसे न जाने कितने ही एल्बम छप गए हैं मेरे अंतस पर। दो दिन के प्रवास के बाद जब शाम को कवि-सम्मेलन प्रारम्भ हुआ तो ऐसा लगा, जैसे ये सब लोग इतने दिन से यही तैयारी कर रहे थे कि हँसी की किसी बात पर ठहाका लगाने से चूक न जाएँ। इतनी सहज खिलखिलाहटें, इतने निश्छल ठहाके, इतनी नैसर्गिक हँसी… मैं काव्यपाठ के दौरान आनंद से भर रहा था। मैंने पहली बार अपने भीतर से फूटती हँसी का स्वाद चखा।
दो दिन का कम्यून जीकर मैं पुनः घर लौट आया हूँ, लेकिन इस बार मैं अपने भीतर रत्ती भर ओशो चुरा लाया हूँ, जो रह रहकर मुझे मेरे अस्तित्व से मिलवाते रहेंगे।

✍️ चिराग़ जैन

आँख भर आई

रास्ता दूभर बहुत था
हारने का डर बहुत था
राह की धरती नहीं थी
चाह का अम्बर बहुत था
जूझने में व्यस्त थे, सुबकी नहीं आई
जीतने पर आँख भर आई

ज़िन्दगी की नाव की पतवार का एहसास भी था
साथ ही इस अनकहे से प्यार का आभास भी था
यूँ समझ लो, द्वार पर शिशुपाल भी था, कंस भी था
और मन के कुंजवन में अनवरत इक रास भी था
और उस पर रीतियों का बोझ हरजाई
जीतने पर आँख भर आई

देह के संवाद पर सब दोस्त-यारों की नज़र थी
और मन के हाल पर बस चांद-तारों की नज़र थी
हम निरंतर शुष्क होती कोंपलों से काँपते थे
पर हमारी डालियों पर भी बहारों की नज़र थी
एक दिन ख़ुद ही समूची डाल हरियाई
जीतने पर आँख भर आई

एक दिन पाया बिवाई में महावर भर गया है
एक दिन देखा हर इक निःशब्द में स्वर भर गया है
पीस की हर टीस सहकर अब हथेली रच उठी है
और इक सौभाग्य का क्षण मांग आकर भर गया है
हर पुरानी याद मुस्काई
जीतने पर आँख भर आई
✍️ चिराग़ जैन

