Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar
सामान्य जीवन के सुगम रास्ते को छोड़कर कुछ अलग करने का पागलपन मनुष्य को विशेष बनाता है, लेकिन इस विशेष जीवन का चुनाव करने वाले लोग (चाहे जिस भी क्षेत्र में हों) जो क़ीमत चुकाते हैं, उस पर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता। बनी-बनाई राह छोड़कर अपनी पगडण्डी स्वयं बनानेवाले ये दीवाने अगर विफल हो जाएँ तो समाज इन्हें मूर्ख कहकर छोड़ देता है। लेकिन यदि ये लोग सफल हो जाएँ तो वही समाज इनकी बनाई पगडण्डी पर चलने लगता है।
जोखि़म उठाने की हिम्मत और पगडण्डी बनाने के लिए झाड़-झंखाड़ से जूझने का जज़्बा विफल होनेवाले में भी उतना ही होता है, जितना सफल होनेवाले में होता है। राजनीति, अध्यात्म, साहित्य, कला, उद्योग, खेल और ऐसे प्रत्येक असामान्य क्षेत्र में काम करनेवाले हर व्यक्ति के भीतर एक ‘मनुष्य’ ज़रूर होता है, जो समाज की साधारण आँखों को कभी दिखाई नहीं देता।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
बाहर से जीते-जीते हैं, भीतर से हारे-हारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
अपने सिर पर ओट रखी है, सारी दुनिया की सिरदर्दी
इनकी दिनचर्या लगती है, घर भर को आवारागर्दी
सामाजिक जीवन जीने की चाहत ने सब कुछ छीना है
जो सबको जीवित रख पाये, वो जीवन इनको जीना है
ये बेचारे, केवल अपनी नींदों के ही हत्यारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
लगने को लगता है, लेकिन इनका दिल भी सख्त नहीं है
आँसू इनको भी आते हैं, पर रोने का वक़्त नहीं है
सबका सुख-दुःख ढोते फिरते, सबकी नाराज़ी सहते हैं
सबके साथ खड़े होते पर, जीवन भर तन्हा रहते हैं
इनकी तन्हाई से पूछो, इनके भी आँसू खारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
सीधा-सादा जीवन जीकर, ये भी उम्र बिता सकते थे
मुट्ठी भर आमदनी करके, रूखी-सूखी खा सकते थे
लेकिन इन लोगों ने अपने सपनों का सम्मान किया है
अपना जीवन मुश्किल करके, दुनिया का आसान किया है
थोड़े इनमें अवगुण हैं पर, गुण भी तो कितने सारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
देश बहुत विकट परिस्थितियों से गुज़र रहा है। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं ने हमें मूलभूत आवश्यकताओं को अनदेखा करना सिखा दिया है। न्याय व्यवस्था स्वयं कठघरे में खड़ी है। जनता, अपराधियों से अधिक पुलिस से आक्रांत है। मीडिया, औद्योगिक घरानों की उंगलियों पर नाच रहा है और आद्योगिक घराने सत्तारूढ़ दल के इशारों पर… इस जंजाल में जनहित और लोकतंत्र दोनों मरणासन्न हैं।
सुव्यवस्थित प्रचार के ज़रिये राजनीति ने समाज में परस्पर विद्वेष बो दिया है। जब कोई एक व्यक्ति अपनी किसी समस्या को लेकर नम आँखों से तंत्र की ओर देखता है तब दूसरे लोग उसकी समस्या या उसके आँसुओं को सांत्वना देने की बजाय, उसकी कराह में राजनैतिक अर्थ टटोलने लगते हैं। उसके निवेदन, प्रलाप, उपालम्भ अथवा आक्रोश में किसी दल विशेष का समर्थन या विरोध तलाशने लगते हैं।
राजनीति आपस में लड़ते इन लोगों को देखकर आश्वस्त हो जाती है कि हम कुछ भी करें, जनता हमारा विरोध तब कर सकेगी जब उन्हें आपस में लड़ने से फ़ुर्सत मिलेगी।
