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विवेक का दामन न छोड़ें

कोविड के कारण स्थितियाँ निश्चित रूप से विकट हैं, किंतु इस समय में आपको और हमको अधिक उत्तरदायित्व तथा विवेक के साथ आचरण करने की आवश्यकता है। कुछ बातों का सब लोग ध्यान रखें तो स्थिति सामान्य होने में मदद मिलेगी –
1) यदि घर में कोई रुग्ण हो तो उसका ऑक्सीजन लेवल और तापमान मापते रहें, जब तक ऑक्सीजन लेवल 94 से नीचे न होवे तब तक घबराकर अस्पताल भागने से बचें।
2) किसी अप्रिय स्थिति के अंदेशे में दवाइयाँ और ऑक्सीजन सिलेंडर स्टॉक करके न रखें, यह आचरण शेष लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा है।
3) किसी भी स्थिति में कोविड सम्बन्धी कोई भी जानकारी सार्वजनिक करने से पूर्व उसकी पुष्टि अवश्य करें। एक ग़लत सूचना दर्जनों लोगों का समय नष्ट करके उन्हें मौत के मुँह में पहुँचा सकती है।
4) कोई भी उपयोगी फोन नम्बर सार्वजनिक करने की बजाय वह नम्बर ज़रूरतमंद को इनबॉक्स में दें, अन्यथा अनावश्यक कॉल अटैंड करके लोग परेशान हुए जा रहे हैं।
5) पैनिक न क्रिएट करें, किसी भी चुनौती में धैर्य तथा विवेक से ही समाधान निकल सकेगा। हड़बड़ाहट में काम बनने की बजाय बिगड़ते ही हैं।
6) डॉक्टर्स और अस्पतालों पर भरोसा करें। सामान्यतया कोई डॉक्टर जान-बूझकर अपने किसी मरीज़ को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। किन्तु यह भी ध्यान रखें कि डॉक्टर भी अंततः इंसान ही है। इसलिए ग़लती और अपराध के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित करें।
आपका विवेक ही इस दौर का पहला उपचार है।

✍️ चिराग़ जैन

माइंड इट प्लीज़

जहाँ-जहाँ जो जो संपर्क सूत्र थे उन सबको प्रयोग कर चुका हूँ। अब नाशिक से लेकर इंदौर तक और देहरादून से लेकर जोधपुर तक अपने फोन में उपलब्ध प्रभावी तथा सामाजिक रूप से सक्रिय लोगों के नम्बर न जाने कितने लोगों के साथ साझा कर चुका हूँ।
मेरी इस धृष्टता से कई ज़रूरतमंदों को समय पर मदद मिल गयी है। हालाँकि कुछ लोग नाराज़ भी हुए हैं लेकिन मेरे लिए ये नाराज़गी झेलना महंगा सौदा नहीं है। यदि आप भी मेरी फोनबुक में मौजूद हैं तो तैयार रहिएगा, किसी अनजान नम्बर से आपके पास भी मदद का फोन आ सकता है; यदि इर्रिटेट हो जाएँ तो बाद में मुझे फोन करके गालियाँ दे लेना, पर इस वक़्त मुसीबत में फँसे उस व्यक्ति की सहायता कर देना।
✍️ चिराग़ जैन

