सत्यमेव जयते
सत्य के आधार पर खड़े
चार-चार शेर भी
झूठ बोलनेवालों को
कुछ नहीं कहते।
देश की हर सरकारी मुहर पर
एक झूठ लिखा है –
‘सत्यमेव जयते’।
✍️ चिराग़ जैन
सत्य के आधार पर खड़े
चार-चार शेर भी
झूठ बोलनेवालों को
कुछ नहीं कहते।
देश की हर सरकारी मुहर पर
एक झूठ लिखा है –
‘सत्यमेव जयते’।
✍️ चिराग़ जैन
रेगिस्तान की दोपहर में
पानी को तरस रहा एक प्यासा
तपती हुई रेत में पड़ा था;
ऊपर से सूरज का भी रुख कड़ा था।
उसको पानी देने के लिए
केंद्र सरकार ने बिल पास किया;
राज्य सरकार ने भी
उसका स्वतः संज्ञान लिया।
लेकिन ज्यों ही
राज्य सरकार का कारिंदा
मदद लेकर प्यासे की ओर बढ़ा,
उसके सद्भाव को लगा
एक जोरदार झटका;
क्योंकि पीछे केंद्र सरकार
लेकर आ रही थी
पानी से भरा मटका।
उधर केंद्र सरकार की नज़र भी
राज्य सरकार की मदद योजना पर पड़ी
तो उसके मटके की
आँखें हो गयी बड़ी।
अब प्यासा हो गया था गौण
दोनों एक-दूसरे से पूछने लगे-
“तू कौन? तू कौन?”
दोनों ही मदद करने के
मूल लक्ष्य से भटक गए
और एक-दूसरे से ऐसे भिड़े
कि दोनों के मटके चटक गये।
फिर राज्य सरकार ने भरी हुंकार
और प्यासे की विरुद्ध दर्ज की
नामज़द एफआईआर।
“कि राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए
प्यासा व्यक्ति
नाटक कर रहा है
और जनता में
राज्य की व्यवस्था के विरुद्ध
घृणा भर रहा है।”
केंद्र सरकार ने
इस एफआईआर की
पूरी ही पैमाइश कर दी
और प्यासे की प्यास की
सीबीआई जाँच की फरमाइश कर दी।
घंटों तक चलता रहा यह ड्रामा
मीडिया से लेकर
अदालतों तक पसर गया हंगामा
आस के मटके फूट चुके थे
समाधान का पानी बिखर चुका था
और प्यासा, दो घूँट पानी के इंतज़ार में
रहनुमाओं की ओर देखते-देखते
कबका मर चुका था!
✍️ चिराग़ जैन
इसने कहा
कि उसकी वजह से व्यवस्था फेल हो गयी
उसने कहा
कि इसकी वजह से व्यवस्था फेल हो गयी
लेकिन एक बात तो दोनों ने कही-
‘व्यवस्था फेल हो गयी।’
✍️ चिराग़ जैन
कोरोना की वर्तमान स्थिति भयावह है। जनता को चाहिए कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकारी नियमों का पालन करे। बाज़ारों में भीड़ देखकर सरकार को घबराहट होती है। जनता होली जैसे अनावश्यक त्योहारों की आड़ लेकर समारोह करने की सोच रही है। लोग, होली मंगल मिलन जैसे बेहूदे कामों के लिये इकट्ठा हो रहे हैं। शर्म आनी चाहिए इस देश की जनता को। घर पर नहीं रह सकते?
सरकार को मजबूर होकर जनहित में सख्ती करनी पड़ती है। विवश होकर पुलिसवालों को कहना पड़ता है कि जो भी बिना मास्क दिखे उसको धर लो। और भी कुछ नहीं तो रिश्तेदारों के साथ ही होली खेलने चल दोगे! लज्जा नहीं आती? कोरोना से डर नहीं लगता? अरे मूर्खाे, अपनी नहीं तो औरों की जान की ही परवाह कर लो!
इस देश के महान राजनेता अपनी जान पर खेलकर लाखों लोगों की रैलियाँ कर रहे हैं ताकि लोकतंत्र बचा रह सके। कभी सोचा है कि कैसा लगता होगा जब दिल्ली में सोशल डिस्टेंस की सख्त नियमावली लागू करके बंगाल में लाखों लोगों की भीड़ के सामने मास्क हटाकर भाषण झाड़ना पड़ता है। कभी कल्पना की है कि अपनी आत्मा को क्या मुँह दिखाते होंगे बेचारे राजनेता!
महाराष्ट्र में लाखों केस आ गये, लेकिन हमारे राजनेता प्रदेश में गहराए राजनैतिक संकट से जूझने के लिए मंत्रालय, राजभवन, दिल्ली और प्रेस वार्ताओं में भागे फिर रहे हैं। कोरोना की जानलेवा दहशत को ताक पर रखकर, सरकारी गाइडलाइंस को धता बताकर भी कुर्सी की क़वायद में लगे हुए हैं। और तुम बस दो वक़्त की रोटी के लालच में धंधे-पानी पर निकल रहे हो। चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ऐसी नाकारा जनता को।
क्या हो जाएगा अगर स्कूल नहीं खुलेंगे? क्या हो जाएगा अगर दफ़्तरों में काम नहीं होगा? क्या आफ़त आ जाएगी अगर लोग त्योहारों पर एक-दूसरे से नहीं मिलेंगे? कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा अगर होली पर बिटिया के घर गुंजिया लेकर नहीं जा सकोगे? …इन सब टुच्ची बातों की तुलना चुनाव की महत्ता से करते हो?
उधर किसान आफ़त मचाए हुए हैं। इतने साल से अपने खेतों से कमा रहे थे ना! तब कौन से ताजमहल बना लिए तुमने। तब भी तुम फाँसी लगा-लगाकर मर रहे थे। अब सरकार जो कर रही है, उसे करने दो। इतनी हाय-तौबा क्यों? आकर बैठ गए हो दिल्ली बॉर्डर पर। …पड़े रहो। सरकार के पास क्या यही काम है कि तुम्हारा रोना सुनती रहे।
कभी बैठे हो सरकार में? कभी जाना है राजनीति किस चिड़िया का नाम है। सरकार के पास इन सब फालतू बातों के लिए वक़्त नहीं है, उसे चुनाव लड़ना है। चुनाव कोई हँसी-मज़ाक़ नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। अब लोक के रोने-पीटने में लोकतंत्र को तो नहीं इग्नोर कर सकते ना! इसलिए ख़बरदार, अगर होली-वोली जैसे फालतू बहाने लेकर घर से बाहर क़दम निकाला तो!
