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भयभीत मोड के जीव

मोबाइल फोन की तरह मन भी अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग मोड पर सैट हो जाता है। सम्भवतः मनोविज्ञान में इसी को मूड कहा जाता हो।
कभी हम बहुत ख़ुश होते हैं, मतलब हम हैप्पी मोड में हैं। ऐसे ही सैड मोड, कन्फ्यूज़्ड मोड और एंग्री मोड भी हम सबके भीतर ऑन-ऑफ होते रहते हैं। यह सहज मानवीय स्वभाव भी है। लेकिन कुछ लोग पूरा जीवन एक ही मोड में बिता देते हैं। इनके सॉफ्टवेयर में बाक़ी किसी मोड पर जाने की वायरिंग ही नहीं होती। आप किसी भी परिस्थिति का वायर छू दो, वह उनके फिक्स मोड को ही पॉवर सप्लाई करेगा।
ऐसा अक्सर भयभीत मोड और चिड़चिड़ा मोड के लोगों के साथ होता है। चिड़चिड़ा मोड के व्यक्ति हमेशा चिड़चिड़ाहट के अलंकार से अपना चेहरा सजाए रखते हैं। जिनका ऊपर का ओंठ कुछ शूकराकार होता हुआ ऊपर उठा रहता है और नासिका के मध्यभाग को सिकोड़ने की कवायद में दोनों नथुने भैंसे के नथुनों से प्रतियोगिता करते रहते हैं। चूँकि भैंसा कभी-कभी थकता भी है, इसलिए वह वर्ष में तीन-चार बार इनसे हार जाता है। इस विजय से इनकी चिड़चिड़ी शिराओं में प्रसन्नता की जो ऊर्जा प्रवाहित होती है, वह भी अंततः चिड़चिड़ाहट में ही परिणत हो जाती है।
लगभग यही स्थिति भयभीत मोड के मनुष्यों की होती है। वे किसी भी बात से भयभीत हो सकते हैं। बल्कि यूँ कहिये कि वे बिना बात के ही भयभीत रहते हैं। आप उनको सामान्य फोन मिलाकर दीपावली की बधाई दें। वे तुरन्त भयभीत हो जाएंगे कि आपको उनसे क्या लोभ है जो आप उन्हें बधाई देने के लिए फोन कर रहे हैं? आप उनकी प्रशंसा करो तो वे भयभीत होकर आपकी प्रशंसा में षड्यंत्र सूंघने लगेंगे। आप उनकी प्रशंसा न करो तो वे आपके भीतर ईर्ष्या के समंदर देख लेंगे।
इनकी स्थिति उस मुर्गे की तरह होती है जो जन्मते ही यह मान बैठता है कि उसका जन्म केवल कटने के लिए हुआ है। इस महान विचार को स्वीकार करने के बाद वह जीवन भर डॉक्टर और कसाई के बीच भेद कर पाने की क्षमता गँवा बैठता है।
संदेह इनकी धमनियों में अनवरत दौड़ता रहता है। इनकी धड़कनों से अहर्निश ‘सावधान-सावधान’ की प्रतिध्वनि मुखरित होती है। सड़क पर चलते हुए दो व्यक्ति यदि हँसते हुए दिख जाएँ तो ये कल्पनाशीलता का प्रयोग करके उनकी सामान्य हँसी को पहले ठहाका और फिर राक्षसी अट्टहास बना लेते हैं। फिर वे दोनों अनजान मनुष्य इन्हें लुटेरे लगने लगते हैं।
इनकी यह असीम प्रतिभा इन्हें कभी चैन से सोने नहीं देती। ये भी किसी तपस्यारत योगी की तरह पूरा जीवन अपनी भय के कबूतर का अपने हृदय के भीतर ही पोषण करते रहते हैं। यदि कभी कोई प्रसन्नता, मेनका बनकर इनकी साधना भंग करने का प्रयास करे तो ये अपने क्रोध की अग्नि से उस प्रसन्नता को उत्पन्न करनेवाले का सुख-चैन भस्म कर देते हैं।
इस मोड के लोगों में यदि ग़लती से स्वयं को समझदार समझने की पैन ड्राइव और लग गयी तो फिर तो इनका पूरा सिस्टम डिस्को करने लगता है। पैन ड्राइव का प्रभाव इनसे समझदार होने का अभिनय करवाता है और इनकी नैसर्गिक मेधा रह-रहकर इनके पर्यायवाची में लगी ‘ऊ’ की मात्रा को लम्बा करती रहती है। अब इनका भय झुंझलाहट के सिंगार से युक्त हो जाता है। झुंझलाहट इसलिए कि पैनड्राइव लगाने के बावजूद कोई इन्हें समझदार मानने को तैयार नहीं होता और ये स्वयं को समझदार मान चुके होते हैं।
इन विरोधाभासी मान्यताओं के बीच ये बेचारे समझदारी के अभिनय का अनुपात बढ़ाते हुए लोगों से सौहार्दपूर्ण व्यवहार का अतिरिक्त प्रयास करने लगते हैं। अपने भयभीत विवेक से ये जिसे ‘सफल’ मान रहे होते हैं, उसकी तरह बैठने लगते हैं, उसकी तरह बोलने का प्रयास करते हैं; लेकिन ज्यों ही कोई इनके अभिनय को सत्य समझकर इनकी समझदारी की प्रशंसा कर देता है, तो इनकी नैसर्गिक प्रतिभा तुरन्त प्रकट हो जाती है और वह उस प्रशंसा में षड्यंत्र सूंघने लगती है।
काश अपनी असुरक्षा-ग्रंथि को पुष्ट करने की बजाय कभी ये लोग यह स्वीकार कर सकें कि हमारे पास है ही क्या जो कोई हमसे छीन लेगा…! काश ये लोग समझ सकें कि ख़ुश रहना बहुत बड़ी कला है, और इस कला पर हर प्रकार का भय स्वाहा किया जा सकता है।
✍️ चिराग़ जैन