मदद के हाथों को घायल मत करो

कोरोना से जूझते लोगों और उनके परिवारों की मदद में जुटे सभी वालंटियर्स का आभार व्यक्त करते हुए एक विनम्र अनुरोध यह है कि हम सब अपनी-अपनी सीमित क्षमताओं में प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में किसी ज़रूरतमंद का संदेश अनदेखा रह जाए तो कृपया उस पर कटाक्ष करने की बजाय, अपने गिरेबान में झाँकने का प्रयास करें।
ये सब लोग जो अपनी सोशल प्रोफ़ाइल, अपना समय और अपने समस्त सम्पर्कों को झोंककर लोगों के लिए सहायता जुटा रहे हैं इन्हें कोई लोभ-लालच नहीं है। ये सब मनुष्यता के नाते मनुष्य के प्रति करुणाभाव लिये दिन-रात जाग रहे हैं। सम्भव है कि इनको हर जगह सफलता न मिले, लेकिन इनकी कोशिश सदैव स्तुत्य रहेगी।
कहीं संपर्क नहीं हो पा रहा तो कहीं कुछ अमानवीय लोगों द्वारा फैलाए हुए श्फेकश् सम्पर्कों के कारण भ्रामक स्थिति बन रही है। इन सब चुनौतियों से जूझते हुए ये सब पावनमना मनुष्य अपने घर-परिवार को ताक पर रखकर जी-जान से इस अभियान में जुटे हुए हैं।
आप इनके सम्बल बनिये। यदि इनकी किसी पोस्ट पर किसी ज़रूरतमंद की कोई गुहार दिखाई दे तो वहीं रिप्लाई में उसे यथासम्भव सहायता पहुँचाने की कोशिश करें। जो जहाँ परेशान है उसे उस जगह का कोई स्थानीय संपर्क सूत्र ही उपलब्ध करा दें। सम्भव है आपका यह कृत्य किसी के लिए जीवनदायी सिद्ध हो।
ये देश आपका भी उतना ही है, जितना इस अभियान में जुटे लोगों का। इसके चरमराते ढांचे को बचाने में हाथ न लगा सकें तो कृपया लात भी न मारें।
अपनी तमाम नकारात्मकता के साथ एक बार सोचें जिनको रात के दो बजे भी सहायता के लिए कोई नम्बर मिल पा रहा हो उसे कैसा लग रहा होगा। एक बार सोचें कि जिसकी टूटती उम्मीद के आखिरी छोर पर सहायता खड़ी मिल रही हो उसे कैसा लग रहा होगा।
हाँ, ये सब आप जितने अनुभवी नहीं हैं कि ग़लती होने के भय से कुछ करें ही नहीं। ये तो बेचारे सारी ग़लतियों का रिस्क लेकर भी आगे बढ़कर सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं। सैंकड़ों लोगों तक इन तीन-चार दिनों में सहायता पहुँचाने में सफल भी हुए हैं।
ये नन्हें-नन्हें हाथ तूफान से जूझकर कश्ती खेने चले हैं। इनको आशीष दो!

✍️ चिराग़ जैन

मौके की नज़ाक़त

टूटने से काम नहीं चलेगा। व्यवस्था में बैठे हुए लोग तुम्हें इग्नोर करेंगे, लेकिन किसी भी स्थिति में किसी की मदद के लिये ‘प्रयास’ करने से मत चूकना। दस जगह फोन करोगे तो नौ जगह से कोई उत्तर नहीं आएगा, लेकिन दसवीं जगह भी कोशिश ज़रूर करना।
बस एक बात ध्यान रखना कि जो आपके पास मदद मांगने आया है वह आप पर विश्वास कर रहा है। आप भगवान नहीं हैं कि उसकी मदद कर ही देंगे, लेकिन आप इंसान ज़रूर बने रहना कि कोशिश में कोई कमी न रहे।
सोशल मीडिया पर अनेक विज्ञापन चल रहे हैं, कहीं ऑक्सीजन की सप्लाई के लिए सम्पर्क करने का विज्ञापन है तो कहीं रेमडेसिवर की उपलब्धता की लंबी-लंबी लिस्टें फॉरवर्ड की जा रही हैं। यदि आपके पास ऐसी कोई सूची हो तो उसे उठाकर पीड़ित के परिजनों को भेजने से पूर्व कम से कम उसकी सत्यता जाँच लें। जो जीवन मृत्यु से जूझ रहा है, उसके परिवार के किसी भी व्यक्ति का एक मिनिट बर्बाद करना कितना बड़ा अपराध है, इसका एहसास इन फेक लिस्टों को फॉरवर्ड करते समय ज़रूर रहना चाहिए।
आप सबने बड़ी मेहनत करके सोशल मीडिया की ताक़त जुटाई है। इस माध्यम का प्रयोग लोगों की जान बचाने के लिए कीजिये। कहीं भी किसी को भी मदद की ज़रूरत हो तो उसकी वास्तविकता की पुष्टि करके उसे अपनी टाइमलाइन से पोस्ट करें, न जाने कौन-सी पोस्ट किसकी जान बचा ले। इस दौर में किसी को यह एहसास भी दे दिया जाए कि वह अकेला नहीं है, तो उसकी हिम्मत बढ़ जाएगी।
सिस्टम और सरकार को कोसनेवाले लोग मेरी प्रोफ़ाइल से फिलहाल दूर रहें। मैं कोविड से त्रस्त लोगों की जानकारी पोस्ट कर रहा हूँ। यदि किसी की कोई सहायता कर सकें, या ऐसी इच्छा हो तो ही मेरी प्रोफ़ाइल पर आएँ, अन्यथा अनर्गल प्रलाप करने के लिए और बहुत प्रोफाइल्स हैं।
कृपया इस समय जीवन बचाने की क़वायद में हमारा सहयोग करें। हम सब बचे रहेंगे तो राजनीति और सिस्टम पर गाल बजाने के बहुत अवसर मिल जाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

