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कोई बिछड़कर मिला है

जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है

उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है

कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है

हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है

भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है

कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है

ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है

जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है

कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है

✍️ चिराग़ जैन

ग़रीबी

रुके आँसू, दबी चीखें, बंधी मुट्ठी, भिंचे जबड़े
इन्हीं के तर्जुमे से मुल्क़ में विस्फोट होता है
ये बम रखने का काम अच्छा-बुरा औरों की ख़ातिर है
ग़रीबी के लिए तो सिर्फ़ सौ का नोट होता है
✍️ चिराग़ जैन

जनता की लूट

क्रूर काल ने गुरुग्राम की एक दम्पत्ति की गोद सूनी कर दी और अस्पताल ने उनकी जेब काट ली। इस देश में कुछ बुनियादी आवश्यकताएं जनता की लूट का माध्यम बन गई हैं। चिकित्सा में सरकारी तंत्र की नाकामी का लाभ अस्पताल उठाते हैं और कई कई दिन तक शव को वेंटिलेटर पर रख कर बिल बढ़ाते पाए जाते हैं। बीमारी से परेशान रोगी और किसी अपने से बिछड़ जाने के शोक से ग्रस्त परिजन कसाई की तरह निष्ठुर बने अस्पताल प्रशासन के हाथों लुटने को विवश हैं।
यदि चिकित्सा एक सेवाकार्य है तो यह कहाँ तक उचित है कि एक सेवक मानवीय संवेदनाओं को धता बता कर लाश तक सौंपने से पूर्व मोलभाव पर उतर आए? और यदि यह व्यवसाय है तो फिर कोई व्यापारी जिस काम को करने की कीमत ले रहा है, जब वह काम ही न हुआ तो ग्राहक से उसकी कीमत कैसे मांग सकता है। एक डॉक्टर किसी मरीज का डेंगू का इलाज कर रहा है और इस इलाज के एवज में दस लाख का मूल्य मांगता है यदि वह मरीज इलाज के दौरान मर जाए तो इसका अर्थ है कि डॉक्टर इलाज नहीं कर पाया और यदि इलाज नहीं कर पाया तो ग्राहक से पैसे लेने का उसका अधिकार समाप्त हो जाना चाहिए।
पूरा विश्व मानव जीवन की बेहतरी के लिए चिकित्सा जगत पर निर्भर है, विश्व भर में अलग अलग पद्धतियों के शोधकर्ता जटिल रोगों के निदान खोजने में जीवन होम कर रहे हैं। लेकिन इन शोधकार्यों से निकल कर नुस्खे का अमृत कलश पेटेंट के अंधकूप में समा जाता है फिर उस संजीवनी को महंगे दामों पर कोई व्यवसायी ख़रीद लेता है और मूर्छित लक्ष्मण के परिजनों से मुंहमांगी रकम वसूलता है।
व्यवसाय बन चुके चिकित्सा के पेशे में स्वास्थ्य और इलाज वरीयता नहीं रह गए हैं। फाइव स्टार में तब्दील हो चुकी वैद्यशालाएँ अब लाचार परिवारों से पैसा लूटने की जुगत में व्यस्त हैं। दवाई कम्पनियों से मिलने वाली कमीशन के आधार पर डॉक्टर्स की प्रिस्क्रिप्शन निर्धारित होने लगी है। महंगे महंगे टेस्ट (वो भी डॉक्टर साहब द्वारा सुझाई गई लैब से) करवाने में ही डॉक्टर साहब की सबसे ज़्यादा रुचि होती है।
सरकारी अस्पतालों में नम्बर नहीं आता और निजी अस्पताल आपका नम्बर लगा देते हैं। सरकारी अस्पतालों में बदतमीज़ी और बेहूदगी की ज़िल्लत झेलनी पड़ती है तो निजी अस्पताल में सीने पर स्टेथोस्कोप रखकर लूटा जाता है। सरकारी अस्पताल में इलाज के अभाव में मरीज़ मर जाता है तो निजी अस्पताल में इतना इलाज मिलता है कि उसका मोल चुकाने में मरीज़ और उसके परिजन सब मर जाते हैं।
अस्पताल में कोई मरीज़ इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाता कि उसे जो मिल रहा है वह इलाज ही है या उसे कुछ दिन तक अस्पताल में टिकाए रखने का नुस्खा दिया जा रहा है।
अस्पताल प्रशासन ने डॉक्टर्स की नौकरी को बंदी बना रखा है कि यदि अमुक राशि हर महीने अस्पताल के खजाने में नहीं जमा करवाई तो आपकी नौकरी चली जाएगी। अपनी नौकरी की इज़्ज़त बचाने के लिए बेचारा डॉक्टर मरीज़ को एटीएम समझ कर उसमें दहशत का कार्ड डालता है और पैसे निकाल कर अस्पताल को फिरौती देता रहता है।
सरकार को यूरोप की तर्ज़ पर टैक्स लेने की सुध आ गई है लेकिन सरकार को यह याद नहीं आया कि ज़्यादा कर चुकाने वाले यूरोपवासियों को चिकित्सा पर एक भी पैसा ख़र्च नहीं करना पड़ता। वृद्धों के लिए हर सप्ताह डॉक्टर घर आता है और बच्चों के लिए हर महीने। दवाई से लेकर इलाज तक सब कुछ सरकार मुहैया करवाती है।
राजनीति की रोटियाँ सेंकने के लिए सरकारें बेशक देश को विकास के पोस्टरों से पाट दें लेकिन उससे पहले कृपया सही और पूर्ण इलाज के वरदान की सुविधा मुहैया करवा दें।

