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ओशो कम्यून की पहली शर्त

ख़ुद से मिलने की ख़ुशी क्या होती है, इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैंने कम्यून में प्रवेश किया। हर चेहरे पर एक नैसर्गिक प्रसन्नता, हर आँख में एक प्राकृतिक चमक, हर पाँव में एक अनायास थिरक …उत्सव वहाँ आयोजित नहीं, घटित हो रहा था। वहाँ सब अपने पूरे अस्तित्व के साथ घूम...

आँख भर आई

रास्ता दूभर बहुत था हारने का डर बहुत था राह की धरती नहीं थी चाह का अम्बर बहुत था जूझने में व्यस्त थे, सुबकी नहीं आई जीतने पर आँख भर आई ज़िन्दगी की नाव की पतवार का एहसास भी था साथ ही इस अनकहे से प्यार का आभास भी था यूँ समझ लो, द्वार पर शिशुपाल भी था, कंस भी था और मन के...

साहित्य बर्बरीक है

साहित्य करुणा से उपजता है। साहित्य संवेदना से जन्म लेता है। ‘आह से उपजा होगा गान’ -यही ‘आह’ साहित्य की सर्जना का बीज है। यही कारण है कि साहित्य सदैव कमज़ोर की आवाज़ बनता है। साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो महाभारत के युद्ध में बर्बरीक की...

इमारत और झोंपड़ी

झोंपड़ी को यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़ी इमारत का मलबा भी झोंपड़ी से ऊँचा होता है। और मलबे को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि मलबा कितना भी ऊँचा हो जाए, उसे इमारत नहीं कहा जा सकता। इमारत ध्यान रखे कि चाटनेवाले दीमक कहलाते हैं और मरम्मत की आवाज़ें शोर होती हैं, संगीत नहीं!...

आराम का एक दिन

रात काटें जागकर हम दिन बिताते भागकर हम व्यस्तता से घिर रहे हैं क्यों उनींदे फिर रहे हैं इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें आओ कुछ पल चैन से सो लें एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन...
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