साहित्य बर्बरीक है

साहित्य करुणा से उपजता है। साहित्य संवेदना से जन्म लेता है। ‘आह से उपजा होगा गान’ -यही ‘आह’ साहित्य की सर्जना का बीज है। यही कारण है कि साहित्य सदैव कमज़ोर की आवाज़ बनता है।
साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो महाभारत के युद्ध में बर्बरीक की थी। वह न पाण्डवों के पीछे खड़ा है, न ही कौरवों के पीछे। क्योंकि साहित्य जानता है कि कोई भी दल हर हाल में निर्दोष नहीं हो सकता और कोई भी दल हर हाल में दुष्ट नहीं होता। इसीलिए बर्बरीक घोषणा करते हैं कि युद्ध में जो हारने लगेगा, मैं उसकी ओर से लड़ने लगूंगा। ठीक यही घोषणा साहित्य की मूल प्रवृत्ति है।
जीतता हुआ मनुष्य अपनी नैसर्गिक विनम्रता खोने लगता है। इसीलिए विजयी को देखकर उन्माद फूटता है, आह नहीं। सत्ताधीश इतिहास का नायक हो सकता है, साहित्य का नहीं। आपने कभी सुना भी न होगा कि विजेता का ही ‘साहित्य’ लिखा जाता है। क्योंकि विजयी के यहाँ साहित्य का कच्चा माल है ही नहीं।
जहाँ पीड़ा होगी, साहित्य वहीं उपजेगा। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि साहित्यकार पीड़ित के पीछे नहीं, बल्कि पीड़ा के पीछे चलता है। यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि साहित्य सत्ताधीश के विरुद्ध न होकर सत्ताभिमान के विरुद्ध होता है।
कठोर होना सत्ता की विवशता है। किन्तु इस विवशता को प्रवृत्ति बनने में देर नहीं लगती। इस अपरिहार्यता को अन्याय बनने में समय नहीं लगता। और जिस क्षण यह कठोर, क्रूर बना; ठीक उसी क्षण साहित्य उसके विरुद्ध खड़ा मिला। क्रूरता और करुणा का परस्पर विरोध सर्वविदित है।
जो इंदिरा गांधी आपातकाल के समय कड़ी साहित्यिक आलोचना झेल रही थीं, उन्हीं की हत्या पर साहित्य की आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी थी। जो अटल बिहारी वाजपेयी अनवरत विपक्ष में रहते हुए साहित्य का अनवरत समर्थन पाते थे, उन्हीं के प्रधानमंत्री बनने के बाद साहित्य ने उनके अनेक निर्णयों की चुटीली आलोचना की। जो राहुल गांधी प्रधानमंत्री का अध्यादेश फाड़ने के बाद साहित्य की तीखी आलोचना के शिकार हुए, उन्हीं को पदयात्रा के बाद साहित्यिक गलियारों का कमोबेश समर्थन मिलने लगा।
यहाँ कोई इंदिरा जी, कोई अटल जी या कोई राहुल गांधी महत्वपूर्ण नहीं है। अपितु इनकी परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण हैं।
यही राहुल गांधी अपनी पार्टी के लोगों को उपलब्ध नहीं होते तो यही साहित्य वहाँ उनकी खिंचाई करने से नहीं चूकता। क्योंकि कांग्रेस मुख्यालय में राहुल गांधी सत्ताधीश हैं। इसलिए यह समझना होगा कि साहित्य का काम वंचित और सत्ता के मध्य संतुलन स्थापित करना है।
यदि साहित्य बर्बरीक की भूमिका न निभाए तो सत्ताधीश को आततायी बनने में देर नहीं लगेगी। और यदि साहित्य कर्ण की भाँति दुर्योधन के दुर्गुण देखते हुए भी उसे टोकने से परहेज करेगा तो वह दुर्योधन का मित्र नहीं अपितु कुरुवंश का आत्मघाती शत्रु सिद्ध होगा।

✍️ चिराग़ जैन

इमारत और झोंपड़ी

झोंपड़ी को यह नहीं भूलना चाहिए
कि बड़ी इमारत का मलबा भी
झोंपड़ी से ऊँचा होता है।

और मलबे को भी
यह नहीं भूलना चाहिए
कि मलबा
कितना भी ऊँचा हो जाए,
उसे इमारत नहीं कहा जा सकता।

इमारत ध्यान रखे
कि चाटनेवाले दीमक कहलाते हैं
और
मरम्मत की आवाज़ें
शोर होती हैं, संगीत नहीं!

झोंपड़ी ध्यान रखे
कि इमारत पर कीचड़ फेंकेगी
तो ओछी कहलाएगी
और अपना आंगन लीपती रहेगी
तो मज़बूत भी बनी रहेगी
और सुन्दर भी!

✍️ चिराग़ जैन

आराम का एक दिन

रात काटें जागकर हम
दिन बिताते भागकर हम
व्यस्तता से घिर रहे हैं
क्यों उनींदे फिर रहे हैं
इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो
आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो
व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन ऐसा चुरा लें
काश बेपरवाह होकर आँख मूंदें, मुस्कुरा लें
याद की कुछ गठरियाँ खोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

पिंडलियों में नींद के अन्याय की पीड़ा भरी है
भृकुटियों पर एक मुद्दत से बहुत चिंता धरी है
भीड़ के जंजाल से हटकर कभी एकांत बुन लें
शांत हों इतने कि अपनी देह की आवाज़ सुन लें
एक दिन ख़ुद के लिए रो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

विश्व का हमने कोई कर्जा नहीं खाया हुआ है
किसलिए मुस्कान का ये झूठ चिपकाया हुआ है
एक दिन बस एक दिन की ज़िंदगी का लुत्फ़ ले लें
जीतने और हारने से दूर होकर खेल खेलें
ज़िंदगी में ज़िन्दगी बो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

✍️ चिराग़ जैन

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