नया धर्म : सेंड टू ऑल

आज मुझे एहसास हुआ कि हमारे देश में कोई आम आदमी है ही नहीं। हर नागरिक के दुनिया के बड़े से बड़े आदमी से डायरेक्ट कॉन्टेक्ट हैं। और सबको ही कोई कल्पवृक्ष टाइप की सिद्धि प्राप्त है। यही कारण है कि जब उन्हें पैनडेमिक से संबंधित कोई पुख्ता जानकारी चाहिए होती है तो उनके व्हाट्सएप पर सीधे डब्ल्यूएचओ से मेसेज प्रकट हो जाता है। वे उस मेसेज को पढ़ते हैं और तुरंत अपने मोबाइल से जुड़े एक-एक जनसामान्य को फॉरवर्ड करके उन्हें अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकाल लेते हैं।
कुछ तो इतने परोपकारी होते हैं कि स्वयं पूरा मेसेज पढ़ने में समय नष्ट करने की बजाय, सीधे औरों तक भेजकर परोपकार में जुट जाते हैं।
कई बार ऐसा लगता है कि अमरीका, जर्मनी, कनाडा, चीन और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ-साथ यूएनओ और नासा जैसी संस्थाएं रोज़ सुबह अपनी दुकान का शटर उठाते ही भगवान के आगे अगरबत्ती जलाने से पहले यह चैक करती होंगी कि आज उनके आका को कौन-सी इन्फॉर्मेशन चाहिए। और फिर जो बिडेन से लेकर बोज़कर तक अपनी लुंगी फोल्ड करके इन्फॉर्मेशन के पुलाव बनाने पर जुट जाते हैं और एक-एक कर सारी इन्फॉर्मेशन इस देश के व्हाट्सएप यूज़र्स के पास पहुँचा देते हैं।
‘भारत सरकार में अंदरख़ाने क्या चल रहा है’ से लेकर ‘शनि के पास से गुज़रते हुए जुपिटर क्या कहेगा’; तक की हर छोटी-बड़ी सूचना इनके पास उपलब्ध होती है। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों में भारत को लेकर क्या रणनीति बनाई जा रही है, पाकिस्तान और चीन गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर भारत के खि़लाफ़ क्या खुसर-फुसर कर रहे हैं; यह चौबीस घण्टे इनके ट्रांसमीटर पर रेकॉर्ड होता रहता है। कई बार तो शक होता है कि पाकिस्तान और चीन नेकर पहनकर दो उंगली आगे करके पहले इनसे परमिशन मांगने तो नहीं आते कि- ‘मैडम जी, क्या हम भारत के खि़लाफ़ कानाफूसी कर सकते हैं?’
पूरी दुनिया के देशों की विदेश नीति इनके लिए बच्चों के घर-घर खेलने से ज़्यादा कुछ नहीं है। अमरीका ने पाकिस्तान को कह दिया है कि तू चीन से कुट्टा हो जा तो मैं तुझे इंग्लैंड से अब्बा करवा दूंगा। समझ ही नहीं आता कि ये देश हैं या नोबिता और शिनचैन!
भारत सरकार का सूचना प्रसारण मंत्रालय, बीबीसी, एएनआई और इतने सारे मीडिया संस्थानों की टुच्ची इन्फॉर्मेशन इन लोगों की पर्सनेलिटी को सूट नहीं करती। आत्मनिर्भरता इनके ख़ून में शामिल है इसलिए अमरीका, जापान, चीन, नासा जैसे इनके योग्य मजदूर इन्हें कोई सूचना उपलब्ध नहीं करा पाते तो ये पुरातन भारतीय पद्धति का प्रयोग करते हुए गहरे ध्यान में उतरकर स्वयं सूचनाएं निर्मित कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में प्राप्त हुई सूचनाओं में पूरा ब्रह्मांड और स्वयं ईश्वर भी इनकी दृष्टि से अछूता नहीं रहता।
माता वैष्णोदेवी के दरबार से चला मेसेज फॉरवर्ड करने पर कितने लोगों की लॉटरी खुल गयी इसका पूरा हिसाब इनके लेजर में उपलब्ध होता है। यह और बात है कि भारत में लॉटरी बैन है।
ऐसे ही गहरे ध्यान में उतरकर प्राप्त हुई सूचना के दम पर उत्तर प्रदेश में एक बाबा ने भारत सरकार के पुरातत्व विभाग समेत पूरे देश को सोने का भण्डार खोजने के काम में लगा दिया था। और अंत में सोना न मिलने पर वे बाबा, पुरातत्व विभाग और हम सब बेशर्मी के साथ अन्य फर्स्ट हैंड इंफोर्मेशन्स फारवर्ड करने में जुट गए, क्योंकि ज़मीर, आत्मा और शर्म जैसे शब्द इन सूचनाओं के वेग में कहीं ग़ुम हो चुके हैं।

