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सुनो कुम्हारो!

गारा गूँदो, चाक चलाओ
चाहे मिट्टी में सन जाओ
पर जिस दिन वह रूप धरेगी, जब वह एक सुराही होगी
उस दिन उसको छू लेने की तुमको सख़्त मनाही होगी

जब उसके भीतर का पानी जग की प्यास बुझाता होगा
जब हर आता जाता उसकी तारीफ़ें कर जाता होगा
तब उसको पछतावा होगा
उसके मन में लावा होगा
जिसने भट्ठी में सुलगाया
उसके ऊपर धावा होगा
जब उसकी मनचाही होगी, तनिक नहीं कोताही होगी
तुम पर निर्णय दुनिया देगी, उसकी सिर्फ़ गवाही होगी

तुम मत याद दिलाना उसको सौंपा है आकार तुम्हीं ने
उसके कोमल कच्चेपन को थामा है हर बार तुम्हीं ने
तब वह यही समझती होगी
निश्चित ही मैं सागर होती
हाथ तुम्हारा ना लगता तो
मैं अब से कुछ बेहतर होती
जब उसकी वाहवाही होगी, तब कुछ लापरवाही होगी
तब तुम उसकी फ़िक्र करोगे, तो वह तानाशाही होगी

✍️ चिराग़ जैन

मत पूछिए

शायरी में ढूंढ लेना सिसकियों की दास्तां
चश्मे-तर की सुर्ख़ियां अख़बार से मत पूछिए

आदमी होकर सियासत में दख़ल मुम्किन नहीं
आदमीयत का पता सरकार से मत पूछिए

दुश्मनी ही कर रहे हो तो ज़रा तल्ख़ी रखो
सच बता दूँगा मैं सब कुछ, प्यार से मत पूछिए

शुक्र है आवाज़ से महरूम होती है दुआ
किस क़दर ऊबा है घर, बीमार से; मत पूछिए

✍️ चिराग़ जैन

प्यार कहाँ खो बैठे

जिसको छू लेने से मन की महक गुलाबी हो जाती थी
जिसमें आँखें बतियाती थीं, हम वो प्यार कहाँ खो बैठे
जिसके दम पर हम दोनों का अपनापन गहरा होता था
जो हमको इक-दूजे पर था, वो अधिकार कहाँ खो बैठे

जाने कैसी ज़िद्द पनपी है, संवादों का स्वर ऐंठा है
तन पर मन भर बोझ चढ़ा है, मन ऐसा तन कर बैठा है
ख़ुशियों की क्यारी जिसके आलिंगन में फूला करती थी
जिसमें रिश्ता पंख पसारे, वो विस्तार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

बातें करने बैठ गए तो फिर बातों का छोर नहीं था
नयनों में बस मुस्कानों का डेरा था, कुछ और नहीं था
जो छोटी सी दुनिया हमको, दुनिया से अच्छी लगती थी
जिसमें अपने सब अपने थे, वो संसार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

आपस की सरगम ऐसी थी, खटपट से भी सुर सजते थे
पल भर सन्नाटा होता था, फिर घंटों नूपुर बजते थे
जो धागा हम-तुम दोनों को आपस में बांधे रखता था
जिससे हम हर बार जुड़े थे, वो इस बार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

✍️ चिराग़ जैन

सीख

मैंने
सीमेंट से सीखा है
कि जोड़ने के लिए
नर्म होना ज़रूरी है
और
जोड़े रखने के लिए
सख़्त…!

✍️ चिराग़ जैन

आस का पत्ता

ताल की आँखें सजल हैं
गन्ध की पाँखें विकल हैं
पेड़ पत्थर से हुए हैं
ख़्वाब नश्तर ने छुए हैं
पर अभी भी आस का दामन नहीं छूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

मुस्कुराहट पर बनावट का असर दिखने लगा है
हर क़दम पर अब कोई अनजान डर दिखने लगा है
नित नए अनुभव हमारी आस को खलने लगे हैं
रेत पर कुछ भ्रम हमारी प्यास को छलने लगे हैं
कष्ट बढ़ते जा रहे हैं
प्रश्न चढ़ते आ रहे हैं
आँख से आराम का सपना नहीं रूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

आँख के आगे कोई घेरा घनेरा छा गया है
है निपट एकांत, साये पर अंधेरा छा गया है
हर उजाला लुट चुका है, हर सहारा लुट चुका है
जो दिशा का ज्ञान देता वो सितारा लुट चुका है
आह का स्वर घुँट गया है
चाह का घर लुट गया है
हौसले का वक़्त ने झोला नहीं लूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

इस प्रतीक्षा के परे फिर से अहल्या श्वास लेगी
और शबरी के चखे हर बेर की क़िस्मत जगेगी
जानकी के पास सागर लांघ आएगी अंगूठी
भोर से पहले उठा ले आएंगे हनुमान बूटी
कष्ट जब हद से बढ़ेगा
देव को आना पड़ेगा
ये अटल विश्वास हो सकता नहीं झूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

✍️ चिराग़ जैन

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