+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

सुख का आमंत्रण

पीड़ा की तैयारी कर लो, सुख का आमंत्रण आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है

ईश्वर का अवतार जना है, माता को अभियोग मिलेगा
कान्हा जैसा लाल मिला है, आगे पुत्रवियोग मिलेगा
नारायण के बालसखा ने निर्धनता के कष्ट सहे हैं
वंशी के रसिया जीवनभर, समरांगण में व्यस्त रहे हैं
राधा के जीवन में दुख से पहले वृंदावन आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है

वरदानों का सुख पाया तो, सुख का फल अभिशाप हुआ है
तप का पुण्य कुमारी कुंती के जीवन का पाप हुआ है
जो शाखा फैली है उसने कट जाने की पीर सही है
अर्जुन जैसा वर पाया, फिर बँट जाने की पीर सही है
पहले रानी बनने का सुख, पीछे चीरहरण आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है

सुख के पीछे दुख आएगा, हर क़िस्से का सार यही है
जितनी घाटी, उतनी चोटी, पर्वत का विस्तार यही है
यौवन आने का मतलब है, आगे तन जर्जर होना है
जिस धारा ने निर्झर देखा, अब उसको मंथर होना है
नदियों में ताण्डव उफना है, जब घिरकर सावन आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है

✍️ चिराग़ जैन

रुक जाने का मन होता है

आपाधापी की राहों पर सुस्ताने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

शिक़वे और शिक़ायत कर ली
हिम्मत और हिमाक़त कर ली
यश-अपयश का दौर हुआ है
ज़हर सरीखा कौर हुआ है
नफ़रत का हर पाठ पढ़ा है
बदले का हर ज्वार चढ़ा है
मस्तक पर अवसाद रखा है
अपशब्दों का स्वाद चखा है
छल-बल की हर रीत दिखी है
देहरी चढ़ती जीत दिखी है
अब दुश्मन के आगे जाकर, झुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

उत्सव देखे, वैभव देखा
यौवन देखा, शैशव देखा
जयकारों का रोर सुना है
तारीफ़ों का शोर सुना है
स्वागत देखे, वंदन देखे
कितने ही अभिनन्दन देखे
फूलों संवरीं राहें देखीं
स्वागत करतीं बांहें देखीं
यश की हर इक सहेली देखी
पसरी रिक्त हथेली देखीं
हर आपाधापी को तजकर, चुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

इच्छाओं को शिष्ट कर लिया
पूरा जीवन क्लिष्ट कर लिया
तन जागा तो स्वप्न नरारद
हल निकले तो प्रश्न नदारद
झुकना चाहा अहम अड़ गए
रुकना चाहा क़दम बढ़ गए
ढेरों नियम, अगिन सीमाएँ
खंडहर थोथी परिभाषाएँ
कारण मिला अधर फैलाये
कारण मिला नयन भर आए
कभी-कभी बिन कारण भी तो मुस्काने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

✍️ चिराग़ जैन

ओ विकलता!

ओ विकलता!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

नींद का तुझसे पुराना वैर है री!
श्वास ने लय खोई तेरे साथ चलकर
धड़कनों की ताल द्रुत होती अचानक
रह गई है शांति अपने हाथ मलकर
मान भी जा!
एक क्षण भीषण प्रतिज्ञा तोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

अनवरत मस्तिष्क में हलचल मची है
मौन के क्षण को कभी सम्मान तो दे!
तू समूची बुद्धि से मन तक बसी है
धैर्य टिक पाए कहीं पर स्थान तो दे!
या चली जा!
या हृदय को इक दफा झखझोर दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

दृष्टि को भीतर उतरने की गरज है
भंगिमा को सरल होने का समय दे!
मुस्कुराहट खिल उठे व्याकुल अधर पर
त्यौरियों को तरल होने का समय दे!
घूम-फिर आ!
भृकुटियों को सहजता से जोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

✍️ चिराग़ जैन

संज्ञा का अपमान

एक विशेषण की चाहत में, संज्ञा का अपमान किया है
लाए को अनदेखा करके, पाए पर अभिमान किया है

अभिलाषा के रथ पर फहरी स्पर्धा की उत्तुंग ध्वजा है
लोभ बुझे तीरों से भरकर लिप्सा का तूणीर सजा है
अपना ही सुख खेत हुआ है, कैसा शर संधान किया है

जीवन को वरदान मिला है, श्वास किसी की दासी कब है
मीठे जल से ना बुझ पाए, तृष्णा इतनी प्यासी कब है
निश्चित की आश्वस्ति बिसारी, संभव का अनुमान किया है

मानव होना बहुत न जाना, जाने क्या से क्या बन बैठा
चोर, दरोगा, दास, नियामक और कभी धन्ना बन बैठा
ख़ुशियों का अमृत ठुकराकर, कुंठा का विषपान किया है

भोर न जानी, रैन न देखी, दिन भर की है भागा-दौड़ी
सुख के पल खोकर जो जोड़ी, छूट गई हर फूटी कौड़ी
अपने जीवन के राजा ने औरों को श्रम दान किया है

✍️ चिराग़ जैन

बंद कपाटों पर तुम आए

इस जीवन में चूक हुई है, बंद कपाटों पर तुम आए
आँखों तक अँधियारा पैंठा, तब तुमने कुछ दीप जलाए
अब इन दीपों के ईंधन से, केवल ऊष्मा ग्रहण करूंगा
अगले जन्म अगर आया तो, उजियारों का वरण करूंगा

शास्त्र बनाते मोक्षपथिक पर, प्यास मुझे इक और जन्म की
बहुत जटिल लगती हैं मुझको, नीरस बातें ज्ञान-धर्म की
पुण्य बढ़े तो स्वर्ग-सुखों में, मुझको निश्चित ला पटकेंगे
मैं उस लोक रहूंगा व्याकुल, मन के भाव यहाँ भटकेंगे
तुमको छूकर बच सकता हूँ, तुमको निश-दिन स्मरण करूंगा
जिसको जगत् अनैतिक कहता, मैं वैसा आचरण करूंगा

बचपन में दादी कहती थी, पिछला अगला सब होता है
आँखें जस की तस रहती हैं, कुछ मिलता सा ढब होता है
आँखों की पहचान बनाना, आदत स्वयं गवाही देंगी
मुझको देखोगे तो तुमको, धड़कन ख़ूब सुनाई देंगी
तुम उस पल चैकन्नी रहना, यादों का अवतरण करूंगा
उस पल मैं धरती से नभ तक, अब का वातावरण भरूंगा

जब भी तुमको बिन कारण ही, कोई जगह बहुत भाती हो
अगर हवा की गंध तुम्हारा, हाथ पकड़ खींचे लाती हो
तुम उस जगह प्रतीक्षा करना, मैं इक रोज़ वहीं आऊंगा
देख तुम्हें निःशब्द रहूंगा, तुमको छूकर जम जाऊंगा
भाषा अधरों पर थिर होगी, पलकों पर व्याकरण धरूंगा
पूर्ण हुए संकल्पों का मैं, आँसू से आचमन करूंगा

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!