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बलात्कार की जड़ें

बलात्कारी कहीं आसमान से नहीं आते। हम जैसे ही सामान्य दिखनेवाले लोग होते हैं, ये वीभत्स अपराधी। स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कुछ बातें बनाई जाती हैं, उनकी निस्सारता हर बार उघड़कर सामने आती है। हमारे यहाँ रात-बेरात लड़कियों को अकेली जाने पर मनाही थी। लेकिन निर्भया काण्ड से पता चला कि किसी का साथ होना भी काम नहीं आता। बुलन्दशहर कांड में तो पिता के सामने माँ-बेटी को एक साथ रौंदा गया।
अब रात और दिन का भी कोई अर्थ नहीं रहा। हवस ने अब घड़ी देखना बन्द कर दिया है। बलात्कारी भी शेष समाज की तरह अमीर-ग़रीब, शिक्षित-अशिक्षित, अगड़े-पिछड़े, हिन्दू-मुस्लिम कई प्रकार के होते हैं। अमीर बलात्कारी यकायक किसी को खेत में जाकर दबोचने से परहेज करता है। वह बाक़ायदा आर्थिक, सामाजिक अथवा अन्य किसी प्रकार का दबाव बनाकर लड़की के साथ इत्मीनान से सालों तक बलात्कार कर सकता है। जबकि ग़रीब बलात्कारी के पास न तो ऐसा कोई लोभ होता है, न धैर्य। इसलिए वह मौक़ा देखते ही वीभत्स होने में यक़ीन करता है।
कुछ विशेष किस्म के बलात्कारी घर से यह सोचकर नहीं निकलते कि उन्हें बलात्कार करना है। वे तो बस हाथ आये अवसर का लाभ उठाते हुए कभी लड़की की छातियाँ मसलते दिखते हैं तो कभी दंगों या बलवों का लाभ उठाकर लूटपाट के साथ बलात्कार भी कर देते हैं। यह सब इतना अचानक घटित होता है कि न तो बलात्कारी को पुलिस की वर्दी बदलने का वक़्त मिलता है, न ही किसी धर्म विशेष का पटका गले में से उतारने की सुधि रहती है। शायद बलवों में विरोधी धर्म की बहन-बेटियों की आबरू लूटना वीरता माना जाता हो। अन्यथा किसी धर्म की रक्षार्थ निकले जत्थों में एक न एक व्यक्ति तो इस कर्म का विरोध करने के लिए आगे ज़रूर आता।
हर दुर्दांत कांड के बाद हम सरकार से कड़े कानूनों की मांग कर बैठते हैं। सरकारें भी अपनी राजनीति बचाने के लिए क़ानून बना देती हैं, लेकिन जब भी कोई लड़की अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अथवा किसी से अन्य बदला लेने के लिए इन कानूनों का दुरुपयोग कर रही होती है, तब वह किसी नए बलात्कार की नींव रख रही होती है। जब-जब इन कानूनों का दुरुपयोग होता है तब-तब समाज ऐसी घटनाओं के प्रति संवेदनहीन होता जाता है।
हैदराबाद, बुलंदशहर, कानपुर, हाथरस, अलवर, दिल्ली, गुवाहाटी… ये सब शहर ऐसी घटनाओं पर शर्मिंदा होकर अपनी बेटियों के आगे लज्जित हो चुके हैं। कॉलेज परिसर से लेकर खेत-खलिहानों तक और न्याय के मंदिर से लेकर धर्म के मंदिरों तक इस अपराध ने पैर पसारे हैं। यौन-कुंठित नपुंसकता जब पौरुष का भरम पाल लेती है, तब बलात्कार होता है। अत्याधुनिक बनने की होड़ जब ‘ओपन माइंडेड कल्चर’ की आड़ में असभ्य शब्दावली को सामान्य मानने लगती है, तब बलात्कार होता है।
स्कूल से निकलती बच्चियों से लेकर कचरा बीनती अधेड़ तक; तीन महीने नई नवजात से लेकर 80 वर्ष की वृद्धा तक, असुरक्षा के इस अभिशाप को झेलती हैं। मतलब साफ़ है, बलात्कार किसी शारीरिक सुख की प्राप्ति का ज़रिया नहीं, बल्कि पाशविक प्रवृत्ति के मुखर हो जाने का परिणाम है। और इस प्रवृत्ति को खाद-पानी देने में समाज का प्रत्येक वर्ग समान अपराधी है।
हम सबको अपने समाज में पनप रही इस पशुता को अपने-अपने स्तर पर नष्ट करना होगा, क्योंकि तंत्र से अपेक्षा रखकर हम अब तक कई बेटियों की ज़िंदगी बर्बाद कर चुके हैं।

