आज़ाद हो गए हैं
कुछ इस तरह के अपने हालात हो गए हैं
सपने सभी सुहाने, बर्बाद हो गए हैं
आब-ओ-हवा है ऐसी, दम सबका घुट रहा है
कुछ लोग कह रहे हैं- ‘आज़ाद हो गए हैं’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
कुछ इस तरह के अपने हालात हो गए हैं
सपने सभी सुहाने, बर्बाद हो गए हैं
आब-ओ-हवा है ऐसी, दम सबका घुट रहा है
कुछ लोग कह रहे हैं- ‘आज़ाद हो गए हैं’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
यूँ ही पूछ बैठी थीं तुम
‘मेरे बिना रह पाओगे?’
सुनकर
मेरे मस्तिष्क में
एकाएक कौंध गया एक और प्रष्न-
‘क्या तुम सही उत्तर सह पाओगी?’
…ख़ुद से उलझते-जूझते
अनायास ही
मेरे मुँह से निकल गया-
‘नहीं!’
…और तुमने
इसे अपने प्रश्न का
उत्तर समझ लिया।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
कोई महज ईमान का जज्बा लिए जिया
कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिए जिया
टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ
इक शख्स सच के नाम पे क्या-क्या लिए जिया
जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब
तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिए जिया
था बेलिबास अपनी नज़र में हर एक शख्स
दुनिया के दिखावे को लबादा लिए जिया
रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिए जिया
इक वो है जिसे दौलते-शोहरत मिली सदा
इक मैं हूँ ज़मीरी का असासा लिए जिया
तुम पास थे या दूर थे, इसका मलाल क्या
मैं तो लबों पे नाम तुम्हारा लिए जिया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
रात के सन्नाटे में
‘प्लानर’ लेकर बैठा।
सोचा, कुछ सुनियोजित कर लूँ
अपने काम-धाम!
घण्टे-सवा घण्टे तक
पृष्ठ दर पृष्ठ
लिखता रहा
प्रोजेक्ट्स और पेंडिंग्स!
…तभी
सन्नाटे को चीरती हुई
मेरे कानों में गूंजी
किसी कुत्ते के रोने की आवाज़…
…और मैंने
एक मद्धम-सी कँपकँपी के साथ
बन्द कर दिया प्लानर!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
इश्क़ को बेदर्दियों का ख़ौफ़ है
ताज़रों को फ़र्दियों का ख़ौफ़ है
जानवर इन्सान का दुश्मन कहाँ
आदमी को वर्दियों का ख़ौफ़ है
ओस, कोहरा, बर्फ़ और ठण्डी हवा
बेघरों को सर्दियों का ख़ौफ़ है
ज़ख़्म को मरहम न मिल जाए कहीं
ज़ुल्म को हमदर्दियों का ख़ौफ़ है
मन के जज़्बातों को दुनिया में ‘चिराग़’
तन की गुण्डागर्दियों का ख़ौफ़ है
✍️ चिराग़ जैन
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