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कौन क़तरा है

ख़र्च ही भेजना रिश्ता नहीं साबित करता
प्यार कितना है, ये पैसा नहीं साबित करता

बस यही बात उसे सबसे बड़ा करती है
वो किसी शख़्स को छोटा नहीं साबित करता

ख़ुद ही दिख जाती है परबत की बुलन्दी सबको
ख़ुद को आकाश भी ऊँचा नहीं साबित करता

सच तो अपनी ही हक़ीक़त बयान करता है
वो किसी और को झूठा नहीं साबित करता

सबको आगोश में भर लेता है आगे बढ़कर
कौन क़तरा है, ये दरिया नहीं साबित करता

रौशनी कितनी है ये बात बताता है ’चिराग़’
कितना गहरा था अंधेरा, नहीं साबित करता।

✍️ चिराग़ जैन

हाल-ए-हक़ीक़त

गुलों को ख़्वाब चमन के दिखा के छोड़ दिया
सवेरे हाल-ए-हक़ीक़त बता के छोड़ दिया

शिकस्त मुझसे बढ़ा देती दुश्मनी उसकी
उसे शिकस्त के नज़दीक ला के छोड़ दिया

अब अपने सच की गवाही कहाँ-कहाँ दूँ मैं
बस उनके झूठ से पर्दा हटा के छोड़ दिया

ज़माना उसके तरन्नुम में क़ैद है अब तक
जो गीत मैंने कभी गुनगुना के छोड़ दिया

मुझे नसीब भला आज़मा के क्या देखे
उसे ही मैंने अभी आज़मा के छोड़ दिया

वो सुर्ख़ हो गयी मेरी ज़रा-सी ज़ुर्रत से
फिर उसने हाथ मेरा मुस्कुरा के छोड़ दिया

✍️ चिराग़ जैन

हारने का डर

फूल, ख़ुश्बू, रंग तो मौसम चुरा ले जाएगा
कौन लेकिन बाग़बां का हौंसला ले जाएगा

हो गए बर्बाद तो फिर जश्न होना चाहिए
देखते हैं वक़्त हमसे और क्या ले जाएगा

जीतने की चाह छोड़ी, अब निभाकर दुश्मनी
हारने का डर मेरा दुश्मन लिवा ले जाएगा

दस्तख़त बेटे की ज़िद पे कर के बूढ़े ने कहा-
“क्या लुटा सकता था मैं, तू क्या लिखा ले जाएगा“

इल्म वाले बस तकल्लुफ़ में फँसे रह जाएंगे
ज़िन्दगी की मौज कोई सिरफिरा ले जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

गुनाहों का एहतराम

दिल में उग आए गुनाहों का एहतराम करें
काम यूँ झूठे दिखावे का हम तमाम करें

बाद मरने के क़सीदे तो पढ़ेंगे सब ही
लोग कुछ हों, जो हमें जीते जी सलाम करें

ज़ीस्त! हम कर चुके जो तेरे साथ करना था
मौत अब आ मरे तो उसका इंतज़ाम करें

इस तरह अक़्ल पे तारी हो नश्अ बोतल का
वाइज़ आए कोई मिलने तो राम-राम करें

हमने तहज़ीब में जिन-जिन से करी है तौबा
वो सारे काम करें, और सुब्हो-शाम करें

✍️ चिराग़ जैन

गोपालदास नीरज जी के निधन पर

ये निशा आज फिर नीरज-निशा कहाएगी
बस क्षोभ यही; इसमें अब वैसा नूर नहीं
ग़ज़लें बाक़ी हैं, गीत बचे हैं अनगिन पर
ये आज तुम्हारे स्वर सुख से भरपूर नहीं

तुम गीत नहीं रचते थे, जादू करते थे
दर्शन की देहरी पर श्रृंगार सजाते थे
रस की गगरी के चातक बड़े छबीले थे
शब्दों की टोली से कितना बतियाते थे

जब आज शाम मैंने सूरज को देखा था
वह लिए शरारत भरे नयन इतराता था
अब जाना उसकी इस इतराहट का मतलब
वह तुम्हें मनाकर साथ लिवाए जाता था

जग को लगता है यही कि ’नीरज’ मौन हुआ
दरअस्ल कारवाँ और बढ़ाने निकले हो
धरती की गोद हरी कर के कविताओं से
अब नभ भर को गीतिका सुनाने निकले हो

थक जाना या चुक जाना; वह भी ’नीरज’ का
मालूम नहीं जलवा नादान ज़माने को
महफ़िल-महफ़िल तुम स्वयं बताते फिरते थे
सदियाँ कम हैं ’नीरज’ की याद भुलाने को

✍️ चिराग़ जैन

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