✍️ चिराग़ जैन

राजभाषा का निरीक्षण

जिस समस्या का कोई समाधान न हो उस समस्या को ही समाधान मान लेना चाहिए। इस महान विचार से प्रेरित होकर हम समाधान को समस्या बना देने में निष्णात हो गए।
देश को स्वतंत्रता मिली तो राजभाषा का प्रश्न उठा। प्रश्न उठते ही हमने वही किया जो हम करते आए हैं। हमने धड़ल्ले से राजभाषा के विभाग खोल दिये। थोक के भाव निदेशालय और संस्थान बनाकर हिंदी को सरकारी तंत्र में ऐसा उलझाया कि प्रश्न उठानेवालों की बोलती बंद हो गई। स्वयं हिंदी को निरीक्षणों और तिमाही रपट के ऐसे थर्ड डिग्री टॉर्चर मिलने लगे कि हिंदी आज तक उस आदमी को कोस रही है जिसने उसके उत्थान का प्रश्न उठाया था।
क्या ज़रूरत थी यह सब करने की। अच्छी-भली लोगों के मुँह पर चढ़ी थी। उसे उठाकर सरकारी दफ़्तरों में ला पटका। जब कभी हिंदी दिवस आता है या राजभाषा समिति का निरीक्षण आता है तब इसे नहला-धुलाकर पेश कर दिया जाता है और निरीक्षण सम्पन्न होते ही पुनः दफ्तर के सबसे बदबूदार कोने में पटक दिया जाता है।
यह निरीक्षण भी क़माल होता है। देश की सबसे बड़ी पंचायत से कुछ पंच दफ़्तरों का निरीक्षण करने निकलते हैं। निरीक्षण की न्यूनतम शर्त यह है कि दफ़्तर किसी रमणीक स्थल पर बना हो। क्योंकि वे जानते हैं कि जब हिंदी की फाइलों में कुछ नहीं मिलेगा तब निहारने को प्राकृतिक सौंदर्य की आवश्यकता पड़ेगी। वैसे भी जो माँ प्रकृति से दूर हो वह माँ हिंदी के क़रीब कैसे हो सकता है।
बहरहाल, निरीक्षण की सूचना मिलते ही दफ़्तर के अधिकारियों से लेकर कर्मचारी तक काम पर लग जाते हैं। मुख्यालय में नियुक्त राजभाषा अधिकारी तुरंत निरीक्षण के निशाने पर आए दफ़्तर में प्रकट हो जाते हैं। रात-दिन जागकर निरीक्षकों के लिए श्रेष्ठतम प्रवास की व्यवस्था की जाती है। मुख्यालय इस पुनीत कार्य हेतु अलग से बजट की व्यवस्था करता है। प्रत्येक निरीक्षक के लिए अलग से गाड़ी तैनात होती है। उनके पर्यटन की योजना बनाई जाती है। उनके भोजन के मेन्यू सेट किये जाते हैं। उन्हें प्रकारांतर से उपहार देने की प्लानिंग होती है। ये सब महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होने के बाद दफ़्तर की सभी नाम-पट्टिकाएँ गर्म-गर्म देवनागरी में पकाकर परोसने की तैयारी होती है। और निरीक्षण से ठीक पहले कार्यालय में हिंदी के कामकाज की फाइलें चकाचक कर दी जाती हैं।
यद्यपि मंत्रालय के पत्र में यह स्पष्ट लिखा जाता है कि उपरोक्त व्यवस्था सम्बन्धी व्यय नहीं करना है। तथापि राजभाषा के अनुभवी अधिकारी जानते हैं कि निर्देश में लिखा गया ‘नहीं’ पढ़ने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।
निरीक्षकों का कर्मठ दल हवाई अड्डे से ही निरीक्षण प्रारम्भ कर देता है। उनके स्वागत में खड़े कर्मचारी से लेकर गाड़ी पर चिपके स्टीकरों तक हिंदी की उपस्थिति जाँची जाती है। चूँकि सब कुछ पहले से ही तय होता है अतएव कहीं कोई चूक नहीं होती। यह देखकर पहले से ही तय कार्यक्रम के अनुरूप आधे निरीक्षक प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं और बाक़ी के आधे थोड़े उखड़े-उखड़े बने रहते हैं। ऐसा करने से निरीक्षण का डेकोरम बना रहता है।
कार्यालय में प्रवेश करते हुए स्वागत की वेला में पूरा कार्यालय हिन्दीमय हो जाता है। सब हिंदी बोल रहे होते हैं। जहाँ न बोलना हो वहाँ भी सभी हिंदी बोल रहे होते हैं। फिनांस के नाम से बदनाम कमरा अचानक वित्त विभाग हो उठता है। परफोर्मा यकायक प्रपत्र बन जाता है। अटेंडेंस रजिस्टर पर नया आवरण चढ़ाकर उसे उपस्थिति पत्रिका बना दिया जाता है।
निरीक्षण दल जानता है कि यह कायाकल्प उनके आगमन से एकाध दिन पूर्व ही हुआ है तथापि वे कार्यालय में हिंदी की स्थिति देखकर संतुष्ट होने की भंगिमा बना लेते हैं। हिन्दीमय वातावरण में चायपान करते समय उन्हें उनके प्रवास, भोजन तथा पर्यटन के कार्यक्रमों से अवगत करा दिया जाता है। इस सूचना के प्रेषित होते ही कार्यालय की कुछ फाइलों का पूर्वनिर्धारित औचक निरीक्षण सम्पन्न कर लिया जाता है। अगली सुबह निरीक्षण की समस्त कार्यवाही समाप्त होने के बाद निरीक्षण दल प्रकृति के वैभव का निरीक्षण करने लगता है और कार्यालय अपनी स्थायी वेशभूषा में लौट आता है। हिंदी बेचारी आचरण से निकलकर पुनः फाइलों के आवरण में सिमट जाती है।
न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका और विधायिका तक हिंदी के लिए प्रवेश निषेध की तख़्ती हर वर्ष और पुख़्ता होती जा रही है। व्यापार में हिंदी को स्थापित करने के लिए नियुक्त लोग हिंदी का व्यापार करने में संलग्न हैं। हिंदी पखवाड़े के दौरान कार्यालय के बाहर नीले रंग का सरकारी बैनर लटक जाता है। उसके बाद पूरे वर्ष हिंदी का चेहरा उस बैनर की तरह लटका रहता है।
राजभाषा विभागों का बजट पूरे कार्यालय के बजट का सबसे तुच्छ भाग होता है। और वह भी सत्र समाप्ति के समय जबरन व्यय किया जाता है। हिंदी को राजभाषा बनाने का यह ढोंग क क्षेत्र से ग क्षेत्र तक समान रूप से चल रहा है। कार्यालयी हिंदी इतनी क्लिष्ट और अव्यवहारिक बना दी गई है कि जब कभी किसी राजभाषा अधिकारी की अंतरात्मा जागती है तो वह स्वयं हिंदी की कृत्रिम सूरत को देखकर अपनी अंतरात्मा को हिंदी की एक लोरी गाकर सुला देता है।