✍️ चिराग़ जैन
दशकों तक परिश्रम करके तंत्र ने जनता को इतना सहनशील बनाया है कि लाख परेशानियाँ सहकर भी जनता शिक़ायत करने से परहेज करे। हम गाहे-बगाहे सत्ता और राजनीति को कोसते हैं। टेलिविज़न के सामने बैठकर राजनेताओं को भ्रष्ट कह लेते हैं; लेकिन हमारे सामने कुर्सी पर बैठा क्लर्क सामने खड़ी जनता को इंतज़ार करने के लिये छोड़कर फोन पर इश्क़ फरमा रहा होता है और हम उसे टोकने की जेहमत नहीं उठाते। खिड़की के उस पार बैठी महिला बराबरवाली महिला से कुरकुरी भिंडी की रेसिपी समझ रही होती है और हम खिड़की के इस पार खड़े भिंडी पक जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
अब तो हमारी सहनशीलता का इतना विकास हो चुका है कि निजी सेवाक्षेत्र, जो ‘क्लाइन्ट सेटिस्फेक्शन फर्स्ट’ जैसे सिद्धांतों के साथ काम करता था, वह भी अब हमें क्लाइंट नहीं, जनता समझने लगा है। वे भी जान गये हैं कि इन्हें परेशान करके कभी कोई नुक़सान नहीं होगा; क्योंकि जब कोई ख़ुद को क्लाइंट समझकर हमसे हमारी ख़राब सर्विस की शिकायत करेगा तब उसके पीछे हमारी उसी ख़ामी को झेल रहे सैंकडों लोग जनता की तरह मौन खड़े रहेंगे। उस समय बर्दाश्त करनेवालों के अनुपात में प्रतिक्रिया करनेवाला वह बेचारा अल्पमत में होने के कारण तर्कों के साथ हार जायेगा और ख़ामोश खड़े रहकर तमाशा देखनेवाले बहुमत के साथ जीत जायेंगे। इन जीते हुए लोगों में से अनेक मन ही मन उस प्रतिक्रियावादी का सम्मान करेंगे, कुछ उसे झगड़ालू और कलेशी कहेंगे, कुछ उस पर हँसेंगे और वह एक अकेला भी धीरे-धीरे सहनशील जनता की भीड़ में शामिल हो जायेगा।
पिछले दिनों एक निजी एयरलाइंस में क्रू के किसी दुर्व्यवहार का विरोध करने पर एक प्रतिक्रियावादी को पूरे क्रू ने जहाज से उतरते ही ज़मीन पर गिरा-गिराकर पीटा, पर शेष जनता चुपचाप देखती रही। निजी कंपनियाँ ‘कंपनी पॉलिसी’ के नाम पर आपकी किसी भी समस्या का समाधान करने से पल्ला झाड़ लेती हैं और आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते क्योंकि उनकी शिक़ायत लेकर आप जहाँ जाएंगे, उन थानों और न्यायालयों में आप पहले ही ‘जनता’ सिद्ध हो चुके हैं। वहाँ आपको दुर्व्यवहार और प्रतीक्षा करवाने में तंत्र को कोई आपत्ति नहीं होती, क्योंकि जब इन संस्थाओं में ऐसा चलन शुरू हुआ होगा तब भी मौन रहनेवाले ऐसे ही प्रतिक्रिया करनेवालों पर हँसे होंगे।
‘कौन पचड़े में पड़े’; ‘अपना काम बनता…’ और ‘हमें क्या लेना-देना’ जैसे जुमले बोलनेवाले लोग जब सिस्टम की ख़ामियों का रोना रोते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई बलात्कारी भेड़िया, स्त्रियों की सुरक्षा का भाषण दे रहा हो। सरकारी नीतियों में सुधार के सपने देखनेवालों को यह समझना होगा कि अच्छी या बुरी, जो भी वर्तमान नीतियाँ हैं, उनके क्रियान्वयन का ज़िम्मा उसी व्यक्ति का है, जो टेबल के उस तरफ़ बैठा फोन पर चौपाल जमा रहा है। यदि उसके इस आचरण पर उसे टोका न गया तो उसकी ख़ामी सरकार को कभी नहीं दिखाई देगी, क्योंकि सरकार के सामने वह कभी लापरवाही नहीं करता।
इस देश में रोज़ लाखों लोग सिस्टम के सामने लाचार खड़े रहते हैं और करोड़ों लोग राजनीति को कोसने में व्यस्त रहते हैं। इस देश में भारत के लोककल्याणकारी राज्य होने का संविधानी दावा रोज़ सैंकड़ों मौत मरता है लेकिन हम मान बैठे हैं कि केवल राजनीति को गाली देकर ही अपने साथ हुए अन्याय की भड़ास निकालना उचित है, क्योंकि अन्याय करनेवाले को डायरेक्ट कुछ कहा तो वह हमारे काम को और मुश्किल कर देगा।
✍️ चिराग़ जैन