✍️ चिराग़ जैन

कितनी मुहब्बतें

नोएडा से एक फोन आया। फोन करनेवाला व्यक्ति स्वयं पॉजिटिव होकर अपने डेढ़ साल के बच्चे के साथ घर पर क़ैद था और उसकी पत्नी अस्पताल में कोविड से लड़ रही थी। बीमारी, चिंता, नन्हें बच्चे का लालन-पालन, अर्द्धांगिनी का रोग, अर्थ, अभाव…!
उस दिन मन बहुत उदास था। मदद की गुहार बढ़ती जा रही थीं और समाधान के स्रोत निचुड़ते जा रहे थे। अंधाधुंध फॉरवर्ड की समस्या के कारण अधिकतर नम्बर बन्द हो गए थे। न जाने कौन से डर के कारण प्लाज़्मा डोनर्स घर से निकलने को तैयार नहीं हो रहे थे। ऑक्सीजन भरनेवाले जो नम्बर्स हमारे पास थे वहाँ धीरे-धीरे निराशा छाने लगी थी। इस बीच कुछ नयी समस्याएँ भी सामने आने लगी थीं। कहीं किसी गाँव में कोई कोरोना पीड़ित परिवार ऑक्सिमीटर नहीं जुटा पा रहा था, तो कहीं किसी शहर में कोई ऑक्सीजन कन्सन्ट्रेटर होते हुए भी उसे ऑपरेट नहीं कर पा रहा था।
समस्याओं का वेग बढ़ने लगे और समाधान का द्वार खुल न पा रहा हो तो हिम्मत का बांध डगमगाने लगता है। ऐसी ही मनोदशा में मैंने एक आखि़री कोशिश के रूप में अपनी फेसबुक पर यह अपील की कि जो भी व्यक्ति, जिस भी क्षेत्र में, जो भी सहायता करने में सक्षम हो; वह मुझे इनबॉक्स में सम्पर्क करे। अपील पोस्ट करने के शुरुआती कुछ घण्टों में केवल इक्का-दुक्का मेसेज ही आए, लेकिन ये एकाध मेसेज मेरे टूटे मन को मज़बूती देने के लिये पर्याप्त थे। छत्तीसगढ़ से एक सज्जन ने बताया कि वे कोविड से गुज़रकर स्वस्थ हो चुके हैं लेकिन चाहते हैं कि उनका ऑक्सिमीटर किसी के काम आ जाए। एकाएक यह संदेश सामान्य लग सकता है, लेकिन इसे पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि इस संक्रमण की त्रासदी से निकला परिवार यदि इतना आत्मविश्वास जुटा पाया है कि अब उसे ऑक्सिमीटर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; यदि वह स्वयं समस्या से निकलकर दूसरे परिवारों की इस मूलभूत समस्या का विचार कर सकता है तो इस देश में सद्भाव और आत्मविश्वास की फसल लहलहाने में अधिक समय शेष नहीं है।
वायरस के आतंक के बावजूद अगर कोई इतनी हिम्मत कर पा रहा है कि वह अपने शहर में किसी की भूख मिटाने जाना चाहता है, तो इस बात के लिए आश्वस्त हुआ जा सकता है कि स्वार्थ की परत के नीचे पनप रहा करुणा का अंकुर फूट आया है।
अपने घर में हुई मौत को भूलकर भी अगर कोई किसी की साँसों के लिए ‘कुछ सहायता’ करने के लिए हमसे जुड़ने की पेशकश करता है तो इस बात की आश्वस्ति होती है कि किसी भी परिस्थिति में नैराश्य का वायरस इस मुल्क को संक्रमित नहीं कर सकेगा।
बस ये सब संदेश मेरा मानसिक उपचार कर गए। मेरी निराशा हवा हो गयी। भीतर कोई क्रांति घटित हुई, जिसने एक तरफ़ अपील की प्रतिक्रिया में प्राप्त हो रहे संदेशों को व्यवस्थित करना शुरू किया, दूसरी तरफ़ ज़रूरतमंद लोगों के संदेशों की सूची बनाई। और एक बार फिर मददगारों तथा ज़रूरतमंदों के बीच समन्वय में जुट गया।
आज किसी ने मेरे फेसबुक पर टिप्पणी की कि ये दौर समाप्त होने के बाद वह एक पीपल का पेड़ लगाएगा, उसकी देखभाल करेगा और उसका नाम रखेगा ‘चिराग़’।
मुझे अहमद फ़राज़ साहब का एक शेर याद आ गया-

