Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
दशकों तक परिश्रम करके तंत्र ने जनता को इतना सहनशील बनाया है कि लाख परेशानियाँ सहकर भी जनता शिक़ायत करने से परहेज करे। हम गाहे-बगाहे सत्ता और राजनीति को कोसते हैं। टेलिविज़न के सामने बैठकर राजनेताओं को भ्रष्ट कह लेते हैं; लेकिन हमारे सामने कुर्सी पर बैठा क्लर्क सामने खड़ी जनता को इंतज़ार करने के लिये छोड़कर फोन पर इश्क़ फरमा रहा होता है और हम उसे टोकने की जेहमत नहीं उठाते। खिड़की के उस पार बैठी महिला बराबरवाली महिला से कुरकुरी भिंडी की रेसिपी समझ रही होती है और हम खिड़की के इस पार खड़े भिंडी पक जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
अब तो हमारी सहनशीलता का इतना विकास हो चुका है कि निजी सेवाक्षेत्र, जो ‘क्लाइन्ट सेटिस्फेक्शन फर्स्ट’ जैसे सिद्धांतों के साथ काम करता था, वह भी अब हमें क्लाइंट नहीं, जनता समझने लगा है। वे भी जान गये हैं कि इन्हें परेशान करके कभी कोई नुक़सान नहीं होगा; क्योंकि जब कोई ख़ुद को क्लाइंट समझकर हमसे हमारी ख़राब सर्विस की शिकायत करेगा तब उसके पीछे हमारी उसी ख़ामी को झेल रहे सैंकडों लोग जनता की तरह मौन खड़े रहेंगे। उस समय बर्दाश्त करनेवालों के अनुपात में प्रतिक्रिया करनेवाला वह बेचारा अल्पमत में होने के कारण तर्कों के साथ हार जायेगा और ख़ामोश खड़े रहकर तमाशा देखनेवाले बहुमत के साथ जीत जायेंगे। इन जीते हुए लोगों में से अनेक मन ही मन उस प्रतिक्रियावादी का सम्मान करेंगे, कुछ उसे झगड़ालू और कलेशी कहेंगे, कुछ उस पर हँसेंगे और वह एक अकेला भी धीरे-धीरे सहनशील जनता की भीड़ में शामिल हो जायेगा।
पिछले दिनों एक निजी एयरलाइंस में क्रू के किसी दुर्व्यवहार का विरोध करने पर एक प्रतिक्रियावादी को पूरे क्रू ने जहाज से उतरते ही ज़मीन पर गिरा-गिराकर पीटा, पर शेष जनता चुपचाप देखती रही। निजी कंपनियाँ ‘कंपनी पॉलिसी’ के नाम पर आपकी किसी भी समस्या का समाधान करने से पल्ला झाड़ लेती हैं और आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते क्योंकि उनकी शिक़ायत लेकर आप जहाँ जाएंगे, उन थानों और न्यायालयों में आप पहले ही ‘जनता’ सिद्ध हो चुके हैं। वहाँ आपको दुर्व्यवहार और प्रतीक्षा करवाने में तंत्र को कोई आपत्ति नहीं होती, क्योंकि जब इन संस्थाओं में ऐसा चलन शुरू हुआ होगा तब भी मौन रहनेवाले ऐसे ही प्रतिक्रिया करनेवालों पर हँसे होंगे।
‘कौन पचड़े में पड़े’; ‘अपना काम बनता…’ और ‘हमें क्या लेना-देना’ जैसे जुमले बोलनेवाले लोग जब सिस्टम की ख़ामियों का रोना रोते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई बलात्कारी भेड़िया, स्त्रियों की सुरक्षा का भाषण दे रहा हो। सरकारी नीतियों में सुधार के सपने देखनेवालों को यह समझना होगा कि अच्छी या बुरी, जो भी वर्तमान नीतियाँ हैं, उनके क्रियान्वयन का ज़िम्मा उसी व्यक्ति का है, जो टेबल के उस तरफ़ बैठा फोन पर चौपाल जमा रहा है। यदि उसके इस आचरण पर उसे टोका न गया तो उसकी ख़ामी सरकार को कभी नहीं दिखाई देगी, क्योंकि सरकार के सामने वह कभी लापरवाही नहीं करता।
इस देश में रोज़ लाखों लोग सिस्टम के सामने लाचार खड़े रहते हैं और करोड़ों लोग राजनीति को कोसने में व्यस्त रहते हैं। इस देश में भारत के लोककल्याणकारी राज्य होने का संविधानी दावा रोज़ सैंकड़ों मौत मरता है लेकिन हम मान बैठे हैं कि केवल राजनीति को गाली देकर ही अपने साथ हुए अन्याय की भड़ास निकालना उचित है, क्योंकि अन्याय करनेवाले को डायरेक्ट कुछ कहा तो वह हमारे काम को और मुश्किल कर देगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
सड़कों पे आया रे किसान, देखे संसद को
पलकों पे आँसू के निशान, देखे संसद को
अपनी सियासत तुम ही संभालो
पैरों में चुभा बस काँटा निकालो
रूठ गए हैं जो, उनको मना लो
इनसे न बनो अनजान, देखे संसद को
अपनों से अपनों की कैसी लड़ाई
जनता है छोटी, तुम हो बड़ भाई
उनकी अड़ाई, तुम्हारी कड़ाई
ऐसे न होगा समाधान, देखे संसद को
सही और ग़लत के न पेंच लड़ाओ
घर की लगी है जो उसको बुझाओ
वो रूठे हैं तो तुम मान जाओ
किसी का न होगा नुक़सान, देखे संसद को
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
मेरो काट दयो चालान, हाय राम
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ
मेरी सूख रही है जान, भगवान
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ
इत कू सिगनल झपकी देवै, उतै पुलिसिया घूरै
जेब सहम कर हाथ पकड़ ले, अण्टी झूला झूलै
मेरो भटक गयो है ध्यान, भगवान
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ
जहाँ नैक गीयर बदलें वां बैरीगेट लगावैं
सड़कन पर गड्ढे ही गड्ढे, कैसे तेज चलावैं
हम उछलैं धूम-धडाम, भगवान
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ
पन्द्रह साल पुरानी लूना, कण्डम में डरवाय दई
मफलर वाले ने दिल्ली में, ईवन-आॅड लगाय दई
इक बार ही ले लो प्रान, हे राम
मेरो आज सकूटर बिक जायगौ
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।
काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?
मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो… लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose, Quotation
राजनीति की स्क्रिप्टिंग और प्रशासन का अभिनय देखकर लगता है कि उत्तर प्रदेश में फ़िल्म इंडस्ट्री बनाने का विचार निराधार नहीं था।
✍️ चिराग़ जैन