✍️ चिराग़ जैन

पाप

सिर्फ़ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है
हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है

शाइरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी
और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है

काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें
ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है

दौर इक ऐसा भी था, जब झूठ कहना मौत था
और अब ये हाल, सच की राह चलना पाप है

किस डरौने दौर में हम जी रहे हैं या ख़ुदा
घर में रहना ऐब है, घर से निकलना पाप है

पाप का दिल से निकल हरक़त में आना ज़ुर्म है
ज़ुर्म का भीतर ही भीतर दिल में पलना पाप है

✍️ चिराग़ जैन

रामसेतु

इन नासमझों का होगा नहीं रे कल्याण
रामधरा पर मांग रहे हैं रामलला के प्रमाण

श्रीराम बसे हैं आंगन में, पावन तुलसी की क्यारी में
श्री राम बसे हैं घर-घर में, आपस की दुनियादारी में
श्रीराम हमारी आँखों में, श्रीराम हमारे सपनों में
श्रीराम हैं सारे संबंधों में, सब रिश्तों में, अपनों में
बोलो कण-कण व्यापी का, कैसे करोगे परिमाण

मांगो प्रमाण रामायण के, इस भारत भू के कण-कण से
सरयू की निर्मल धारा से, और अवधपुरी के आंगन से
पूरब के उस मिथिलांचल से, पश्चिम के उस दंडक वन से
उत्तर के बृहत् हिमालय से, दक्षिण के उस भीषण रण से
देगा गवाही तुम्हें, सागर का थोथा अभिमान

ढूंढो शबरी के बेरों में, जंगल की दुर्गम राहों में
तिनकों की पावन कुटिया में, महलों की सिक्त निगाहों में
कब राम हुए थे ये पूछो, जंगल के हर इक वानर से
जिसने रावण को टक्कर दी, उस पंछी के टूटे पर से
भ्राता भरत से पूछो, पूजे थे जिसने पदत्राण

रामायण इस भारत भू के गौरव की अमर कहानी है
ये कथा हमारे पुरखों के पौरुष की एक निशानी है
रामायण केवल ग्रंथ नहीं, संस्कृति का ताना-बाना है
इस रामायण को झुठलाना, इस संस्कृति को झुठलाना है
इसमें बसा है अपने भारत का स्वर्णिम स्वाभिमान

जिनको पढ़ कर जीना सीखा, उनको मिथ्या बतलाते हैं
ये रावण के गोरे वंशज, राघव पर प्रश्न उठाते हैं
ये मैकाले के दूत भला तुलसी को क्योंकर मानेंगे
जो ख़ुद को जान नहीं पाए, रघुपति को क्या पहचानेंगे
आंखों पे पट्टी बांधे, करने चले हैं पहचान

✍️ चिराग़ जैन

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