✍️ चिराग़ जैन

मधुबन पर बस उसका हक़ है

फूलों का सौंदर्य निरखने
बगिया में दुनिया आती है
रंग लुभाते हैं आँखों को
गंध भ्रमर को ललचाती है
लेकिन हर ललचाने वाला
सुख की घड़ियों का ग्राहक है
जड़ में जिसका लगा पसीना
इस उपवन पर उसका हक़ है

शोभा बढ़ती है उपवन की
रूप निरखने वालों से भी
फूलों का मकरंद निखरता
उसको चखने वालों से भी
लेकिन मधुबन उसका होगा
जो ये फूल उगाने आया
तुम सब खिल जाने पर आए
पर वो इन्हें खिलाने आया
तुम उत्सव के अभिनेता हो
वो संघर्षों का नायक है
जिसने सींचे हैं सब पौधे
बस मधुबन पर उसका हक़ है

मंदिर-मंदिर द्वारे-द्वारे
तुमने केवल हाथ पसारे
ईश्वर के व्यापारी बोलें-
ईश्वर हैं क्या सिर्फ़ तुम्हारे?
पूजक बनकर तुमने केवल
इच्छाओं का भार दिया है
छैनी ने आकार दिया है
शब्दों ने विस्तार दिया है
देवालय में मूरत रखकर
शीश झुकाने वाले सुन लें
जिसने रूप गढ़ा मूरत का
बस भगवन पर उसका हक़ है

धरती उनकी है, जो आए
तिनका-तिनका नीड़ बनाने
उनका क्या जो निकल पड़े हैं
ध्वंस मचाती भीड़ बनाने
जो लालच से अभिप्रेरित है
उसका कुछ अधिकार नहीं है
विक्रेता, सर्जक से ऊँचा!
जीवन है, बाज़ार नहीं है
कंस, कालिया सबने केवल
गोकुल का दोहन करना था
जिसने वंशी के स्वर घोले
वृंदावन पर उसका हक़ है