और ‘फ़राज़’ चाहियें कितनी मुहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों के नाम रख दिये

✍️ चिराग़ जैन

क्या मृत्यु भी प्रतिशोध का अवसर है?

मन की विकलता ने आँखों से नींद छीन ली है। यद्यपि कठिन था, लेकिन मानव की मृत्यु के समाचार सुन-सुनकर भी मैं किसी तरह ख़ुद को थामे हुए था। लेकिन आज मैंने अपनी आँखों से मानवता की मृत्यु का दृश्य देखा। इन चीत्कारों के बीच कुटिल मुस्कान और अट्टहास के वैभत्स्य ने आत्मा को छलनी कर दिया।
आह! ये किस समाज में श्वास ले रहे हैं हम लोग! किसी की मृत्यु भी उपालम्भ, उपहास अथवा प्रतिशोध-प्रदर्शन का ‘अवसर’ हो सकता है… यह अविश्वसनीय सत्य आज मेरी आँखों के सामने था। हालाँकि लगभग ऐसा ही नंगा नाच हम गौरी लंकेश, इरफान, सुशांत सिंह राजपूत, ऋषि कपूर और राहत इंदौरी के निधन पर भी देख चुके हैं। तब भी संवेदनाएँ इस कृत्य से आहत हुई थीं; लेकिन न जाने आज क्यों यह दृश्य कुछ अधिक ही विदीर्ण कर गया।
आज पूरे देश में मातम पसरा है। मृत्यु किसी बवंडर की तरह सबको अपने आगोश में समेटे लिए जा रही है। चिता, लाश, श्मशान, श्रद्धांजलि जैसे शब्दों के हम नियमित प्रयोक्ता बन गए हैं। इस स्थिति में भी समाज प्रतिशोध की ज्वाला बचाए रख पाया है और वह भी इतनी वीभत्स की जिसको सोचने भर से जी घृणा से भर जाता है।
यदि इन्हीं सब मनुष्यों के बीच रहना मानव जीवन की विवशता है तो मुझे उन लोगों से ईर्ष्या हो रही है जो यह सब देखने से पहले ही चिरनिद्रा में लीन हो गए।
इस दुनिया में इतने सारे वाद, इतनी सारी विचारधाराएँ, इतने सारे धर्म, इतने सारे सम्प्रदाय, इतनी सारी जातियाँ, इतने सारे पंथ और इतने सारे रंग भर गए हैं कि बेचारी मनुष्यता के लिए जगह ही कहाँ बची है।
लेकिन आज एक बात बिल्कुल साफ हो गयी कि जो भी व्यक्ति किसी वाद, विचारधारा या अन्य किसी भी शब्द के नाम पर अकड़ कर खड़ा है, उसके पैर उस लाश पर जमे हुए हैं, जिसमें कभी उसकी मनुष्यता श्वास लेती थी।
✍️ चिराग़ जैन

