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बुरा मानने वाले लोग

हर आदमी के जीवन में
तीन तरह के लोग होते हैं
एक जानने वाले
एक पहचानने वाले
एक बुरा मानने वाले

जानने वाले लोग
जीवन को बहाव देते हैं
पहचानने वाले गाहे-बगाहे भाव देते हैं
और बुरा मानने वाले
हमेशा तनाव देते हैं।

जानने वाले लोग
ज़िन्दगी की डोर होते हैं
पहचानने वाले बेमतलब का शोर होते हैं
और बुरा मानने वाले
न डोर होते हैं, न शोर होते हैं
ये साले कुछ और होते हैं।

बुरा मानने वाले लोग
पतझड़ में मिलते हैं
बहारों में मिलते हैं
दुश्मनों में मिलते हैं
यारों में मिलते हैं
पड़ोसियों में मिलते हैं
रिश्तेदारों में मिलते हैं।
शास्त्रीय भाषा में कहा जाए
तो जहाँ-जहाँ तक
जीवन के निशान हैं
ये बुरा मानने वाले
वहाँ-वहाँ तक विद्यमान हैं।

ये अपनी-अपनी हाँकते हैं
और सामने वाले को
कुछ नहीं कहने देते हैं।
ये न तो कभी ख़ुद ख़ुश रहते
और न किसी को रहने देते हैं।

इस प्रजाति के लोग
जब घर से निकलते हैं
तो इनका एक ही लक्ष्य होता है
और ये लक्ष्य जीवन भर अक्षय होता है
कि किसी नए आदमी से बैर ठानना है
आज फिर किसी बात का बुरा मानना है
इस लक्ष्य को साधने
ये सारा दिन भटकते हैं
गाड़ियों में चलते हैं, बसों में लटकते हैं
तरह-तरह से लोगों से अटकते हैं
दुनिया भर में अपनी राय भिड़ाते हैं
सबकी फटी में टांग अड़ाते हैं
सबकी समस्याएँ अपने ऊपर ओटते हैं
और फाइनली
किसी न किसी बात का
बुरा मान कर ही घर लौटते हैं

डिस्कवरी चैनल वाले
जब इन पर प्रोग्राम बनाएंगे
तो इनके बारे में कुछ यूँ बताएंगे
बुरा मानने वाले ये जीव
पृथ्वी के हर कोने मेें पाए जाते हैं
सामान्यतया
बुरा मानने का तत्व
मादा में नर से अधिक होता है
इन तस्वीरों में जो व्यक्ति
अपनी आँखों के ऊपर की भौंहें ताने हुए है
वह वास्तव में कैमरे से बुरा माने हुए है

इस जाति के एक किंग
नाम था उखड़सिंह
किसी के घर खाने पर गए
ऐसे ही नहीं गए
बाक़ायदा उसके बुलाने पर गए
बुलाने वाले ने ख़ूब दिया आदर सत्कार
सेवा-सुश्रुसा, अपनत्व और प्यार
हाथ जोड़कर विनम्रता का मनोयोग
स्वादिष्ट पकवान, पूरे छप्पन भोग
भेंट देकर स्वागत किया था
उपहार देकर विदा किया
घर पहुँचते पहुँचते
उखड़सिंह जी इस बात पर नाराज़ हो गए
कि अगले ने नाराज़ होने का मौका ही नहीं दिया

बुरा मानने वाली प्रजातियों के
अलग अलग रीति-रिवाज़ होते हैं
न तो ये व्यक्ति की परवाह करते हैं
न ही अवसर के मोहताज होते हैं
चाहे ये किसी को जानते हैं
चाहे नहीं जानते हैं
सबसे समभाव रखते हैं
मतलब, बराबर बुरा मानते हैं

ये अलौकिक लोग न चोर होते हैं
न मवाली होते हैं
न संत होते हैं, न आली होते हैं
ये लोग दरअस्ल बेहद ठाली होते हैं

