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वही बात फिर…

किसी ख़्वाब को आज छू कर के देखें
अमां अब कोई आरज़ू कर के देखें

जिस इक बात पर हमसफ़र बन गए हम
वही बात फिर हू-ब-हू कर के देखें

ख़मोशी की राहें जुदा कर रही हैं
घड़ी दो घड़ी गुफ़्तगू कर के देखें

जहाँ से मरासिम फ़ना हो गया था
वहीं इक दफ़ा फिर शुरू करके देखें

कोई ज़ख़्म दिल को दुखाने लगा है
चलो आँसुओं से वजू कर के देखें

तकल्लुफ़ हटेगा, क़रीबी बढ़ेगी
जहाँ आप था, उसको तू करके देखें

✍️ चिराग़ जैन

कमी

मरने की चाह, ज़िन्दगी जीने से कम रही
लहरों की चाल मेरे सफ़ीने से कम रही

दौलत की चमक सबसे ज़ियादा रही मग़र
मजदूर के माथे के पसीने से कम रही

सेहरा की तेज़ धूप में भी तिश्नगी तो थी
पर हिज्र में सावन के महीने से कम रही

ताउम्र मैं ख़ुशी की शक्ल भूल न पाया
आफ़त भी मेरे पास क़रीने से कम रही

✍️ चिराग़ जैन

एयर इण्डिया

बादलों के बीच तैरता
भारतीयता का रिवाज़ देखिए
आइए साहब
एयर इंडिया का जहाज देखिए

जब ये जहाज उड़ता है ना आसमान में
तो यह अकेला नहीं उड़ता
इसके साथ उड़ती हैं
हज़ारों आँखों की आशाएं
सुरक्षा की सारी परिभाषाएं
किसी की प्रतीक्षा से किया गया वादा
किसी का जीवन बचा लेने का इरादा
किसी का सपना पूरा करने की चाह
किसी का कॅरियर बना देने की परवाह
इस जहाज को
हम भारतीयों ने अपने श्रम से पोसा है
यह जहाज हर मंज़िल पर
सुरक्षित पहुँचने का भरोसा है

जब कोई विदेश जाता है इस जहाज से
तो यात्रा में उसको
अपनत्व का परिवेश मिलता है
विदेश की धरती पर कदम रखने से
एक क्षण पहले तक
उसे आसपास अपना देश मिलता है

सिपाही को मोर्चे पर पहुँचाना हो
आपदा के समय पर
मानव धर्म निभाना हो
मुसीबत में फँसे अभागों की
मदद का सवाल हो
बाढ़ हो, सूनामी हो,
अकाल हो या भूचाल हो
एयर इंडिया का जहाज
हर समय तैनात रहता है
हर मुश्किल में
अपने देशवासियों के साथ रहता है

भीतर झाँको
तो यात्रा की थकान के बीच
सुकून भरी निंदिया है
बाहर से देखो तो
आसमान के माथे पर
सजावटी बिंदिया है
जी साहब
ये एयर इंडिया है
जी हुज़ूर
ये एयर इंडिया है

✍️ चिराग़ जैन

फूल का क़त्ल

हार का ख़ौफ़ गुनहगार बना देता है
जीत की चाह कभी वार नहीं कर सकती

हाथ वहशत की ग़ुलामी पे अड़े थे, वरना
फूल का क़त्ल तो तलवार नहीं कर सकती

बेच दी होगी चकाचौंध में ग़ैरत उसने
भूख इंसान को ग़द्दार नहीं कर सकती

रौशनी नूर तो आलम पे लुटा सकती है
पर अंधेरे को गिरफ़्तार नहीं कर सकती

अश्क़ अशआर के लहज़े में बयां होते हैं
आशिक़ी दर्द को अख़बार नहीं कर सकती

✍️ चिराग़ जैन

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