✍️ चिराग़ जैन

घूरे में पड़ा अतीत: आशापुरी

भोपाल के पास एक छोटा-सा कस्बा है, आशापुरी। यहाँ उत्खनन में कुछ प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले हैं। सड़क किनारे एक अहाते में खुले चौक में लाल पत्थर की भव्य मूर्तियाँ रखी गई हैं। पूछने पर पता चला कि खुदाई में इन्हें बरामद करने के बाद यहाँ रखा गया है। सर्दी, गर्मी, बरसात में यह बहुमूल्य धरोहर बेकद्री की शिकार है।
इन मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व तो है ही, लेकिन इनको देखकर जो आस्था उपजती है, वह तो मूल्यातीत है। केयरटेकर टाइप के एक लड़के से पूछा कि इनकी ख़ैर-ख़बर लेने कोई आता है क्या, तो वह बेपरवाह होते हुए बोला- ‘कोई कछु ना पूछै साहब!’ उसकी बात का प्रमाण खोजते हुए इन अवशेषों की पड़ताल की तो देखा गंधर्व, तोरण, देहरी, वेदी, गणेश, महावीर, कुबेर, शिव, विष्णु, नृसिंह, नवावतर, इंद्र और न जाने कितने ही शिल्प यहाँ खुले में पड़े अपने उद्धार की राह देख रहे हैं। इनमें से कुछ खंडित हैं और कुछ समय की मार से स्वयं को बचा लाए हैं।
घूरे में पड़ी इन मूर्तियों पर पीपल और जंगली घास ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। एक तराशे हुए विशाल पत्थर पर हरियाली बेल ऐसे इठलाकर बढ़ी है जैसे शिल्पी द्वारा पत्थर पर तराशी हुई बेल से ईश्वर अपनी बेल की प्रतियोगिता कर रहा हो। इस विलक्षण सौंदर्य को निहार ही रहा था कि अचानक ऐसा लगा जैसे ये हरी बेल इन मूर्तियों को ताना मार रही हो कि, ‘धरती मैया की गोद में रहकर तो दम घुटता था, अब यहाँ घूरे में पड़कर चैन मिल गया!’
आस्था और इतिहास पर गर्व करनेवाली संस्कृति में यह दृश्य मन को भीतर तक कचोट गया। इधर क्षोभ बढ़ रहा था, उधर कौतूहल। इसी कस्बे में आगे एक पहाड़ी जैसे इलाके की चोटी पर वह स्थान देखने को मिला जहाँ से ये मूर्तियाँ निकाली गई हैं। देखकर, समझा जा सकता है कि यहाँ कभी कितना भव्य देवालय रहा होगा! पत्थर का एक भी टुकड़ा ऐसा न मिला जिस पर किसी कलाकार ने नक्काशी से कोई आस्था न उकेरी हो।
क गर्भगृह अभी भी लगभग गर्भगृह जैसा ही लग रहा है। उसमें शिवलिंग का स्थान अभी तक यथावत है। किन्तु उसमें से शिवलिंग निकालकर एक पुजारी ने पास के ही मंदिर में स्थापित कर लिया है। अब जब भी कोई ‘पर्यटक’ इन खंडहरों की दुर्दशा देखने आ जाता है तो पुजारी जी वह शिवलिंग दिखाने के बहाने उसे अपने नवनिर्मित मंदिर में ले आते हैं और वहीं माथा टिकवाकर उससे दक्षिणा की डिमांड करते हैं। इस दृश्य पर अपने स्थान से अलग हुआ शिवलिंग ठठाकर हँस पड़ता है कि चलो इतने बड़े मंदिर का कोई हिस्सा तो किसी का रोज़गार बन सका।
यह मुझे नहीं पता चला कि यह अमूल्य धरोहर किसी धर्मांध आततायी की कट्टरता का शिकार हुई है या फिर धरती की किसी करवट ने ईश्वर के इस भव्य मंदिर को तहस-नहस कर डाला है। लेकिन इतना मुझे ज़रूर समझ आया कि अब, जब यह अमूल्य धरोहर स्वतः ही अपनी गर्द झाड़ कर चमकना चाह रही है तब सरकारी ढर्रे की लापरवाही इन खण्डहरों को दिन-प्रतिदिन जर्जर किये जा रही है।

✍️ चिराग़ जैन

सिस्टम का सिस्टम

पड़ी कुँए में भांग है, भली करे करतार
होरी के घर लूट में, मुखिया हिस्सेदार
मुखिया हिस्सेदार, शिक़ायत किससे करता
आखिर थाने में जा पहुँचा डरता-डरता
लिखा रपट में गया, रुपैये गए जुए में
मिला उसे यह ज्ञान, भांग है पड़ी कुँए में

✍️ चिराग़ जैन

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