परेशान रहना इनकी लाइफ का फंडा होता है
कड़वा बोलना इनका परमानेंट एजेंडा होता है
कोई इन्हें ख़ुश करने की कितनी भी कोशिश कर ले
लेकिन इनका रिस्पांस बेहद ठंडा होता है

ये गले में भौंकड़ा पूरते हुए पैदा होते हैं
माथे में त्यौरियां डाले जीते हैं
और अपने जीवन में
पानी से ज़्यादा
ख़ून का घूंट पीते हैं।

मुस्कुराहट इनके पास आने से नाटती है
हंसी इन्हें काटती है
ठहाकों से ये डरते हैं
और ज़िन्दगी से इतना बुरा माने हुए हैं
कि लगभग रोज़ मरते हैं

बुरा मानना है तो ऐसे मानो
जैसे गांधी जी ने माना था
अंग्रेजों के अत्याचार का
जैसे शांतिदूत कृष्ण ने माना था
दुर्योधन के दुर्व्यवहार का
जैसे सीता ने माना था
रावण की मनमानी का
जैसे प्रह्लाद ने माना था
हिरण्यकश्यप जैसे अभिमानी का

ऐसा बुरा मत मानो
कि निरपराध अहिल्या का जीवन
पत्थर सा शाप बन जाए
ऐसे नाराज़ न होओ
कि किसी श्रवण कुमार का पुण्य
किसी दशरथ का पाप बन जाए
ऐसी गांस मत पालो
कि कुरुक्षेत्र में महाभारत खड़ी हो जाए
और ऐसी आदत मत डालो
कि कोई भी छोटी सी बात
इस अनमोल जीवन से बड़ी हो जाए
✍️ चिराग़ जैन

शरद पूर्णिमा

शरद रात्रि का चंद्रमा, किसे सुनावे पीर
ना जमना में नीर है, ना अंगना में खीर

सखी! शरद की पूर्णिमा, मन हो गया अधीर
मैं तरसूं निज श्याम को, दुनिया खाए खीर
✍️ चिराग़ जैन