जनता गाली देना सीख गयी है। जो व्यक्ति दक्षिणपंथ के पक्ष में बोलेगा, उसे वामपंथियों की गाली खानी पड़ेगी। जो वामपंथ के पक्ष में बोलेगा, उसे दक्षिणपंथियों की गाली खानी पड़ेगी। जो निष्पक्ष होगा, उसे दोनों की गाली खानी पड़ेगी।
दलितों के दम पर बने हुए राजनैतिक संगठन दलितों को यह सोचने का अवसर ही नहीं देंगे कि दलित संगठन का हित होने से दलित समाज का हित होना आवश्यक नहीं है। मुस्लिम समाज के दम पर बने राजनैतिक संगठन इस विषय पर कभी चर्चा ही न करेंगे कि इस्लामिक संगठनों के हित में तन-मन-धन न्यौछावर करने वाले मुसलमानों के जीवन पर किसी इस्लामिक लीडर के मंत्री बन जाने से क्या प्रभाव पड़ा।
राजनीति आपका यूज़ करती है। उसे विवेकशील और जिज्ञासु व्यक्ति पसंद नहीं होता। विवेकशील व्यक्ति राजनेताओं के लिये ख़तरनाक होते हैं। इसलिये आजकल बुद्धिजीवी व्यक्ति का उपहास किया जाने लगा है। बुद्धिजीवी होना किसी अपमान से कम नहीं रह गया है। ठीक इसी प्रकार ज्यों शांतिप्रिय व्यक्ति राजनीति के लिये व्यर्थ है। झगड़े नहीं होंगे तो राजनीति की महत्ता ही समाप्त हो जायेगी। सब लोग चैन से अपनी-अपनी रोटी कमाएंगे, छुटपुट विवाद हुए भी तो सभ्य पुलिस और सुव्यवस्थित न्यायालय में झटपट उनका निपटारा हो जाएगा; यदि ऐसा समाज बन गया तो कोई क्यों राजनेताओं को पूछेगा?
यदि मुसलमान और हिंदुओं के बीच झगड़े न होंगे तो कट्टर हिन्दू नेता और कट्टर मुस्लिम नेताओं की शरण में कोई क्यों जायेगा। इसीलिये साम्प्रदायिक सद्भाव की बात करनेवाला व्यक्ति भी आजकल उपहास का पात्र बन गया है। जो लड़ाए वही योग्य व्यक्ति है। जो झगड़ा शांत कराने का उपक्रम करे, वह तो मूर्ख है।
राजनीति ने समाज का विवेकहरण कर लिया है। पुराने समय में हमारे घर में एक केबल कनेक्शन होता था। जिसमें लगभग सभी चैनल 50, 75, 100 या 150 रुपये में आराम से देखने को मिल जाते थे। घर पर दूसरा टेलिविज़न आये तो उतने पैसों में केबलवाला दोनों टीवी केबलयुक्त कर देता था। कोई चैनल यदि केबल से प्रसारित न हो रहा हो तो केबलवाले से कहकर उसे शुरू करवा लिया जाता था। आंधी, बारिश, बादल जैसी स्थितियों में भी केबल कनेक्शन जारी रहता था। फिर हमें बताया गया कि यह केबलवाला हमें लूट रहा है। यह उन चैनल्स के भी पैसे हमसे वसूल रहा है जो हम नहीं देखते। इसलिये बुद्धिमानी इसमें है कि सेट-टॉप बॉक्स लगवाकर केवल उन चैनल्स का भुगतान किया जाये जो हमें देखने हों। हमें बात अच्छी लगी। हमने प्रारम्भ में स्वेच्छा से सेट-टॉप बॉक्स लगवाये। बाद में सरकार ने सेट-टॉप बॉक्स आवश्यक कर दिये। अब हम केवल उन्हीं चैनल्स का भुगतान करते हैं, जो हम देखते हैं; यह और बात है कि तब हम 100 रुपये में सारे चैनल देखते थे अब तीन-चार सौ रुपये में चुनिंदा चैनल्स देखते हैं। यदि आपने कोई ऐसा चैनल देखना है, जिसका प्रसारण आपके घर पर लगे सेट-टॉप बॉक्स की कम्पनी से नहीं होता है तो आप चाहकर भी उस चैनल को सब्सक्राइब नहीं कर सकते। हाँ, यह लाभ अवश्य हुआ है कि जैसे ही बाहर बादल छाएँ, पुरवा या पछुआ की हिलोर आये अथवा बरखा रानी आपके अंगना में रुनझुन का संगीत बजाए तब आपका टेलिविज़न आपको बता देता है कि टीवी के सामने बैठकर आँखें मत फोड़ो, बाहर जाकर मौसम का लुत्फ़ उठाओ!
