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मरासिम

यार दहशत से समर्पन नहीं जीता जाता
रूप मिल सकता है, यौवन नहीं जीता जाता

क्या मरासिम की रवायत में कोई ख़ामी है
तन लिवा लाते हैं पर मन नहीं जीता जाता

एक झोंके की छुअन से ही बरस जाता है
आंधियो! शोर से सावन नहीं जीता जाता

सामने वाले के एहसास पे हारो ख़ुद को
प्यार का खेल है, जबरन नहीं जीता जाता

हौसला बनके सदा साथ में चलना मेरे
रंग और रूप से साजन नहीं जीता जाता

मार डाला था उसे ख़ुद के अकेलेपन ने
तीर-तलवार से रावन नहीं जीता जाता

✍️ चिराग़ जैन

दोतरफ़ा पोषण

मैं अपनी हर जीत भुला दूँ, तुम बिसरा दो हार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को

जब धरती ने हरियाली का रूप सजाना छोड़ दिया
तब अम्बर ने बादल लेकर आना-जाना छोड़ दिया
कोई तो आकर्षण मिलता सावन की बौछार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को

दिन की हर तारीफ़ भुलाकर महक लुटाई रातों पर
ध्यान नहीं अटका ख़ुशबू का दुनिया भर की बातों पर
रातों ने होंठों से चूमा खिलते हरसिंगार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को

सबके जीवन में दुनिया की थोड़ी तो मजबूरी है
फिर भी हर इक रिश्ते में थोड़ा सम्मान ज़रूरी है
कब तक मथुरा ठुकराएगा गोकुल की मनुहार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को

✍️ चिराग़ जैन

वादा खि़लाफ़ी

सागर
मुक़द्दमा कर रहा है नदी पर
वादाखि़लाफ़ी का।
कहता है
मिलने का वादा करके
पहुँची ही नहीं
अब कोई प्रश्न नहीं है मुआफ़ी का।
नदी बेचारी
पर्वत की कृपणता
और मरुथल की वासना के बीच
बून्द-बून्द सिमटती रही
घाट-घाट घटती रही।
नदी के भीतर उग आई
सभ्यताओं ने
कठघरे में खड़ी नदी को
दोषी क़रार दिया
फ़ैसला सुनकर
पर्वत ने नदी से
मुँह फेर लिया
मरुथल ने उसके मुँह पर
धूल का तमाचा मार दिया।
और सागर…
…वह निरंतर
एक मीठी छुअन के अभाव में
मर रहा है
किसी नदी के वादा निभाने की
प्रतीक्षा कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

बारहमासा

मीत! तुम्हारी सुधियों का ये कैसा बारहमासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

पल में मुखड़े पर जगमग दीवाली-सी आ जाती है
पल में मन में चैत दुपहरी की वीरानी छाती है
पल में डरकर मन बेचारा पूस निशा-सा कँपता है
पल में आषाढ़ी चातक-सा चंद्रकिरण को तकता है
क्षणिक हताशा, क्षणिक पिपासा, क्षणिक मिलन अभिलाषा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

जब पुरवा के बहकाने से मन भरमाने लगता है
तब बिन मौसम की बारिश से खेत लजाने लगाता है
दुनियादारी के पचड़ों से आलस करने लगता है
इस बैरागी मन में महुए का रस झरने लगता है
मन संतृप्त हुआ बैठा है पर तन भूखा-प्यासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

इधर हृदय के पास अचानक जेठ पिघलने लगता है
उधर पुराने पल से तपकर अन्तस् गलने लगता है
सपनों के कजरारे बादल अम्बर तक बढ़ जाते हैं
धूप चढ़े तो इच्छाओं के मृग काले पड़ जाते हैं
इस पल शांत तथागत है मन, अगले पल दुर्वासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है

✍️ चिराग़ जैन

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