सामान्यीकरण की बीमारी

जो लोग कोविड की आपदा को अवसर समझकर ऑक्सीजन से लेकर दवाइयों तक की कालाबाज़ारी कर रहे हैं; वे भी इसी देश के हिस्से हैं। जो लोग बिना किसी कारण के ऑक्सीजन और ज़रूरी दवाइयाँ अपने घरों में स्टॉक कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं। जो लोग किसी से दुश्मनी निकालने के लिए उसका फोन नम्बर कोविड हेल्प के पोस्टर पर चिपका कर वायरल कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं। और जो लोग तन-मन-धन से जुटकर लोगों की यथासम्भव मदद कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं।
हमारा समाज सामान्यीकरण करने की प्रवृत्ति का शिकार रहा है। दिल्ली में कोई बलात्कार हो गया तो हर दिल्लीवाले को घूर-घूरकर देखने लगे। भाजपा का कोई नेता बेईमान निकल गया तो हर भाजपाई को गरियाने लगे। कांग्रेस का कोई नेता नाकारा निकल गया तो पूरी कांग्रेस का उपहास करने लगे। भगवा वस्त्र पहनकर कोई अपराध करता पकड़ा गया तो पूरे हिन्दू समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया। जाली टोपी लगाकर कोई गुनाह करता मिला तो सभी मुसलमानों को गुनहगार मान बैठे। एक महिला दहेज की आँच में जली तो हर दूल्हे को हत्यारा समझ लिया। एक पति का परिवार दहेज कानूनों के कारण बर्बाद हो गया तो हर दुल्हन को षड्यंत्री मान लिया।
यह प्रवृत्ति समाज के लिए घातक है। जिन खेतों में अन्न उपजता है वहाँ धतूरा भी फूट आता है। कैक्टस के झाड़ में भी दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत फूल खिल जाते हैं। किसी के प्रति धारणा पालकर उसके पूरे समुदाय के लिए जजमेंटल हो जाना अविवेक का प्रमाण है।
हमने तो अपने धर्मग्रन्थों में देखा है कि सौ कौरवों में भी एक ‘विकर्ण’ हो सकता है। हमने अपनी कथाओं में पढ़ा है कि बाली के घर भी अंगद जन्म ले सकता है। फिर हम इतनी सरलता से किसी एक के कृत्य को देखकर किसी अन्य का आकलन क्यों करने लगते हैं?
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक की यात्रा तो बड़ी बात है हमने तो एक ही अशोक का चंड रूप भी देखा है और विरक्त रूप भी। हमने एक ही अंगुलिमाल में दो चरित्र देखे हैं। यदि बुद्ध भी अंगुलिमाल के प्रति जजमेंटल हो गए होते तो उसके गले से अंगुलियों की माला उतारकर उसे कांचुकीय पहनाने में कभी सफल न हुए होते।
धारणाएँ बनाकर समाज को देखना बन्द करना होगा। पूरी दुनिया की राजनीति ने ऐसी ही पूर्वग्रह ग्रसित धारणाओं के आधार पर समाज को बाँटा है और पूरी दुनिया के अध्यात्म ने इस बँटवारे को पाटने के लिए मनुष्यता का भराव किया है।
जो बाँट रहा है, वह अपना कोई भी नाम रख ले, लेकिन उसके मूल में सियासत मिलेगी। और जो जोड़ रहा है, वह चाहे अपना कोई भी रूप बना ले, उसके मूल में मनुष्यता मिलेगी।
यह समय व्यक्तियों के प्रति धारणाएँ बनाने का नहीं अपितु मनुष्यता को पोसने का है। विपत्ति का यह कालखण्ड यदि मनुष्य को मनुष्यता का सम्मान करना सिखा गया तो इसके लिए चुकायी गयी क़ीमत की टीस काफ़ी कम हो जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

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