यह है राजनीति की विवेकहरण योजना।
प्यारे देशवासियों! राजनीति हमें हिन्दू-मुस्लिम, दलित-सवर्ण, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, स्त्री-पुरुष, बीपीएल-यूपीएल, शहर-गाँव, कांग्रेसी-भाजपाई और न जाने कितने वर्गों में बाँटकर इस स्थिति तक ले आयी है कि हम अपने हित-अहित के चिंतन से पहले राजनैतिक दलों की स्वार्थ-साधना का चिंतन करने लगे हैं। इस पथ पर न तो हमारे समाज का उत्थान होगा, न ही हमारे लोकतंत्र का..! हम एक बार ठहरकर विचार करें कि कहीं हम अपने आचरण से राजनीति को यह संदेश तो नहीं दे बैठे कि आप निश्चिंत रहें माई-बाप, हमें सब कुछ सहने की आदत है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भारतीय राजनीति, जनता को, मिलकर रहने की प्रेरणा देती है। धर्म, विचार, आदर्श, सिद्धांत और विचारधारा जैसे खिलौनों में उलझकर आपस में द्वेष उत्पन्न करनेवाले लोगों को राजनीति से सीखना चाहिए कि इन सब रास्तों का अस्तित्व वहीं तक है, जहाँ तक गंतव्य दिखाई न देता हो। एक बार गंतव्य दिखाई दे जाये; फिर इन शब्दों को विस्मृत कर देना ही सफल मनुष्य का कर्त्तव्य है। जो मार्ग ईश्वर तक न पहुँचाता हो वह अधर्म है; इसी प्रकार जो सिद्धांत सत्ता तक पहुँचाने में बाधा दे, उसका वध कर देना ही उचित है।
अध्यात्म में जिन्हें स्थितप्रज्ञ कहा गया है, वे वास्तव में राजनीति के गलियारों में ही वास करते हैं। जनता चाहे आपके लिये लड़-लड़कर मर रही हो, कार्यकर्ता चाहे आपके प्रति श्रद्धावान रहकर अपना तन-मन झोंक चुका हो; किन्तु सत्ता पर अधिकार करने के लिये जनता की भावनाओं और कार्यकर्ताओं के समर्पण की बेड़ियों को तोड़ देनेवाला ही वास्तव में शासन के योग्य माना जाता है।
बरसों-बरस मनुवाद को पानी पी-पीकर कोसनेवाले यदि भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर उस समय उत्तर प्रदेश की कुर्सी न हथियाते तो कार्यकर्ताओं की भावना को क्या धरकर चाटते? साँप और नेवले की तरह लड़नेवाले सपाई, अगर बसपाइयों के चरण न पखारते तो लोहिया जी के सिद्धांतों का क्या अचार डालना था?