जनता ख़ामोश है।

पूरे देश का मज़ाक़ बनाकर रख दिया है। बेशर्मी से झूठ बोलनेवाले राजनेता, एक साथ मिलकर सब कुछ बर्बाद कर रहे हैं और देश की जनता ख़ामोश होकर तमाशा देख रही है।
प्रश्न समूची राजनीति की उस ढिठाई का है जो जनता के जीवन से खिलवाड़ करने में हिचकती नहीं है। प्रश्न जनता की उस मानसिकता का है जो किसी भी राजनैतिक निर्णय की चर्चा शुरू होने से पूर्व किसी दल या विचारधारा का चश्मा पहनना नहीं भूलते।
अरे भाई, सही हर स्थिति में सही होता है और ग़लत हर हाल में ग़लत? इतनी सी बात हम समझना नहीं चाहते। कांग्रेस के शासन में कम किसानों ने आत्महत्या की थी, भाजपा के शासन में ज़्यादा किसान मर रहे हैं। इस बात को कहकर कांग्रेसी भला कैसे इतरा सकते हैं? राजनीति ने जनता को विवेकशून्य बनाया है या फिर विवेकशून्य जनता ने राजनीति को इतना मक्कार और बेशर्म कर दिया है इस पर ढंग से विचार करना ज़रूरी हो गया है।
उन्हें पता है कि चुनाव के समय उनका कोई एक पैंतरा देखते ही तुम उनकी बदतमीज़ियों के पोथे भूल जाओगे। उन्हें पता है कि पैदल चलकर घर जाती जनता को कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने के लिए छोड़ा जा सकता है क्योंकि बिहार में चुनाव आते ही राजनीति इन सब कीड़े-मकोड़ों को वोट में तब्दील कर लेगी। उन्हें पता है कि न्यायपालिका की पेचीदा भूल-भुलैया में फँसा नागरिक कभी इतनी फ़ुरसत ही न पाएगा कि व्यवस्था के सुधार की मांग कर सके।
उन्हें पता है कि लाखों-करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा करने से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि इस देश की जनता की इतनी हिम्मत ही नहीं है जो उस पैकेज के अस्तित्व पर प्रश्न पूछ लेवे। और अगर इतने वर्ष की मेहनत के बाद भी कोई विवेकशील व्यक्ति इस जनता के बीच बचा रह गया है तो उसको धराशायी करने के लिए इसी जनता के बीच अपने-अपने लीडर पर अटूट श्रद्धा रखनेवाले लोगों की कोई कमी थोड़े ही है।
राजनीति बीस लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा करेगी और हम दो पाटों में बँट जाएंगे। राजनीति मजदूरों के लिए बसों की लिस्ट लेकर आएगी, उसमें बसों के नाम पर बसें न हों तो भी हम भाजपा-कांग्रेस करने में व्यस्त हो जाएंगे।
हमारे लिए सवाल यह है ही नहीं कि तपती दुपहरी में जानवरों की तरह घिसटने को मजबूर इंसान तक सहायता पहुँची या नहीं पहुँची, हम तो इस तमाशे में व्यस्त हैं कि इसमें कांग्रेस ने बीजेपी को धूल चटाई या बीजेपी ने कांग्रेस को। इससे आगे हमारी संवेदनात्मक सोच का इंजन चल ही नहीं पाता।
हम यह समझ ही नहीं पाते कि शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन में भी वही लालचमण्डी है जो अन्य किसी प्रदेश में है। लेकिन हम इससे खुश हो जाते हैं कि अमित शाह की चाल फेल हो गयी।
कोई अमित शाह को फेल करके खुश है, कोई राहुल गांधी को, कोई केजरीवाल को तो कोई मोदी या दीदी को। लोकतंत्र के आखिरी पायदान पर खड़े आदमी पर किसी का ध्यान नहीं है।