लो वेस्ट जीन्स पर बैन

पिछले दिनों इस बात से पूरे समाज में सनसनी फैल गई कि अब लड़के-लड़कियाँ लो वेस्ट जीन्स नहीं पहन सकेंगे। मुद्दआ ये है कि इस प्रकार के परिधानों को उत्तेजक बताते हुए इन पर बैन लगा दिया गया है। अब ये विषय विश्वविद्यालयों की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं के वाद-विवाद व्यवसाय तक छाया रहेगा।
दरअसल हमारा जागरूक समाज इस निर्णय को इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि यह हमारे मौलिक अधिकार ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का हनन है। इस संदर्भ में परम आदरणीया मल्लिका जी की एक सूक्ति उद्धृत की जा सकती है। जब उनके परिधानों को लेकर कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने हंगामा खड़ा किया था तो मल्लिका जी ने यह उद्बोधन देकर मुआमला शांत किया था कि मेरे पास ख़ूबसूरत बदन है तो मैं क्यों न दिखाऊँ। तर्क में दम था। सो हंगामाजीवियों को साँप संूघ गया और संपादकीय पृष्ठों से उठा विवाद पेज थ्री के इस बयान से समाप्त हो गया।
कदाचित् बुद्धिजीवियों ने यह सोचकर विवाद को आगे नहीं बढ़ाया कि यदि कल को मल्लिका जी ने उन्हें कम कपड़े पहनने की चुनौती दे डाली तो क्या होगा! सो अपनी इज़्ज़त अपने हाथ….। ख़ैर कपड़ों की तरह विषय भी भटक गया था। सो वापस लो वेस्ट जीन्स पर आते हैं।
यह मुआमला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का नहीं है अपितु हमारे सभ्य समाज की ‘अनुभूति की स्वतंत्रता’ का भी है। जब कुछ ‘सुराग़’ ही नहीं दिखाई देगा तो कल्पनाशील समाज पूरी तस्वीर की कल्पना कैसे करेगा। और जब तस्वीर की कल्पना ही नहीं होगी तो वह सुखद अनुभूति कैसे होगी जो……….!
इतना ही नहीं, ये निर्णय पुनः हमारे समाज की महिलाओं को उसी पुरुषवादी कठघरे में ला खड़ा करने का एक षड्यंत्र है जिससे बाहर आने के लिए सैंकड़ों लोग महिला-मुक्ति का झंडा उठाए कमा रहे हैं। पहले पुरुषों ने धर्म के नाम पर महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में क़ैद कर रखा था और अब पूरे कपड़ों में क़ैद करने के लिए समाज और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है।
ये अन्याय नहीं चलेगा। और चूंकि क्रांति दबाने से और भड़कती है इसलिए यदि पुरुष यूँ ही मनमानी करते रहे और महिलाओं को पूरे कपड़े पहनाने को विवश किया गया तो महिलाएँ इसका और भी अधिक विरोध करेंगी और कोई काॅरपोरेट कंपनी अपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभाते हुए लो थाइज़ जीन्स लांच कर देगी। फिर देखते रह जाएंगे सारे पुरुष!
सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए इस निर्णय पर बैन लगाए। ज़रा सोचिए! एक ग़रीब आदमी जो अभी दो सप्ताह पहले लिवाइज़ की जीन्स ख़रीद कर लाया है, इस निर्णय के लागू होने से उसके दिल पर क्या बीतेगी। कहाँ से लाएगा नई जीन्स ख़रीदने के लिए वह पैसा। जिस दौर में लोगों के पास दाल-रोटी के लाले हैं, ऐसे में सरकार ने यदि इस प्रकार के निर्णयों पर रोक नहीं लगाई तो ग़रीबी कितनी बढ़ जाएगी।
वैसे भी जब गांधी जी अपने देशवासियों की चिंता में अपने पायजामे को धोती में बदल सकते हैं, तो गांधी जी के अनुयायी अपनी जीन्स को थोड़ा छोटा नहीं कर सकते। ये और बात है कि गांधी जी ने पाऊँचे काटे थे और हमने बैल्ट! पर मूल मुद्दआ तो कटौती का है। और कटौती हम कर रहे हैं। अब इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए और इसको जीन्स से हटाकर टाॅप पर लागू करना चाहिए कि जो लो वेस्ट टाॅप पहनेगा उस पर ज़ुर्माना किया जाएगा। इससे हमारे टाॅप भी ऊपर उठेंगे और ‘संस्कृति’ भी!

✍️ चिराग़ जैन

रात से रिश्वत ली है

जीत ने मात से रिश्वत ली है
दिल ने जज़्बात से रिश्वत ली है

चांदनी कम है अंधेरा ज़्यादा
चांद ने रात से रिश्वत ली है

फिर से बारिश में चुएगा छप्पर
इसने बरसात से रिश्वत ली है

सब समय की दुहाई देते हैं
सबने हालात से रिश्वत ली है

मुझको लगता है मिरी नींदों नें
कुछ ख़यालात से रिश्वत ली है

कैसे सच्चा जवाब दे कोई
जब सवालात से रिश्वत ली है

✍️ चिराग़ जैन

इलेक्शन

होता तो यही है जी हर बार इलेक्शन में
पब्लिक को मनाती है, सरकार इलेक्शन में

जनता का ही पैसा है, जनता पे ही शासन है
जनता का ही होता है, व्यापार इलेक्शन में

कुछ झंडे उठाकर के, कुछ बिल्ले लगाकर के
बिन बात ही करते हैं, बेगार इलेक्शन में

कुछ रंगे सियारों ने, कुछ नंगे गरीबों के
बच्चों को लिया कैसे पुचकार इलेक्शन में

लीडर के कदम चूमें, ये लीपी हुई सड़कें
इनका तो हुआ ही है, उद्धार इलेक्शन में

हर दिल है महज दलदल, दिल्ली के दलालों की
कूदे तो भला कैसे, ख़ुद्दार इलेक्शन में

✍️ चिराग़ जैन

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