राजनीति निरंतर हमें अपने आचरण से यह समझाती रहती है कि सफल होनेवाले व्यक्ति सिद्धांतों की पूँछ पकड़कर नहीं चलते, वे तो ‘महाजनो येन गतः स पन्थः’ की नीति पर चलकर सदैव सत्तारूढ़ रहते हैं। नीतीश कुमार जी लालूप्रसाद यादव के साथ गठबंधन करते समय यदि राजद के प्रति कहे गए अपने ही वचनों का स्मरण करने के चक्कर में पड़े होते तो कुर्सी पर ध्यान केंद्रित कैसे करते? ये महान योगी तो वर्तमान में जीते हैं। अर्जुन की तरह उन्हें केवल मंत्रालय की कुर्सी दिखाई देती है; अन्य वस्तुएँ उनकी एकाग्रता से अछूती ही रहती हैं। कल किसको क्या कहा था और कल किसको क्या कहा जायेगा – इन ओछे प्रश्नों में उलझना तो कार्यकर्ता का काम है। इन सबसे ऊपर उठे बिना आप कार्यकर्ता तो हो सकते हो, नेता नहीं।
नेता बनने के लिये तो स्वयं अपनी ही कही हुई बातों से विमोह करना पड़ता है। जिसको गाली दी जा रही है और जो गाली दे रहा है ये दो महाशक्तियाँ जब एकाकार होकर मंच पर गले मिलती हैं तब कहीं जाकर एक सरकार बनती है।
शिवसेना की कट्टरपंथी छवि के समस्त अवगुणों को ‘थोथा देय उड़ाय’ की तरह मन से भुला कर विधायकों की संख्या का सद्गुण ग्रहण करते हुए जब कांग्रेस महाराष्ट्र राज्य की सरकार का निर्माण करने के लिये राज़ी हो जाती है तब कहीं जाकर यह ज्ञात होता है कि राजनीति के हठयोगियों को कितनी कठिन साधना करनी पड़ती है।
राजनेता को जनक की तरह विदेह भी होना पड़ता है। एक ही समय में एक ही पार्टी का केंद्र में समर्थन तथा राज्य में विरोध करने का कार्य बड़े-बड़े योगियों के वश में भी नहीं है। किंतु हमारे राजनेताओं ने यह दूभर कार्य अनेक अवसरों पर कर दिखाया है।
पीडीपी और भाजपा का गठबंधन; राजद और कांग्रेस का गठबंधन; वामपंथ और दक्षिणपंथ का गठबंधन… और न जाने कितने असम्भवप्रायः संयोग बनाकर भारतीय राजनीति ने हमें बार-बार समझाया है कि शत्रु और मित्र केवल चुनावी रैलियों में होते हैं; सदन में यह सब नहीं चलता। जो इन सबमें फँसते हैं वे कभी सदन के दर्शन नहीं कर पाते।
इसलिए हे कार्यकर्ताओ! राजनीति में रोचकता बनाए रखने के लिए ख़ूब लड़ो। जो अभी हमारे साथ नहीं है उसको ख़ूब गालियाँ दो। उसके कच्चे चिट्ठे खोलकर उसे भरे बाज़ार में नंगा करो। जो उसका समर्थक हो उसे अपना शत्रु मानो। उससे मित्रता, रिश्तेदारी और मनुष्यता तक समाप्त कर दो। किन्तु जैसे ही वह हमारे साथ मिल जाए, तुरंत उसका गुणगान करना प्रारंभ करो। उसके ऊपर लगनेवाले भ्रष्टाचार के आरोपों को सिरे से ख़ारिज करो। उसके समर्थक को रिश्तेदार बना लो।
यदि यह सब करते समय तुम्हें हैरानी अथवा परेशानी हो; तुम्हारा ज़मीर तुम्हें धिक्कारने लगे; तुम्हारी आत्मा तुम्हारे हाथ पकड़ ले तो समझ लेना कि तुम्हारा जन्म केवल झण्डे और बिल्ले बाँटने के लिए ही हुआ है; तुम्हारा कार्य केवल पार्टी कार्यालय के बाहर इलेक्शन के बाद भीड़ बनकर नाचने तक सीमित है; तुम्हें मृतज़मीर सिद्धों के ट्वीट को वायरल करने में ही अपनी ऊर्जा लगानी चाहिये क्योंकि राजनेता बनना तुम्हारे वश का रोग नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
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हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।
काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?
मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो… लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।
✍️ चिराग़ जैन