राजनीति ने सिद्ध कर दिया है कि इस देश की जनता रिमोट से चलती है। जब तक राजनीति किसानों को अन्नदाता कहती रहती है तब तक कोई खेतों में पड़ रहे जानलेवा कैमिकल्स पर सवाल नहीं कर सकता। जब राजनीति ने किसानों को आतंकवादी कहना शुरू कर दिया तो कोई टीवी चैनल उनके विरोध की आवाज़ प्रसारित नहीं कर सका।
रामदेव के आंदोलन पर रात में लाठीचार्ज करवानेवाली कांग्रेस, भाजपा को आन्दोलन से निपटने की नैतिकता सिखाती है और कुल दो लोगों की तानाशाही पर चल रही भाजपा, कांग्रेस को पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक मूल्य स्थापित करने का ज्ञान देती है।
कितनी आदर्श स्थिति है, इस देश के महान राजनेता यकायक चुनाव से ठीक पहले अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर ‘नये दल’ में चले जाते हैं। जो चुनाव से पहले आत्मा की आवाज़ न सुन पाए वो चुनाव जीतने के बाद उस आवाज़ को सुन लेते हैं। सब कुछ खुल्लमखुल्ला चल रहा है लेकिन अपना-अपना चश्मा पहने जनता इस बात पर ख़ुश है कि अमित शाह ने ममता बनर्जी की पार्टी का दिवाला निकाल दिया।
सब अपनी-अपनी कांग्रेस और अपनी-अपनी भाजपा में इतने लिसड़े हुए हैं कि देश की बर्बादी उन्हें दिखाई ही नहीं देती। जिन्हें यह बर्बादी दिख रही है, जिन्होंने अपने चश्मे हटाकर देश को देखने की कोशिश की है उन्हें उनकी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। उनको गद्दार, राष्ट्रद्रोही, हिन्दू विरोधी और ऐसे ही तमाम अलंकरणों से सँवारने के लिए पूरी टोली सक्रिय है।
लोकतंत्र में सत्ताधारी पक्ष की निरंकुशता पर लगाम लगानेवाला विपक्ष भी इस पूरी स्थिति में बराबर का हिस्सेदार है क्योंकि जिसे इस निरंकुशता के विरुद्ध खुलकर बोलने से डर लगता है समझ लो कि उसने अपने होंठों में अपना ख़ुद का कच्चा चिट्ठा भींच रखा है।
भारत की महानता के ढोल पीटते हुए सदियाँ बीत गईं, लेकिन आज भी दिल्ली से लेकर दार्जिलिंग तक कोई कस्बा, कोई शहर, कोई गाँव, कोई मुहल्ला ऐसा न मिलेगा जहाँ इस महान देश का कोई नागरिक जानवरों से बदतर ज़िन्दगी जीने को मजबूर होगा।
विचारधाराओं के नाम पर देश को टुकड़े-टुकड़े करनेवाले इन सियासतदानों से पूछो कि प्रचण्ड बहुमत की सरकार बनाकर भी ‘अंत्योदय’ की अवधारणा अहल्या की भाँति पत्थरों में ही क्यों सुबक रही है? इतने लम्बे समय तक शासन करने के बावजूद गांधी का ‘रामराज’ कोरी कल्पना ही क्यों बनकर रह गया? न लोहिया का समाजवाद आया, न अंबेडकर का संविधान ही शत प्रतिशत लागू हो सका!
फिर क्यों चल रहा है ये ढोंग? यह प्रश्न न पूछ लिया जावे इसीलिए राजनीति आपको चुटकुलों, जुमलों और सोशल मीडिया के प्रोपेगैंडा में उलझाए रखेगी। इस उलझन से आपको स्वयं बाहर आना होगा अन्यथा ये उलझन एक दिन आपकी आगामी पीढ़ियों के लिए फाँसी बन जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

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