Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
गुलों को ख़्वाब चमन के दिखा के छोड़ दिया
सवेरे हाल-ए-हक़ीक़त बता के छोड़ दिया
शिकस्त मुझसे बढ़ा देती दुश्मनी उसकी
उसे शिकस्त के नज़दीक ला के छोड़ दिया
अब अपने सच की गवाही कहाँ-कहाँ दूँ मैं
बस उनके झूठ से पर्दा हटा के छोड़ दिया
ज़माना उसके तरन्नुम में क़ैद है अब तक
जो गीत मैंने कभी गुनगुना के छोड़ दिया
मुझे नसीब भला आज़मा के क्या देखे
उसे ही मैंने अभी आज़मा के छोड़ दिया
वो सुर्ख़ हो गयी मेरी ज़रा-सी ज़ुर्रत से
फिर उसने हाथ मेरा मुस्कुरा के छोड़ दिया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
यार दहशत से समर्पन नहीं जीता जाता
रूप मिल सकता है, यौवन नहीं जीता जाता
क्या मरासिम की रवायत में कोई ख़ामी है
तन लिवा लाते हैं पर मन नहीं जीता जाता
एक झोंके की छुअन से ही बरस जाता है
आंधियो! शोर से सावन नहीं जीता जाता
सामने वाले के एहसास पे हारो ख़ुद को
प्यार का खेल है, जबरन नहीं जीता जाता
हौसला बनके सदा साथ में चलना मेरे
रंग और रूप से साजन नहीं जीता जाता
मार डाला था उसे ख़ुद के अकेलेपन ने
तीर-तलवार से रावन नहीं जीता जाता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
कौन आगोश में भरता था बिना मर्ज़ी के
लोग कहते हैं, यहाँ चाँद से खूँ टपका है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मैं अपनी हर जीत भुला दूँ, तुम बिसरा दो हार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को
जब धरती ने हरियाली का रूप सजाना छोड़ दिया
तब अम्बर ने बादल लेकर आना-जाना छोड़ दिया
कोई तो आकर्षण मिलता सावन की बौछार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को
दिन की हर तारीफ़ भुलाकर महक लुटाई रातों पर
ध्यान नहीं अटका ख़ुशबू का दुनिया भर की बातों पर
रातों ने होंठों से चूमा खिलते हरसिंगार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को
सबके जीवन में दुनिया की थोड़ी तो मजबूरी है
फिर भी हर इक रिश्ते में थोड़ा सम्मान ज़रूरी है
कब तक मथुरा ठुकराएगा गोकुल की मनुहार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished
सागर
मुक़द्दमा कर रहा है नदी पर
वादाखि़लाफ़ी का।
कहता है
मिलने का वादा करके
पहुँची ही नहीं
अब कोई प्रश्न नहीं है मुआफ़ी का।
नदी बेचारी
पर्वत की कृपणता
और मरुथल की वासना के बीच
बून्द-बून्द सिमटती रही
घाट-घाट घटती रही।
नदी के भीतर उग आई
सभ्यताओं ने
कठघरे में खड़ी नदी को
दोषी क़रार दिया
फ़ैसला सुनकर
पर्वत ने नदी से
मुँह फेर लिया
मरुथल ने उसके मुँह पर
धूल का तमाचा मार दिया।
और सागर…
…वह निरंतर
एक मीठी छुअन के अभाव में
मर रहा है
किसी नदी के वादा निभाने की
प्रतीक्षा कर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन